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आयुष्मान खुराना और जीतू से पहले ये 14 मशहूर बॉलीवुड एक्टर्स बन चुके हैं समलैंगिक

कुछ दिनों पहले एक वेब सीरीज़ देखी थी. ‘हॉस्टल डेज़’. उसके कई सीन और डायलॉग्स प्रोब्लमेटिक थे. उन्हीं में से एक था-

‘मीठा’, केक अच्छा लगता है, लौंडे नहीं.

गोविंदा का वो डायलॉग तो याद ही होगा आपको, जिसमें वो गे कम्युनिटी का मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं-

आदमी हूं, आदमी से प्यार करता हूं.

और वो ‘प्यार का पंचनामा’ का लंबा मोनोलॉग, जिसमें कार्तिक आर्यन का किरदार, गे लड़कों का भद्दा मज़ाक बनाता है.

ये तो बस दो-तीन उदाहरण हैं. लेकिन आपको ज़्यादा ज़ोर लगाने की ज़रूरत नहीं, उन सैकड़ों डायलॉग्स को, उन हज़ारों सीन्स को, रिकॉल करने के लिए, जिसमें समलैंगिकों का मज़ाक बनाया गया है. फिल्म से लेकर टीवी सीरियल और वेब सीरीज़ से लेकर कॉमेडी शो तक. अगर किसी एक जेंडर, किसी एक कम्युनिटी के प्रति हम सबसे ज़्यादा असंवेदनशील रहे हैं, तो वो है समलैंगिक समुदाय. फिर फिल्मों का यही कैज़ुअल सेक्सिज़्म, रियल वर्ल्ड में अत्याचार और प्रताड़नाओं के रूप में मूर्त होता है. और इस तरह एक कुचक्र बनता है.

इस सब के बीच आती हैं ‘शुभ मंगल ज़्यादा सावधान’ जैसी फ़िल्में. हमें समझाने के वास्ते कि ‘अलग होने’ का मतलब ‘खतरनाक होना’ नहीं होता. 6 सितंबर, 2018 को भारतीय संविधान की धारा 377 को सुप्रीम कोर्ट ने अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था. अब हमें अपने मन में इसे डिक्रिमिनलाइज़ करने की आवश्यकता है.

‘शुभ मंगल ज़्यादा सावधान’ 21 फरवरी को आ रही है. इसको लेकर बज़ बनना शुरू हो गया है. इसी सब के बीच हमने सोचा आपको याद दिला दें वो फ़िल्में और कैरेक्टर्स जो समलैंगिकता का मजाक नहीं उड़ाते. उसे अच्छे से हैंडल करते हैं. हमें पारदर्शिता और स्वीकार्यता की सीख देते हैं. वैसे ही जैसे ‘शुभ मंगल ज़्यादा सावधान’ से हम उम्मीद किए बैठे हैं.

# 1) अलीगढ़ | मनोज वाजपेयी –

निर्देशक हंसल मेहता की फिल्म ‘अलीगढ़’, एक सच्ची घटना पर आधारित है. कहानी है अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक प्रफेसर, रामचंद्र सिरास की. जिन्हें जॉब से इसलिए निकाल दिया गया था, क्यूंकि लोकल मीडिया के कुछ लोग जबरिया उनके घर में घुस गए थे और उन्हें एक रिक्शा चालक के साथ संबंध बनाते हुए पकड़ लिया था. अंत में उन्होंने क़ानूनी लड़ाई जीती. एक पत्रकार दीपू सेबेस्टियन की मदद से. उनके नौकरी पर लौटने से पहले ही उनके घर से उनकी लाश बरामद हुई.

हालांकि ऊपर हमने जो बताई, वो मूवी की स्टोरी थी. लेकिन रियल में भी जो हुआ वो इससे थोड़ा-बहुत ही अलग था.

‘अलीगढ़’ में मनोज वाजपेयी ने रामचंद्र सिरास का किरदार निभाया था और दीपू सेबेस्टियन बने थे राजकुमार राव. ‘लंडन फिल्म फेस्टिवल’ से लेकर ‘मामी फिल्म फेस्टिवल’ तक में ये मूवी खूब सराही गई. भारत के ही नहीं, विश्व भर के समीक्षकों ने इस फिल्म को हाथों-हाथ लिया था और भारत की कुछ बेहतरीन ‘सामजिक संदेश देने वाली फिल्मों’ में से एक बताया था.

