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मेंटल हेल्थ पर जो बात घरवाले नहीं करते, वो ये 11 फिल्में करती हैं

“जब रोना आता है तो बड़े कहते हैं आंसू पोछो, जब गुस्सा आता है तो बड़े कहते हैं स्माइल करो, क्यों? ताकि घर की शांति बनी रहे”

मुद्दा ये कि हमारे समाज में दिमाग की शांति से कई ज़्यादा ज़रूरी है ये ‘घर की शान्ति’. सबसे पहले डेमोक्रेसी की मुखालफततो हमारे घर में ही हो जाती है. मेन्टल हेल्थ खराब होना हमारे लिए पागलपन ही होता है. और चूंकि सिनेमा इसी समाज का आइना है, तो वहां भी यही देखने को मिलता है. पुरानी फिल्में और उनके रंग ही ब्लैक एंड वाइट नहीं थे. रंग भरने के बाद भी उनमें किरदारों का पोट्रेयल ब्लैक एंड वाइट जैसा ही था. या तो किरदार ‘शुद्ध बुद्धि वाला’ होगा या फिर ‘इनको कुछ दिमागी बीमारी है’ या ‘ये पागल है’ या ‘इनका दिमागी संतुलन हिला हुआ है’ वाला. फिल्मों में मेन्टल हेल्थ से जुड़ी कोई भी बात, तकलीफ हो तो उसका इलाज दिखाते थे बस रिवेंज, बदला! बदला लेते ही संतुलन सुधर गया, याद है ‘खिलौना’ मूवी? संजीव कुमार की वो फिल्म, जिसमें वो एक ऐसा ही किरदार प्ले करते हैं. जिसकी मानसिक हालत ठीक नहीं है और ये दर्शाने के लिए वो अजीब तरह से आँखें फाड़ते, आवाज़ मॉड्यूलेट करते दिखते हैं. तब समाज जैसा मानता था, फिल्मों में भी वही दिखता था.

Shock Therapy Scene2
मेन्टल हेल्थ और उसके इलाज का मज़ाक बनाने में कई फिल्मों का छोटा-बड़ा योगदान रहा है.

पर्सनालिटी डिसऑर्डर पर बात करने वाली फिल्म ‘भूलभुलैया’ में भी राजपाल यादव का पोट्रेयल ह्यूमर पर्पज़ के लिए वैसा रखा गया. याद करिए पानी-पानी, और अरे बेटी राधा कहा चली अपने गधे पर बैठ कर वाले सीन पर आप खूब हंसे. लेकिन ये एक इंसान की परेशानी थी, जिसे हमने हंसकर बाकी समस्याओं की तरह बस इग्नोर कर दिया. सलमान खान की फिल्म क्योंकि में तो मेन्टल असाइलम को भी सर्कस जैसा दिखाने का उल्टा काम कर दिया गया था. जो किसी बीमारी से परेशान है, उसे कमरे में बंद करने और शॉक लगाने की धमकी देना ही फिल्मों में पागलपन का इलाज था. इसे इतना ड्रामेटाइज़ किया गया कि लोगों में ट्रीटमेंट को लेकर डर बैठ गया.

सिर्फ फिल्में ही क्यों, आगरा और बरेली वाले चुटकुलों से सबने मेन्टल हेल्थ और इलनेस को लेकर अपनी गंभीरता का स्तर दिखा ही दिया है. खैर इन सब बातों के बावजूद कुछ ऐसी फिल्में थीं और फिल्म मेकर्स भी, जो अपना फ़र्ज़ नहीं भूले. पूरे कम्पैशन के साथ ऐसे मुद्दों पर बात करने और सबको अवेयर करने का काम बाखूबी किया. आज हम World Mental Health Day के मौके पर ऐसी ही फिल्मों की एक लिस्ट लाए हैं. जो किसी को ‘ये तो पागल है’ नहीं कहती, बल्कि उनकी परेशानी बिना किसी तड़के के हमें दिखाती हैं. जो फिल्में कम और जनता के लिए लेसन ज़्यादा हैं. आइए लिस्ट पर नज़र डालते हैं.


