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कानून तो जब आएगा तब आएगा, फेक न्यूज़ पता लगाने के 10 तरीके अभी जान लो

‘एक सर्वे में आया है कि भारत में दस में से सात लोग फेक न्यूज़ से परेशान हैं.’

ऊपर का कथन सत्य है या नहीं, इस बात पर आप आंख मूंद कर विश्वास न करें और हम नीचे फेक न्यूज़ को पहचानने के लिए जो भी ‘लिटमस टेस्ट’ दे रहे हैं उनमें से हर ख़बर को और हर कथन को (इन्क्लुडिंग ऊपर वाला कथन) गुज़ारें, और जो न्यूज़ बेदाग निकले वही सच वरना सब फेक.

लेकिन अब सवाल ये उठता है कि आप इतने स्टेप्स उठाएंगे ही क्यूं, आप तो अंततः एक पाठक, एक एंड यूज़र हैं और जो परोसा जा रहा है उसमें आपकी तो कोई गलती है नहीं. व्हाई बोदर?

तो उत्तर यही है कि – अंततः आपको ही तय करना है कि आप एक पाठक होना चाहते हैं या एक जागरूक पाठक.

और दूसरी बात – जैसे पर्यावरण प्रदूषण हमारी सेहत को ख़राब कर रहा है वैसे ही ख़बरों और जानकारियों का प्रदूषण हमको मानसिक और बौद्धिक रूप से बीमार, बहुत बीमार कर रहा है.

तो इसलिए जानते हैं कि कैसे पता लगे कि कोई ख़बर रियल है या फेक. और ये सब आप न्यूज़ पर ही नहीं आपको मिली किसी जानकारी पर भी अप्लाई कर सकते हैं (याद है न ‘कुरकुरे में प्लास्टिक’ और ‘चाइना के प्लास्टिक वाले चावल’?):

# 1 –  बोला था न उस दुकान से चावल मत खरीदना

एक बार जब आपको किसी दुकान से सामन खरीदने पर पछतावा होता है तो फिर वहां से सामन खरीदते हुए आप अगली बार दो बार सोचते हैं. ठीक उसी तरह, उन सभी स्त्रोतों पर यकीन करना छोड़ दें जो आपको पहले भी फेक न्यूज़ परोसते रहे हैं.

साथ ही रिलाएबल न्यूज़ चैनल्स पर सबसे ज़्यादा आश्रित रहें. होने को बड़े से बड़ा न्यूज़ चैनल या अख़बार या न्यूज़ पोर्टल भी जाने-अनजाने फेक न्यूज़ छाप या दिखा ही देता है लेकिन ऐसा बहुत कम होता है. और वैसे भी ये कोई अकेला लिटमस टेस्ट तो है नहीं आगे कहीं न कहीं तो इस स्टेप से बच गए न्यूज़ की ‘फेकता’ पता चलेगी. इसलिए प्लीज़ उस दुकान से चावल न खरीदें, बाकी दुकानों का भी देर-सबेर पता चल ही जाएगा.


# 2 – कबीर को फॉलो करें

एक बहुत बड़े कवि और बहुत बड़े विद्वान् हुए थे हमारे देश में – कबीर. उन्होंने एक दोहा लिखा है:

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय.

इसको ही आधार बनाकर देखें कि ख़बर कितनी पुरानी हो चुकी है. यदि ख़बर को एक दो घंटे हो चुके हैं और ख़बर बड़ी है, तो गूगल में उसके एकाधिक लिंक होंगे/होने चाहिए. यदि नहीं हैं, तो ख़बर को फेक मान लें. ऐसा (ख़बर को फेक) मानने में कोई नुकसान नहीं है. क्यूंकि यदि वो बाद में फेक नहीं सच्ची ख़बर भी साबित हुई तो गूगल सर्च में भी देर-सबेर ढेर सारे लिंक उग ही जाएंगे.


# 3 – चाणक्य को इन दो तरहों में से किसी भी तरह से न फ़ॉलो करें

1 – ‘ये बात चाणक्य ने (या ग़ालिब, यूनेस्को, नासा, गुलज़ार) ने कही है’ से शुरू होने वाली बातें सिरे से नकार दें. क्यूंकि अव्वल तो ये कि ज़्यादातर ये ख़बरें/बातें फेक ही होती हैं और दूसरा ये कि – मान लें कि ये बातें सच भी हों तो भी, ये लोग (चाणक्य, ग़ालिब, गुलज़ार) कोई ख़बर तो बताएंगे नहीं बस राय ही बताएंगे. जहां एक तरफ राय से सहमती असहमति होती है वहीं दूसरी तरफ ख़बर सच या झूठ होती हैं.