# 2) पद्मावत | रणवीर सिंह, जिम सरभ-

25 जनवरी, 2018 को रिलीज़ होने से ही पहले ही ‘पद्मावत’ कई ऐतिहासिक और समाजिक कारणों से विवादों से घिर गई थी. मूवी में पद्मावत की कहानी के अलावा एक सब प्लॉट अल्लाउद्दीन खिलजी और उसके ग़ुलाम मलिक काफूर के बीच समलैंगिक संबंधों का भी है. काफूर के लिए खिलजी का इश्क इतना गहरा था कि उसने गुजरात की जंग में ग़ुलाम बने काफूर को सेनापति जैसा बड़ा पद दे डाला था. मूवी में खिलजी और काफूर के बीच कई इंटेंस सीन भी दिखाए गए थे. पर्दे के पीछे से ही सही.

काफूर के रोल के लिए जिम सरभ को बेस्ट एक्टर इन नेगेटिव रोल कैटेगरी में एशियाविज़न अवॉर्ड भी मिला था. खिलजी के कैरेक्टर के लिए तो खैर रणवीर सिंह तारीफ़ों और अवॉर्ड्स से मालामाल हो ही गए थे.

# 3) एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा | सोनम कपूर आहूजा, रेजिना कैसेंड्रा-

377 के डिक्रिमिनलाइज़ होने के बाद ‘गे-लेस्बियन’ रिलेशन पर बनी पहली मूवी.

‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ में शैली चोपड़ा धर का निर्देशन, लेस्बियन रिलेशन जैसे टैबू और नाज़ुक टॉपिक को एक ‘फैमिली ड्रामा’ वाले ट्रीटमेंट के साथ सामने लाता है. कहानी है स्वीटी (सोनम कपूर) नाम की एक पंजाबी लड़की की जो कुहू (रेजिना कैसेंड्रा) से प्यार करती है. हालांकि स्वीटी का परिवार खुले विचारों का है (इतना कि वो एक मुस्लिम लड़के, साहिल मिर्ज़ा से स्वीटी की शादी करने को तैयार हो जाता है), लेकिन इतना भी ओपन माइंडेड नहीं कि दो लड़कियों की शादी के लिए राज़ी हो जाए.

आमतौर पर सोशल मैसेज देने वाली फ़िल्में अक्सर सब्जेक्ट तो बढ़िया चुन लेती हैं, लेकिन एग्ज़िक्यूशन में मार खा जाती हैं. ये वाली फिल्म ऐसी नहीं है. डायरेक्टर शैली चोपड़ा धर ने ग़ज़ब की सेंसिटिविटी से फिल्म हैंडल की है.

# 4) कपूर एंड संस | फवाद खान-

ये भी एक फैमिली मूवी है, जिसमें एक सब-प्लॉट समलैंगिकता की बात भी करता है. एक फैमिली है. फैमिली में क्यूट से दादाजी हैं. रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर. पांव कब्र में हैं. बची हुई जिंदगी का एक ही मकसद है. न बहू चाहिए, न पोता खिलाना है. न जाना है तीरथ पर. बस पूरी फैमिली के साथ फोटो खिंचानी है. और उसमें नीचे लिखना है, ‘कपूर एंड संस.’

इसमें फवाद खान का कैरेक्टर राहुल, एक गे था. वो अपनी लैंगिक पहचान छिपाकर रखता है. जिसे हम अंग्रेजी में कहते हैं ‘क्लोजेटेड गे’.

‘कपूर एंड सन्स’ में समलैंगिकता एक सब-प्लॉट ही था, जिससे पता पड़ता था कि परिवार में सभी लोग अलग-अलग तरह के स्ट्रगल से जूझ रहे हैं. समलैंगिकता के ट्रीटमेंट को देखा जाए, तो ये उन कुछ एक मेनस्ट्रीम फिल्मों में थी, जिसमें पूरी संवेदनशीलता के साथ गे कैरेक्टर से डील किया गया था.

फवाद ने अपने इस रोल के बारे में कहा था-

अगर कोई इस तरह का चरित्र निभाता है, तो वह बहिष्कृत क्यों होगा? कुछ साल बाद चीजें सामान्य हो जाएंगी. हर कोई जो इस वक्त इन चीजों के बारे में चिंतित रहता है, भविष्य में इन्हें स्वीकार करना सीख जाएगा.

