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2016 की दस रीजनल फिल्में जो ढूंढ-ढूंढ कर देखनी चाहिए

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#1. हाफ टिकट

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तमिल फिल्म एक्टर धनुष और डायरेक्टर वेत्रीमारन ने मिलकर 2015 में बच्चों की एक फिल्म प्रोड्यूस की थी – ‘काका मुत्ताय’. दो नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली इस तमिल कॉमेडी को लेकर तब अनुमान नहीं हो सका कि कोई रीमेक इसकी बराबरी कर लेगी. मराठी में इसे ‘हाफ टिकट’ नाम से इस साल रिलीज किया गया और फिल्म ओरिजिनल जितनी ही ताजा और मजेदार थी. इस हद तक कि जिसने ‘काका मुत्ताय’ देख रखी है वो भी ‘हाफ टिकट’ देख सकता है और उसे बहुत मजा आएगा जबकि कहानी, संवाद और दृश्य हूबहू समान हैं. ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ की जो आलोचना लोगों ने की कि भारत की गरीबी और झुग्गियां दिखाकर पश्चिमी दर्शकों को मनोरंजन बेचा गया, उन्हें ‘हाफ टिकट’ से कोई आपत्ति नहीं होगी क्योंकि ये उस जीवन की तमाम दुश्वारियां दिखाती है लेकिन उसमें भी लोगों का जो एटिट्यूड और स्पिरिट है वो आपको किसी भी निजी दुख में हौसला देने के लिए काफी है. एसी युक्त एसयूवी में बैठने वाले जिन भी लोगों को लगता है कि वे परेशान हैं जीवन में, उन्हें अपनी गाड़ी के शीशे बाहर से साफ करते हुए इन दो गंदले भाइयों की कहानी में प्रवेश करना चाहिए और जब बाहर निकलेंगे तो निराशा जा चुकी होगी. ‘हाफ टिकट’ जैसी फिल्मों का एक महत्व ये भी है कि ये उन निम्नवर्गीय लोगों की कहानी सुनाती है जो मनोरंजन माध्यम से लगभग बाहर ही रखे जाते हैं. जहां आपका गोरे गालों, लाल होठों, दमकती त्वचा, उजले दांतों, फैशनेबल कपड़ों, आकर्षक स्टाइल और एस्पीरेशनल वर्ल्ड के मायावी होना जरूरी है. इस फिल्म में ऐसा नहीं है.

ये फिल्म नहीं देखी है तो जरूर देखें. इसे दिल न दे बैठें तो कहें. परिवार के साथ देखें, बच्चों के साथ देखें.

” कहानी दो बच्चों की है. भाई हैं. एक छोटा है. अति चंचल. मजाकिया. दूसरा सीरियस है क्योंकि वो बड़ा है. दोनों झुग्गी में रहते हैं. मां पैसा-पैसा जोड़कर घर चलाती है. ये दोनों रेल की पटरियों पर बिखरा कोयला ढूंढ़ते हैं और बेचते हैं. बच्चे हैं, उनके भी अरमान हैं. उन्हें टीवी देखनी है, पिज्जा खाना है लेकिन मां कहती है कि हमारे बस का नहीं है. लेकिन वे मानते नहीं. आक्रामक होकर पैसा कमाने में लगते हैं. इसके लिए कई तरकीबें लगाते हैं जिन्हें देखकर हम लोटपोट होते हैं. और भी काफी कुछ होता है. “

