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वो एक्टर जिनके जैसी एडल्ट कॉमेडी इंडिया में कोई नहीं कर पाया

Iconic दादा कोंडके के जन्मदिन पर आज बात उनके जीवन की. वो जिनकी वजह से हवलदारों को 'पांडू' कहा जाने लगा.

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बॉम्बे या महाराष्ट्र में 35-40 से ज्यादा उम्र के या अधेड़ दर्शकों के बीच दादा कोंडके की पहचान एक लैजेंड की है. एक्टिंग का दिग्गज, कॉमेडी का दिग्गज, गीतकार, लेखक. एक निम्नवर्गीय भोले आदमी की छवि को सिनेमाई परदे पर सबसे ज्यादा भुनाने वाला. पेट काट-काट कर कमाई करने और फिर सिनेमाघरों में मनोरंजन पाने पहुंचने वाले दर्शकों को पैमाना मानने वाला तमाशा विधा का कलाकार जो चाहे कुछ भी कंटेंट बनाना पड़े, उन विशेष दर्शकों को हंसाना सुनिश्चित करता था.

उसकी नौ फिल्में 25 से ज्यादा हफ्तों तक सिनेमाघरों में चली. इसका गिनीज़ विश्व कीर्तिमान है. मराठी सिनेमा में कॉमेडी को एक नई ऊंचाई (या निचाई) पर ले जाने वाले वे पितृपुरूष हैं. मैंने प्यार किया और हम आपके हैं कौन वाले लक्ष्मीकांत बैर्डे की कॉमेडी में आप सीधे-सीधे कोंडके को देख सकते हैं. बॉलीवुड में कमर्शियल फायदे के लिए इस कॉमेडी को हाथों-हाथ लिया गया. गोविंदा ने इसी हास्य से अपना करियर बनाया.

दादा कोंडके.
दादा कोंडके.

हालांकि तब भी आलोचकों ने कोंडके की फिल्मों की विषय वस्तु पर ऐतराज किया. इसमें औरतों का अपमान होता था, उन्हें उपभोग की वस्तु या फिर सांस्कृतिक सजावट की वस्तु के तौर पर रखा जाता था. अगर वो पाश्चात्य कपड़े पहनती, पाश्चात्य नृत्य करती तो दर्शक उस पर हंसता था. उसके सामने भोले मराठी मानुष कोंडके की छवि ऊंची होती जाती थी. पुरुष के तौर पर वो सम्मान का पात्र बनता जाता. चाहे किसी मोटे के पेट में मुक्का मारना हो या गैर-जरूरी दृश्यों में सेक्स को लेकर दि्वअर्थी बातें लानी हों, कोंडके लाते थे. इसकी नैतिकता पर बहस हो सकती है लेकिन इस पर ऐतराज आलोचकों द्वारा किया जाता रहा.

आलोचना के कई अन्य कारण हम पाते हैं. उन्होंने भले ही महाराष्ट्र के मनोरंजन जगत में कमर्शियल कीर्तिमान बनाए हों, भले ही तात्कालिक तौर पर लोगों को जबरदस्त तरीके से हंसाया हो लेकिन महानता जैसी कोई बात उनमें नहीं थी.

उनका एक गाना जिसमें वे ‘लेने’ ‘देने’ ‘खोलने’ की बातें कर रहे हैं:

उनका ज्ञान दुनिया को लेकर बहुत सीमित था. वे एक लापरवाह विचारधारा के प्रतिनिधि थे. उनका world view संकीर्ण था. उनका देश दृष्टिकोण भी संकीर्ण था. आगे के बिंदुओं में जानेंगे. आज इन्हीं कृष्णा दादा कोंडके का जन्मदिन है. 1932 में 8 अगस्त को उनका जन्म हुआ था. उनकी पहली फिल्म तांबडी माती 1969 में प्रदर्शित हुई. चंदू जमादार, राम राम गंगाराम, राम राम आमथाराम, एकटा जीव सदाशिव, तुमचं आमचं जमलं, अंधेरी रात में दीया तेरे हाथ में उनकी अन्य फिल्मों में प्रमुख थीं. 1994 में आई सासरचं धोतर उनकी आखिरी फिल्म थी. इसका निर्देशन भी कोंडके ने ही किया था. 30 सितंबर 1997 को उनका निधन हो गया.