शकुन बत्रा के निर्देशन में बनी ये मूवी 2016 की बेस्ट मूवीज में से एक मानी जाती है. ‘कपूर एंड संस’ फिल्मफेयर अवार्ड्स में नौ कैटेगरीज़ के लिए नॉमिनेटेड हुई और इसने पांच अवॉर्ड्स जीत भी लिए. इसका एक गीत ‘लड़की ब्यूटीफुल’ भी खूब देखा सुना गया. फवाद खान के रोल की दर्शकों से लेकर समीक्षकों तक ने खूब तारीफ़ की.

# 5) फायर | शबाना आज़मी, नंदिता दास-

इस्मत चुगताई की कहानी ‘लिहाफ’ ने जो देसी लिटरेचर में किया वही देसी फिल्मों में दीपा मेहता की ‘फायर’ ने किया. मतलब आग लगा दी. ‘लिहाफ’ से इंस्पायर्ड इस मूवी को बॉलीवुड की नहीं, इंडो-कैनेडियन मूवी कहा जाना चाहिए. दीपा की बाकी फिल्मों की तरह. लेकिन जो भी हो इस फिल्म ने न सिर्फ सामजिक तौर पर, बल्कि राजनैतिक तौर पर भी पूरे इंडिया में आग लगा दी थी. अगेन, दीपा की बाकी फिल्मों की तरह.

देवरानी-जेठानी के बीच का ‘लेस्बियन रिलेशन’. इंडिया में पहली बार. वो भी किसी सब-प्लॉट में या किसी मेटाफर के पीछे छुपाया हुआ नहीं. मेन प्लॉट और पूरी तरह विज़ेबल. दृश्य.

फायर मूवी का पोस्टर. मूवी जिसके विरोध में शिवसेना मुंबई की सड़कों पर उतर आई थी.
‘फायर’ मूवी का पोस्टर. मूवी जिसके विरोध में शिवसेना मुंबई की सड़कों पर उतर आई थी.

राधा (शबाना आज़मी) घर की बड़ी बहू है. उसकी कोई संतान न होने की वजह से वो अकेलेपन की गिरफ्त में है. उसका पति अशोक (कुलभूषण खरबंदा) पिछले 13 सालों से उसके प्रति उदासीन है. दूसरी तरफ छोटी बहू सीता (नंदिता दास) है. इस कैरेक्टर का नाम सेंसर बोर्ड ने इंडियन दर्शकों के लिए नीता कर दिया था. हालांकि मूवी बिना किसी कट के ‘एडल्ट’ सर्टिफिकेट के साथ पास हो गई थी.

तो सीता का पति जतिन (जावेद ज़ाफरी) किसी और लड़की से प्यार करता है. देवरानी-जेठानी घर की ज़िम्मेदारियां निभाते-निभाते एक दूसरे के अकेलेपन को बांटने लगती हैं. लेस्बियन रिश्ते में जुड़ जाती हैं. परिवार से बगावत कर दोनों एक दूसरे में अपना प्रेम न केवल तलाश लेती हैं, बल्कि उसकी लहरों में बहने का हौंसला भी करती हैं.

न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी में ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ जेंडर एंड सेक्सुअलिटी’ की निदेशक गायत्री गोपीनाथ कहती हैं-

एक फैमिली पिकनिक के दौरान जब सीता, राधा के पैरों की मालिश करती हैं या जब सीता, राधा के बाल बनाती हैं. और जब ये हरकतें कामुक होने लगती हैं, क्यूंकि दोनों औरतें इसमें सेक्सुअली शामिल हैं. तब, ये कहा जा सकता है कि ‘फायर’ ने फिल्मों को पढ़ने का एक नया तरीका खोजा. व्याख्यात्मक तरीका.

नंदिता दास ने 2015 में, ‘वीमेन इन दी वर्ल्ड’ समिट के दौरान कहा था-

उन दिनों (जब ये मूवी रिलीज़ हुई थी) प्रमुख अंग्रेजी अख़बारों के पत्रकार तक ‘लेस्बियन’ शब्द का उपयोग नहीं करते थे. वो इसे ‘इस तरह के संबंध’ कहते थे.

