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यश चोपड़ा ने जब रेखा और जया से कहा, 'यार मेरे सेट पर गड़बड़ी ना करना यार!'

यश चोपड़ा ने मौत के एक महीने पहले अपना आखिरी इंटरव्यू दिया था, जो काफी लंबा भी था. इसमें उन्होंने अपने जीवन से जुड़े तमाम किस्से बताए. जिनसे उनको जानने में आसानी होगी.

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#1. फिल्मों की दुनिया उन्होंने इसलिए चुनी

ये 1951 की बात है. यश चोपड़ा कोई 19 बरस के थे. उनके बड़े भाई बीआर चोपड़ा तब डायरेक्टर थे. एक भाई कैमरामैन था. एक भाई वितरक था. तो उनके पिता विलायती राज चोपड़ा चाहते थे कि घर में कोई तो हो जो अलग लाइन में हो. उन्होंने यश को जालंधर से बॉम्बे भेजा. बोले, “जाओ! पासपोर्ट बनाओ, इंग्लैंड जाओ और इंजीनियर बनकर आओ.” आ गए. पासपोर्ट बनने लगा. लेकिन उन्हें इंजीनियरिंग के बारे में कुछ भी नहीं पता था, रुचि तो दूर की बात, यशजी के मुताबिक, “मैं तो एक खीला (कील) भी दीवार में नहीं लगा सकता था, आज भी नहीं लगा सकता हूं.”

कुछ दिन बेदिली से ये करने के बाद उन्होंने एक दिन तय किया कि दिल की ही सुनेंगे. और दिल में था फिल्म डायरेक्टर बनना. दो कारण थे – एक, उन्हें फिल्में देखना बेहद पसंद था. वो दुनिया बहुत पसंद थी. दूसरा, उन पर बड़े भाई बीआर के व्यक्तित्व का बेजां असर था. इंग्लिश में एमए थे. बहुत अनुशासित आदमी थे. लाहौर में एक फिल्म मैगजीन के एडिटर थे. फिर फिल्मों में आए तो वहां भी व्यवस्थित ढंग से हर काम करते थे. यश चोपड़ा को वैसे ही बनना था.

#2. भाई बीआर चोपड़ा को यूं मनाया

एक दिन उन्होंने बीआर से कहा, ” भाईसाब, मैं इंजीनियर तो नहीं बनूंगा. मैं डायरेक्टर बनना चाहता हूं आपकी तरह.” भाई बोले, “तुम्हे इसका इल्म क्या है, कैसे बनोगे?” यशजी ने कहा, “इसके लिए कोई सबजेक्ट नहीं पढ़ना पड़ता, लाइफ पढ़नी पड़ती है. मैं आपको असिस्ट कर लूंगा.” भाई ने कहा, “तुम मेरे असिस्टेंट मत बनो. मैं राजकपूर या अन्य दोस्तों से बात कर लेता हूं. तुम मेरे भाई हो, मुझसे नहीं सीख पाओगे.” यशजी ने कहा, “मुझे आपका स्टाइल सीखना है.” लेकिन बीआर ने कहा कि आईएस जौहर एक फिल्म बना रहे हैं. पहले उन्हें असिस्ट कर लो. तब जौहर ‘नास्तिक’ डायरेक्ट कर रहे थे. फिल्मिस्तान में शूटिंग चल रही थी. यश अगले दिन चले गए. चूंकि वे दोस्त के भाई थे, तो जौहर ने अच्छे से रखा, खाना-वाना खिलाया. यशजी पूरे दिन शूटिंग देखते रहे.

शाम को निर्माता शशधर मुखर्जी आए और जौहर से पूछा शूट कब खत्म हो रहा है? उन्होंने कहा, “कल तक”. तो मुखर्जी ने कहा, “कल नहीं आज ही”. जौहर ने कहा, “ओके जी कर दूंगा”. शाम को पैकअप हुआ. यश जी को अजीब लग रहा था. उनके भाई के दो दोस्त थे, मनमोहन कृष्ण और जीवन. वे उनके घर गए. बोले, “ये मुश्किल है. जो डायरेक्टर कल पूरी होने वाली फिल्म आज खत्म कर देगा, तो उससे मैं क्या सीखूंगा. तुम भाईसाब से सिफारिश करो कि मुझे अपने साथ अपरेंटिस बना लें, असिस्टेंट भी ना बनाएं.” अगले दिन वे आए. बीआर से बात की और बात बन गई.