1. देवराई
डायरेक्टर – सुनील सुकथनकर और सुमित्रा भावे

शेष. एक ऐसा आदमी, जिसे अकेले रहना पसंद था. इंसानों से ज़्याद जंगल पसंद था. एक दिन शेष तूफ़ान खड़ा कर देता है, सबके सामने तमाशा करता है. तमाशा! यही तो कहा जाता है, जब दिल खोलकर कोई अपना गुस्सा या फ्रस्ट्रेशन ज़ाहिर कर देता है. जिसके बाद सब उसे ‘ये तो पागल है’ कह देते हैं. जिसे घर पर रखना खतरनाक है. उसकी बहन उसका ख्याल रखती है, बाकी सब बस एम्बैरस  होते हैं. फिल्म में शेष का भांजा, एक बच्चा जब इस बारे में बात करता है, तो टॉपिक डाइवर्ट कर दिया जाता है. बस यही दिक्कत है हमारी सोसाइटी में. मेन्टल हेल्थ, सेक्स एजुकेशन, लव लाइफ- जिनके बारे में वाकई बात होनी चाहिए, नहीं होती. डिप्रेशन से लेकर स्किज़ोफ्रेनिया सब कुछ पागलपन है. खैर अतुल कुलकर्णी की फिल्म ‘देवराई’ में उन्होंने बहुत संभल कर पूरी एम्पथी के साथ किरदार निभाया है. वो हकलाना, लोगों को देख घबराना और अपनी बीमारी को समझना, उस समय की vulnerablity उन्होंने खूब अच्छे से दिखाई है. फिल्म सुमित्रा भावे और सुनील सुकथनकर ने डायरेक्ट की है. मस्ट वॉच है.

मराठी फिल्म देवराई - अतुल कुलकर्णी, सोनाली कुलकर्णी
मराठी फिल्म देवराई – अतुल कुलकर्णी, सोनाली कुलकर्णी

2. 15 पार्क एवेन्यू
डायरेक्टर – अपर्णा सेन

कोंकणा सेन शर्मा. जिन्हे आज की जनरेशन जानती है ‘वेकअप सिड’ जैसी फिल्मों से. उन्ही की एक फिल्म है ‘फिफ्टीन पार्क एवेन्यू’. जिसमें उन्होंने एक स्किज़ोफ्रेनिक पेशेंट का रोल किया है. मीठी. मीठी की एक बड़ी बहन है अंजली (शबाना आज़मी) जो उसे बड़े ही प्यार से ट्रीट करती हैं. माँ है वहीदा रहमान. जो बेटी की बीमारी के लिए तांत्रिक बुलाती हैं. इस फिल्म को कोंकणा के बेहतरीन प्रोजेक्ट्स में से एक कहा जा सकता है. जिसमें उन्होंने एक पेशेंट का किरदार बहुत स्मूथली निभाया. वो पेशेंट, जो अपनी ही ख्याली दुनिया में जीती है, सच्चाई से दूर. एक पता है पार्क एवेन्यू का, वही तलाशती है. जो शायद है भी नहीं वहां. कोंकणा की एक्टिंग और फिल्म की डायरेक्टर अपर्णा सेन के शानदार काम के लिए ये फिल्म देखनी चाहिए. इस फिल्म में एक मेंटली परेशान पेशेंट के साथ कैसे रहे, इस बात के छोटे-छोटे लेसन्स हैं. जो एस हर पेशेंट के रिश्तेदारों के काम आयेंगे. और हाँ इस फिल्म की एंडिंग खुद को नॉर्मल कहने वाले इंसानों को भी एक बार अपने दिमाग पर शक कर लेने को मजबूर कर देगी. कि जो देखा वो सच है या जो सच है वो दिखा ही नहीं.