मूवी में एक डायलॉग है जहां मैं कहती हूं, ‘हम एक दूसरे के लिए कैसा महसूस करते हैं, ये बताने के लिए कोई भारतीय शब्द नहीं है.’ ‘फायर’ ने इस विमर्श की शुरुआत की थी. इसको इस हद तक मेनस्ट्रीम किया कि हम आज भी इस फिल्म को डिस्कस कर रहे हैं.

# 6) आई एम | राहुल बोस, अर्जुन माथुर-

‘आई एम’ एक एंथोलॉजी मूवी है. मतलब ऐसी मूवी, जिसमें एक से ज़्यादा कहानियां हों. ओनीर की ‘आई एम’ मूवी में 4 कहानियां हैं. ‘आफिया’, ‘मेघा’, ‘अभिमन्यु’ और ‘ओमार’. ‘आई एम’ भारत की पहली ‘क्राउड सोर्सड’ मूवी है. जिसमें 400 से ज़्यादा लोगों में अपना योगदान दिया है. सिर्फ पैसे ही नहीं. कहानी से लेकर कास्ट और क्रू के लिए सामान, लोकेशंस वगैरह के इंतज़ाम में इन लोगों ने हाथ बंटाया. जैसे चाइल्ड एब्यूज़ वाली कहानी (आई एम अभिमन्यु) की स्क्रिप्ट लिखने में फैशन डिज़ाइनर गणेश नाल्लारी और गे राइट एक्टिविस्ट हरीश अय्यर ने हेल्प की और अनुराग ने इस वाले पार्ट में एक्ट किया. तीनों ही चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार बन चुके हैं.

बहरहाल हम हम बात करेंगे ‘ओमार’ की स्टोरी की. ओमार (राहुल बोस) और जय (अर्जुन माथुर) को कैजुअल सेक्स के दौरान एक पुलिसवाला रंगे हाथों पकड़ लेता है. और धारा 377 ( जो उस वक्त डिक्रिमिनलाइज़्ड नहीं हुई थी) से दोनों को ब्लैकमेल करता है. ये वाली स्टोरी, दिखाती है कि कैसे समलैंगिकों को समाज में परेशानी झेलनी पड़ती है. खास तौर पर तब जब कानून भी उनके साथ न हो.

'आई एम ओमार' सेक्स में आपसी सहमती और ज़बरदस्ती के बीच क्या डिफ़रेंस है इसे भी बड़े सूक्ष्म और संवेदनशील ढंग से दिखाती है.
‘आई एम ओमार’, सेक्स में आपसी सहमती और ज़बरदस्ती के बीच क्या डिफ़रेंस है इसे भी बड़े सूक्ष्म और संवेदनशील ढंग से दिखाती है.

‘आई एम’ खूब सराही गई थी. इसे बेस्ट फिल्म का नेशनल अवॉर्ड मिला. अमिताभ भट्टाचार्य को बेस्ट लिरिसिस्ट का नेशनल अवॉर्ड भी. इसके अलावा भी ये मूवी कई देसी-विदेशी फिल्म फेस्टिवल्स में प्रदर्शित हुई थी. इसका ‘अभिमन्यु’ और ‘ओमार’ वाला पार्ट टीएमजी (ट्रायंगल मीडिया ग्रुप) ग्लोबल अवॉर्ड्स के लिए अलग से नॉमिनेट हुआ था.

# 7) माय ब्रदर… निखिल | संजय सूरी, पूरब कोहली-

समलैंगिकता पर बनीं अधिकांश फ़िल्में वाह्य दृष्टिकोण से बनाई गई हैं. ( वाह्य दृष्टिकोण से मतलब ये कि फिल्म बनाने वालों का निजी अनुभव वो नहीं रहा है, जो वो अपनी फिल्मों दिखा रहे हैं.) इसलिए इन समलैंगिक कैरेक्टर्स को लेकर एक सही समझ नहीं पैदा हो पाती.

‘मेड इन हैवन’ फेम, अलंकृता श्रीवास्तव की ये बात सुनने के बाद आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ओनीर एक मात्र निर्देशक हैं जिनकी दो फ़िल्में इस लिस्ट में है. क्यूंकि वो एक मात्र निर्देशक हैं, जो खुले आम अपने सेक्सुअल ओरिएंटेशन को स्वीकार करते हैं. कि वो गे हैं.