2 – चाणक्य ने कहा था कि – ‘चावल पक गए या नहीं ये जानने के लिए पूरे चावलों को जांचने की ज़रूरत नहीं केवल एक चावल का दाना काफी है.’ अब आपसे अनुरोध है कि ख़बरों के मामले में ये बात फॉलो न करें. क्यूंकि ख़बरों में एक कांसेप्ट होता है क्लिक-बेट. आईये बताते हैं क्या है ये क्लिक-बेट, फिर आगे बात करते हैं.

मछली को फंसाने के लिए जो चारा डाला जाता है उसे कहते हैं – बेट और पूरी ख़बर पढ़ने के लिए आपको हेडिंग या लिंक में जो करना पड़ता है उसे कंप्यूटर की भाषा में कहते हैं – क्लिक. इन दोनों शब्दों से मिलकर बना है – क्लिक-बेट. यानी हैडिंग ऐसी होगी कि क्लिक करने का मन होगा लेकिन अंततः अंदर होगा कुछ और ही या कुछ भी नहीं.

तो, यदि आप केवल हैडिंग पढ़कर अपनी राय बना लेते हैं तो ऐसा मत कीजिए. यहां पर चाणक्य के चावल वाले सिद्धांत को फ़ॉलो करना एक बड़ी भूल होगी, एक उदाहरण देखिए –

हैडिंग – जानिए क्या करती हैं कैटरीना घंटो अपने बाथरूम में?
ख़बर – कैटरीना ने कहा है कि उनको शावर बाथ बहुत पसंद है इसलिए वो घंटों बाथरूम में अपना समय गुज़ारती हैं.

अब बेशक हैडिंग और ख़बर एक दूसरे के पूरक हैं लेकिन फिर भी आप जान गए होंगे कि हैडिंग क्यूं मिसलीडिंग है.

लेकिन इसका फेक ख़बर से क्या संबंध? संबंध ये कि, यदि आपने चावल का केवल एक दाना चखा (यानी केवल हैडिंग या कोई एक अंश) तो हो सकता है वो पूरी ख़बर से बिल्कुल अलग हो –

‘अश्वस्थामा मारा गया, लेकिन हाथी!’


# 4 – ‘सर्वे’ भवन्तुः

सर्वे से ज़्यादा मिसलीडिंग शायद ही किसी चीज़ का उपयोग किया जाता हो ख़बरों में. सर्वे भी तो राय ही है, बस चाणक्य वाली राय एक की राय थी और सर्वे दस, सौ या लाख ही है. और सबसे प्रसिद्ध सर्वे एग्जिट-पोल वाले ही होते हैं, जब वो फेल हो गए तो बाकियों की क्या बिसात? – एक सर्वे कहता है कि रेड वाइन फायदेमंद होती है, दूसरा कहता है नुकसानदायक.

ये तो तब है जब सर्वे ‘सच’ में किए गए हों लेकिन फेक न्यूज़ ही लिखनी है तो कोई सर्वे करवाएगा ही क्यूं?


# 5 – इमोसनल अत्याचार

ख़बर सच है या झूठ इससे ज़्यादा लोग इस बात से प्रभावित होते हैं कि ख़बर में ‘भावुकता’ वाला तड़का कितना है.

हमें वो ख़बर नहीं पसंद आती जो सच है, हमें वो ख़बर सच लगती है जो पसंद आए.

अब यदि दीवाली में उपग्रह से खींची गई भारत की तस्वीर अच्छी दिख रही है तो फिर सच-झूठ भाड़ में जाए. यदि इसे शेयर करने से किसी गरीब को दस पैसे मिल रहे हों तो अपना क्या जाता है?

तो क्या करना चाहिए? ‘हम क्या गलत करते हैं’ जान जाना ही दरअसल ‘हमें क्या नहीं करना चाहिए’ जान जाना भी होता है. तो उत्तर यही है कि हमें किसी ख़बर या बात को ‘इमोशनल’ होकर नहीं पढ़ना चाहिए.


# 6 – अतिश्योक्ति अलंकार

उन ख़बरों पर तो एक बार में ही विश्वास कर लेना बिल्कुल गलत है जिसमें आपको लगता है कि चीज़ें सामन्य से ज़्यादा बड़ी हैं. उदाहरण देने से किसी न किसी की भावनाएं ज़रूर आहत हो जाएंगी, इसलिए आप खुद मन ही मन में कोई उदाहरण बना लीजिए. बहुत हद तक संभव है कि वो व्हाट्सएप-ज्ञान ही होगा.