#3. मां का एपिक आशीर्वाद

जब यश जालंधर से चले थे तो मां ने 200 रुपये दिए. 2-2 रुपये के नए नोट थे. बोलीं, “तुम भाई के साथ तो रहोगे लेकिन जरूरत पड़ेगी. ये रुपये हैं और मेरा आशीर्वाद है. मेरा दिल कहता है जो भी तुम करोगे ठीक ही करोगे. मेरा भी है और तुम्हारे पिता का भी आशीर्वाद है.”

#4. यश चोपड़ा ख़ुद हीरो भी बनते-बनते रह गए

जब ‘चांदनी चौक’ (1954) फिल्म बन रही थी तो मीना कुमारी हीरोइन थीं. यशजी असिस्टेंट थे. दोनों को पोएट्री का बड़ा शौक था. दोनों बहुत करीबी दोस्त बन गए. मीना कुमारी ने बीआर से कहा कि वे यश को हीरो क्यों नहीं बना देते? इसी तरह बीआर एक और फिल्म बना रहे थे जिसमें नरगिस लीड थीं और उनके पति के रोल में मोतीलाल थे. एक बार गाड़ी में जाते हुए मोतीलाल ने बीआर से कहा कि इसे (यश) हीरो क्यों नहीं ले लेते? बाद में बीआर ने छोटे भाई से कहा कि “तुम सबसे जाकर बोलते हो कि तुम्हे हीरो बनना है? तुम हीरो का काम करने आए हो?” तो यशजी ने कहा कि नहीं, उन्हें सिर्फ डायरेक्टर ही बनना है.

अपने चहेते एक्टर शाहरुख के साथ यश चोपड़ा. (फोटोः य़शराज फिल्म्स)
अपने चहेते एक्टर शाहरुख के साथ यश चोपड़ा. (फोटोः य़शराज फिल्म्स)

#5. ‘सिलसिला’ में रेखा और जया की असंभव कास्टिंग यूं की

1981 में रिलीज हुई फिल्म ‘सिलसिला’ में यश चोपड़ा अमिताभ बच्चन के साथ रेखा और जया बच्चन को कास्ट करना चाहते थे. लेकिन तब अमिताभ-रेखा के अफेयर और जया की नाराजगी की खबरें आम थीं. यशजी को लगा कि ये कास्टिंग हो नहीं पाएगी. तो उन्होंने परवीन बॉबी और स्मिता पाटिल को साइन कर लिया. शूटिंग से पहले यशजी कश्मीर गए जहां पर अमिताभ ‘कालिया’ की शूटिंग कर रहे थे. वे डिनर पर बच्चन से मिले. बच्चन ‘सिलसिला’ की स्क्रिप्ट पढ़ चुके थे.

डिनर खत्म होने के बाद जब सब लोग वहां से चले गए तो उन्होंने यशजी से पूछा कि क्या कास्टिंग को लेकर वे निश्चिंत हैं? उन्होंने कहा, नहीं. तो बच्चन ने पूछा कि आपको सबसे सही कास्टिंग कौन सी लगती है? यशजी ने कहा कि “बताने का कोई फायदा नहीं, अब तो हम शूटिंग करने आ गए हैं.” बच्चन ने कहा, “फिर भी आप बताइए. मैं स्क्रिप्ट पढ़ रहा हूं और बहुत कमाल की है. पहली बार extramarital affair पर फिल्म बन रही है.”

फिल्म 'सिलसिला' के एक दृश्य में रेखा औऱ जया.
फिल्म ‘सिलसिला’ के एक दृश्य में रेखा औऱ जया.

यशजी ने कहा, “सच पूछो तो अमिताभ बच्चन, जया बच्चन और रेखा की कास्टिंग.” अमिताभ ने लंबा विराम लिया और कहा, “ऐसा करते हैं, बॉम्बे चलते हैं. फिर आप जया और रेखा दोनों से बात कीजिए.” दोनों श्रीनगर से दिल्ली और दिल्ली से बॉम्बे फ्लाइट पर साथ आए लेकिन इस दौरान चुप बैठे रहे, एक शब्द भी एक-दूसरे से नहीं कहा. अगले दिन यशजी जया के पास गए. वे मान गईं. फिर यशजी ने कहा, “ठीक तो है, लेकिन कल शायद हम शूटिंग पर जा रहे हैं कश्मीर.” जया चौंक गईं. यशजी बोले, “हां. तुम पैम (पामेला चोपड़ा, यश की पत्नी) के साथ जाओ और कुछ साड़ियां ख़रीद लाओ. और मैं टेलर को साथ ले लेता हूं वो पेटीकोट ब्लाउज बनाता रहेगा, हम शूटिंग करते रहेंगे.” जया बोलीं, “ठीक है”. रेखा से भी वे मिले. वे भी मान गईं. उन्होंने रेखा से कहा, “तुम भी कुछ ड्रेस बनवाकर तीन-चार दिन में आ जाओ.”

