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2016 का ज़रूर देखा जाने वाला हिंदी सिनेमा!

अगर इस साल की बेस्ट हिंदी फिल्मों की सूची बनानी हो तो निश्चित रूप से अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू और अन्य उम्दा कलाकारों वाली कोर्ट-रूम ड्रामा ‘पिंक’ सबसे ऊपर होगी जो अपनी तरह के प्रयासों में पहली गिनी जाएगी. इसी श्रंखला में ‘उड़ता पंजाब’, ‘दंगल’, ‘नीरजा’, ‘कपूर एंड संस’ और ‘डियर जिंदगी’ जैसी फिल्म भी आती हैं. इन्हें बहुत सारी प्रशंसा, बॉक्स ऑफिस कलेक्शन और मीडिया विमर्श हासिल हुआ है. लेकिन 2016 में कुछ फिल्में ऐसी भी थीं जो इतने ही प्रेम और सम्मान की हकदार हैं. इनमें सम्मोहित करने वाला सिनेमा है, रंग हैं, अनूठी कहानियां हैं, सामाजिक चिंता है और लीक से हटकर चलने की हिम्मत हैं. जो इस कमर्शियल बदहवासी में भी दर्शकों की दुनिया बेहतर करने के प्रति वफादार बनी हुई हैं. जानिए ऐसी ही दस हिंदी फिल्मों के बारे में जो हमारा जीवन बेहतर करती हैं. जिन्हें इग्नोर नहीं किया जा सकता.

#1. वेटिंग

ये 2016 की ऐसी फिल्म नहीं थी जिसके पीआर पर करोड़ों रुपये खर्चे गए या जिसे कमर्शियली बेचने के लिए आकर्षक मसाले डाले गए थे. लेकिन ‘वेटिंग’ के पास हमें देने के लिए जो था वो ज्यादातर बड़ी फिल्मों में नहीं था. ये थियेटर से बाहर भी हमारे साथ आती है. ऐसे जीवन मूल्य, फिलॉसफी, समझदारी हमें देती है जिनका असल जीवन में हम उपयोग कर सकते हैं. ये कहानी है साइकोलॉजी के प्रोफेसर शिव और विज्ञापन की दुनिया में काम करने वाली युवती तारा की. शिव की 40 साल से साथी, उनकी पत्नी कोमा में हैं और तारा का पति एक्सीडेंट की वजह से गंभीर रूप से चोटिल है और भर्ती है. कोच्ची के इस अस्पताल में अपने लाइफ पार्टनर्स के ठीक होने की प्रतीक्षा और अंदेशे में ये दोनों मिलते हैं. व्यवहार में बिलकुल अलग. एक शांत, ठहराव वाला, पुराने जमाने का. एक अशांत, अधीर, नए जमाने की. दोनों में आखिरकार दोस्ती भी होती है और हम जीवन की विशेष परिस्थितियों में इंसानी साथ की ताकत देखते हैं. बड़ी सिंपल सी बात है कि कष्ट के लंबे दौर में किसी का साथ मिल जाए तो वो बिलकुल आसानी से कट जाता है, और फिल्मों में ये बात बार-बार दिखाई जाती रहे तो संबल मिलता है. ‘वेटिंग’ को देखना बड़ा ही शांतचित्त, प्यारा, सशक्त करने वाला अनुभव है. इसमें लीड रोल नसीरूद्दीन शाह और कल्कि कोचलिन ने निभाए हैं. इसे डायरेक्ट किया है अनु मेनन ने जिन्होंने पहले ‘लंदन पैरिस न्यू यॉर्क’ बनाई थी.