15 पार्क एवेन्यू में शबाना आज़मी एज़ अंजलि और कोंकणा एज़ मीठी
15 पार्क एवेन्यू में शबाना आज़मी एज़ अंजलि और कोंकणा एज़ मीठी

3. डियर ज़िन्दगी
डायरेक्टर – गौरी शिंदे

जब हम अपने आप को समझ लेते हैं तो दूसरे क्या सोचते हैं, डज़ नॉट मटर. बस यही फिल्म का वन लाइनर है. बहती रेत से समय नाप लेने वाला इंसान इतना नहीं जान पाता कि अपने खुद के दिमाग में जो थॉट्स हैं, वो कहीं अपने ही लिए स्पाइडर वेब का काम तो नहीं करते? डिप्रेशन, एंग्जायटी, गुस्सा. हमेशा से इसके ‘निपटारे’ के लिए बड़ों ने कहा, ‘अरे सुबह जल्दी उठो, सब ठीक हो जाएगा’. ‘अरे तुम फ़ोन बहुत चलाते हो, इसीलिए दिमाग में ये सब बैठ गया है’. हम अक्सर परेशान होते हैं अपने रिलेशनशिप्स, ब्रेकअप्स से जुड़ी एंग्जायटी को लेकर. लेकिन पता नहीं होता क्या करें. डॉक्टर जहांगीर उर्फ़ जग ने हमें बताया था,

 ‘नफरत करना चाहते थे तो इजाज़त नहीं थी और जब हम प्यार करना चाहते हैं, तो पता चलता है ये सारा इमोशनल सिस्टम ही गड़बड़ा गया. रोना, गुस्सा, नफरत कुछ भी खुलकर एक्सप्रेस करने नहीं दिया. अब प्यार कैसे एक्सप्रेस करें!”

डिअर ज़िन्दगी - शाहरुख़ खान और आलिया भट
डिअर ज़िन्दगी – शाहरुख़ खान और आलिया भट

‘डियर ज़िन्दगी’ का ये एक ही नहीं, ऐसे अनेकों सीन हैं जिसमें डायरेक्टर गौरी शिंदे ने बड़ी सेंसिबिलिटी और खूबसूरती से बताया कि जितनी इस शरीर की तबियत का हाल पूछते हैं, उतना ही ज़रूरी है इस दिमाग के हाल जानने-पूछते रहने का. शाहरुख़ खान और आलिया भट्ट ने फिल्म में न पूछे जाने वाले दर्जनों सवालों के जवाब दिए. दिखाया कि ये जिन्हें हम ‘अरे कुछ नहीं होता, तू ये सब इग्नोर कर’ कहते हैं, गलत है. अपनी मेन्टल हेल्थ के लिए किसी डॉक्टर के पास जाना पागलपन का इलाज कराना है भी, तो होने दो. फिल्म में बहुत सारे सीन हैं, जो बताते हैं कि बचपन की परवरिश और बड़े होकर इंसान की मेन्टल हेल्थ कितनी कनेक्टेड है. कुर्सी वाला सीन, आलिया का अपने ही घर में अकेले होना सब कुछ मेन्टल हेल्थ की चीख-चीखकर बात करते हैं. बस फिल्म की तरह थेरपीज़, समुद्र की लहरों के साथ कबड्डी खेलने वाली, आसान नहीं हो शायद लेकिन ज़रूरी होगी.


5. तमाशा
डायरेक्टर – इम्तियाज़ अली

 “सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना. तड़प का न होना. सब कुछ सहन कर जाना.”

पाश की लिखी लाइंस हैं. ‘तमाशा’ के वेद के साथ अपनी रूटीन लाइफ जीते हुए शायद यही हुआ था. सोशल मीडिया पर भतेरे वीडियोज़ आपको एक टाइटल के साथ मिल जाएंगे – how did tamasha change my  life? इस फिल्म ने उन हज़ारों-लाखों लोगों को उसी रूटीन लाइफ को तोड़ने की हिम्मत दी, जो नहीं जानते थे उन्हें करना क्या है! समाज एक मोल्ड में हमें फिट करना चाहता है. बेटा ऐसा पहनो, यहाँ पढ़ो, यहाँ जॉब करो, अब शादी, अब बच्चे. कुछ लोग इस प्रेशर को झेल नहीं पाते. ये फिल्म हमें याद दिलाती है कि हर इंसान अलग है. कोई ज़्यादा प्रेशर झेल लेता है लेकिन कोई किसी कमज़ोर पेड़ की तरह एक तूफ़ान में टूट भी जाता है. ज़माना बताता है कि वेद के किरदार को बाइपोलर डिसऑर्डर है, स्किज़ोफ्रेनिया है, अलग-अलग मेन्टल डिसऑर्डर है वगैरह. लेकिन वो बस अपनी आइडेंटिटी को लेकर कन्फ्यूज्ड है. क्योंकि एक ही ढर्रे में जीते हुए उसने अपनी मेन्टल हेल्थ के साथ होते खिलवाड़ के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई. जिसे इरशाद कामिल और ए आर रहमान के गाने ‘तू कोई और है’ में समझा जा सकता है. ये फिल्म नहीं है, एक आइना है. जब-जब वेद खुद से हाथ जोड़ के आईने के सामने कहता है ‘प्लीज़ मैं तेरे हाथ जोड़ता हूँ’, शायद वो ज़िन्दगी में खुद के बनाए मेस से परेशान हो जाता है.  फिल्म कम्पैनियन को दिए एक इंटरव्यू में इम्तियाज़ अली ने बताया था –