फिल्म शुरू करने से पहले यश चोपड़ा ने रेखा और जया दोनों को अलग-अलग बुलाकर कहा, “तुम मेरी दोस्त हो और ये फिल्म दोस्ती में कर रही हो, तुम दोनों को रोल पसंद हैं, मैं तो बेइमानी नहीं करूंगा न इसमें? स्क्रिप्ट तुम्हारे पास है. यार, मेरे सेट पे कुछ गड़बड़ी ना करना यार!” उनका इशारा तब रेखा और जया के असल खटास भरे रिश्तों और तनाव की ओर था. लेकिन यशजी की बात सुनने के बाद दोनों ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे ऐसा कुछ नहीं करेंगी. और शूटिंग में उन्हें कोई समस्या नहीं हुई.

#6. अब परवीन बाबी, स्मिता पाटिल को फायर करना था

‘सिलसिला’ की नई कास्टिंग तो हो गई लेकिन स्मिता और परवीन पहले से कास्ट हो चुकी थीं. परवीन कश्मीर में शूटिंग कर रही थीं. यशजी ने अपने असिस्टेंट रोमेश शर्मा को कहा कि परवीन को समझा दो, माफी मांग लेना. यश जी बॉम्बे से श्रीनगर पहुंचे तो देखा कि परवीन एयरपोर्ट पर हैं और बॉम्बे जा रही हैं. छोटा सा एयरपोर्ट था. उन्होंने देख लिया और दौड़ी आईं. वे बोलीं, “यश तुमने वो किया जो फिल्म के लिए अच्छा है, तुम मेरे साथ कुछ बुरा नहीं कर रहे हो इसलिए तुम्हे मुझे टालने की जरूरत नहीं है. बस तुम पर मेरी एक फिल्म उधार रही.”

परवीन बाबी और स्मिता पाटिल.
परवीन बाबी और स्मिता पाटिल.

यश जी ने फिर शशि कपूर से बात की जो उनके सबसे शुरुआती दोस्त थे. बोले, “एक बात है. मैं स्मिता को नहीं ले रहा हूं.” शशि बोले, “ना लो मुझे क्यों बोल रहे हो?” यश बोले, “यार तू मेरा दोस्त है, मैं कल सुबह जा रहा हूं. तेरी ड्यूटी ये है कि तुम स्मिता को मिलो, उसको समझाओ मेरी प्रॉब्लम और उसको बोलो वो काम नहीं कर रही है.” शशि बोले ये तो बहुत मुश्किल काम है. लेकिन यश के कहने पर वे मान गए. बात आई गई हो गई. पहला शेड्यूल खत्म करके यशराज बॉम्बे लौटे.

वे राजकमल स्टूडियो के अपने ऑफिस में थे तो वहीं स्मिता पास में शूटिंग कर रही थीं. उन्हें पता लग गया तो वे आईं. बोलीं, “यशजी आपने किया तो वो जो आपको ठीक लगा. बस उसमें एक ही गलत बात थी, आप मुझे ख़ुद बोल देते तो मुझे बुरा न लगता. शशि ने बोला तो मुझे बुरा लगा.” यशजी बोले, “तुम सही हो लेकिन आदमी कभी कभी ऐसे शर्म वाले हालात में घिर जाता है कि खुलकर बात नहीं कर सकता. मैं बहुत शर्मिंदा था. मुझे लगा कि मैंने तुम्हारे साथ गलत किया है. लेकिन मैंने किया क्योंकि फिल्म के लिए जरूरी था.”

