Submit your post

Follow Us

वो राइटर, जिसने दिलीप कुमार और शाहरुख़ खान के करियर को पंख लगाए

बंगाली साहित्य की बात हो और रबीन्द्रनाथ टैगोर का ज़िक्र ना हो, ये आमतौर पर नहीं होता है. बांग्ला भाषा के टॉप साहित्यकारों में गिने जाने वाले टैगोर एक जबरदस्त शख्सियत थे. उनके जोड़ का काम हमें कम ही देखने को मिलता है. लेकिन उसी दौर में एक और साहित्यकार थे, जिनका योगदान बंगाली साहित्य में टैगोर के बराबर ही था. लेकिन इनका जीवन टैगोर के ठीक उलट था. गरीबी में पले-बढ़े, पापा-मम्मी के पैसे कॉलेज भेजने का भी पईसा नहीं था. पैसे की दिक्कत से पढ़ाई तो नहीं कर पाए, लेकिन इससे उनकी तेजी में कोई कमी नहीं आई. उन्होंने बांग्ला में बहुत नॉवेल्स और कहानियां लिखीं, जिनके कैरेक्टर्स बड़े मजेदार होते थे. यहां साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की बात हो रही है. इनका का जन्म 15 सितम्बर, 1876 को हुआ था. उनकी कहानियां इतनी जबर होती थीं कि कई भाषाओं में ट्रांसलेट की जाती थीं. आज उनकी जिंदगी और लेखन से जुड़े कुछ रोचक किस्से जानिए.

इतने बड़े लेखक होने के बावजूद इनकी एक भी ढंग की तस्वीर इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है. इसे बदकिस्मती नहीं तो और क्या कहेंगे.
इतने बड़े लेखक होने के बावजूद इनकी एक भी ढंग की तस्वीर इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है. इसे बदकिस्मती नहीं तो और क्या कहेंगे?

1. ‘आवारा मसीहा’

हिंदी भाषा के मशहूर साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने शरत की बायोग्राफी ‘आवारा मसीहा’ के नाम से ही प्रकाशित करवाई थी. आवारा मसीहा का मतलब होता है मतलब एकदम फक्कड़ आदमी. इंग्लिश में तो इसके लिए एक टर्म भी है ‘बोहेमिया’. अरे वो रैपर बोहेमिया नहीं, जो नाक में पिन पहिन के घूमता है. ये एक शब्द है जिसका मतलब होता है अपनी मर्जी से चलने वाला आदमी. कला को जिंदगी मान लेने वाला, जो समाज के बनाए रीति-रिवाज़ों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देता. फक्कड़, मनमौजी चाहे जो कह लीजिए. अगर इंग्लिश भाषा से कोई शब्द आता है तो उसका हिंदी करने में हम जो महिमामंडन करते हैं, बोहेमिया के साथ भी वही हुआ है. मतलब कुल जमा शरतचंद्र अपने टाइम के ‘कूल’ आदमी थे.

एक तरफ 'आवारा मसीहा' वहीं दूसरी ओर उसका कलयुगी अर्थ.
एक तरफ ‘आवारा मसीहा’ वहीं दूसरी ओर उसका कलयुगी अर्थ.

2. पढ़ाई में अव्वल थे

पहले के ज़माने में अगर कोई पढ़ने में अच्छा होता था, तो लोग उनसे क्लास स्किप करवा देते थे. शरत चंद्र के साथ भी कुछ ऐसा हुआ था. पढ़ाई में इतने तेज़ थे कि टीचर्स ने कहा टाइम काहे ख़राब कर रहे हो 5वीं-6वीं पढ़ने की जरूरत नहीं है, सीधे 7वीं में दाखिला ले लो. लेकिन बुरी किस्मत कि बेचारे सिर्फ स्कूल वाली पढ़ाई ही कर पाए. पैसे की कमी के कारण कॉलेज में एडमिशन नहीं हो पाया. घर में पैसे एक भी नहीं थे और बच्चे थे पांच. उसके बाद से आवारा मसीहा बनने की प्रोसेस में लग गए. लौंडो-लफाड़ों के साथ घूमने लगे. लेकिन ये थोड़े इंटेलेक्चुअल टाइप के थे, तो दिन-भर बाहर घूमते और रात को घर पर पढ़ने लगते.

ये शायद शादी ही थी जिसने इन्हें आवारा बना दिया. इन्हें दो शादी करनी पड़ी क्योंकि जब बर्मा में नौकरी करते थे, तब पहली पत्नी शांति और बेटा बीमारी की वजह से मर गए. लेकिन गृहस्थी से अभी मन उचटा नहीं था. मोक्षदा नाम की एक कमउम्र विधवा लड़की से शादी कर ली. उसे पढ़ाया-लिखाया और उसका नाम बदलकर रख दिया हिरोनमोई. हिरोनमोई शरत की मृत्यु के 23 साल बाद तक जीवित रहीं.

सरत चंद्र अपनी पत्नी के साथ.
सरत चंद्र अपनी पत्नी के साथ.