ट्रेलर:

#2. साला खड़ूस

इस साल की अच्छी फिल्मों में आर. माधवन और रितिका सिंह अभिनीत ये फिल्म भी है जो आदि के किरदार से शुरू होती है जो एक बॉक्सिंग कोच है और खेलों में राजनीति से चिढ़ा रहता है. गुस्से में रहता है. इस बात से भी कि लड़के-लड़कियों में इस खेल के लिए जुनून नहीं है. फिर वो मधी को देखता है जो एक लफंडर लड़की है और मच्छी बेचकर अपना घर चलाती है. वो उसे चैंपियन बनाने को अपना लक्ष्य बना लेता है. इसे डायरेक्ट किया था सुधा कोंगरा प्रसाद ने जिन्होंने फिल्म को बहुत सरल, छोटा और कसा हुआ रखा. ये एक प्रेरणा दायक फिल्म है जो लड़कियों के खेलों में अच्छा कर पाने और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आकर भी किसी भी क्षेत्र में अव्वल हो सकने को बिलकुल संभव मानती है. राजकुमार हीरानी ने फिल्म को प्रोड्यूस किया है.

तमिल वर्जन ‘इरुधी सुत्रू’ का ट्रेलर:

#3. रमन राघव 2.0

डायरेक्टर अनुराग कश्यप की ये फिल्म आला दर्जे की थी लेकिन इसे व्यापक दर्शकों ने नहीं देखा. ये बहुत संभव है कि काफी बरस बाद वो दर्शक इसे पहली बार अनुभव कर रहे होंगे और मजा ले रहे होंगे. फिल्म जो बात कहने की कोशिश करती है उसमें बहुत परतें हैं और अंतहीन फिलॉसफी है. जो दर्शक इनमें जाकर टटोलेगा उसे बहुत कुछ नया जानने को मिलेगा. ये कहानी है रमन्ना नाम के सीरियल किलर की जो अपने मन की अलग ही दुनिया में रहता है और वहां उसे जो भी लगता है उसे वो मार देता है. वो अपनी सगी बहन और उसके परिवार को भी नहीं छोड़ता. इसी कहानी में राघवन भी है जो पुलिस अधिकारी है. इंसान अपराध क्यों करता है? समाज की तय की हुई अपराधियों की परिभाषा कितनी सही है? क्या कानून के दायरे में रहकर गोली मारने वाले अपराधी नहीं हैं? क्या हमें नृशंस हत्यारों से घृणा करनी चाहिए कि सहानुभूति? ऐसे ही अनेक-अनेक सवालों से होकर ये फिल्म गुजरती है. ये शायद पहली ऐसी फिल्म है जिसमें इतने नृशंस हत्यारे को देखते हुए हमें उससे घृणा नहीं होती, बल्कि हम उसे एक केस स्टडी की तरह देखते हैं. वहीं जो असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर राघवन है हमें उसमें और रमन्ना में कोई फर्क नहीं दिखता. ये कैसी विडंबना है कि दोनों ही किरदारों का नाम राम है और दोनों ही रावण हैं. और ये रावण मां के पेट से नहीं बनकर आए, ये समाज में आकर ऐसे हुए. यानी समाज में ही कोई गड़बड़ थी. यही बात इस कहानी को विशेष बनाती है. फिल्म में संवाद जोरदार हैं. खासकर रमन्ना का दुनिया को लेकर विश्लेषण, राम-रावण को लेकर विश्लेषण. राघवन का वो डिलीटेड सीन भी जो फिल्म से बाहर रख दिया गया जिसमें दिखता है कि कैसे हमारे बड़े-बुजुर्ग अपनी विरासत और दुर्बुद्धि को आगे बढ़ाते हुए हममें भी हिंसा की स्थापना करते जाते हैं. नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विकी कौशल ने इसमें रमन्ना और राघवन के रोल किए हैं. निर्देशक, संवादों, संदेश और अभिनय के लिए फिल्म खासतौर पर देखी जानी चाहिए. इसका नाम ‘रमन राघव 2.0’ इसलिए है क्योंकि 1968 में ऐसे मर्डर करने वाले असल हत्यारे सिंधी दलवाई यानी रमन राघव पर श्रीराम राघवन पहले ही एक फिल्म बना चुके हैं.