इसके अतिरिक्त भी दस ऐसी बातें हैं जो कोंडके के बारे में जाननी चाहिए:

1. मराठी नाटक विच्छा माझी पूरी करा (मेरी इच्छा पूरी करो) की शुरुआत 1965 में हुई थी. इसी से कोंडके की सबसे पहली बड़ी पहचान बनी. इस नाटक को वसंत सबनिस ने लिखा था जो एक समाजवादी थे. उनकी ओर से anti-establishment का यह एक औजार था. कहानी एक राजा, उसके मूर्ख कोतवाल और एक सुंदर नर्तकी के बारे में थी. सबनिस ने तमाशा की लोककला के प्रारुप को यह कहानी कहने के लिए चुना जिसमें गंभीर तौर पर लोगों के मसलों को सामने रखा गया था. लेकिन कोंडके की खास विचारधारा के कारण यह सिर्फ कॉन्ग्रेस विरोधी नाटक बनकर रह गया. इसके साल ही उन्होंने इसमें द्विअर्थी, सेक्सुअल टोटके भी भर दिए. इससे ये नाटक हिट तो बहुत हुआ लेकिन सबनिस ने इसकी निंदा की थी. कोंडके ने फिल्म स्टार बनने से पहले इस नाटक के 1185 (और कुल करीब 1500) शो किए थे. इसका आखिरी शो मार्च 1975 में हैदराबाद में हुआ. उसके बाद आपातकाल लागू हो चुका था. इसमें इंदिरा गांधी का उपहास भी उड़ाया गया था.

2. सन् 1975 में दादा कोंडके की फिल्म पांडू हवलदार प्रदर्शित हुई. इसमें उन्होंने इसी नाम के पात्र का रोल किया था. इसकी लोकप्रियता इतनी थी कि बाद में महाराष्ट्र में हवलदारों को पांडू नाम से संबोधित किया जाने लगा.

 दादा कोंडके और ऊषा चौहान
दादा कोंडके और ऊषा चौहान (फोटोः मीडिया वन)

3. वे तमाशा विधा के एक्टर थे और कलात्मक फिल्मों में उनकी क्षमता नहीं थी ऐसे में अन्य तत्कालीन आर्ट फिल्मकारों से चिढ़ते थे. कोंडके ने जून 1984 में एक इंटरव्यू में ऐसा ही जब्बार पटेल के बारे में बोलते हुए दिखाया. जब्बार भारतीय सिनेमा के बेहद महत्वपूर्ण निर्देशक हैं. कोंडके ने कहा था कि जब्बार पटेल सिनेमा के साथ प्रयोग क्यों करना चाहते हैं? खेती-बाड़ी में प्रयोग क्यों नहीं करते!

4. एक मिल कामगार के बेटे कोंडके का बचपन और शुरुआती जीवन बॉम्बे के लालबाग में एक छोटे, मैले क्वार्टर में गुजरा. लेकिन तब भी वहां उनकी धूम थी. मार-कुटाई करते थे. कोंडके ने खुद कहा था, “लालबाग में मेरा आतंक था. जो भी वहां बदमाशी करता था उस पर मेरा क्रोध बरसता था. कोई हमारे मोहल्ले में लड़की को छेड़ता तो मैं वहां पहुंच जाता था. सोडा वॉटर की बोतल, पत्थर, ईंटें.. मैंने हर चीज के साथ लड़ाई है.”

5. कोंडके द्वारा निर्मित पहली फिल्म सोंगाड्या 1971 में प्रदर्शित हुई. इस कहानी नम्या नाम के युवक की थी जो कलावती नाम की तमाशा नर्तकी का दीवाना हो जाता है. मां यह जानकर उसे घर से निकाल देती है कि वो तमाशा देखने जाता है. फिर कलावती उसे अपने पास रखती है और नम्या भी तमाशा में काम करने लगता है. ये फिल्म जबरदस्त हिट थी और आगे की फिल्मों में कोंडके की छवि ऐसे ही सीधे-साधे आदमी की रही. यही वो फिल्म थी जब कोंडके शिव सेना से जुड़े. वो ऐसे कि सोंगाड्या को बॉम्बे के दादर स्थित कोहीनूर थियेटर ने लगाने से मना कर दिया जबकि कोंडके ने चार हफ्ते पहले बुकिंग करवा ली थी. उसके बजाय यहां देव आनंद की फिल्म जॉनी मेरा नाम लगानी तय हुई. इस पर कोंडके शिव सेना के प्रमुख बाल ठाकरे के पास गए. इस पर शिव सैनिकों की फौज थियेटर के बाहर प्रदर्शन करने लगी. और कोंडके की फिल्म कोहीनूर में रिलीज हुई.

बाल ठाकरे के साथ एक रैली के दौरान स्टेज पर कोंडके.
बाल ठाकरे के साथ एक रैली के दौरान स्टेज पर कोंडके.

