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सुषमा स्वराज के ये 5 रिकॉर्ड कोई नहीं तोड़ पाएगा, कभी नहीं...

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6 अगस्त 2019. रात करीब 11 बजे खबर आई कि बीजेपी की वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का निधन हो गया है. उन्हें दिल का दौरा पड़ने के बाद एम्स लाया गया था, जहां उन्हें बचाया नहीं जा सका. देखते ही देखते वहां नेताओं का तांता लग गया. तांता तो लगना ही था. 25 साल में ही विधायक और मंत्री बनने वाली सुषमा का सफर ही ऐसा है. कभी अपने भाषणों से लुभाया तो कभी लोगों की मदद करके. साथ ही वो तमाम बड़े पदों पर रहीं, मगर इनमें कुछ खास हैं. बहुत खास. वो इसलिए क्योंकि वह ऐसा करने वाली पहली थीं. फर्स्ट विमिन. पहली महिला. ऐसे ही पदों के बारे में आपको बताते हैं-

1. 1977 में 25 साल की उम्र में सुषमा कैबिनेट मंत्री बनने वाली देश की सबसे कम उम्र की महिला थीं. उन्हें तब हरियाणा के मुख्यमंत्री बने चौधरी देवी लाल ने अपनी कैबिनेट में जगह दी थी. उनकी सिफारिश चंद्रशेखर और जेपी जैसे बड़े नेताओं ने की थी.

सुषमा स्वराज बीजेपी में बड़े कद की नेता थीं.
सुषमा स्वराज बीजेपी में बड़े कद की नेता थीं.

2. विदेश मंत्री बनने वाली वो देश की पहली महिला थीं. हालांकि इंदिरा गांधी के पास भी विदेश मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार रहा है. जब वो प्रधानमंत्री थीं. मगर अकेले ये पद सबसे पहले सुषमा ने ही संभाला.

3. दिल्ली की मुख्यमंत्री बनने वाली वो पहली महिला थीं. दिल्ली चूंकि यूनियन टेरिटरी थी और वहां विधानसभा नहीं थी. मगर फिर 1991 में कानून में बदलाव कर यहां चुनाव की अनुमति मिली. 1993 में चुनाव हुए और बीजेपी के मदन लाल खुराना सीएम बने. तीन साल रहे. फिर साहिब सिंह वर्मा ने कमान संभाली मगर वो भी टर्म पूरा नहीं कर सके. और बचे 3 महीने के लिए सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया. 1998 में हुए चुनाव में बीजेपी दिल्ली में हारी. कांग्रेस आई और शीला दीक्षित ने मुख्यमंत्री की गद्दी संभाली.

अटल बिहारी वाजपेयी ने भी उन्हें अपनी कैबिनेट में जगह दी थी.
अटल बिहारी वाजपेयी ने भी उन्हें अपनी कैबिनेट में जगह दी थी.

4. भाजपा की पहली महिला मंत्री. साथ ही पार्टी की ओर से बनने वाली पहली महिला केंद्रीय मंत्री. सन 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें अपनी सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय दिया था. इसके बाद वो सरकार जाने तक अलग-अलग मंत्रालय संभालती रहीं.

5. 2009 में विपक्ष की पहली महिला नेता यानी नेता प्रतिपक्ष बनीं. 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की हार के बाद पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी का कद घटा था. सेकंड लीग के नेताओं में सुषमा सबसे आगे थीं. उनके सामने दो ऑप्शन थे. या तो वो राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए दावेदारी करें या संसद में नेता प्रतिपक्ष का पद चुनें. सो उन्होंने नेता प्रतिपक्ष बनना ज्यादा बेहतर समझा. और इतिहास रच दिया. पद से भी और अपने भाषणों से भी.


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