‘माय ब्रदर… निखिल’ में भी वो इस सेम-सेक्स के मुद्दे को बड़े संवेदनशील ढंग से उठाते हैं. निखिल एक बढ़िया तैराक है. उसके लिए तैराकी में कोई इनाम जीतना, पिताजी के सपने को सच करना है. लेकिन एक दिन पता चलता है कि उसे एड्स है. उसे घर और स्वीमिंग टीम से निकाल दिया जाता है. जब सभी उसका साथ छोड़ देते हैं तो उसकी बहन अनामिका (जूही चावला) उसके साथ बनी रहती है. और बना रहता है उसका बॉयफ्रेंड निगेल (पूरब कोहली).

इस मूवी की विशेषता है मेन प्लॉट के चलते, गे रिलेशन वाले सब प्लॉट का नॉर्मलाइज़ हो जाना. कि ये ‘है’. न अच्छा न बुरा. बस है. एक खबर सा. एडिटोरियल आर्टिकल सा नहीं.

‘माय ब्रदर… निखिल’, ओनीर की डायरेक्टर के तौर पर पहली मूवी थी. और उनकी बाद ही हर मूवी की तरह ये वाली भी खूब सराही गई थी.

# 8) बॉम्बे टॉकिज | साक़िब सलीम, रणदीप हुड्डा

‘बॉम्बे टॉकिज़’ इस लिस्ट की एक और एंथोलॉजी मूवी है. ‘आई एम’ की तरह इसमें भी चार कहानियां हैं. लेकिन ये ‘आई एम’ से इस तरह अलग है कि इसके चारों पार्ट्स अलग-अलग डायरेक्टर्स ने बनाए हैं. करण जौहर, दिबाकर बैनर्जी, ज़ोया अख्तर और अनुराग कश्यप ने. लेकिन गे रिलेशन पर बात करता है, करण जौहर वाला पार्ट. अजीब दास्तां है ये.

‘बॉम्बे टॉकिज़’ मूवी के इस पार्ट में दो गे के बीच का रिलेशन दिखाया गया है. देव (रणदीप हुडा) एक ‘क्लोजेटेड गे’ है. वो शादीशुदा है. गायत्री (रानी मुखर्जी) से. अब चूंकि वो शादीशुदा है, इसलिए कहा जा सकता है कि वो होमोसेक्सुअल नहीं, हेट्रोसेक्सुअल है. दूसरी ओर अविनाश (साक़िब सलीम) खुले तौर पर स्वीकारता है कि वो गे है. गायत्री इन दोनों समलैंगिको के बीच का पुल बनती है, अनजाने में.

ये मूवी हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर रिलीज़ की गई थी और कान फिल्म फेस्टिवल में भी प्रदर्शित की गई थी. हालांकि करण जौहर ने कभी स्वीकार नहीं किया कि वो समलैंगिक हैं, लेकिन उनकी इस विषय को लेकर संवेदनशीलता कमाल की है. आर्टहाउस या पैरलल मूवी की बात न की जाए तो, मेनस्ट्रीम सिनेमामेकर्स के बीच, उनकी ये समझ अन-पैरलल कहना ग़लत न होगा.

इन फिल्मों के अलावा, ‘रज़िया सुल्तान’ (1983) को भी ‘छुपी लेस्बियन थीम’ के लिए याद किया जाता है. जैसे वो सीन, जब नाव में परवीन बाबी का किरदार हेमा मालिनी के किरदार को उनींदा देखकर उसके लिए लोरी गाता है. और फिर हेमा उठ जाती है और दोनों एक दूसरे को किस करते हैं. हालांकि ये किस पर्दे पर दिखाई नहीं जाती. जैसा उस वक्त का रिवाज़ था, ऐसे सीन फूलों, पत्तों, पंखों या दुपट्टों से छुपा दिए जाते थे.

रज़िया सुल्तान क्या ढके छुपे ढंग से एक 'होमोरोटिक' मूवी थी?
‘रज़िया सुल्तान’ क्या एक ‘होमोरोटिक’ मूवी थी?

मधुर भंडारकर की मूवीज़ (‘पेज 3’, ‘फैशन’) वगैरह में भी कई समलैंगिक किरदार दिखते हैं. ‘बॉमगे’ (बॉम्बे और गे से मिलकर बना) 1996 में आई थी. इसे भारत की पहली गे फिल्म का दर्ज़ा हासिल है. इसका लाइब्रेरी का एक गे-सेक्स सीन काफी विवादास्पद रहा था.  2016 में आई मूवी ‘डियर डैड’ का सेंट्रल आईडिया भी कमाल है- क्या हो जब आपका बाप आपसे कहे कि वो गे है? वो भी एक रोड ट्रिप के दौरान आत्ममंथन करते हुए?