#7. बिमल रॉय के कहने पर ‘वक्त’ में कपूर्स को नहीं लिया

‘वक्त’ (1965) हिंदी फिल्मों की पहली, बिछड़े भाइयों की कहानी वाली फिल्म मानी जाती है. इसमें तीन भाइयों के रोल में यशजी और बीआर शशि कपूर, शम्मी कपूर और राज कपूर को लेना चाहते थे. उन्हें लग रहा था कि परदे पर लोग असली भाइयों को देखेंगे तो बहुत असर होगा. इसी बीच निर्देशक बिमल रॉय उनसे मिले. चोपड़ा ने अपना प्लान बताया तो बिमल रॉय ने कहा कि “बाकी कुछ भी करो, ये कास्टिंग मत करना. ये फिल्म नहीं चलेगी. तीन सगे भाइयों को मत लो और चाहे किसी को भी ले लो. तुम्हारी कहानी में ये तीन बिछड़ गए, फिर अलग-अलग घूम रहे हैं, एक-दूसरे को पहचान नहीं रहे हैं. लेकिन ये भाई (कपूर्स) तो अंधेरे में खड़े एक-दूसरे को पहचान लें.” बीआर ने भी मान लिया. यश चोपड़ा ने अपने दोस्त शशि को इसमें रखा जिनके साथ उन्होंने ‘धर्मपुत्र’ बनाई थी. बाकी दो भाइयों के रोल में सुनील दत्त और राज कुमार को लिया गया.

राज कपूर, शशि कपूर और शम्मी कपूर.
राज कपूर, शशि कपूर और शम्मी कपूर.

#8. ‘इत्तेफाक’ तूफानी रफ्तार से बनी

1969 में यशजी ने ‘इत्तेफाक’ नाम की फिल्म बनाई जो किसी संयोग से कम नहीं थी. हुआ ये था कि उस समय वे ‘आदमी और इंसान’ फिल्म की शूटिंग कर चुके थे. इसमें धर्मेंद्र, सायरा बानो लीड रोल में थे. जब यश चोपड़ा ने फिल्म का करीब फाइनल प्रिंट देखा तो उन्हें लगा फिल्म में कुछ गड़बड़ी है. उन्हें लगा कि इसकी कुछ शूटिंग और करनी चाहिए, ऐसे तो रिलीज नहीं कर करते. लेकिन तब हीरोइन सायरा बानो की तबीयत ख़राब थी और वे इलाज के लिए लंदन गई हुई थीं.

उन्हें तीन-चार महीने पहले लौटना नहीं था. अब किसी नई फिल्म पर काम नहीं किया जा सकता था जब तक इसे न रिलीज किया जाए. वे और बीआर बड़ी दुविधा में थे. इसी बीच एक दिन वे लोग एक गुजराती प्ले ‘धूमस’ देखने गए जो एक इंग्लिश प्ले ‘साइनपोस्ट टु मर्डर’ से प्रेरित था और वो प्ले एक फ्रेंच प्ले का रूपांतरण था. उन्हें प्ले बहुत अच्छा लगा. अगले दिन वे राइटर्स को साथ ले गए और प्ले दिखाया. उन्होंने कहा कि इसी पर फिल्म बनाते हैं. उन्होंने प्ले के मेकर्स से भी बात की. उसी दौरान फिल्मफेयर का कॉन्टेस्ट जीते थे राजेश खन्ना और उन्हें एक फिल्म दी जानी थी. तो उन्हें ले लिया गया.

फिल्म 'इत्तेफाक' के पोस्टर और दृश्य में राजेश खन्ना व अन्य कलाकार.
फिल्म ‘इत्तेफाक’ के पोस्टर और दृश्य में राजेश खन्ना व अन्य कलाकार.

अब हीरोइन ऐसी चाहिए थी जो कहानी में मर्डरर होती है लेकिन दर्शकों को किसी भी रूप से नहीं लग पाए कि वो ख़ून भी कर सकती है. तो नंदा को लिया गया क्योंकि उनका मासूम चेहरा ऐसा है कि किसी को संदेह नहीं हो सकता. इसके बाद ‘इत्तेफाक़’ की शूटिंग शुरू की गई और सिर्फ 20 दिन में पूरी फिल्म ख़त्म कर ली गई. इतने कम समय में बनी फिल्म का रिस्पॉन्स बहुत अच्छा रहा.