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#2. तिथि

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ये कन्नड़ फिल्म 2015 से विश्व के टॉप फिल्म फेस्टिवल्स में लोगों को दीवाना किए हुए है. इसने लोकार्नो जैसे फेस्ट में गोल्डन लियोपर्ड जैसा शीर्ष पुरस्कार जीता. आखिरी बार 1972 में किसी कन्नड़ फिल्म ने इस फेस्ट में शीर्ष पुरस्कार जीता था. फिल्म थी पट्‌टाभिरामा रेड्‌डी की क्लासिक ‘संस्कारा.’ ‘तिथि’ देखने वाले या तो अवाक होते हैं या ठहाके लगाते हैं. इसका कथ्य और सिनेमाई भाषा अपने वक्त से आगे की है और न भूलने वाली है. इसे राम रेड्‌डी ने डायरेक्ट किया है जो महज छब्बीस-सत्ताइस साल के हैं. ये उनकी पहली फीचर फिल्म है. इसकी कहानी और स्क्रिप्ट लिखने से लेकर कलाकार चुनने और उनसे एक्टिंग करवाने की जो प्रक्रिया उन्होंने अपनाई वो पहले शायद ही किसी फिल्म में अपनाई गई. इसमें सारे कलाकार कर्नाटक के उसी छोटे से गांव के आम लोग हैं जहां शूटिंग हुई. किसी को एक्टिंग नहीं आती थी लेकिन फिल्म देखकर इसी बात की हैरत होती है. राम की इस फिल्म को बनने से साढ़े तीन साल लग गए. भारत के तमाम फिल्मकारों और आलोचकों ने ‘तिथि’ को बहुत सराहा है.

” एक परिवार की चार पीढ़ियों की ये कहानी सेंचुरी गवडा से शुरू होती है जो 101 साल का है. सनकी, बड़बड़ाने वाला, नेगेटिव और रसिया. गडप्पा जो उसका बेटा है और लंबी दाढ़ी होने के कारण उसका ये नाम पड़ा, वह भी बहुत बूढ़ा है. उसका मन संसार में नहीं लगता. वो नंगे पैर दिन भर घूमता रहता है. टाइगर ब्रांड का पव्वा पीता है. बीड़ी सुलगाता रहता है. गडप्पा का बेटा है थमन्ना जो सांसारिक होने को अभिशप्त है. ऐसा नहीं है कि वह विलासी है या अपने सुख के लिए कुछ चाहता है. लेकिन घर चलाने का तनाव उसी ने लिया हुआ है. उसका बेटा अभि मासूम नौजवान है. घर-गांव के कामों में सक्रिय रहना, शराब पीना, पत्ती खेलना और भेड़ चराने वाली युवती कावेरी के प्रति आकर्षित होना उसके जीवन का सार है. कहानी शुरू तब होती है जब सेंचुरी गवडा परलोक सिधार जाते हैं.”

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#3. चौथी कूट

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पंजाबी भाषा के सिनेमा की हाज़िरी दुनिया के बड़े-महत्वपूर्ण समाजों, फिल्म महोत्सवों और भारत के सिनेमाई विमर्श में लगाने काम 2011 से गुरविंदर सिंह कर रहे हैं. उस साल वे अपनी पहली फीचर फिल्म ‘अन्ने घोड़े दा दान’ लाए थे. इसने विदेशों में पुरस्कार पाए ही, भारत में तीन नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते. जहां कमर्शियल पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री में सिर्फ जट्‌टों को ही हीरो बनाकर पेश किया जाता है. गोलियों, हॉकियों, जमींदारी और मर्दानगी को बेहूदगी से लहराया जाता है वहां ये फिल्म थी जिसने पंजाब में दलितों और हाशिये पर पड़े लोगों की वेदना और ठोकरों को ऐसे दिखाया कि कलेजा बाहर आ गया. फिल्म अपने व्याकरण में इतनी विरली थी कि पंजाब यूनिवर्सिटी के कैंपस में जब फिल्म का मंचन किया गया तो शिक्षित लोग भी फिल्म में उन जगहों पर हंस रहे थे जहां शॉक होना या रोना चाहिए. अब गुरविंदर अपनी दूसरी पंजाबी फीचर ‘चौथी कूट’ लाए. 2015 से फिल्म फेस्टिवल्स में ट्रैवल करने लगी इस फिल्म को भी बेस्ट पंजाबी फिल्म का नेशनल अवॉर्ड मिला. ‘अन्ने घोड़े दा दान’ जहां पंजाबी लेखक गुरदयाल सिंह के नॉवेल पर आधारित थी, वहीं ‘चौथी कूट’ वरयाम सिंह संधू की दो लघु कथाओं पर आधारित है.