दीप्ति नवल की डायरेक्टर के रूप में पहली और एक मात्र फिल्म ‘दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश’ में भी लीड कैरेक्टर, देबू (रजत कपूर) गे है जो एक अंजान प्रॉस्टिट्यूट, जूही (मनीषा कोइराला) के साथ रहने लगता है.

‘इवनिंग शेडोज़’, ‘हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड’, ‘लाइफ इन अ मेट्रो’, ‘मैंगो सूफ्ले’, ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ’ जैसी और भी ढेरों मूवीज़ हैं जिसने इस पूरी बहस को न सिर्फ मेनस्ट्रीम कर दिया है, बल्कि इसका पलड़ा भी काफी हद तक ‘समलैंगिक कम्युनिटी’ की ओर झुका दिया है.

डायरेक्टर ऋतुपर्णो घोष ने हालांकि सिर्फ 2 हिंदी फ़िल्में बनाई हैं. ‘रेनकोट’ और ‘सनग्लास’ और दोनों ही काफी संवेदनशील मूवीज़ होते हुए भी समलैंगिकता के मुद्दे को नहीं छूती. लेकिन उनका नाम इसलिए लिया क्यूंकि अव्वल तो वो एकमात्र ऐसी फ़िल्मी हस्ती थे जो एलजीबीटीक्यू अधिकारों के प्रति रील लाइफ में ही नहीं रियल लाइफ में भी काफी एक्टिव थे.

उनकी एक मूवी थी, जिसमें वो एक्टर थे, डायरेक्टर नहीं, ‘मेमोरीज़ इन मार्च’. हालांकि संजय नाग डायरेक्टेड ये मूवी बंगाली भाषा में थी, और हमारी लिस्ट सिर्फ हिंदी फिल्मों तक सीमित है. लेकिन अगर जेंडर-इश्यूज़ पर बनीं भारत की कुछ बेहतरीन फिल्मों की बात हुई तो इसका नाम ज़रूर आएगा. दीप्ति नवल और ऋतुपर्णो ने इसकी स्क्रिप्ट में जान फूंक दी थी.  इसके अलावा डायरेक्टर के तौर पर उनकी बंगाली मूवी ‘चित्रांगदा’ की भी बात कर ली जाए. ‘चित्रांगदा’ में गे कपल की दिक्कत है कि उनको कानून बच्चा गोद लेने की इजाज़त नहीं दे रहा.


# क्या ‘लक्षणा’ में भी दिखी है हिंदी फिल्मों में समलैंगिकता? –

फिल्म और समलैंगिक विषयों पर रिसर्च करने वालों ने बॉलीवुड फिल्मों और समलैंगिकता के बीच, पर्दे के पीछे चलने वाले रिलेशन पर भी तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बातें रखी हैं. जैसे-

# इनका मानना है कि ‘दोस्ती’ मूवी में रामू और मोहन का रिश्ता उन सभी शर्तों को पूरा करता है जो एक गे रिलेशन की होती हैं. उन दोनों के बीच की इंटेंसिटी काव्यात्मक डायलॉग्स से, गीतों और नैरेटिव से दिखाई गई है. लास्ट वाले सीन में भी दोनों को देखकर एक बूढ़ी औरत कहती है-

भगवान करे, तुम्हारी जोड़ी इसी तरह बनी रहे.

जेंडर और गे-लेस्बियन मुद्दों पर लिखने वालीं रुथ वनिता कहती हैं-

‘जोड़ी’ शब्द शादीशुदा लोगों के लिए ही बोला जाता है, और इस तरह के आशीर्वाद भी बड़े-बूढ़े शादीशुदा जोड़ों को ही देते हैं.