6. इसके बाद से कोंडके शिव सेना की राजनैतिक रैलियों में लोगों की भीड़ जुटाने का काम करने लगे. वह भीड़ जो उनकी दीवानी थी और उनकी हर सही-गलत बात पर हंसती, चीखती जाती थी. वहां कोंकडे शिव सेना के प्रतिद्वंदियों के खिलाफ ज़हर उगलते. ऐसी ही एक रैली में उन्होंने कहा, “शिवसेना का बहुत बड़ा अधिवेशन हुआ जिसमें पांच लाख लोग आए. इस पर राजीव गांधी ने शरद पवार को फोन लगाया और कहा ‘ऐ सुअर के बच्चे! मैं सुना है पांच लाख के करीब आदमी जमा हुआ था ऊधर शिव सेना का’. तो बोला, ‘हां हां. यस सर’. तो राजीव ने कहा, ‘भें** तू काए को बैठेला है ऊधर. अपना भी ऐसा ही अधिवेशन करो नहीं तो मैं तुमको दो मिनट में कुर्सी से निकाल दूंगा’. एक मौके पर उन्होंने कहा कि “शरद पवार के पास राजीव गांधी के बूट पॉलिश करने के अलावा कोई काम नहीं है”.

7. इन रैलियों में कोंडके शिवाजी की छवि का इस्तेमाल करते थे. मुग़लों पर अपमानजनक टिप्पणी करते थे जिसका एक सिरा मुस्लिमों से जुड़ा होता था. वे बाल ठाकरे का चारणगान करते थे. उन्हें वीर शिवाजी जैसा बताते थे.

Dada-Kondke
दादा कोंडके (फोटोः मराठी स्टार)

8. 1986 में आई हिंदी फिल्म अंधेरी रात में दीया तेरे हाथ में कहानी थी गुल्लू नाम के भोले मराठी ग्रामीण आदमी की जो धारियों वाला कच्छा पहनता है. बाहर नाड़ा लटकता रहता है. एक बंजारन है जो दर्शकों की सेक्सुअल फैंटेसी को गुदगुदाती है. फिर बाकी कमी अलग-अलग स्थितियां और संवाद पूरी कर देते हैं. हीरोइन का ये रोल ऊषा चव्हाण ने किया था जो कोंडके की ज्यादातर फिल्मों में हीरोइन होती थीं. कोंडके की क़ॉमेडी में गैर-मराठी मानुष वाली मानसिकता चारे का काम करती थी. दूसरे राज्यों के लोग बुरे पात्र होते थे. जैसे, इसी फिल्म में विलेन उन्होंने ठाकुर के एक  बिहारी पात्र को बनाया. यह रोल महमूद ने निभाया था. इसका बिहारी एक्सेंट कहानी में बुरे तौर पर दिखता है. उसका नमस्कार और तनिक यूं सुनाया जाता है कि मराठियों को हंसी आए. इसी भाषा और छवि का मजाक उनके समर्थन वाली शिव सेना के बाल और राज ठाकरे उड़ाते रहे थे. गैर-महाराष्ट्रियन के मुद्दे पर यूपी-बिहार के लोगों की पिटाई भी इस पार्टी ने करवाई है. कोंडके को शायद यह याद नहीं रहा कि उनके परिवार के लोग भी मुंबई के रहने वाले नहीं थे बल्कि काम की तलाश में इस महानगर में आए थे और यहां कॉटन मिल में उनके पिता ने काम शुरू किया था.

देखें उनकी फिल्म ‘तेरे मेरे बीच में’ (1984):

9. उनकी कुंडली देखकर ज्योतिषियों ने कहा था कि वे जीवन में कभी सफल नहीं होंगे. वे बहुत बड़ी हार साबित होंगे. लेकिन वे फिल्मों में स्टार बने. करोड़पति हुए. एक गंदली चॉल से बॉम्बे के शिवाजी पार्क में शानदार पेंटहाउस तक पहुंचे.

10. उनका एक सपना महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने का था. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा भी था, “मैं सीएम बनना चाहता हूं.” उन्हें लगता था कि बाल ठाकरे जरूर उन्हें ऐसा मौका देंगे. लेकिन बाल ठाकरे सिर्फ उनका इस्तेमाल भीड़ जुटाने और अपने मराठी बैंक में वृद्धि करने के लिए कर रहे थे. जिसमें भोले कोंडके बड़े काम के रहे. वे विधायक भी नहीं बन पाए.

वेस्टर्न लड़की बनाम देसी ग्रामीण का उनका गैग जो खूब चलता थाः

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