ट्रेलर:

#4. आइलैंड सिटी

ये 2016 की सबसे उल्लेखनीय फिल्मों में से है. इसमें तीन कहानियां दिखती हैं जो शहर जीवन की अलग-अलग विडंबनाओं को आधार बनाती हैं. एक आदमी है जो बड़े कॉरपोरेट ऑफिस में काम करता है और रोबोट बन चुका है. इतना कि उसे खुश होने के लिए राय नहीं बल्कि निर्देश दिए जाते हैं और खुश होना भी उसके लिए दुख बन जाता है. ये भूमिका विनय पाठक ने की है. दूसरी कहानी एक परिवार की है जिसमें कुछ औरतें हैं. घर के खूंटे से बंधी. दोयम दर्जे की नागरिक. फिर घर का कमाऊ बेटा अस्पताल में कोमा में पहुंच जाता है. औरतें टीवी खरीदती हैं और सीरियल्स के दुख-सुख उन्हें अपने लगने लगते हैं. इस फैंटेसी की दुनिया के साथ-साथ वे अपनी जिंदगी भी आगे बढ़ाती हैं. इस कहानी में अभिनेत्री अमृता सुभाष भी हैं जिन्होंने ‘किल्ला’ और ‘रमन राघ‌व 2.0’ जैसी फिल्मों में अदायगी से बड़ा प्रभावित किया है. तीसरी कहानी एक ऐसी लड़की की है जो शारीरिक श्रम वाले छोटे-मोटे काम करती है. पुरुषवादी समाज में घिरी हुई है. सड़क पर और घर में वो आजाद नहीं है. बिना पसंद के लड़के से उसकी शादी तय कर दी जाती है. फिर एक दिन उसे एक लव लेटर मिलता है जो किसी अजनबी ने लिखा है और उसके चेहरे पर स्माइल ले आता है. ये भूमिका तनिष्ठा चैटर्जी ने निभाई है. ‘आइलैंड सिटी’ न सिर्फ अपने कंटेंट में उजली है बल्कि फिल्ममेकिंग के हर विभाग में ताजा लगती है. इसे देखने का अनुभव सवालों से होता हुआ उपायों तक पहुंचता है.

ट्रेलर:

#5. निल बट्‌टे सन्नाटा

ये प्यारी सी कहानी है चंदा की जो एक डॉक्टर के घर में बाई का काम करने के अलावा और छोटे-मोटे रोजगार करती है ताकि अपनी बेटी को हाई स्कूल और उससे आगे की पढ़ाई करवा सके. लेकिन उसकी बेटी अपेक्षा उर्फ अप्पू अपने भविष्य को लेकर किसी उत्साह में नहीं है क्योंकि उसे लगता है कि हाई एजुकेशन दिलाने की उसकी मां की हैसियत नहीं है और उसे भी घरों में बाई का काम करने से इतर सपने अपने लिए नहीं देखने चाहिए. लेकिन उसकी मां डटी हुई है कि उसकी बेटी बहुत आगे बढ़ेगी और बड़ा काम करेगी क्योंकि वो अपने टाइम में चाहकर भी पढ़ाई नहीं कर पाई थी. मां-बेटी का ये रिश्ता प्यार और तकरार से भरा है. उससे भी ज्यादा चंदा की कठिनाइयों से भरा है. साल की सबसे सम्मानजनक फिल्मों में ‘निल बट्‌टे सन्नाटा’ का नाम लिया जाएगा जो मनोरंजन और अपनी विषय-वस्तु दोनों में अव्वल है. एक इंसान के तौर पर ये हममें बेहतरी लाने वाली फिल्म है. इसे डायरेक्ट किया है अश्विनी अय्यर तिवारी ने जो ‘दंगल’ के डायरेक्टर नितेश तिवारी की पत्नी हैं. कहानी में चंदा का रोल स्वरा भास्कर ने और अप्पू का रोल रिया शुक्ला ने किया है. इनके बेहतरीन काम के अलावा फिल्म में रत्ना पाठक शाह भी हैं जो डॉक्टर के रोल में हैं और चंदा का मार्गदर्शन करती हैं. फिल्म में जिनको पल-पल देखकर बहुत अधिक खुशी मिलती है वो हैं पंकज त्रिपाठी. जिन्होंने ‘मसान’ की तरह यहां भी हमें शांतचित्त और आनंदित करने वाला काम किया है.