“साइकिएट्री में बाइपोलर एक क्लीनिकल कंडीशन होती हैं, मैं नहीं कहूंगा फिल्म में वेद बाइपोलर है”.

बेदर्द थी ज़िन्दगी, बेदर्द है - अगर तुम साथ हो (तमाशा)
बेदर्द थी ज़िन्दगी, बेदर्द है – अगर तुम साथ हो (तमाशा)

बहुत ब्यूटिफुली फिल्म में उनके साथ दीपिका को डील करते भी दिखाया था. बिना किसी असल तमाशे या पागलपन के टैग के.


5. छिछोरे
डायरेक्टर – नितेश तिवारी

“सक्सेस के बाद का प्लान सबके पास है, लेकिन अगर फेल हो गए तो फेलियर से कैसे डील करना है, कोई नहीं बताता.”

सुशांत सिंह राजपूत का यही डायलॉग छिछोरे फिल्म का सार दे देता है. एक बाप अपने बेटे के लिए कूल है, लेकिन कितना अंडरस्टैंडिंग है इसका जवाब उस बच्चे के पास ही है. जो बचपन से भारी बस्ते का बोझ अपने कन्धों पर उठाते हैं और फिर लोगों की एक्सपेक्टेशन के बोझ को ढोते हैं. उन्हीं बच्चों की मेन्टल स्ट्रेंथ कितनी अफेक्टेड होती है, इस फिल्म ने हमें उसकी एक झलक दिखाई है. ये समझाया है कि सुसाइडल थॉट्स हमेशा वॉट्सएप्प पर डीपी गायब करके ही शो नहीं करते लोग. कोई डिप्रेस्ड या डरा हुआ इंसान ज़रूरी नहीं कि हमेशा चीख-चीखकर अपनी परेशानी बताए. हमें एज़ ए सोसाइटी थोड़ा संवेदनशील होने की ज़रुरत है.

छिछोरे फिल्म का एक सीन
छिछोरे फिल्म का एक सीन

6. अ डेथ इन द गंज
डायरेक्टर कोंकणा सेन शर्मा

विक्रांत मेसी, तिलोत्तमा शोम, कल्कि, रणवीर शोरी, ओम पुरी, तनुजा. ऐसी कास्ट हो तो उस फिल्म को मिस करना गलत होता है. स्पेशली तब, जब डायरेक्टर का नाम हो कोंकणा सेन शर्मा. एक लड़का है शुटु, जो अपने आप में रहता है. दोस्त बनाए भी कैसे? खुद से मन ही मन ‘लक्ष्य’ फिल्म के ऋतिक वाला सवाल पूछता है ‘मैं ऐसा क्यों हूँ’. आस पास के लोग बुली करते हैं. घर के पानी ला दो, बोतल भर दो जैसे काम कराते हैं. खेल में उसे पीट देते हैं. शुटु पढाई में फेल हो रहा है. एक लड़की को पसंद करता है जो उसे प्यार नहीं करती. अपने पिता को खोने के बाद लाइफ की गाड़ी पटरी से उतर जाती है. रोज़ उन्ही का एक पुराना स्वेटर पहनता है और उस सदमे से निकलना नहीं चाहता. मैक्लुस्कीगंज नाम की जगह है.. 70 का दशक है. इंटरनेट पर अपना दुःख या सवाल पोस्ट करने का भी कोई स्कोप नहीं था. शुटु की मेन्टल हेल्थ पर इस सब का जो असर हुआ वो फिल्म ने बहुत सटल तरीके से दिखाया है. फिल्म में विक्रांत मेसी शुटु बने हैं और उन्हें देखने के बाद शायद आप कभी भी किसी को बुली करने, उस पर आवाज़ ऊँची करने से पहले दस बार सोचेंगे.