4. इनकी नॉवेल ने दिलीप कुमार को सुपरस्टारडम दिया

अगर आपने ‘देवदास’ (नई या पुरानी कोई भी) देखी होगी तो उसके डायलॉग्स नहीं भूले होंगे. जैसे वो ‘कौन कमबख्त बर्दाश्त करने के लिए पीता है… हम तो पीते हैं कि यहां बैठ सकें तुम्हें देख सकें, तुम्हें बर्दाश्त कर सकें’. ऐसे ही कई डायलॉग हैं फिल्म में. ये फिल्म शरतचंद्र की ही नॉवेल ‘देवदास’ पर बेस्ड थी. इसे तक़रीबन 16 बार अलग-अलग लोगों ने अपने-अपने तरीके से परदे पर दिखाया है. 1917 जब उन्होंने ये नॉवेल लिखी, तब उनकी उम्र महज़ 17 साल की थी. इसे संजय लीला भंसाली ने 2002 में इसी नाम से बनाया था. अब सुधीर मिश्रा ‘और देवदास’ नाम से बना रहे हैं. ये एक ऐसे नौजवान की कहानी थी, जिसके जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है. लेकिन उसे प्यार हो जाता है. और ऐसा प्यार होता है जिसका उदहारण दिया जाने लगता है. लगभग हम सभी उस दौर से गुज़रे हैं. लेकिन सब शरतचंद्र तो हो नहीं सकते. जिसके 17 साल की उम्र में लिखे साहित्य की महिला किरदारों के नाम भी लोगों की जुबान पर चढ़ जाएं.

पुरानी 'देवदास' में दिलीप कुमार और नई वाली में शाहरुख़ खान और माधुरी दीक्षित.
पुरानी वाली  ‘देवदास’ के एक सीन में दिलीप कुमार और नई वाली में शाहरुख़ खान और माधुरी दीक्षित.

5. फेमिनिज्म का झंडा बुलंद किया

शरतचंद्र की एक और नॉवेल है ‘परिणीता’. इसे भी 2005 में ही सिनेमा में तब्दील किया गया. इसका मुख्य पात्र भी यानी शेखर रॉय ‘देवदास’ के देव की तरह ही बिना किसी मतलब या लक्ष्य के जिंदगी जिए जा रहा था. लेकिन उसे भी प्यार हो जाता है. और उसके बाद जो होता है वही सिनेमा है. ये बड़े फेमिनिस्ट टाइप के थे. लड़कियों को बहुत समझदार समझते जबकि लड़कों को आले दर्जे का नल्ला-निकम्मा मानते थे. चाहे वो ‘देवदास’ की पारो, चंद्रमुखी हो या फिर ‘परिणीता’ की लोलिता हों. उनकी महिलाएं समझदार होती हैं, सही-गलत समझती हैं. जैसे ‘परिणीता’ की अनपढ़ लोलिता बैरिस्टर शेखर से ज़्यादा बुद्धिमान है.

वो चाहे देवदास की पारो हो, चंद्रमुखी हो या फिर परिणीता की लोलिता ही क्यों न हो सभी देव या शेखर से ज़्यादा समझदार हैं.
वो चाहे देवदास की पारो हो, चंद्रमुखी हो या फिर परिणीता की लोलिता ही क्यों न हों. सभी देव या शेखर से ज़्यादा समझदार हैं.

 


वीडियो देखें:

ये भी पढ़ें:

जब बड़ी हो रही थी तो ये डर था कि अगर फ़ेल हुई तो मुझे रंडी, डायन या पागल करार दिया जायेगा : कंगना

कंगना के वो बयान, जिन्होंने बॉलीवुड और सोशल मीडिया को हिला रखा है

हां, कंगना, तुम चुड़ैल हो. मुझे इस बात पर गर्व है

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

पोस्टमॉर्टम हाउस

फिल्म रिव्यू- कार्गो

कभी भी कुछ भी हमेशा के लिए नहीं खत्म होता है. कहीं न कहीं, कुछ न कुछ तो बच ही जाता है, हमेशा.

फिल्म रिव्यू: सी यू सून

बढ़िया परफॉरमेंसेज़ से लैस मजबूत साइबर थ्रिलर,

फिल्म रिव्यू- सड़क 2

जानिए कैसी है संजय दत्त, आलिया भट्ट स्टारर महेश भट्ट की कमबैक फिल्म.

वेब सीरीज़ रिव्यू- फ्लेश

एक बार इस सीरीज़ को देखना शुरू करने के बाद मजबूत क्लिफ हैंगर्स की वजह से इसे एक-दो एपिसोड के बाद बंद कर पाना मुश्किल हो जाता है.

फिल्म रिव्यू- क्लास ऑफ 83

एक खतरनाक मगर एंटरटेनिंग कॉप फिल्म.

बाबा बने बॉबी देओल की नई सीरीज़ 'आश्रम' से हिंदुओं की भावनाएं आहत हो रही हैं!

आज ट्रेलर आया और कुछ लोग ट्रेलर पर भड़क गए हैं.

करोड़ों का चूना लगाने वाले हर्षद मेहता पर बनी सीरीज़ का टीज़र उतना ही धांसू है, जितने उसके कारनामे थे

कद्दावर डायरेक्टर हंसल मेहता बनायेंगे ये वेब सीरीज़, सो लोगों की उम्मीदें आसमानी हो गई हैं.

फिल्म रिव्यू- खुदा हाफिज़

विद्युत जामवाल की पिछली फिल्मों से अलग मगर एक कॉमर्शियल बॉलीवुड फिल्म.

फ़िल्म रिव्यू: गुंजन सक्सेना - द कारगिल गर्ल

जाह्नवी कपूर और पंकज त्रिपाठी अभिनीत ये नई हिंदी फ़िल्म कैसी है? जानिए.

फिल्म रिव्यू: शकुंतला देवी

'शकुंतला देवी' को बहुत फिल्मी बता सकते हैं लेकिन ये नहीं कह सकते इसे देखकर एंटरटेन नहीं हुए.