ट्रेलर:

#6. घायल वंस अगेन

सनी देओल हमेशा कहते हैं रहे हैं कि उनकी फेवरेट फिल्म है ‘सत्यकाम’ जिसमें उनके पिता धर्मेंद्र ने सच्चाई के रास्ते पर चलने वाले इंजीनियर का रोल किया था जिसके आदर्श अपरिमेय हैं. ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित वो हिंदी सिनेमा की महान फिल्मों में से थी. सनी ने ‘घायल वंस अगेन’ के साथ कुछ वैसा ही करने की कोशिश की है. ये 1990 में रिलीज हुई उनकी ही हिट फिल्म ‘घायल’ की सीक्वल है जिसे उन्होंने खुद डायरेक्ट किया है. इसमें वे अजय मेहरा बने हैं जो जेल की सजा पूरी करने के बाद नई जिंदगी शुरू करता है. वो जर्नलिज़्म को अपना जरिया बनाता है. वो न सिर्फ श्रेष्ठतम पत्रकारिता करता है साथ ही समाज सेवा भी. वो विजिलांते बनकर ऐसे रईस और ताकतवर लोगों को कानून के दायरे में लाता है जो बच निकले थे. उसकी पत्रकारिता भी करप्ट नहीं है. ‘घायल वंस अगेन’ एक कमर्शियल फिल्म थी लेकिन ये जैसी फिल्म थी इसे उस मुताबिक दर्शक नहीं मिले और इसके मैसेज को पूरी कीमत में समझा नहीं गया. साउथ, हॉलीवुड और बॉलीवुड की असंख्य एक्शन फिल्मों को उठाकर हम देख लें तो पाते हैं कि हीरो अपराध करने वाले लोगों को मौके पर ही मारता है. क़त्ल-ए-आम करता है और हम खुश होते हैं जबकि ये किसी भी स्वरूप में सही नहीं है. उसी भीड़ में सनी उस स्क्रिप्ट को चुनते हैं जिसमें वो संभवत: किसी को नहीं मारते हैं. यहां तक कि मुंबई में मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया जैसी ही डिजाइन वाली ईमारत में रहने वाले उतने ही बड़े कारोबारी बंसल का बेटा एक सामाजिक कार्यकर्ता को मार देता है, कुछ बच्चों को मारने वाला होता है और अजय की बेटी तक को मारने वाला होता है लेकिन सनी का किरदार उन बाप-बेटे को भी मारता नहीं है. उन्हें भी वो कानून को सौंपता है. कहां वो सनी देओल था जिसकी बहन को कोई छेड़ दे तो वो हाथ उखाड़ देता था और कहां ये जो मुख्यधारा की कमर्शियल सिनेमा का विजिलांते व एक्शन हीरो होते हुए भी मारने का विकल्प छोड़ता है. वो प्रो-पीपल है. उनके लिए वो ऐसे उद्योगपति से लड़ाई लड़ता है जिसके पास मंत्री, कानून, सीसीटीवी कैमरा, आईटी, मॉल, गुंडे सब हैं. ‘घायल वंस अगेन’ अपने इरादे और अपने फैसलों में नेक फिल्म है, इसमें कमियां भी ढूंढ़ी जा सकती हैं लेकिन 2016 की इस फिल्म को याद जरूर रखेंगे और देखेंगे भी.

ट्रेलर:

#7. धनक

‘हैदराबाद ब्लूज़’, ‘डोर’ और ‘इकबाल’ जैसी फिल्में डायरेक्ट करने वाले नागेश कुकुनूर ने इस फिल्म को बनाया है. फिल्म उद्योग में तमाम तरह के रचनाकारों में वो अपनी तरह के अकेले हैं जो जिस उद्देश्य के साथ नौकरी छोड़ फिल्ममेकिंग में आए उसे अब भी पकड़े हुए हैं. उन्हें जैसी कहानियां अच्छी लगती हैं वे बनाते हैं. फिर चाहे उसके लिए कमाई और प्रतिक्रिआएं कैसी भी हैं. और निस्संदेह उनकी हर फिल्म देखने लायक होती हैं. ‘धनक’ प्यारी कहानी है. राजस्थान के चुरू जिले में दो भाई-बहन रहते हैं. बच्ची परि और उसका नन्हा भाई छोटू. छोटू देख नहीं सकता. जैसलमेर में शाहरुख खान शूटिंग कर रहा है और परि का इरादा है कि उन तक पहुंचेगी और छोटू को आंखें दिलवाएगी क्योंकि उसने शाहरुख का कहा एक पोस्टर पढ़ा, ‘नेत्रदान कीजिए’. अब ये दोनों बच्चे निकल लिए हैं. रास्ते में पैदल, लिफ्ट लेकर और अलग-अलग प्रकार को किरदारों से मिलते हुए उनका संग करते हुए इनकी जर्नी आगे बढ़ती है. ये उन सीमित फिल्मों में से है जिनकी कोई पॉलिटिक्स नहीं है, जो सिर्फ कहानी सुनाना चाहती है और वो भी बहुत ही मासूम, प्यारी और मानवीय. सबसे ऊपर, इंसान के इंसान से प्रेम करने की कहानी. चेहरे और ज़ेहन पर इस फिल्म को देखकर मुस्कान आ जाती है.