डायरेक्टर कोंकणा सेन शर्मा विथ विक्रांत मेसी (शुटु)
डायरेक्टर कोंकणा सेन शर्मा विथ विक्रांत मेसी (शुटु)

फिल्म की कहानी कोंकणा सेन शर्मा के पिता मुकुल शर्मा की एक कहानी पर बेस्ड है. दावा है कि ये सत्य घटना पर आधारित है.


7. #होम
डायरेक्टर – रोजिन थॉमस

रीजनल सिनेमा आज के समय में ऐसा है, जैसे किसी विदेश में रह रहे भारतीय को स्क्रॅम्बल्ड एग्स और सुशी, बेगल के ढेर में स्वादिष्ट घर की दाल और रोटी मिल जाए. सच्चा और सिंपल. एक मलयालम फिल्म आई थी अगस्त 2021 में ‘#होम’. घर-घर की कहानी बट नॉट लाइक कहानी घर घर की. कनन गिल का एक स्टैंड अप है, जिसमें वो बताते हैं पेरेंट्स को टेक्नोलॉजी समझाना कितना मुश्किल है. उसी के उलट इस फिल्म में आप देखते हैं कि वो जिन्होंने ब्लैक एंड वाइट टीवी को भी हैरान होकर देखा था, आज उस समय को पार करके टच क्लिक टेक्नोलॉजी समझने के कितने जतन करते हैं.

मलयालम फिल्म - होम
मलयालम फिल्म – होम

फिल्म में एक दादाजी हैं, जिन्हें डिमेन्शिया है. अपने समय में इंग्लिश से मलयालम ट्रांसलेशन का काम करते थे और बच्चों के नाम ओलिवर ट्विस्ट, मैरी पोपिंस जैसे रखे थे. बेटे ओलिवर ट्विस्ट पिता का ख्याल रखते हैं, उनकी बेड वेटिंग तक का. लेकिन उन्हें अपने बेटे से ऐसा सेम प्यार नहीं मिल पाता. ओलिवर ट्विस्ट का एक दोस्त है, जिसे हर थोड़ी देर में अपनी जान का खतरा महसूस होता है. जिसे हम पैरानॉयड कहते हैं. उसी के लिए बीवी जी साइकोलोजिस्ट के पास जाने के लिए कहती हैं. कहने को मेन्टल हेल्थ और थेरेपी सेशंस फिल्म का सब प्लॉट हैं लेकिन फिल्म के प्रोड्यूसर विजय बाबू जब डॉक्टर फ्रेंकलिन, दी साइकोलॉजिस्ट बन कर आते हैं, धीरे-धीरे मेन्टल हेल्थ को अफेक्ट करने वाली परेशानियों के धागे खुलते जाते हैं. कैसे साइकोलॉजिस्ट के पास पिता का जाना, बेटे के लिए शर्म की बात बनता है और आखिर इससे डील कैसे करना है फिल्म सिखाती है. बहुत प्यारी फिल्म है.


8. तारे ज़मीन पर
डायरेक्टर – आमिर खान

‘दुनिया में ऐसे-ऐसे हीरे पैदा हुए, जिन्होंने दुनिया का नक्शा ही बदल दिया. क्योंकि ये दुनिया को अपनी अलग नज़र से देख पाए’.