” सन् 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ है और पंजाब में भय और ख़ून पसरा हुआ है. पंजाब को तोड़कर खालिस्तान मुल्क बनाने की मांग करने वाले उग्रवादी एक ओर हैं और सुरक्षा बल दूसरी तरफ. बीच में फंसे हैं वे जिनकी कोई बात नहीं करता – असहाय, बेबस, आम लोग. इस माहौल में हम दो कहानियां देखते हैं. दोनों जुड़ी हुई हैं. पहली है दो दोस्तों की जो अमृतसर जाने के लिए बड़ी मुश्किल से ट्रेन पकड़ पाते हैं. ट्रेन तकरीबन खाली है और इसमें भययुक्त सन्नाटा है. कुछ ऐसा ही डरावना सन्नाटा दूसरी कहानी में होता है. एक गांव में जोगिंदर और उसका परिवार रह रहे हैं. रात में इनका पालतू कुत्ता भोंकता है तो उग्रवादी आकर कहते हैं कि उसे मार दे क्योंकि उसके भौंकने से रात का सन्नाटा टूटता है. फिर सुरक्षा बल के लोग आकर पूछते हैं कि उग्रवादी क्यों आए और उनका क्या वास्ता है. दुविधा, तनाव और डर की ये कहानी अपने अंत की ओर बढ़ती है. “

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#4. विसारनाय

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फिल्ममेकर अनुराग कश्यप ने 2015 की बेस्ट फिल्मों की अपनी सूची में इसे पहले नंबर पर रखा था. इस साल रिलीज हुई ‘विसारनाय’ 2017 में होने जा ऑस्कर अवॉर्ड में भारत की ऑफिशियल एंट्री के तौर पर चुनी गई थी. इसे डायरेक्ट किया है वेत्रीमारन ने जिन्होंने करीब एक दशक में सिर्फ तीन फिल्में बनाई हैं और सब जोरदार रही हैं. न सिर्फ सिनेमाई व्याकरण बल्कि वेत्रीमारन की सामाजिक समझ बेमिसाल है. इस साल मई में ‘विसारनाय’ ने तीन नेशनल अवॉर्ड जीते थे. सितंबर, 2015 में वेनिस फिल्म फेस्ट में मानवाधिकारों की संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल इटली का ‘सिनेमा फॉर ह्यूमन राइट्स’ अवॉर्ड इस तमिल फिल्म को दिया गया. ये फिल्म एम. चंद्रकुमार के नॉवेल ‘लॉक अप’ पर आधारित है. चंद्रकुमार ऑटो चलाते हैं और तीन दशक पहले उनके साथ ऐसी ही पुलिस की बर्बरता हुई थी. उनका नॉवेल बेहद लोकप्रिय हुआ है.

” सच्ची घटना से प्रेरित ये कहानी चार मजदूरों की है जो तमिलनाडु के हैं लेकिन आंध्र प्रदेश में जाकर मजदूरी कर रहे होते हैं. वहां पुलिस उन्हें एक घर में लूट करने के संदेह में उठा लेती है. दरअसल तय समय सीमा में अपने केस बंद करने के दबाव के चलते पुलिस उन चारों को फंसाना चाह रही होती है क्योंकि असली चोरों को वो नहीं ढूंढ़ पाई होती है. अब इन चारों से फर्जी जुर्म कुबूल करवाने लिए जेल में पुलिस उन्हें जानवरों की तरह पीटती है. लेकिन ये कहानी का आधा हिस्सा भी नहीं है. आगे जो होता है उसे देखने के बाद पुलिस के काम करने की प्रणाली को लेकर घृणा पैदा होती है. इस कहानी का अंत भयभीत करने वाला होता है. “

