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इंडिया का वो ऐक्टर, जिसे देखकर इरफ़ान ख़ान और नवाज़ुद्दीन भी नर्वस हो जाएं

पढ़िए उनकी पांच बेहतरीन भूमिकाओं के बारे में.

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वो जासूस था. लेकिन जासूस कम मसखरा ज़्यादा लगता था. जब असिस्टेंट किटी उसकी तारीफ़ करती थी, तो एक ही फिकरा चिपकाता था. “शटअप किटी’. हमेशा काला चश्मा लगाता था. गाजर खाता रहता था. नाम था ‘करमचंद’.

1985 का टेलीविज़न. सिर्फ दूरदर्शन आता था. वो भी पूरे दिन नहीं. गिने-चुने प्रोग्राम. इन्हीं में से था जासूसी सीरियल ‘करमचंद’. शीर्षक भूमिका निभानेवाला अभिनेता इससे पहले ‘गांधी’, ‘आरोहन’ और ‘मंडी’ जैसी फिल्मों में संजीदा भूमिकाएं निभा चुका था. ऐसे में एक अलग ही रंग का रोल इतनी आसानी से निभा ले जाना बड़ी बात थी. वो भी इस तरह कि इंडियन टेलीविज़न में वो शो और उसका मुख्य किरदार क्लासिक का दर्जा पा गया. ऐक्टर थे ‘पंकज कपूर’. अपने अभिनय की ज़बरदस्त रेंज का ट्रेलर ‘करमचंद’ में दिखा चुके पंकज कपूर ने आगे चल कर अपने करियर में एक से बढ़ कर एक उम्दा भूमिकाएं की. आज इन्हीं में से कुछेक की बात करेंगे.

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पंकज कपूर का जन्म 29 मई 1954 को हुआ था.


1. एक डॉक्टर की मौत

 “इसका मतलब आप लोग मुझे यहीं ख़त्म कर देना चाहते हैं. मैं स्वीकार करता हूं मैंने कोई वैक्सीन नहीं बनाया. आई सरेंडर.”

फिल्म के क्लाइमेक्स में डॉक्टर दीपंकर रॉय का ये कह कर हथियार डाल देना एक टैलेंटेड वैज्ञानिक के जीवन में घिर आई हताशा का उच्चतम पॉइंट है. जो शख्स कड़ी मेहनत और संसाधनों की कमी से नहीं हारा, वो लालफीताशाही और कुछ सूट-बूट वाले मूर्खों की हठधर्मी से नहीं जीत पाया. कुष्ठरोग की दवाई ढूंढने में अपनी तमाम ज़िंदगी दी इस वैज्ञानिक ने. और जब कामयाबी मिली तो एहसासे-कमतरी की मारी भारतीय अफसरशाही ये मानने को तैयार ही नहीं हुई कि विदेशी वैज्ञानिकों से पहले किसी भारतीय ने ये काम कर दिखाया है.

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अपने अड़ियल रवैये के चलते अफसर उनके काम को मानने से इंकार करते रहते हैं और दुनिया के किसी और कोने में कोई और ही इस वैक्सीन की ईजाद का दावा ठोक देता है. डॉ दीपंकर रॉय हताश होते हैं. लेकिन मानवता की सेवा में अपने ‘काम करते रहने के’ इरादे को अमलीजामा पहनाने में फिर से जुट जाते हैं.

ये भूमिका पंकज कपूर का स्टैंड आउट परफॉरमेंस है.


2. धर्म

किरदार में कैसे घुसना है ये कोई पंकज कपूर से सीखे. वो इस फिल्म में सिर्फ और सिर्फ ‘पंडित राम नारायण चतुर्वेदी’ लगे हैं और कुछ नहीं. चतुर्वेदी जी एक कट्टर हिंदू ब्राह्मण हैं. शास्त्रों के ज्ञाता हैं. जैसा धर्म उन्होंने घोट रखा है, वैसा ही जीते आए हैं. स्वभाव से नर्मदिल हैं लेकिन धर्म से कोई समझौता नहीं कर सकते. इसीलिए जब कोई अछूत छू जाता है तो उसे पीटते तो नहीं, लेकिन दोबारा स्नान ज़रूर करते हैं. एक मुस्लिम बच्चे को अज्ञानता में घर में पनाह देने का प्रायश्चित घर का शुद्धिकरण करके करते हैं. धर्म की किताबी परिभाषा को जीवन में उतारे पंडित जी की जब ‘धर्म बड़ा या मानवता’ के बुनियादी सवाल से मुठभेड़ होती है तो उनकी ज़िंदगी बदल जाती है.