#9. इंडिया की पहली बिना इंटरवल वाली फिल्म

‘इत्तेफाक’ इंडिया की पहली ऐसी फिल्म थी जिसे उन्होंने बिना इंटरवल के रिलीज किया. इंटरवल से पहले क्या किया जाए इसे सोचते हुए उन्होंने एक 20 मिनट की डॉक्यूमेंट्री ख़रीदी जो एक डॉक्टर की कहानी थी. पहले वो डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई और उसके बाद स्टार्ट-टू-फिनिश के अंदाज में ये फिल्म दिखाई गई. बिना इंटरवल की, 20 दिनों में बनाई ये फिल्म हिट साबित हुई. वहीं रीशूट के बाद भी ‘आदमी और इंसान’ ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया.

#10. पिता तुल्य भाई बीआर चोपड़ा की कंपनी छोड़ने का फैसला

इसी दौरान यश चोपड़ा ने पामेला से शादी कर ली थी. उन्हें जिम्मेदारी का अहसास होने लगा. उनके पास कुछ हजार रुपये थे और कोई बैंक-बैलेंस नहीं था. चोपड़ा ने सोचा कि वे सैलरी पर ही चल रहे हैं. क्रिएटिव तौर पर भी वे फिल्मों के मालिक नहीं हैं. तब उन्होंने अपनी कंपनी यशराज फिल्म्स बनाने का सोचा. उनकी पत्नी प्रेग्नेंट हो गई थीं. चोपड़ा ने उन्हें दिल्ली की फ्लाइट में बैठाया और कहा कि वे वहीं डिलीवरी की व्यवस्था करें.

पत्नी पामेला, बेटे उदय और आदित्य के साथ यश चोपड़ा.
पत्नी पामेला, बेटे उदय और आदित्य के साथ यश चोपड़ा.

उसके बाद दो दिन वे सोचते रहे. अभी वे बीआर फिल्म्स जैसे बड़े बरगद की छाया में बैठे थे, अब वे अलग होना चाहते थे लेकिन उनके पास कोई संसाधन न थे. कार, फ्लैट, पैसा कुछ भी नहीं. ये भी डर था कि अगर उनका अपना वेंचर असफल रहा तो वे क्या कर पाएंगे? लेकिन उन्हें भीतर से लग रहा था कि या तो अभी ही कुछ नया करना होगा या फिर कभी नहीं किया जा सकेगा. उनके पास गुलशन नंदा की लिखी एक कहानी थी – ‘दाग़’. अपने हनीमून के दौरान यश जी ने इसे पसंद किया था. उन्होंने तय किया था कि इस पर बहुत ही रोमांटिक और बहुत ही बोल्ड फिल्म बनाएंगे.

#11. भाई का एक-एक शब्द रीढ़ में जमते ठंडे लोहे सा था

उन्होंने बड़े भाई बीआर चोपड़ा से बात की कि मिलना चाहते हैं. वे मिले. बोले, “भाईसाब मुझे लगता है कि मुझे यशराज फिल्म्स नाम से अपनी ख़ुद की फिल्में बनानी चाहिए. हम एक रहें ऐसा बनाए रखना है तो ये कर सकते हैं कि आप मेरी कंपनी की एक फिल्म डायरेक्ट करें और मैं आपकी कंपनी की एक फिल्म डायरेक्ट करूंगा. लेकिन मैं यशराज फिल्म्स स्थापित करना चाहता हूं.” बीआर ने कहा, “ऐसा करने से क्या होगा? तुम फोकस एक ही चीज पर रखो. तुम अपनी फिल्में बनाओ. लेकिन एक बात ध्यान में रखो कि अब तुम अपने भरोसे ही हो.”

भाई का एक-एक शब्द उनके लिए ठंडे लोहे जैसा था. लेकिन भाई की हर बात सही थी. बीआर ने कहा, “अब तुम्हे एक्टर्स से ख़ुद बात करनी होगी. तुम निर्माता रहोगे. तुम उन्हें क्या फीस दोगे ये तुम्हे ही देखना होगा. तुम्हे ही तमाम टेक्नीशियंस से बात करनी होगी. पैसा भी तुम्हे खुद जुटाना होगा.” यश चोपड़ा समझ गए. फिर भाई ने उन्हें अपनी कार से जाते हुए ड्रॉप किया और यहां से दोनों के रास्ते अलग हो गए.

यश चोपड़ा अपने बड़े भाई बीआर चोपड़ा के साथ.
यश चोपड़ा अपने बड़े भाई बीआर चोपड़ा के साथ.