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#5. ओड़िवुदिवस्थे कलि

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2016 की सब भाषा की बेस्ट फिल्मों में ये मलयालम इंडिपेंडेंट फिल्म भी प्रमुखता से गिनी जानी चाहिए, ये और बात है कि हमने इसे चर्चा में नहीं रखा. हम tiff और cannes की सूची में आई इंडि फिल्मों को श्रद्धा से देखते हैं लेकिन अपने ही घर में बनी इतनी शानदार इंडि फिल्म पर बात भी नहीं करते. ख़ैर, ये नुकसान डायरेक्टर सनलकुमार ससिधरन का नहीं है सिने फैंस का है. वेत्रीमारन की तरह सनल भी बहुत उत्कृष्ट समझदारी वाले रचनाकार हैं. ज़ूलॉजी की पढ़ाई करके वकील बने और फिल्मों का फैन होने के कारण अपनी फिल्म सोसायटी बनाई. फिर क्राउड फंडिंग से अपनी पहली फीचर फिल्म ‘ओरालपोक्कम’ 2014 में लाए. बहुत अच्छी फिल्म थी. जरूर देखें. अब वे ‘ओड़िवुदिवस्थे कलि’ लाए हैं जिसका मतलब होता है ‘छुट्‌टी के एक दिन में खेल’. साहित्यकार और फिल्म लेखक उन्नी आर. की लघु कथाओं के संग्रह में से ली गई कहानी पर ये फिल्म आधारित है. अगर 2016 में हम ‘उड़ता पंजाब’ जैसी पोलिटिकल और सामाजिक फिल्म को पाकर खुश हैं तो ये मलयालम फिल्म भी वहीं खड़ी है और अपने अलग ही तेवरों के साथ. जाति व्यवस्था, राजनीति, समाज, नैतिकता, वर्गभेद और मनोविज्ञान पर इस फिल्म का टेक ख़ूब है.

” कहानी पांच अधेड़ दोस्तों की है जो केरल में चुनाव की छुट्‌टी वाले दिन दारू पार्टी और चिल करने के लिए शहर से दूर एक जगह पर जमा होते हैं. हल्की-फुल्की बातों, पुरानी यादों और मजे से सब शुरू होता है. लेकिन हमारी जातिगत और सामाजिक पहचानें हमें कितना पशु बनाए होती हैं ये भी बाद में पता चलता है. इन लोगों का चिल करने के सिवा कोई इरादा नहीं होता लेकिन जब वो बोरियत मिटाने के वो खेल खेलने लगते हैं जो बचपन में खेला करते थे तो सबके अंदर के असली इंसान बाहर आने लगते हैं. और अंत तक इस कहानी को देखने वाले हक्के-बक्के हो चुके होते हैं. “

 

#6. लेथ जोशी

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जाते 2016 में ऐसे पोलिटिकल फैसले लिए जा चुके हैं जिन्होंने पलक-झपकते ही लोगों के जीवन जीने के तरीके को बदल दिया है. जिन्होंने हाथ से रुपया-पैसा देकर चीजों को खरीदा, गुल्लक से बचत करके भविष्य सुरक्षित किया, पांच-छह हजार की तनख्वाह से पूरे संयुक्त परिवारों को पाला और अच्छे से पाला. उसका ये अनुशासन डिजिटल भुगतान करने को मजबूर किए जाने के साथ ही छीन लिया गया है. आप जिस पद्धति, जिस रूटीन, जिस काम से बरसों जुड़े होते हैं और कोई छीन ले तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाती है, ऐसा लगता है जैसे कि किसी ने एक पहचान छीन ली. इस मराठी फिल्म में भी एक ऐसा ही आदमी दिखता है जिसके जीवन से उसकी पहचान वैश्वीकरण और मशीनीकरण ने छीन ली है. वो पहचान जो उसे सबसे ज्यादा प्यारी थी कि वो लेथ मशीन पर काम करने वाला काबिल मजदूर है. ‘लेथ जोशी’ के जैसी फिल्म 2016 में दूजी कोई नहीं है. इतने सुकून के साथ फिल्म इतनी जबरदस्त सामाजिक-पारिवारिक-वैश्विक हकीकतों की विवेचना करती है कि यकीन नहीं होता. फिल्म में कई-कई रेशे हैं. आज के दौर को लेकर ऐसे ऑब्जर्वेशन हैं जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं.

इसी फिल्म में हमें चित्तरंजन गिरि जैसे जबरदस्त अभिनेता मिलते हैं जिन्हें अब तक हमने इग्नोर किया. ‘गुलाल’ में जब उन्होंने पुलिस इंस्पेक्टर का रोल किया था तो बहुत अच्छी अदाकारी के बावजूद दर्शकों की खीखीखी तले उनकी उपयुक्त प्रशंसा दब गई. इस फिल्म में वो उसे वसूल करते हैं.