फिल्म का गाना ‘दमा-दम मस्त कलंदर’:

#8. चॉक एंड डस्टर

एजुकेशन पर ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ जैसी चमचमाती, एलीट फिल्म बनाना बॉलीवुड में आसान है लेकिन ‘चॉक एंड डस्टर’ जैसी फिल्म मुश्किल. ‘तारे जमीं पर’ भी बन गई तो आमिर खान की वजह से क्योंकि वे संसाधनों से भरपूर हैं. या फिर अमोल गुप्ते हैं जो बच्चों के जीवन के प्रति जूनूनी हैं इसलिए उन्हें केंद्र में रखकर लगातार फिल्में बनाते हैं. इससे इतर अगर कोई प्रयास करता है तो बहुत सराहनीय है. ‘चॉक एंड डस्टर’ शिक्षा व्यवस्था को कारोबार में तब्दील कर दिए जाने की जो मोटी समस्या है उसकी बात करती है. फिल्म में शबाना आज़मी गणित की शिक्षिका विद्या बनी हैं. ये शिक्षिका हमेशा बच्चों की मदद करती हैं, उनकी निजी समस्याओं को दूर करने की कोशिश करती हैं, वो शिक्षा को महज पेशा नहीं मानतीं. वो एक हाई स्कूल में पढ़ाती भी हैं. वहीं पर उनके जैसी ही जूनूनी शिक्षिका है ज्योति है जिसका रोल जूही चावला ने किया है. लेकिन इस बीच नई प्रिंसिपल नियुक्त कर दी जाती है जो इस भलाई से जुड़े पेशे को कॉरपोरेट कल्चर में तब्दील करती है. इस एक्शन के पीछे ट्रस्टी होते हैं. कहानी में प्रमुख मोड़ तब आता है जब विद्या मैम को निकाल दिया जाता है और उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता है. अब प्रिंसिपल के खिलाफ ज्योति और अन्य स्टाफ मोर्चा खोल देता है. 2016 की बेहद अच्छी फिल्मों में ‘चॉक एंड डस्टर’ शामिल है जो एंटरटेनिंग भी है और सार्थक भी.

ट्रेलर:

#9. पार्च्ड

महिलाओं की समानता पर इस साल ‘पिंक’ जैसी बेहद अग्रगामी, सुलझी और निर्णायक फिल्म आई तो पार्च्ड भी. ये फ्रांस में जिस नाम से रिलीज हुई उसका मतलब था ‘महिलाओं का मौसम’. ये फिल्म राजस्थान के एक गांव में स्थित चार औरतों की कहानी कहती है. रानी, लज्जो, बिजली और जानकी की कहानी. कच्ची उम्र में ही बेटे को जन्म देने वाली रानी तभी विधवा हो गई थी. अब वो अपने बेटे का बाल विवाह जानकी से करना चाहती है. उसकी दोस्त है रानी जो बच्चा पैदा नहीं कर पा रही है और उसका पति शराब पीकर पीटता है. बिजली गांव में नाचने वाली है. कई मर्द उसके पास आते हैं. दूसरी ओर गांव में मर्द हैं जो वैसे ही जीना चाहते हैं जैसे उनके पुरखे जीते आए हैं और इस कड़ी में चाहते हैं कि पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का स्थान वही रहे जो हमेशा रहा है. लेकिन फिर कुछ ऐसा होता है कि ये महिलाएं आज़ाद होने और अपनी शर्तों पर जीने का फैसला लेती हैं. इस दौरान वे हर उस विषय पर बात करती हैं, अनुभव लेती हैं जो सिर्फ उनके लिए वर्जित रहा है. इन चार औरतों का अभिनय फिल्म में तनिष्ठा चैटर्जी, राधिका आप्टे, सुरवीन चावला और लेहर खान ने किया है. इसे डायरेक्ट किया है लीना यादव ने जिन्होंने ऐश्वर्या राय और संजय दत्त स्टारर ‘शब्द’ और अमिताभ बच्चन, बेन किंग्सले, श्रद्धा कपूर अभिनीत ‘तीन पत्ती’ बनाई थी.