#12. पहली फिल्म ‘दाग़’ ऐसे बनी, लैजेंड वी. शांताराम ने ऑफिस दिया

उस कठिन घड़ी में एक बात ने यश चोपड़ा को सबसे ज्यादा ताकत दी. उनकी मां उनके साथ ही रह रही थीं. वे घर पहुंचे. उनसे कहा, “माताजी, मैंने भाईसाहब को छोड़ दिया है. मैं अपनी ख़ुद की कंपनी बना रहा हूं.” उनकी मां तकनीकी बातें तो नहीं समझती थीं लेकिन बोलीं, “बेटे, जो तेरा दिल करे वो करो, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है. मैं तुम्हारी आंखों में देख रही हूं, तुम कर लोगे.” अगले दिन वे एक्टर्स के पास गए. तब सितारे बहुत पैसे लिया करते थे.

वे शर्मिला टैगोर, राखी, राजेश खन्ना के पास गए. उन्होंने कहा, “मैं अपने बूते फिल्म बना रहा हूं क्या आप मेरा साथ देंगे?” तीनों ने कहा कि वे उनके साथ हैं, उनकी कंपनी का जो भी बजट होगा वे उतनी फीस में संतोष कर लेंगे. राखी तो उन्हें देने के लिए रुपये ले आईं. बोलीं, “तुम फिल्म बनाने जा रहे हो, जरूरत पड़ेगी. ये बिजनेस की बात नहीं है. तुम्हारे पास जब हों दे देना.” इस दौरान उन्हें बड़ी मदद मिली वी.

शांताराम से जहां से उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी. जब शांताराम को पता चला कि यश चोपड़ा खुद निर्माता बन गए हैं और उन्हें ऑफिस की जरूरत है, वे एकदम अकेले हैं तो उन्होंने फोन किया और बोले, “मेरा राजकमल स्टूडियो तुम्हारे लिए हाजिर है. वहां ऑफिस ले लो. वहीं से काम करो.” ‘दाग़’ बन गई. वितरकों ने तारीफ की लेकिन सबको लग रहा था कि ज्यादा चलेगी नहीं. राजेश खन्ना की पिछली फिल्में भी नहीं चली थीं ये भी एक कारण था. फिल्म पहले सिर्फ 9 सिनेमाघरों में रिलीज की गई. ओपनिंग इतनी बढ़िया रही कि संख्या 18 कर दी गई. फिर और ज्यादा.

#13. दिलीप कुमार के काम करने का अंदाज जब जाना

बीआर चोपड़ा के निर्देशन में बन रही ‘नया दौर’ (1957) के वक्त यश चोपड़ा असिस्टेंट थे. दिलीप कुमार हीरो बने लेकिन पहले उन्होंने फिल्म ठुकरा दी थी. हुआ यूं कि उनकी कास्टिंग करने के लिए जब यश और बीआर गए तो दिलीप साब ने कहा कि “ये कहानी अच्छी है लेकिन मैं आपके साथ काम नहीं कर सकता. मैं एक समय में दो फिल्में ही करता हूं, अभी मेरे पास दो फिल्में हैं.” चोपड़ा वहां से चले गए. वे दूसरे एक्टर्स को अप्रोच करते रहे. दो महीने बाद दिलीप साब ने ख़ुद फोन किया. बोले, “आप मेरे पास ‘नया दौर’ लेकर आए थे. तब मेरे पास दो फिल्में थीं. दुर्भाग्य से मेरी एक फिल्म के निर्देशक चल बसे. वो पिक्चर नहीं बन रही है. अगर आप अब भी दिलचस्पी रखते हैं तो आ जाइए.” उस समय वे बड़े सितारे थे. वे फिल्म की कहानी सुनने को राजी होते तो भी बड़ी बात होती थी.

दिलीप कुमार ने कहानी सुनी. बोले, “मैं कर रहा हूं.” बोले, “ऐसा करते हैं मेरी छोटी की कॉटेज है जुहू में, कल से वहां बैठते हैं. एक महीना हम वहां एक-एक सीन रिहर्स करेंगे. मैं हर सीन करूंगा और आप बताना कि कौन सा सुर सही है और कौन सा गलत. खाना-वाना वहीं खाएंगे. सुबह आइए 11 बजे और शाम तक काम करेंगे.” लेकिन इस दौरान उनके सारे इनपुट ऐसे थे जो साथी एक्टर अजीत के लिए थे. जब यशजी ने पूछा कि “आप सुझाव तो सारे अजीत के लिए दे रहे हैं.” तो दिलीप कुमार ने कहा, “यार विलेन मजबूत नहीं होगा तो मैं क्या कर लूंगा?”

