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शोले के 'रहीम चाचा' जो बुढ़ापे में फिल्मों में आए और 50 साल काम करते रहे

# सब लोग अच्छे होते नहीं, सब बुरे भी नहीं होते.

# इस देश को क्रांति की जरूरत है और मुझे पूरा विश्वास है कि वो जरूर आएगी. नहीं तो भारत में अराजकता हो जाएगी, धर्मनिरपेक्षता आंदोलन और लोकतांत्रिक मूल्य हार जाएंगे.

# किरदारों की लंबाई मेरे लिए कभी महत्वपूर्ण नहीं रही, मेरे लिए कैरेक्टर प्रमुख रहे. अगर आप हीरो के रोल से शुरू करो तो आप वही रहोगे. आप कभी एक्टर नहीं बन पाओगे.

# लोग कहते कि आप बहुत इमोशनल बहुत हैं, मैं कहता हूं इमोशनल तो हूं क्योंकि मैं एक्टर हूं. इमोशनल नहीं होता तो इतने रोल जो आपने देखे वो मैं नहीं कर सकता था.

# हालात ने इंसान को पैदा किया है, इंसान ने हालात को पैदा नहीं किया. और फिर इंसान हालात बदलता है, ये बात है.

– ए. के. हंगल

अवतार किशन हंगल पूरी जिंदगी शंभू काका, रामू काका, नाना, पिता, नेता, स्कूल मास्टर, रिटायर्ड जज, डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर, पंडित, संत, कर्नल, पुजारी, दीवान और प्रिंसिपल जैसी छोटी भूमिकाएं करते रहे लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी और समाज-राजनीति-मानवता को लेकर उनकी सोच ऐसी थी कि उस पर एक पूरी प्रेरणादायक फिल्म बन सकती है. ऐसी फिल्म जिसमें वो हीरो होंगे. हालांकि वे मानते थे कि स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर उन्होंने जो डंडे और गोलियां खाईं उस असल पिक्चर में वो ही हीरो थे.

फरवरी 1917* (1914 भी माना जाता है) में पंजाब के सियालकोट (तब भारत में) में उनका जन्म हुआ जहां फैज़ अहमद फैज़ जन्मे थे. परिवार में ज्यादातर लोग ब्रिटिश सरकार के अधीन नौकरियां करते थे, अच्छे पदों पर थे. लेकिन हंगल आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे. कई बार जेल गए. भगत सिंह से बेहद प्रभावित हुए और उनकी राह पर वामपंथी विचारधारा को अपना लिया.

एके हंगल
एके हंगल

2012 में अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की अपनी सदस्यता का नवीनीकरण करवाया था. एक इंटरव्यू में ए. के. हंगल ने कहा था, “मुझे स्पष्ट तौर पर याद है वो दिन जब भगत सिंह को गिरफ्तार किया गया था. जिस दिन उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था. तब पठान रोए थे और लोग उनका नाम पुकारते हुए सड़कों पर निकल आए थे.”

कराची में विचारधारा के कारण उन्हें तीन साल जेल में डाल दिया गया. फिर उन्हें वो शहर छोड़ना पड़ा और वे 1949 में बॉम्बे चले गए. वहां पहुंचे तो जेब में सिर्फ 20 रुपये थे.

पहले उन्होंने दिल्ली में टेलरिंग का काम सीखा था. तो साउथ बॉम्बे में आनंद जेंट्स नाम की दुकान पर टेलर का काम शुरू किया. फिर मुंबई के क्रॉफर्ड मार्केट में अपना खुद का काम शुरू किया. 1964 में उन्होंने टेलरिंग का काम छोड़ा.

अभिनय वे काफी पहले से शुरू कर चुके थे. कोई बीस बरस की उम्र में 1937 में उन्होंने अपना पहला नाटक कर लिया था. रंगमंच से जुड़े रहे. फिर 1950 में नाट्य संस्था इप्टा से जुड़ गए. अभिनय जबरदस्त करने लगे थे. फिर फिल्मों में प्रवेश किया. हंगल कहते थे कि जब लोग रिटायर होते हैं तब मैंने फिल्मों में एंट्री ली.