” कहानी पुणे के लेथ जोशी की है. वह लेथ मशीन पर काम करता है इसलिए उसे इस नाम से पुकारा जाता है. उसके पास जीवन में बस ये एक ही पहचान है और वो भी छिन जाती है जब उसकी वर्कशॉप बंद होने की स्थिति में आ जाती है. उसे ऐसा लगता है जैसे न सिर्फ दुनिया से बल्कि परिवार से भी उसकी किसी ने गर्भनाल काट दी हो. परिवार में पत्नी है जो खाना पकाती है और टिफिन सर्विस देने का काम करती है. बेटा कंप्यूटर असेंबल करने का काम करता है. मां है जो टीवी देखती रहती है और मंत्र बोलने वाली इलेक्ट्रॉनिक मशीन का इस्तेमाल करके पांच लाख मंत्र पूरे करने का टारगेट किए हुए है. सब अपने काम में लगे हैं और लेथ जोशी धूमिल होता जा रहा है.” 

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#7. रेलवे चिल्ड्रन

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डायरेक्टर पृथ्वी कोनानूर की ये कन्नड़ फिल्म बहुत ठोस और सच्चाई वाली जमीन पर बनी थी. इसकी कहानी ऐसी थी जो रोज हमारे इर्द-गिर्द होती है, हमारे सामने ही होती ही लेकिन हम अपनी कारों के शीशों के पीछे बंधे रहते हैं और उसे बदलने की कोशिश नहीं करते. ऐसे बच्चे जो रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंड और बाजारों में भीख मांगते हैं या छोटे-मोटे काम या अपराध करके जिंदा रहते हैं ये उनकी कहानी है. अनुमान है कि हर साल भारत से 1.25 लाख बच्चे रेलगाड़ी में चढ़कर घर से भाग जाते हैं. बाद में उनकी कहानी ट्रैजिक होती है. ये कहानी खासतौर पर ऐसे ही एक बच्चे के जरिए कही जाती है. ‘रेलवे चिल्ड्रन’ एक मस्ट वॉच है. ये उन फिल्मों में से है जिन्हें देखना हम छोड़ चुके हैं क्योंकि हमें रंगीन लड़ियों वाले मसाला सिनेमा ने सम्मोहित कर रखा है.

” बता राजू से शुरू होती है जो घर से भाग जाता है. सिर्फ 12 साल का है. डर और असुरक्षाओं के बीच पहली बार वो रेलवे प्लेटफॉर्म पर गुजारा करने को मजबूर है. यहां वो गैर-कानूनी काम करने वाले एक गैंग के संपर्क में आता है. गैंग में उसी की उम्र का नशेड़ी लड़का जोल्लू है. वो राजू को सिखाता है कि प्लेटफॉर्म पर जिंदा कैसे रहा जाता है. यहां पानी बेचने का अलग ही धंधा होता है. फिर राजू, जोल्लू और एक तीसरा लड़का मिलकर बिना अपने बॉस को बताए खुद ही पानी बेचना शुरू कर देते हैं. लेकिन इससे उनकी जिंदगी ख़तरे में पड़ जाती है. “

 

#8. शंखाचिल

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साल की एक और गौरव करने वाली फिल्म है डायरेक्टर गौतम घोष की बंगाली प्रस्तुति ‘शंखाचिल’. गौतम पहले भी ‘मोनेर मानुष’ (2010) और ‘अबार अरण्ये’ (2003) जैसी कई प्रासंगिक और अनूठी फिल्में बना चुके हैं. उनकी फिल्में 16 नेशनल अवॉर्ड जीत चुकी हैं. 2016 में रिलीज हुई उनकी इस फिल्म में काव्यात्मकता है और ज्यादातर मौन में ही बात करती है लेकिन फिर भी इसकी कहानी सरल है और बांधती है. विषय बहुत बड़ा है. भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित कहानी है लेकिन हम सोचते जाते हैं कि कैसे जब से सभ्यताएं बनी हैं इन्होंने बुनियादी इंसानों और इंसानियत को हर सदी में फेल किया है. सेनाएं बनी, सीमाएं बनी, बाड़ें खड़ी हुईं और आजाद-सुरक्षित होने के बदले मानव कैद होता गया. चाहे आप एक फिल्ममेकर हों, कहानीकार या पेंटर हों, एक बौद्धिक रचनाकार के तौर पर आपका परम उद्देश्य यही होता है कि इंसान को सीमाओं से आजाद़ करें और उसे लगातार खुद को खोजने व बेहतर करने की जर्नी में बढ़ाते रहें. ‘शंखाचिल’ के जरिए गौतम यही काम करते हैं. वे हमारे अंदर की उन चीज़ों को जिंदा करने की कोशिश करते हैं जो मर रही हैं या मर गई हैं. एक बड़ी खास बात फिल्म में है वो ये कि इसमें कोई विलेन नहीं है. किसी भी ट्रैजेडी में ये फिल्म दोषी नहीं ढूंढ़ती और उसे क्रूसिफाई करने को नहीं दौड़ती. इसे जरूर देखें.