एक बच्चा जो 3 और 8 , अंग्रेजी के D और B का फ़र्क़ नहीं समझ पाता था. जो पिता के लिए ‘मेरी इज़्ज़त डुबो के रहेगा’ वाला बेटा था. ईशान अवस्थी यानी दर्शील सफारी, जो नज़र आया ‘तारे ज़मीन पर’ फिल्म में. हेमा मालिनी के ऐड वाला केंट आर ओ वॉटर जितना शुद्ध नहीं है. उससे ज़्यादा साफ़ होता है एक बच्चे का मन. उस स्लेट की तरह है उसका दिमाग जिस पर चॉक से बड़े जो लिख दें, वो छप जाता है. मिटाने पर भी कुछ धुंधला सा रह ही जाता है. इस बच्चे के मन में भी कुछ ऐसी ही बातें हैं. पिता की एक्सपेक्टेशन से लेकर माँ से बिछड़ने की परेशानी है. सिर्फ बच्चे ही नहीं, फिल्म उन पैरेंट्स की भी मेन्टल हेल्थ की एक झलक दिखाती है. हमेशा गुस्से में रहने वाला पिता जब अपने डिस्लेक्सिक बच्चे को एक पोस्टर पर लिखे शब्द पढ़ते देखता है, तो उसकी आँखें भर आती हैं. कई बार किसी मंज़िल का रास्ता हमें पता नहीं होता, तो हम GPS का सहारा लेते हैं न! तो मानसिक हालत में सुधार के लिए किसी और की मदद क्यों नहीं ले सकते? जैसे इस फिल्म में ली गयी, राम शंकर निकुम्भ यानी आमिर खान की. जैसा कि फिल्म में कहा गया था,

‘ख्याल करना बहुत ज़रूरी है, इसमें इलाज की शक्ति है, एक मरहम है जिससे दर्द मिट जाता है’.

तारे ज़मीन पर में दर्शील सफारी
तारे ज़मीन पर में दर्शील सफारी

9. अनजाना-अनजानी
डायरेक्टर – सिद्धार्थ आनंद

जब मन टूट जाता है तो एक गाना सबको हिम्मत ज़रूर देता है.

“खुद पे डाल तू नज़र, हालातों से हारकर, कहाँ चला रे…

हाथ की लकीरों को, मोड़ता मरोड़ता, है हौसला रे

तू न जाने आसपास है खुदा….”

गाना है उस फिल्म का, जिसमे दो ट्वेंटी समथिंग लोग ज़िन्दगी से हार मान लेते हैं. डिप्रेस्ड और सुसाइडल हो जाते हैं. अपनी जान लेने की तमाम कोशिशें करते हैं. लेकिन मरते नहीं. हार नहीं मानते. ‘अनजाना अनजानी’. बहुत डिबेट्स होती हैं इस फिल्म पर.

एक– कैसे दो सुसाइडल लोगों की इस कंडीशन को रोमांटिसाइज किया गया.

दो– कम से कम लोगों के इस हार मानने वाले फेज़ पर रौशनी डाली गई बिना किसी ज्ञान के.

फिल्म दो लोगों की कहानी है. आकाश, जिसे एक्यूट स्ट्रेस डिसऑर्डर है और किआरा, जिसे एडजस्टमेंट डिसऑर्डर है. इन्हें रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा ने प्ले किया. ये दोनों मिलते हैं. दोनों ही डिप्रेस्ड हैं, जान लेने की कोशिश करते हैं. लेकिन दोनों की अकेली लाइफ में उन्हें एक समझने वाला साथी मिलता है. और बस सार यही है. कि किसी को ना कहना पड़े ‘बात करले मुझसे मेरे खालीपन’. शायद हाँ फिल्म में इस इशू को हैंडल करने के लिए थोड़ी सिंसियोरिटी का और स्कोप ज़रूर था.

अनजाना-अनजानी

10. कासव
डायरेक्टर – सुनील सुकथनकर और सुमित्रा भावे

अक्सर सेमिनार्स और मीटिंग्स की थीम हुआ करती है –डिप्रेशन. लेकिन डिप्रेशन क्या है? ‘भाई ज़्यादा मत सोचा कर, ठीक हो जाएगा’. दोस्तों से नहीं मिलोगे, बाहर नहीं जाओगे, तो डिप्रेस होंगे ही ऐसा माना जाता है. लेकिन इस दौर में जहा एक स्वाइप पर पार्टनर, एक क्लिक पर दोस्त और किसी फोटो के कमेंट बॉक्स में प्यार मिल जाता है, कोई अकेला कैसे हो सकता है? यही सवाल हैं मराठी फिल्म ‘कासव’ में. कासव यानी टर्टल, जो फिल्म में एक मेटाफर का काम करता है. ये फिल्म डिप्रेशन का इलाज नहीं बताएगी. ये बताती है कि हर इंसान अलग है और हर इंसान का दुःख, अकेलेपन और डिप्रेशन से डील करने का तरीका भी अलग है.