'धर्म' को उस साल ऑस्कर में न भेजे जाने की आलोचना भी हुई थी.
‘धर्म’ को उस साल ऑस्कर में न भेजे जाने की आलोचना भी हुई थी.

‘धर्म’ के आज के दौर में एक बेहद ज़रूरी फिल्म है. और इसमें पंकज का अभिनय ऐसा है जैसे एवरेस्ट. जिसके बाद छूने को कुछ ना बचे.


3. एक रुका हुआ फैसला

एक लड़के पर अपने बाप के क़त्ल का इल्ज़ाम है. 12 ज्यूरी मेम्बर्स को फैसला करना है कि लड़का दोषी है या नहीं. 11 लोग उसे दोषी मानते हैं. सिर्फ 1 आदमी है जो इतनी जल्दी फैसला देने को राज़ी नहीं. धीरे-धीरे वो अकेला शख्स अपने तर्कों से बाकियों को कायल करने लगता है. इस तमाम वक्फे में छोटे से कद का एक आदमी लड़के को निर्दोष मानने वाले हर एक बंदे के साथ पर्सनल दुश्मन जैसा व्यवहार करता है. यही आदमी है पंकज कपूर.

ये फिल्म अंग्रेज़ी मूवी '12 एंग्री मैन' का रीमेक थी.
ये फिल्म अंग्रेज़ी मूवी ’12 एंग्री मैन’ का रीमेक थी.

बाद में खुलता है कि अपने बेटे के साथ नाकाम रिश्ते की सज़ा वो उस लड़के को देना चाहता है. अंत में टूटकर रोते हुए जब वो ‘नॉट गिल्टी’ कहता है, तो पूरी फिल्म में उससे नफरत करने वाला दर्शक उसके लिए मन में तरस लिए घर लौटता है. पंकज कपूर की ये भूमिका आला एक्टिंग के साथ-साथ मैनरिज्म के लिए भी याद रखी गई. बात-बात पर होठों पर ज़ुबान फेरते रहने की उनकी आदत को दर्शकों ने खूब एन्जॉय किया.


4. रुई का बोझ

पंकज कपूर की कम चर्चित फिल्म. बहुतों को तो पता भी नहीं. भारतीय परिवार संस्था के उतार-चढ़ाव का सटीक चित्रण है ये फिल्म. किशन शाह अपने बुढ़ापे में प्रवेश करते ही अपनी सारी जायदाद अपने बच्चों में बांट देता है. और अपने छोटे बेटे के साथ रहना शुरू कर देता है. बेटे-बहू से ना बनने पर पूरी दुनिया से ही खफ़ा हो जाता है. सब कुछ छोड़-छाड़ कर अकेले रहने की ज़िद पकड़े घर से निकलता है. लेकिन आधे रास्ते से ही लौट आता है. क्यों ये फिल्म में देखिए.

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रुई का बोझ पंकज कपूर के साथ-साथ पिछले साल दिवंगत हुई रीमा लागू के उम्दा अभिनय के लिए भी देखी जानी चाहिए.


5. द ब्लू अम्ब्रेला

बेहद स्वीट फिल्म. यूं तो विशाल भारद्वाज और पंकज कपूर ने ‘मकबूल’ जैसी शानदार फिल्म भी दी है, लेकिन मुझे व्यक्तिगत रूप से ये फिल्म ज़्यादा पसंद है. एक नीली छतरी के लिए लोकल दुकानदार खत्री जी का मोह कल्पना से परे है. और उसे हासिल करने के लिए भिड़ाई गई उसकी तरकीबें, लालच दिमाग पर हावी होने के बाद क्या होता है इसका लेखाजोखा है. पहले इज्ज़त और बाद में हासिल ज़िल्लत से डील करता ‘खत्री’ रुपहले परदे पर ज़िंदा करना, अगर किसी के बस का था तो वो थे पंकज कपूर.

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हिंदी सिनेमा स्टार सेंटर्ड सिनेमा है. हीरो ही सबकुछ होता है यहां. स्टारडम की चकाचौंध के बीच भी जो कलाकार अपनी चमक बनाए रखते हैं, उनका कद यकीनन बेहद ऊंचा हो जाता है. पंकज कपूर तमाम बड़े स्टारों जैसा अभिनय कर के दिखा सकते हैं. लेकिन चेहरे के हावभाव से अभिनय की बारीकियों को दिखाने का उनका हुनर बड़े-बड़े स्टार्स की भी पहुंच के बाहर है. यही चीज़ उन्हें ख़ास और हिंदी सिनेमा के लिए ज़रूरी बनाती है.


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