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वो 5 ताकतवर पोलिटिकल थ्रिलर्स जो आपको अभी घर बैठे ज़रूर देखनी चाहिए

कोरोना. लोकडाउन. सोशल डिस्टेंसिंग. सेल्फ-आइसोलेशन. घर की कैद. और फड़फड़ाहट. मन हुआ कि चलो फिल्में देखें. लेकिन मूवी चैनल्स पर वही फिल्में आ रही हैं जो दर्जनों बार देखी हुई हैं. तो ऑनलाइन. हां. यहां बहुत ऑप्शंस हैं. लेकिन हज़ारों लाखों में से देखें क्या? जो ग्रिपिंग हो. जोरदार हो. याद रहे. मज़ा आए.

तो हाज़िर हैं वो 5 फ़िल्में जो पोलिटिकल थ्रिलर/ड्रामा श्रेणी में आपको ज़रूर देखनी चाहिए.

शुरू करने से पहले जान लेते हैं कि ये पोलिटिकल थ्रिलर जॉनर/श्रेणी होता क्या है?

सरल शब्दों में कहें तो वो कहानी जिसमें किसी न किसी तरह का राजनीतिक/पोलिटिकल संघर्ष हो.

इसमें कई कैरेक्टर हो सकते हैं. उनकी अपनी-अपनी कहानियां, उप-कहानियां हो सकती हैं. माना जाता है कि आवश्यक रूप से इसमें एक हीरो, एक विलेन और एक वास्तविक लगने वाली कहानी ज़रूर होनी चाहिए.

1. न्यू डेल्ही टाइम्स (1986)

विकास पांडे न्यू डेल्ही टाइम्स का एक ईमानदार पत्रकार है. एक दिन उसे एक राजनीतिक मर्डर के बारे में मालूम चलता है. मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए सरगर्मियां ज़ोरों पर है. साथ ही साथ ज़हरीली शराब की वजह से सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है. विकास छानबीन करता है, तो कड़ियां जुड़ने लगती हैं. और सामने आती है राजनेताओं और मीडिया के पावरफुल लोगों के बीच चल रही साठ-गांठ. कौन बचेगा, कौन फंसेगा?

ये फिल्म इतनी कॉन्ट्रोवर्शियल थी, कि डिस्ट्रीब्यूटर और टीवी वालों ने दिखाने से मना कर दिया था. लेकिन बाद में शशि कपूर अभिनीत इस फिल्म को तीन नेशनल अवॉर्ड मिले.

डायरेक्टरः रमेश शर्मा

कहां देखेंः बताया जाता है कि इस फिल्म को ऑनलाइन लाने पर काम चल रहा है. अभी यूट्यूब पर इसका एक ख़राब प्रिंट है जिसे देखा जा सकता है.

2. ज़ी (1969)

फिल्म शुरू होती है राइट-विंग सरकार के एक पुलिस अफसर के भाषण से. ‘लेफ्ट’ एलिमेंट्स से लड़ने के लिए सरकार का प्रोग्राम बताया जा रहा है. दूसरी तरफ रैली में भाषण हो रहा है न्यूक्लियर हथियारों के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए. पुलिस द्वारा भेजे गए गुंडे रैली में तोड़फोड़ करते हैं. भाषण दे रहे एक्टिविस्ट को मरवा दिया जाता है. कहा जाता है कि रोड एक्सीडेंट हो गया. लेकिन एक डॉक्टर पोस्ट-मॉर्टम में झूठ बोलने से मना कर देता है. एक फोटोजर्नलिस्ट सबूत के तौर पर फोटो पेश करता है. एक्टिविस्ट के मर्डर में दो राइट-विंग आतंकवादियों के साथ चार मिलिट्री पुलिस अफसर भी जांच के दायरे में आते हैं. देखना यह है कि जज बिक जाएगा या नहीं.

फ्रेंच भाषा की इस फिल्म ने कान फिल्म फेस्ट में दो अवॉर्ड जीते थे. ‘ज़ी’ दरअसल वसिली वसिलीकोस के इसी नाम वाले नॉवेल पर बेस्ड फिल्म है जिस पर बाद में 2012 में दिबाकर बैनर्जी ने अपनी फिल्म ‘शंघाई’ बनाई.