” ये कहानी इच्छामती नदी के ठंडे पानी के दोनों ओर बहती है. इसके करीब ही बांग्लादेश में बने एक गांव में स्कूल में पढ़ाते हैं मुंतसिर चौधरी. जो एक आदर्श पुरुष हैं. घर में पत्नी लैला और 12 साल की बेटी रूपशा है. बहुत प्यारा परिवार है. भारत-बांग्लादेश सीमा के इस हिस्से पर दोनों देशों के लोगों में बहुत भाईचारा और प्रेम है. रूपशा को दिल की बीमारी है. जब उसकी तबीयत ज्यादा खराब होने लगती है तो अस्पताल ले जाने पर विचार होता है. ढाका मुंतसिर से गांव से दूर है और दूसरा विकल्प है कि वो पास ही में भारत जाकर इलाज करवाए. भारत जाना है तो उसे नकली पहचान बनाकर गैर-कानूनी तरीके से जाना होगा. आगे त्रासद मोड़ आते हैं. “

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#9. सैराट

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डायरेक्टर नागराज मंजुले की पहली फीचर फिल्म ‘फंड्री’ 2013 में आई थी और इसने एक-एक दर्शक को भौचक्का कर दिया था. अब वे ‘सैराट’ लाए हैं जो किसी आम मराठी फिल्म न रहकर, 2016 की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर्स में शुमार हो गई है. सिर्फ 4 करोड़ में बनी इस फिल्म ने 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई की. अगर निवेश के अनुपात में मुनाफे को देखें तो ये इस साल की सबसे सफल इंडियन फिल्म है. अपने असर और संदेश में भी ये बहुत बहुत स्पेशल फिल्म है. नागराज दलित हैं और अब तक उनकी फिल्मों में दलित पात्र केंद्र में रहे हैं जो इंडियन सिनेमा में पहले इस रूप में नहीं हो पाया था. न सिर्फ ये फिल्म विदेशी फेस्टिवल्स में प्रशंसित हुई बल्कि भारत में दर्शकों, आलोचकों, वितरकों सबने इसके गुण गाए. लेकिन इन सबको छोड़ दें तो बेहद निजी लेवल पर इसका अनुभव अविस्मरणीय है.

इसे देखते हुए लगता है कि कोई चट्‌टान आपसे आ टकराई है. ‘सैराट’ आपकी आखों और आपके दिमाग को निचोड़कर चली जाती है.

” ये टीनएजर परश्या और आर्ची की कहानी है जो साथ में पढ़ते हैं. दोनों के बीच एक बहुत बड़ा अंतर जाति का है. परश्या नीची जाति से ताल्लुक रखता है. आर्ची ऊंची जाति की है और उसका पिता बड़ा पॉलिटिशियन है. परश्या खेलने और पढ़ने दोनों में अव्वल है. आर्ची बहुत ही मजबूत इरादों वाली बहादुर लड़की है. दोनों में प्यार हो जाता है. इनके प्यार के पल इतने मनमोहक और ताजा लगते हैं कि हम भूल जाते हैं इन स्थितियों को हजारों बार फिल्मों में देख चुके हैं. जब आर्ची के घरवालों को परश्या के बारे में पता चलता है तो कयामत आ जाती है. आगे बहुत कुछ होता है. वो जिसे देखने के लिए बहुत जिगरा चाहिए. “