हां! इसी बात पर एक बात और जान लीजिए – एक सर्वे में कहा गया था कि व्हाट्सएप में आई दस में से बारह ख़बरें झूठ होती हैं. अब आप कहेंगे कि बारह कैसे? तो उत्तर ये है कि ये सर्वे भी मैंने व्हाट्सएप में ही पढ़ा था.


# 7 – पार्टनर! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है

यदि किसी ब्रेकिंग-ख़बर में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर किसी राजनितिक दल, किसी व्यक्ति या किसी संस्था की कुछ ज़्यादा ही तारीफ़ या बुराई की जा रही हो तो बहुत हद तक संभव है कि वो ख़बर फेक है और उसका कोई-न-कोई एजेंडा है. क्यूंकि लॉजिक लगाइए – यदि किसी ख़बर को कुछ टाइम हो चुका तब उस ख़बर में संपादकीय राय आए तो जायज़ है. लेकिन अगर ख़बर ब्रेक करने वाला ही ख़बर में किसी व्यक्ति या संस्था के प्रति बायस्ड दिख रहा है तो लगभग निश्चित है कि ख़बर के वजह से राय नहीं राय या एजेंडा के वजह से खबर बनी है.


# 8 – स्लिप ऑफ़ फिंगर्स

जब हम कुछ का कुछ बोल जाते हैं तो वो ‘स्लिप ऑफ़ टंग’ यानी जीभ का फिसलना कहा जाता है, वैसे ही अगर कुछ का कुछ लिखा हो तो उसे आप ‘स्लिप ऑफ़ फिंगर्स’ या उंगलियों का फिसलना कह सकते हैं.

देखिए, एक-दो टाइपो की ग़लतियों तक तो ठीक, लेकिन यदि किसी ख़बर में ये ग़लतियां बहुत ज़्यादा हैं तो हो न हो वो ख़बर फेक ही होगी. भाषाई-त्रुटियों में और फेक न्यूज़ में ये संबंध इसलिए है कि फेक न्यूज़ को लिखने वाले प्रोफेशनल राइटर या पत्रकार तो होते नहीं, और न ही उनके पास इतनी बड़ी टीम होती है कि कोई प्रूफ रीडिंग कर ले, और सबसे बड़ी बात उनको इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि बात कहने का ढंग क्या है?


# 9 – टेक्नोलॉजी इज़ कूल

टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के कई फायदे हैं – पहला आप इससे कूल लगते हैं.

होने को इतना ही काफी है, लेकिन फिर भी इससे, यानि टेक्नोलॉजी से, आप ‘फेक न्यूज़’ पहचानने का काम भी निकाल सकते हैं. गूगल-अंकल के पास एक चीज़ है इमेज सर्च. यदि किसी न्यूज़ में कोई इमेज दी गई है तो उसको आप गूगल में डालकर जान सकते हैं कि क्या ऐसी, इससे मिलती जुलती या यही इमेज पहले भी कहीं किसी और न्यूज़ के साथ यूज़ हुई है? इसको कहते हैं – इमेज सर्च.

और यकीन जानिए ज़्यादातर फेक ख़बरों में होता यही है कि ख़बर होती है बहुत पुरानी, वो भी विदेश की. उसकी ही फोटो उठा कर आज की किसी फेक न्यूज़ में डाल देते हैं. लेकिन एक बार फोटो का पता चल गया तो समझो ख़बर की सच्चाई का पता चल गया.

ऐसी ही कितनी ढेर सारी तकनीकें विकसित हो चुकी हैं, हो रही हैं. हमेशा अपडेटेड रहें.


# 10 – दी लल्लनटॉप

यदि इन सब टेस्ट के बाद भी आपको ये नहीं समझ में आता कि ख़बर फेक है या सच, ये बात नासा ने कही है या नताशा ने, ये ग़ज़ल ग़ालिब की है या फैज़ की तो हम हैं न. हमसे मेल या एफबी आदि के माध्यम से संपर्क करें, हम आए दिन इन फेक ख़बरों की ख़बर लेते रहते हैं.


# बोनस पॉइंट – लेकिन ये बिकाऊ… 

‘लेकिन बिकाऊ मीडिया आपको ये नहीं बताएगा’, से शुरू होने वाली लगभग सभी न्यूज़ फेक होती हैं. क्यूं?

क्यूंकि  फेक न्यूज़ बनाने के लिए ये कथन रामबाण है.  ये कथन फेक न्यूज़ बनाने के लिए रामबाण क्यूं है?

क्यूंकि फिर हमें लगता है कि मेन-स्ट्रीम मीडिया में ये ख़बर इसलिए ही नहीं आई क्यूंकि वो तो अॉलरेडी बिक चुका है.


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