डायरेक्टरः कोस्टा गावराज़

कहां देखेंः यहां यूट्यूब पर

3. सीरियाना (2005)

अमेरिका की एक कंपनी का गल्फ किंगडम की ऑयल फ़ील्ड्स से कंट्रोल छूटता जा रहा है. इस कंपनी पर भ्रष्टाचार का केस भी चल रहा है. फिर ये कंपनी कज़ाक़स्तान की एक छोटी सी कंपनी के साथ मर्जर कर लेती है, जिसके पास वहां के पेट्रोलियम फ़ील्ड्स के अधिकार है. अरब के प्रिंस नासिर चीन की एक कंपनी को नेचुरल गैस निकालने का कॉन्ट्रैक्ट दे देते हैं. अब अमेरिकी सरकार के लिए भी ये भी चिंता का विषय है. इस सबके बीच एक अमेरिकी सीआईए एजेंट हथियारों की गैर-कानूनी तस्करी की छानबीन में लगा है. और उसके सामने इस पूरी कहानी के चिट्ठे उघड़ते हैं.

डायरेक्टरः स्टीफन गेगन

कहां देखेँः हंगामा डॉट कॉम पर यहां क्लिक करके 

Syriana Movie Watch Online Freee
‘सीरियाना’ के एक सीन में मैट डेमन और जॉर्ड क्लूनी. ये एक जियोपोलिटिकल थ्रिलर भी कहलाती है.

4. आयुदा इड़त्तु (2004)

ये कहानी तीन युवकों के बारे में है. माइकल जो मद्रास यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट लीडर है. उसका बड़ा प्रभाव है. वो किसी से नहीं डरता. नेताओं को पसंद नहीं करता जो गंदी पॉ़लिटिक्स करते हैं. छात्रों के हक उसे बड़े प्यारे हैं. दूसरा है अर्जुन जो एक आई.ए.एस. अफसर का बैठा है. लाइफ का कोई सीरियस गोल नहीं है. अमरीका जाना है. उससे पहले एक लड़की के प्यार में पड़ जाता है, जो अपना प्यार कन्फर्म नहीं कर रही है. उसी के पीछे जाते हुए एक दिन माइकल से लिफ्ट लेता है और दोस्ती हो जाती है. फिर सीरियस होना चालू होता है लाइफ के प्रति. तीसरा है इंबा जो एक लोकल गुंडा है. जब माइकल अपने साथियों के साथ चुनाव में खड़ा होता है तो एक नेता डराने के लिए इंबा को भेजता है. सब हथकंडे अपनाता है. लेकिन इस इलेक्शन में जीतता कौन है, ये अंत में दिखता है.

डायरेक्टरः मणिरत्नम. जिन्होंने बाद में इसी फिल्म को नए कलाकारों के साथ ‘युवा’ नाम से हिंदी में भी बनाया.

कहां देखेंः यहां यूट्यूब पर

5. एनिमी ऑफ़ द स्टेट (1998)

अमेरिकी कॉन्ग्रेस आतंकवाद से लड़ने के लिए एक नया बिल लेकर आ रही है. जो अगर पास होता है तो नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी (एएसए) को नागरिकों और समूहों की निगरानी करने की बहुत ज्यादा ताकत मिल जाएगी. एनएसए का अधिकारी रेनल्ड्स चाहता है कि बिल पास हो ताकि उसका फायदा हो जाए. लेकिन एक अमेरिकी सांसद इसका विरोध करता है. एक दिन वो सांसद मर जाता है. उसकी मौत का सबूत एक वाइल्डलाइफ रिसर्चर के कैमरे में गलती से कैद हो जाता है. हत्यारे उसके पीछे पड़ जाते हैं. वो भाग रहा होता है और अपने एक वकील दोस्त डीन से टकरा जाता है और वीडियो टेप उसके बैग में छुपा देता है. उस दिन के बाद से डीन की लाइफ बदल जाती है. या कहें तो बर्बाद हो जाती है. उसे झूठे केस में फंसा दिया जाता है. अब वो जान बचाकर भाग रहा है. एनएसए के सैटेलाइट और सारे सर्वेलेंस उसे ढूंढ़ रहे हैं. चप्पे चप्पे पर. अब आगे क्या होता है और कैसे वो खुद को निर्दोष साबित करता है ये दिखाई देता है.

डायरेक्टरः टोनी स्कॉट

कहां देखेँः यहां यूट्यूब पर. 50 रुपये में.

Video: इस फिल्म को बनाने के दौरान मौत शाहरुख ख़ान को छूकर निकली थी!

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