# गे रिलेशन की ढेरों लक्षणाएं अमिताभ बच्चन की फिल्मों में भी दिखती हैं. ‘क्वीयर एशिया सिनेमा’ के लेखक आरआर राव कहते हैं-

अमिताभ बच्चन की फिल्मों में महिलाओं के लिए कम ही कंटेंट होता था. उनकी फिल्मों में सिनेमा हॉल के अंधेरे  में होमोरोटिक (होमो और इरोटिक शब्दों से मिलकर बना एक शब्द जिसका मतलब है, होमोसेक्सुअल दर्शकों के लिए इरोटिक कंटेंट) चीज़ें परोसी गई थीं. जैसे हाथ पकड़ना, कंधे या कमर पर हाथ रखना वगैरह.

अमिताभ बच्चन ‘यारी’ के नाम पर दूसरे पुरुष के साथ अमर प्रेम को अभिव्यक्त किया करते थे. आईआईटी दिल्ली में सोशल साइंस के विजिटिंग प्रफेसर राज अय्यर कहते हैं-

यार का मतलब एक ऐसा इंसान, जिसके साथ आपका एक गहरा संबंध हो. इस शब्द की परिभाषाएं समय के साथ-साथ बदलती रही हैं. कभी ये प्रेमी को कहा गया है और कभी एक मित्र और एक प्रेमी दोनों के मिलन को.

तो ‘नमक हराम’ और ‘आनंद’ जैसी मूवी में जहां राजेश खन्ना एक इमोशनल, फेमिनाइज़्ड (स्त्री गुणों वाले) पुरुष की भूमिका निभाते हैं, वहीं अमिताभ बच्चन एक ऐसे प्रेमी की भूमिका में होते हैं जो अपने प्रिय मित्र को अपनी बाहों में मरते हुए देखकर क्रोध से भर जाता है.

ऐसे ही ‘दोस्ताना’ मूवी में अमिताभ का किरदार एक गीत में शत्रुघ्न सिन्हा के किरदार को कोसते हुए ‘बेवफ़ा’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं. जो उतना ही स्पेसिफिक है, जितना ‘जोड़ी’.

# कुछ लोग ‘शोले’ मूवी में जय वीरू की दोस्ती को होमोरोटिज़्म का सबसे बड़ा उदाहरण मानते हैं और इसी के चलते शोले के गीत ‘ये दोस्ती, हम नहीं छोड़ेंगे’ को न्यूयॉर्क और सैन फ्रांसिस्को में होने वाली कई ‘गे प्राइड परेड’ में इस्तेमाल किया जाता रहा है.

कनाडा के थॉमस वॉघ, जिन्होंने इरोटिसिज़्म और एलजीबीटीक्यू पर काफी काम किया है, कहते हैं-

गौर कीजिए कैसे इस गीत में दो दोस्त, अपनी बाइक के हैंडल बार से ज़्यादा एक दूसरे के हाथ, कंधे, सर और जांघे दबाते और दुलारते हैं.


# हिंदी फिल्मों के इतर-

मूवीज़ से इतर अगर ‘नए ज़माने के ऑडियो विज़ुअल कंटेट’ की बात की जाए तो वेब सीरीज़, शॉर्ट मूवीज़ और पॉडकास्ट, व्लॉग वगैरह में अब ये इश्यू इतना अस्पर्शनीय नहीं रहा और न ही ऐसा जो ह्यूमर के लिए प्रयोग में आए.

# जैसे ‘सेक्रेड गेम्स’ में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और पंकज त्रिपाठी के किरदारों के बीच का रिलेशन.

# जैसे ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज़’ में गे किरदार का सामान्यीकरण.

# जैसे ‘कोड एम’ में आर्मी में समलैंगिकता वाला इश्यू सीरीज़ का मेंन कनफ्लिक्ट है, हालांकि ये आता सीरीज़ के बिलकुल एंड में है. एक सस्पेंस सा.

# जैसे ‘मेड इन हैवन’ में  लीड कैरेक्टर करण मेहरा (अर्जुन माथुर) का गे होना. और दबे छुपे ढंग से उसके मकान मालिक (विनय पाठक) का भी. बड़ी स्टारकास्ट के साथ बनी इस सीरीज़ को ज़ोया अख्तर, नित्या मेहरा, प्रशांत नय्यर और अलंकृता श्रीवास्तव ने मिलकर डायरेक्ट किया है. वहीं अलंकृता जिनका कोट हमने ऊपर लिया था.

तो हम समाज के तौर पर इवॉल्व कर रहे हैं, ये अच्छी बात है. लेकिन बहुत धीरे-धीरे, ये थोड़ी दिक्कत भरा है.


वीडियो देखें:

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