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#10. कम्मटीपाडम

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इस मलयालम एक्शन थ्रिलर को डायरेक्ट किया है राजीव रवि ने जो हिंदी फिल्मों के बहुत मशहूर सिनेमैटोग्राफर हैं. उन्होंने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘उड़ता पंजाब’, ‘लायर्स डाइस’, ‘गुलाल’, ‘चांदनी बार’ और ‘बॉम्बे वेलवेट’ जैसी कई फिल्मों का छायांकन किया है. ‘कम्मटीपाडम’ से पहले वो दो मलयालम फिल्में डायरेक्ट कर चुके हैं जिन्हें काफी पसंद किया गया था. उन दोनों के मुकाबले ‘कम्मटीपाडम’ बहुत ठोस जमीन पर बनी है. एफटीआईआई से पढ़े राजीव ने फिल्म में मलयालम और इंडियन सिनेमा के बहुत सारे स्टीरियोटाइप तोड़े हैं. इसके केंद्र में दलित समुदाय की कहानी है. इसमें भूमाफिया जैसे असल और अर्जेंट विषय को गंभीरता से दिखाया गया है जो जर्नलिस्ट भी नहीं कर रहे. इसमें सांवली त्वचा के प्रति सिनेमा में जो उपेक्षा का भाव है उसका जवाब भी मिलता है. मूल मलयाली पात्रों की त्वचा का जो कच्चा आकर्षक सौंदर्य है वो मन मोहता है. सिनेमा के लिहाज से फिल्म के फ्रेम बड़े खूबसूरत है जो राजीव की फिल्मों में गारंटीड होते हैं. कमर्शियल फिल्मों में मनोरंजन और टिकट की बिक्री पैमाना बना दिए गए हैं और फिल्म आर्ट के कलात्मक इवोल्यूशन पर कोई ध्यान नहीं होता, ‘कम्मटीपाडम’ समेत राजीव की हर फिल्म में कलात्मक प्रयोगों पर पूरा ध्यान होता है. लेकिन वो प्रयोग किसी भी लेवल के दर्शक को कभी भी अबूझ नहीं लगते.

फिल्म में दुलकर सलमान (ओके कनमनी, उस्ताद होटल) और विनायकन का काम भी बहुत पसंद आएगा.

” कहानी हंसमुख नौजवान कृष्णन से शुरू होती है जो मुंबई में काम करता है. वह केरल में एर्नाकुलम में बनी एक झुग्गी कम्मटीपाडम का रहने वाला है. मुंबई में उसे बचपन के दोस्त गंगा का फोन आता है जो खतरे में है. वह गंगा को खोजने कम्मटीपाडम लौटता है. इसी दौरान उसे अपना बचपन याद आता है कि कैसे वह पहली बार परिवार के साथ इस जगह में रहने आया था और सबकुछ कितना नया था. यारी दोस्ती और लव की यादों के अलावा भी बहुत कुछ उसके बचपन में था और अब जवानी में है. कथा में प्रमुख कथानक है भूमाफिया का. गंगा और उसके लोग दलित हैं और कैसे कोच्ची के तेज शहरीकरण से जमीनों के भाव बढ़ते चले गए और अब भूमाफिया कम्मटीपाडम की बेशकीमती जमीन हथियाना चाहता है. दलितों के दुखों की पृष्ठभूमि में एक नाटकीय कहानी और हिंसा का दौर चलता है.”

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अतिरिक्त: कुछ और बहुत अच्छी फिल्में हैं जिन्हें जरूर देखें.

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# अस्तु
बेहद मार्मिक. फिलोसॉफिकल. विमर्श भरी.

# कौल
अमूर्त. त्वचा पर रेंगती. कुरेदती. एक अलग ही ज़ोन में स्थानांतरित करती.

# रॉन्ग साइड राजू़
हंसाने वाली. सीरियस. सोशल और पोलिटिकल कमेंट्री करती हुई. गुजराती.

# रंगा पतंगा
ज़मीनी कहानी. बढ़िया व्यंग्य. पीपली लाइव की याद दिलाती. किसानी और मीडिया पर जरूरी टिप्पणी. समझदार.

# गप्पी
जिंदगी से भरी. देखने वाले को भी भरती हुई. रंग और प्रस्तुति जोरदार. ऐसी जैसी यूरोपियन ऑटर्स की होती है. म्यूजिक पर भी ध्यान दें.

# महेशिंते प्रथीकारम
बहुत फ्रैश और विटी.

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