ट्रेलर:

#10. अलीगढ़

जब हंसल मेहता ने इस फिल्म को बनाने की घोषणा की तभी ये एक सिहरन पैदा करने वाला अनुभव था क्योंकि मुंबई फिल्म उद्योग में और खासकर आज के भारत में ये ज्यादातर लोगों के बीच टैबू ही है. समलैंगिकता पर बात करें तो बड़ी मात्रा में पत्रकार, शिक्षक और वकील तक मजाक उड़ाते हैं फिर बाकी जनता का तो कहना ही क्या. आदमी की निजता और इस एक जीवन में उसे सबकुछ अनुभव करने का अधिकार देने की मूल बात पर हमारी न्यायपालिका भी अभी सहमत नहीं है. इस बीच ये फिल्म आई है और उम्मीद से अधिक सहज बनी है. कहानी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मराठी पढ़ाने वाले प्रोफेसर रामचंद्र सिराज की है जो समलैंगिक थे और जिन्हें एक समाज के तौर पर हमने 2010 में फेल किया और मार डाला. इसमें सिराज का रोल मनोज बाजपेयी ने किया है. राजकुमार राव ने एक जर्नलिस्ट का रोल किया. समलैंगिकता जैसे टैबू और जटिल विषय को फिल्म प्रेम जैसे सरल और ईश्वरीय शब्द के पर्याय के रूप में जैसे समझा जाती है वो बड़ी प्राप्ति है. ये वो फिल्म है जो आधी या पूरी सदी के बाद और भी ज्यादा सम्मान के साथ देखी जाएगी, जो तब अपने समय से काफी आगे की फिल्म मानी जाएगी. पॉपुलर कल्चर की वो चीज जिसने 2016 में समलैंगिक अधिकारों के विमर्श की शुरुआत फिल्मों में की जिसे एक दिन हकीकत बनना ही पड़ेगा. काव्यभरी, कष्टभरी, अविरल, भययुक्त, प्रेमयुक्त ये फिल्म सबको जरूर देखनी चाहिए.

ट्रेलर:

अतिरिक्त उल्लेख: डायरेक्टर आर. बाल्की की करीना-अर्जुन कपूर अभिनीत फिल्म की एंड का भी वर्किंग वुमन और हाउस-हस्बैंड के कॉन्सेप्ट पर कुछ कहने की कोशिश करती अच्छी फिल्म है. इसके क्लाइमैक्स और कुछ बर्ताव को लेकर अलग-अलग राय हो सकती है लेकिन कुल मिलाकर ये नेक इरादे वाली और अच्छी है. राकेश ओमप्रकाश मेहरा की मिर्जया भी अच्छी लगी. इसमें बिना जजमेंटल होकर प्रेम के जितने भी प्रवाह हैं उन्हें देखें और उन पर सोचें तो बहुत आनंद मिलता है. मिर्जा-साहिबा का त्रासद प्रेम, 2016 तक आते-आते प्रेम और दो प्रेम त्रिकोणों में पीछे छूट जाने वाले तीसरे प्रेमी का प्रेम.. इन सब के बारे में फिल्म को देखते हुए सोचना आता है. वहीं बड़े रेग्युलर-कमर्शियल ढंग से इस फिल्म का माल तौलेंगे तो शायद कुछ नहीं ढूंढ़ पाएंगे.

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