2017 में आई ये नेशनल अवॉर्ड विनिंग फिल्म है. जिसमें एक महिला है जानकी जो खुद डिप्रेशन और एंग्जायटी से रिकवरी के रास्ते पर है. इस रास्ते में उसे मिलता है एक लड़का मानव. जो अकेला है और उसके अकेलेपन को लोग आलस का नाम दे देते हैं. मानव बने हैं मराठी एक्टर आलोक राजवाडे, जिनके लिए आप इमैजिन ड्रैगन्स का फेमस गाना ‘डीमन्स’ सुनेंगे तो शायद उनकी मनोदशा समझ पाएंगे. ड्रामा पसंद है तो आप इसे ना ही देखें. फिल्म में स्पेस है. वो स्पेस जो किसी भी वूंडेड यानी घायल इंसान की हीलिंग के लिए ज़रूरी होती है. चाहे वो फिज़िकल हो या फिर मेन्टल. फिल्म के ट्रेलर मात्र से ही शायद कोरोना के कारण चार दीवारी में बंद लोग रिलेट कर पाएं, जो शायद अब वापस भीड़ और सोशलाइज़ करने से बचने लगे हैं. फिल्म लिखी और डायरेक्ट की है एक बेहतरीन फिल्म मेकिंग जोड़ी ने सुमित्रा भावे और सुनील सुकथनकर ने. जो कई सोशल मुद्दों पर पहले भी मराठी फिल्में बना चुके हैं. इसी फिल्म के प्रोड्यूसर और एक्टर रहे डॉक्टर मोहन आगाशे ही की एक फिल्म लिस्ट का अगला नाम है. वही मोहन आगाशे, जिन्हें आपने ‘गंगाजल’ में DIG का रोल करते देखा. जो खुद एक साइकैट्रिस्ट भी हैं.

मराठी फिल्म कासव
मराठी फिल्म कासव

11. अस्तु – सो बी इट
डायरेक्टर – सुनील सुकथनकर और सुमित्रा भावे

‘यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन्सत्यं वदति विजानन्नेव सत्यं वदति’

यानी जब कोई इंसान कुछ निश्चित रूप से जानता है, अवेयर होता है , तो वो सच को सच बता सकता है. जहां अवेयरनेस नहीं, वहां सच नहीं. ये बात मोहन आगाशे का किरदार डॉक्टर शास्त्री कहता है. मेन्टल हेल्थ की अवेयरनेस की बात करें तो ये एकदम सटीक होगा. ये बात कहना गलत नहीं होगा कि मराठी सिनेमा ने जिस तरह से मेन्टल हेल्थ और डिसऑर्डर्स को परदे पर उतारा है, हमें उनसे सीखना चाहिए. ‘अस्तु – सो बी इट’ भी ऐसी ही एक फिल्म है. फिल्म में अल्ज़ाइमर्स के एक पेशंट की कहानी है, जैसे ‘ब्लैक’ में थी. लेकिन अस्तु की ख़ास बात ये है कि वो अपनी कहानी को हैप्पी एंडिंग देने के लिए कोई चमत्कार नहीं करती. बल्कि एक सफर पर ले जाती है. एक शांत दिमाग की चाह में, शांति की खोज में. फिल्म में इरावती हर्षे, मिलिंद सोमन और अमृता सुभाष जैसे कलाकार भी हैं. फिल्म में अमृता सुभाष का किरदार जैसे अपने बच्चे का ख्याल रखती है, वैसे ही भटके हुए डॉक्टर शास्त्री का ख्याल भी रखती है. शायद ऐसी ही अंडरस्टैंडिंग की उम्मीद हमें अपनों से होती है.

अस्तु - सो बी इट
अस्तु – सो बी इट

आखिर में एक बात, जो अल्बर्ट आइंस्टीन ने कही थी-

‘पागल वो होता है जो हर बार सेम काम करता है, लेकिन नतीजा अलग हो’


ये भी देखें – लल्लनटॉप अड्डा: कोरोना के दौरान मेंटल हेल्थ का ख्याल कैसे रखें, इन डॉक्टर्स से समझिए

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