ये हुआ 1966-67 में जब उनकी उम्र करीब 50 की थी. सुबोध मुखर्जी की फिल्म ‘शागिर्द’ उन्होंने की. उन्हें निर्देशक बासु भट्‌टाचार्य ने ‘तीसरी कसम’ में राज कपूर के भाई के रोल में लिया.

आगे उन्होंने अभिमान, आनंद, परिचय, गरम हवा, अवतार, मेरे अपने, गुड्‌डी, शोले, बावर्ची, कोरा काग़ज, शौकीन, आंधी, दीवार, चितचोर, सत्यम शिवम सुंदरम, मीरा, शराबी, अर्जुन, मेरी जंग, लगान, पहेली जैसी करीब 225 फिल्मों में काम किया.

 

लगान (2001) में शंभू काका के रोल में हंगल और आमिर.
लगान (2001) में शंभू काका के रोल में हंगल और आमिर.

इनमें उन्हें सबसे ज्यादा लोकप्रियता रमेश सिप्पी की 1975 में प्रदर्शित फिल्म ‘शोले’ में रहीम चाचा के रोल से मिली. जिसमें उनका संवाद “इतना सन्नाटा क्यों है भाई” पॉपुलर कल्चर में बहुत इस्तेमाल होता है. आमिर खान के साथ ‘लगान’ उनकी आखिरी बड़ी फिल्म थी.

वे आजीवन सैंटा क्रूज के एक छोटे से फ्लैट में रहे. उन्होंने कभी भी धन या बड़ा बैंक बैलेंस नहीं बनाया. निजी जीवन में भी वे अकेले ही रहे. उनके सिर्फ एक पुत्र हैं जो खुद बेहद बुजुर्ग हो चुके हैं और सक्रिय नहीं हैं. हंगल की पत्नी और बहू का देहांत काफी पहले ही हो चुका था. जीवन में कई अंतिम वर्षों में बीमारी, धन की तंगी से जूझते हुए उनकी मृत्यु हई.

उनकी तमन्ना थी कि लंबे समय तक जीवित रहें और काम करते रहें. आंशिक रूप से ये पूरी भी हुई. 2011 में 94 की उम्र में वे फैशन डिजाइनर रियाज़ गंजी के शो-स्टॉपर बने.

शो-स्टॉपर हंगल के साथ मॉडल सोफिया हयात.
शो-स्टॉपर हंगल के साथ मॉडल सोफिया हयात.

आखिरी बार वे 2012 में टीवी सीरियल ‘मधुबाला – एक इश्क एक जुनून’ में अतिथि भूमिका में नजर आए. उसी साल 95 की उम्र में 26 अगस्त को उनकी मृत्यु हो गई.

पद्मभूषण से सम्मानित मामूली भूमिकाओं वाले इन महान अभिनेता को इन पांच किस्सों में हम याद करते हैं:

1. बूढ़े हंगल को लड़की लंपट मान बैठी

फिल्म ‘शौकीन’ (1982) में उन्होंने एक लंपट बुजुर्ग का रोल किया था. इसमें उनके साथ अशोक कुमार और उत्पल दत्त जैसे दिग्गज भी थे. उन्होंने ज्यादातर भले आदमियों वाले ही रोल किए, लेकिन ये ग्रे शेड वाला रोल भी किया तो लोगों को याद रहा. वे 80 बसंत पार कर चुके थे. एक बार दिल्ली में एक फाइव स्टार होटल में वे डिनर कर रहे थे और उसके बाद उन्हें अपने दोस्त के घर जाना था. उन्हें पहुंचाने का काम करीब 20 साल की युवती को सौंपा गया. उसने फुसफुसाते हुए अपने बॉस से कहा, ‘सर, मैंने शौकीन देखी है’. इसके बाद हंगल को छोड़ने के लिए एक पुरुष को भेजा गया.

