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3 साल गए, अगले 2 सालों में मोदी सरकार के सामने ये हैं 5 बड़ी चुनौतियां

तीन साल पूरे होने पर हर तरफ मोदी सरकार इस दौरान की उपलब्धियों की चर्चा कर रही है. मौजूदा राजनीतिक हालात 2019 लोकसभा चुनाव में ‘ब्रांड मोदी’ की आसान जीत की संभावना को मजबूत करते हैं. लेकिन अभी से 2019 के बीच दो साल का फर्क है. इस दौरान मोदी सरकार के सामने पांच ऐसी बड़ी चुनौतियां हैं, जिनका असर ‘ब्रांड मोदी’ पर पड़ सकता है, जिसके बूते भाजपा ज्यादातर जगह जीतती जा रही है.

तो आइए, जानते हैं अगले दो सालों में मोदी सरकार की पांच बड़ी चुनौतियां:

1. नॉर्थ ईस्ट में कल्चरल एक्सचेंज

सेवेन सिस्टर्स के नाम से फेमस अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा की केंद्र की सियासत में क्या भूमिका है, ये सबको पता है. बीजेपी असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में झंडा गाड़ चुकी है और बाकी राज्यों की तैयारी में है. बाकी देश में इसे बड़ी सफलता के रूप में प्रचारित किया जाता है, लेकिन ये फलीभूत तब तक नहीं होगा, जब तक इन सात राज्यों और बाकी देश के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान नहीं होता.

असम में नरेंद्र मोदी
असम में नरेंद्र मोदी

क्या कारण है कि बाकी राज्यों में सत्ता संभालने वाली पार्टियां नॉर्थ ईस्ट नहीं जा पातीं और नॉर्थ ईस्ट की पार्टियों की छवि गुटों जैसी बन चुकी है. चीन के पड़ोस में होने की वजह से इन राज्यों को मुख्यधारा में लाना और जरूरी है. वहां के लोगों दूसरे राज्यों में हमले झेलते हैं. उनके अंदर ये भरोसा पैदा करना जरूरी है कि वो भी भारत के वैसे ही हिस्से हैं, जैसे कश्मीर, केरल या गुजरात. 2019 से पहले मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में विधानसभा चुनाव भी हैं.

2. कश्मीर के हालात और पाक के साथ रिश्ते सुधारना

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार बनने के बाद वहां हालात बहुत खराब हुए हैं. पाकिस्तान की तरफ से होने वाली गोलीबारी और घुसपैठ भी बढ़ी है. सेना को अपने काम के साथ-साथ सियासत भी देखनी पड़ रही है. अगले दो सालों में मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती कश्मीर के हालात स्थिर करना होगा. भले ही इसके लिए सरकार को एक बार फुल ऐंड फाइनल फैसला लेना पड़े.

कश्मीर में एक रैली को संबोधित करने के दौरान मोदी
कश्मीर में एक रैली को संबोधित करने के दौरान मोदी

सरकार लद्दाख, जम्मू और कश्मीर को अलग-अलग तरीके से ट्रीट करने पर विचार कर सकती है. साथ ही, हुर्रियत को अलग-थलग करना फायदेमंद हो सकता है. हुर्रियत नेताओं के बेटों को सरकारी नौकरियां मिल जाती हैं, उन्हें आने-जाने के लिए वीजा वगैरह मिल जाता है, लेकिन वो सरकार के लिए मुश्किलें पैदा करने के अलावा कुछ नहीं करते. बेहतर होगा कि उन्हें हर तरह के संवाद से बाहर किया जाए.

3. मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में गढ़ बचाए रखना

2019 लोकसभा चुनाव से पहले ही इन चारों राज्यों में चुनाव होने हैं, जो बीजेपी के गढ़ हैं. गुजरात में बीजेपी 1995, 1998, 2002, 2007 और 2012 में सरकार बना चुकी है और अब उस पर यहां सरकार बचाने का दबाव होगा. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चौथी बार सरकार बचाने और राजस्थान में लगातार दूसरी बार सरकार बनाने का दबाव होगा. अपने गढ़ों में बीजेपी दबाव में इसलिए होगी, क्योंकि शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह को 15 साल की एंटी-इन्कम्बेंसी झेलनी पड़ेगी. एमपी में व्यापम घोटाला और छत्तीसगढ़ में शराब बिक्री जैसे मुद्दों पर जनता नाराज है.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

राजस्थान में 1993 से कांग्रेस और बीजेपी बारी-बारी आती रही हैं. पिछली बार बीजेपी को बड़ी जीत मिली थी, लेकिन सीएम वसुंधरा पर अतीत का दबाव जरूर होगा. गुजरात के सियासी समीकरण पिछले तीन साल में कई बार पलटे हैं. गोरक्षा के मसले पर दलितों की पिटाई और हार्दिक पटेल के नेतृत्व में दलितों का संगठित होना बीजेपी के लिए परेशानी के तौर पर देखा गया. मोदी के केंद्र में आने के बाद इसी दबाव के चलते गुजरात में एक बार मुख्यमंत्री को भी बदला जा चुका है.

4. कोरोमंडल कोस्ट वाले राज्यों में दखल बढ़ाना

बंगाल की खाड़ी से हिंद महासागर के बीच पड़ने वाले तटीय राज्यों में भी बीजेपी की आमद कम है, जिस पर पार्टी को जोर देना होगा. पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तेलंगाना और तमिलनाडु में बीजेपी को अभी बहुत मेहनत की जरूरत है. इस लिस्ट में केरल को भी शामिल किया जा सकता है. इन राज्यों में बीजेपी छोटी सी बढ़त को भी बड़ी सफलता के तौर पर प्रदर्शित कर सकती है.

तमिलनाडु में रजनीकांत के साथ नरेंद्र मोदी
तमिलनाडु में रजनीकांत के साथ नरेंद्र मोदी

तमिलनाडु में तो बीजेपी वर्चस्व बढ़ाने के लिए छटपटा रही है, लेकिन वहां उसे एक बड़े चेहरे की तलाश होगी. जयललिता की मौत के बाद से कयास लगाए जा रहे थे कि बीजेपी रजनीकांत को अपने पाले में शामिल करके पूरा खेल ही पलट देगी, लेकिन अभी इन अटकलों पर विराम चल रहा है. पश्चिम बंगाल में बीजेपी के पास सिर्फ दो सीटें हैं. 2019 में अगर ये आंकड़ा 10 तक भी पहुंच जाता है, तो इसे बीजेपी की सफलता माना जा सकता है.

5. अच्छे दिन?

2014 में बीजेपी इसी नारे के साथ सत्ता में आई थी. यकीनन ये एक जुमला है. अच्छे दिन हों या न हों, वो दिखेंगे नहीं. लेकिन क्या बीजेपी जनता को ये भरोसा दिला पाएगी कि अच्छे दिन आ गए हैं या सब कुछ ठीक है. मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर किए गए सर्वे दिखाते हैं कि लोग मोदी से खुश हैं, लेकिन उनके सांसदों से नाराज हैं. लोगों को सर्जिकल स्ट्राइक पसंद आई, लेकिन नोटबंदी लागू करने के उनके तरीके को जनता ने खारिज किया.

2014 में बीजेपी के चुनाव प्रचार का एक पोस्टर
2014 में बीजेपी के चुनाव प्रचार का एक पोस्टर

बीजेपी की पिछली जीत ऐतिहासिक थी. पार्टी खुद दोबारा इस तरह जीतने का दावा करने में हिचकिचाएगी, लेकिन अगर वो लोगों को अच्छे दिनों का यकीन दिलाने में असफल रही, तो इसका सबसे बड़ा डेन्ट ब्रांड मोदी पर ही लगेगा, जिसके भरोसे उसने यूपी जैसे सूबे में इतनी बड़ी जीत दर्ज की है. कहीं ऐसा न हो कि पिछले तीन सालों की तरह अगले दो साल भी गोरक्षा, एंटी-रोमियो और आरक्षण की बहस में निकल जाएं.


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