यश चोपड़ा और दिलीप कुमार, फिल्म 'मशाल' की शूटिंग के दौरान.
यश चोपड़ा और दिलीप कुमार, फिल्म ‘मशाल’ की शूटिंग के दौरान.

#14. शूटिंग के दौरान 18 अंडों का ऑमलेट बनाते थे

यश चोपड़ा और दिलीप कुमार को खाने का बड़ा शौक था. ‘नया दौर’ की शूटिंग के वक्त भी ऐसा ही था. वे लोग एक वेटरनरी कॉटेज में ठहरे हुए थे. दिलीप साब उन्हें कहते थे, “तुम शाम को आ जाना, मैं चिकन बनाऊंगा और तुम डायलॉग बोलते रहना और मैं याद कर लूंगा.” जब यश चोपड़ा के बैनर की पहली फिल्म ‘दाग़’ की सिल्वर जुबली हुई तो दिलीप साब बोले, “अच्छा डायरेक्टर या एक्टर बनने का एक ही सीक्रेट है कि आदमी को शौक कितना है खाने का.” शूटिंग के दौरान वो लोग 18 अंडों का ऑमलेट खाते थे. एक रेसिपी यश चोपड़ा को हमेशा बहुत पसंद रही. वो थी कीमा बनाना और उस पर फ्राइड एग डाल देना. ये रेसिपी उन्हें दिलीप कुमार ने दी थी.

#15. ऐसे फिल्माया था ‘मशाल’ का एपिक सीन

‘नया दौर’ के वक्त से ही यश चोपड़ा की इच्छा रही कि वे दिलीप कुमार जैसे ग्रेट एक्टर के साथ काम करें. जब स्थापित प्रोड्यूसर हो गए तो ‘मशाल’ (1984) फिल्म प्लान की. इसमें दिलीप साब लीड रोल में थे. उसमें रात में सड़क पर दौड़ते और पत्नी (वहीदा रहमान) को अस्पताल पहुंचाने के लिए गाड़ी वालों से मदद मांगते उनका इंटेंस सीन बहुत याद किया जाता है. ये एक सीन चार रातों में पूरा किया गया था. क्योंकि यश चोपड़ा उनसे पूरी-पूरी रात काम नहीं करवाना चाहते थे इसलिए थोड़ा-थोड़ा शूट किया गया लेकिन चोपड़ा याद करते हैं कि चारों रातों में उस इंटेंस सीन में दिलीप कुमार की निरंतरता बेमिसाल थी.

#16. ‘चांदनी’ के साथ जब हार्डकोर रोमैंटिक डायरेक्टर जन्मा

यश चोपड़ा 1932-2012
यश चोपड़ा 1932-2012

‘विजय’ (1988) बनाने के दौरान एक दिन वे अपने घर से कहीं जा रहे थे. रास्ते में देखा कि फिल्मों के पोस्टर लगे हुए हैं. उन्होंने ऑब्जर्व किया कि हर पोस्टर में एक ही तरह का हीरो है. बस उसके हथियार अलग-अलग हैं. किसी के हाथ में चाकू है तो किसी के बम. तब यश चोपड़ा ने अपने आप से सवाल किया कि “यार मैं क्या कर रहा हूं? मैं एक सफल फिल्म बनाना चाहता हूं इसलिए वैसी ही फिल्में बार-बार बना रहा हूं. हर फिल्म में लड़ाई-झगड़ा और ग्लैमर, तो कोमलता कहां है? जो मेरे अंदर थी वो कहां चली गई? लोग बोलते हैं फाइट्स हाइलाइट्स होती हैं! अरे भाई, गाना भी तो हाइलाइट हो सकता है अगर अच्छा करोगे तो!”

उस दिन घर पहुंचते-पहुंचते यश चोपड़ा तय कर लिया था कि वे समझौता नहीं करेंगे और फिल्म वही बनाएंगे जो उनके दिल की होगी. उन्होंने एक हार्डकोर फिल्म बनाने का फैसला लिया. ऐसी जिसमें नौ गाने होंगे और वो फिल्म की नौ हाइलाइट बनेंगे. और यहीं से फिल्म ‘चांदनी’ का विचार जन्मा.

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