2. अभिनय ऐसा कि पुलिसवाले ने असली मान लिया

फिल्म ‘नमक हराम’ में उन्होंने ट्रेड यूनियन लीडर का रोल किया था. उसे देखकर बॉम्बे के एक पुलिसवाले को यकीन हो गया कि हंगल यूनियन वगैरह में बड़ा अनुभव रखते हैं. उसने हंगल की कार शहर के क्रॉफर्ड मार्केट में रोक दी और उनसे पूछा कि वह पुलिसकर्मियों की यूनियन शुरू करना चाहता है और इसे कैसे किया जा सकता है? हंगल ने कहा कि वे सिर्फ एक एक्टर हैं और ट्रेड यूनियनों से उनका कोई लेना देना नहीं है.

3. बाल ठाकरे ने एंटी-नेशनल बोलकर बैन करवा दिया

ये 1993 की बात है जब भारत में पाकिस्तानी कौंसुल जनरल के दफ्तर में पड़ोसी मुल्क का स्वतंत्रता दिवस मनाया गया जिसमें हंगल भी शामिल हुए. वे वहां वीज़ा लेने गए थे ताकि अपने जन्मस्थान जा सकें जहां उन्होंने अपनी जिंदगी के शुरुआती 25 साल भी गुजारे थे. लेकिन बॉम्बे में शिवसेना के बाल ठाकरे ने उन्हें एंटी-नेशनल करार दे दिया. उन्हें बहुत दुखों का सामना करना पड़ा. उन्हें फिल्मों में लेने पर अघोषित बैन लगा दिया गया. शिवसेना के कारण सिनेमाघर वालों ने उन फिल्मों को हटा लिया जिनमें हंगल थे. निर्माणाधीन फिल्मों से हंगल के रोल काट दिए गए. उन्होंने एक साल बहुत मानसिक और आर्थिक कष्टों का सामना किया. फिल्म उद्योग के लोगों ने भी उनका साथ नहीं दिया. सिर्फ थियेटर समूहों और मीडिया ने उनका साथ दिया. दो साल तक उन्हें काम नहीं मिला. हालांकि बाद में बाल ठाकरे ने पलटी खा ली और कहा कि उन्होंने कोई बैन नहीं लगाया था. हंगल बहुत आहत थे. उन्होंने कहा था, “मैं अपना सब कुछ पीछे छोड़कर कराची से भारत आया था लेकिन फिर भी मुझे पाकिस्तानी घोषित कर दिया गया”. उन्होंने कहा कि “मैं बाल ठाकरे के पिता (प्रबोधंकर ठाकरे) को भी जानता था लेकिन उन दिनों में इस शहर का मिजाज बहुत कुरूप हो गया था”. तब लोगों को ये भी याद नहीं रहा कि हंगल बहुत पहले संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन का हिस्सा रहे थे. उनके दादा शंभु नाथ पंडित आज़ाद भारत से पहले कलकत्ता हाई कोर्ट के पहले भारतीय जज थे. कलकत्ता में आज भी उनके नाम से सड़क और अस्पताल बने हैं.

हंगल.
हंगल.

4. संजीव कुमार को नाटक में रोल दिया

फिल्मों में आने से पहले हंगल थियेटर समूह भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े हुए थे. उन्होंने बलराज साहनी और कैफी आज़मी के साथ मिलकर कई सार्थक नाटक किए. इनमें उन्होंने गरीब और अमीर के बीच की खाई और गरीबों के शोषण जैसे मसले उठाए. उन्होंने सामाजिक व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला. ऐसे ही एक नाटक में उन्होंने 25 साल के संजीव कुमार को रोल दिया था.

5. पाकिस्तान एयरपोर्ट पर लोगों ने घेर लिया

एक बार हंगल सोवियत संघ से लौट रहे थे. किसी टेक्नीकल समस्या के कारण उनका प्लेन कराची एयरपोर्ट ले जाया गया. वे एयरपोर्ट पर पहुंचे तो लोगों ने उन्हें पहचान लिया और घेर लिया. सब उनसे बॉलीवुड स्टार्स और अपने बारे में पूछने लगे. हंगल ने याद किया कि लोगों की बॉलीवुड में इतनी ज्यादा दिलचस्पी थी कि उनका ध्यान इस ओर भी नहीं गया कि उनके मुल्क के राष्ट्रपति ज़िया-उल-हक़ उसी दिन हवाई दुर्घटना में मारे जा चुके थे.


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