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पापा के जमाने में इन 10 चीजों से बनते थे लल्लनटॉप

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दुनिया हमेशा ऐसी नहीं थी. पापा के जमाने में तो बिल्कुल नहीं. बालकनी में पिच्चर भी देख आएं तो आधा शहर टिकट सहलाता था. प्लेन में चढ़ना लाइफटाइम अचीवमेंट होती थी. डिक्शनरी एक घर में होती और दो मोहल्ले पार कोई अंग्रेजी में अटकता तो झांकने दौड़ पड़ता. उस दौर में ‘स्मार्टनेस’ के मीनिंग बहुत अलग थे डूड. हम बताते हैं ना. ये थी वो 10 चीजें जिनसे तब भौकाल बनता था.

1. सिंकारा

हमदर्द का टॉनिक सिंकारा

जावेद जाफरी का वो ऐड याद है. जिसमें पहले तो वो गिरते-पड़ते ऑफिस पहुंचते हैं. फिर पीते हैं हमदर्द की बूटी और अगले दिन खिड़की का कांच तोड़ ऑफिस में घुसते हैं. कलीग सब हो जाते हैं हैरान, कन्याएं हो जाती हैं मुग्ध. उस जमाने में सिंकारा ही ऐसी चीज थी जिसे पीकर लोग तंदरुस्त फील करते थे. वही पीना ये अहसास दिलाता था कि काम कर रहे हैं. थक रहे हैं और थकने के बाद अगले दिन खटने को तैयार हो रहे हैं. जो थोड़ा और मेहनती थे वो ग्लूकोज पीते थे. तब सलमान नहीं थे, रिवाइटल भी नहीं थी.

2. बीबीसी हिन्दी

Source -shortwaveradio

विविध भारती बजता था. आठ बजे हवामहल आता था. हर दूसरा नाटक ‘अजी सुनती हो’ से शुरू होता था, फिर भी अच्छा लगता था. पापा को उनके पापा सुनने नहीं देते थे. बीबीसी लंदन हिंदी में जो बजता रहता था रेडियो पर. बीबीसी हिंदी सुनने वाले खुद को ऐसा तुर्रम खां समझते थे, जैसे अब के ‘गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ देखने वाले. पढ़े-लिखे घरों में बीबीसी का सामूहिक श्रवण होता. सलीके से समझाया जाता था, सुनो..सुन लो. आदमी बन जाओगे. आज तक दादा लोग बताते हैं कि इंदिरा गांधी की मौत की खबर सबसे पहले बीबीसी ने ही दी थी.

3. मस्ती कंडोम

Source- universalsalesindia

सेक्स के मामले में इस मुल्क में हजारों अनकहे नियम चलते हैं. तब भी चलते थे.वो दौर था जब लोगों को बच्चे पैदा करने में शर्म न आती लेकिन कंडोम मांगने में लजाते थे. चोरी-छुपे सरकारी निरोध जुटाए जाते थे. कंडोम खरीदना फिजूलखर्ची मानी जाती थी. उस वक्त में भी कुछ लोग थे जिन्होंने सरकारी कंडोम से आगे बढ़कर मस्ती के ‘चिकनाई युक्त’ कंडोम का महत्व समझा और दो पैसे उसके पीछे लगाए. दुनिया का पता नहीं, पर उन्होंने तो खुद को स्मार्ट ही समझा.

4. राजदूत

प्रिया और वेस्पा का दौर था. गाड़ियां भी कामचलाऊ होती थीं. हीरो पुक ले नहीं सकते थे. हीरो होंडा तब रडार में भी नहीं थी. बुलेट ढोने को कूवत चाहिए होती थी. ऐसे में राजदूत ही तारणहार थी. ‘धुक धुक’ इंजन वाली भारी भरकम बाइक. अब झूठ का कहें कईयों के पापा ने तो बस बुलेट के लालच में शादी कर ली होगी.

5. रैपिडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स

Source- ultimatecollection

‘स्विस घड़ियां बेकार होती हैं’ या ‘पराठे कब्ज करेंगे’ का ज्ञान इंडियन जनता को पहली बार रैपिडेक्स से ही पता चला होगा. मिडल क्लास घरों में रैपिडेक्स रखना शान की बात समझी जाती थी. स्कूली शिक्षा नाकाफी हो गई थी. अंग्रेजी का बोलबाला था, बच्चे का सर्वांगीण विकास चाहिए था. तब रैपिडेक्स खरीदने के गुरुमंत्र दिए जाते थे. याद है, रैपिडेक्स के कवर पर एक उल्लू बैठा होता था. पता नहीं रैपिडेक्स पढ़ने के बाद कितने अंग्रेज बने और कितने….

6. कॉर्डलेस फोन

Source-etsy

जब हम देखते कि तिवारी जी दोमंजिला छत पर कॉर्डलेस फोन पर बतिया रहे हैं, तो पता चलता असली रईसी तो ये है भाई. तिवारी जी भी बतियाते कम, दिखाते ज्यादा थे. कुत्ता टहलाने भी कॉर्डलेस लेकर निकलते थे. देखने वालों को बड़ा भौकाल लगता था कि कोई बिना तार वाले फोन से बात कर रिया है.

7. एचएमटी की घड़ी

Source- wikiwand

पढ़े-लिखे लोगों की पहचान थी एचएमटी की घड़ी. ये नेसेसरी भी थी, लग्जरी भी और असेसरी भी. हर घर में लौंडों को इंटर में अच्छे नंबर लाने के बदले घड़ी दिलवाने का वादा किया जाता. शौक पूरे करने को चीजें कम ही थीं. घड़ी कूल बनाती थी. बड़े सलीके से संभाली-सहेजी और इस्तेमाल की जाती थी.

8. मर्फी का रेडियो

Source- cuttingthechai.

मर्फी का रेडियो वो भी तीन बैंड वाला, विविध भारती बजता उसमें. कमल शर्मा हैल्लो फरमाइश कहते. फौजी भाइयों का जयमाला आता. आकाशवाणी का छतरपुर केंद्र भी आता और बीबीसी हिंदी भी. पापा लोगों के जमाने में रेडियो तमाम खूबियों से लैस दुनिया भर से जुड़ने का जरिया था.

9. ग्वालियर सूटिंग्स

ब्रांड तो बस रेमंड्स, विमल और ग्वालियर सूटिंग्स हुआ करते थे. सूटिंग शर्टिंग का जोर था. एयर इंडिया का महाराजा हवाई जहाजों पर कम, क्लासिक और रीगल टेलर्स की दुकान के बोर्ड पर ज्यादा दिखता. हर दर्जी सूटिंग शर्टिंग एक्सपर्ट. फिर भी हजार हिदायतें दी जाती. ब्रांड बताकर कपड़े का रिव्यू लिया जाता. जिन्हें याद हो वे हामी भरें. स्मार्टनेस के पैमाने ये कहते थे कि अगर सूट सिलवाया जा रहा है तो शर्ट के कपड़े से छोटा सा रुमाल भी कटवाया जाए. मैचिंग होना चाहिए ना. यह आशा की जाती थी कि जब तक सूट चले और पहना जाए तब तक रुमाल भी बची रहे और न खोई जाए. है ना? कहो हां!

10. पनामा

Source- semiadventuroustraveler

धुएं का छल्ला तब भी कूल था. पापा से छुपकर सुट्टा मारते थे लोग, बड़ा वाला चश्मा लगाकर. उस दौर में भी लड़कों को लगता था कि कोई माधुरी दीक्षित टाइप लड़की उनकी इस अदा पर न्यौछावर हो जाएगी. सो जब प्रेम की अगन में जलने की तमन्ना जोर मारती तो पनामा की सिगरेट जला ली जाती. ऑप्शन तो ‘रेड एंड वाइट’ का भी था पर तजुर्बेकार लोग बताते हैं कि पनामा की कसक कहीं और नहीं मिलती थी.

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