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2017 की 10+ हिंदी फिल्में जो सबसे ज्यादा तृप्त करेंगी!

इस सूची में फिल्मों को रैंकिंग नहीं दी गई है.

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#1. तुम्हारी सुलु

इस लिस्ट में है:
क्योंकि मेनस्ट्रीम सिनेमा में ये 2017 की सबसे स्वास्थ्यवर्धक और मनोरंजनक फिल्म है.
क्योंकि इसकी कहानी उन महिलाओं को भी जॉब करने और पैसों के मामले में आत्म-निर्भर होने की प्रेरणा दे जाती है जिनकी शादी हो चुकी है, जिनके बच्चे हैं, जिनके पढ़ाई में अच्छे नंबर कभी नहीं आए और जिन्हें हर कोई हर समय हतोत्साहित ही करता है.
क्योंकि इस फिल्म में एक मिडिल क्लास इंडियन औरत, आधी रात के बाद, रेडियो पर एक ‘अश्लील’ शो की एंकर बनकर पराए मर्दों से बातें करती है और इतना वर्जित सा काम करने वाली सुलु के बारे में दर्शक घर लौटकर भी सहजता और सम्मान से सोच रहे होते हैं.

सुलोचना की भूमिका में विद्या बालन कपूर. इस फिल्म को लिखा और डायरेक्ट किया है सुरेश त्रिवेणी ने.
सुलोचना की भूमिका में विद्या बालन कपूर. इस फिल्म को लिखा और डायरेक्ट किया है सुरेश त्रिवेणी ने.

कहानी हैः 
मुंबई में रहने वाली सुलोचना (विद्या बालन) की जो एक खुशमिजाज और मज़ाकिया महिला है. उसका 11 साल का बेटा है प्रणव (अभिषेक शर्मा) जो स्कूल में पढ़ता है. पति अशोक (मानव कौल) टेक्सटाइल कंपनी में काम करते हैं. बहुत खुश परिवार है. सुलु अपने आस-पास गृहिणियों वाले तमाम कॉन्टेस्ट जीतती है. जैसे मुंह में चम्मच पर नींबू रखकर रेस करना. दो बड़ी बहनें और पिता हर दूसरे दिन उससे मिलने आते रहते हैं और उसे टोकते ही रहते हैं. वो भी बड़बड़ाते हुए भुला देती है और फिर जीवन की छोटी छोटी चीजों में एकदम खुश हो जाती है. एक बार वो एक एफएम रेडियो स्टेशन जाती है कॉन्टेस्ट में जीता अपना प्रैशर कुकर लेने और वहां नए आरजे की भर्ती हो रही होती है. सुलु भी इंटरव्यू देती है. वो हमेशा कसमसाती रहती है कि काश वो भी बाकी लड़कियों की तरह जॉब कर पाती. लेकिन उसके पास डिग्री वगैरह भी है नहीं और पति को छोड़कर सारे परिवार वाले हिम्मत तोड़ने का काम ही करते हैं. लेकिन ये मौका वो नहीं छोड़ना चाहती. बेहद खुशनुमा और हल्के-फुल्के मूड वाली इस कहानी में आगे वो दिखता है जो हर उस औरत के साथ होता है जब वो अपने मर्दवादी रुढ़िवादी परिवार में पहली बार जॉब करना शुरू करती है. आगे हम देखते हैं कि सुलु परिस्थितियों को कैसे संभालती है और क्या करती है? अपने सपने के पीछे जाती है या फिर से सिर्फ हाउसवाइफ वाले रोल में वापस लौट आती है.

कहां देखें: कुछ दिनों में टीवी प्रीमियर पर या लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए.

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#2. समीर

इस लिस्ट में है:
क्योंकि ये साल की सबसे अंडररेडेट फिल्म है जिसे खूब देखा जाना चाहिए था.
क्योंकि 2016 में ‘विसारनाय’ ने हमें पुलिस ब्रूटेलिटी और सत्ता के संस्थानों के छुपे शैतानी चेहरे को दिखाया था, वैसे ही इस साल ये काम समीर ने आतंकवाद के विषय में किया है.
क्योंकि इसका क्लाइमैक्स देखते हुए आप कांप जाते हो.

समीर की भूमिका में मोहम्मद जीशान अयूब. फिल्म को डायरेक्ट किया है दक्षिण छारा ने.
समीर की भूमिका में मोहम्मद जीशान अयूब. फिल्म को डायरेक्ट किया है दक्षिण छारा ने.

कहानी हैः
समीर नाम के लड़के की. हैदराबाद में सीरियल ब्लास्ट होते हैं और नाम आता है यासीन दर्ज़ी का. एटीएस की टीम उसे ढूंढ़ने इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में पहुंचती हैं जहां यासीन नहीं मिलता लेकिन उसके रूममेट समीर (मोहम्मद जीशान अयूब) को वो लोग उठा लाते हैं और टॉर्चर करते हैं. कुछ दिनों के बाद जब उन्हें पता चल जाता है कि समीर बेकसूर है तो एटीएस ऑफिसर देसाई (सुब्रत दत्ता) उसे छोड़ने वाला होता है, लेकिन सरकार में बैठे एक व्यक्ति के कहने पर देसाई उससे कहता है कि अगर वो उनका आदमी बनकर यासीन की गैंग में शामिल होगा और उसे पकड़वाने में मदद करेगा तब उसे छोड़ देंगे नहीं तो फंसा देंगे. अब न चाहते हुए भी समीर मान जाता है. वो गुजरात पहुंचता है और यासीन की मां मुमताज़ खाला का भरोसा जीतने की कोशिश करता है. फिल्म के अंत में पूरा नेरेटिव सिर के बल खड़ा हो जाता है.

कहां देखें: यूट्यूब पर यहां देखें. और नेटफ्लिक्स पर.

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#3. मुक्तिभवन

इस लिस्ट में है:
क्योंकि ये इतनी निर्मल, कलेजे को ठंडक देने वाली फिल्म है कि दशकों बाद भी याद रहेगी.
क्योंकि इंडिया में जिन भी बाप-बेटों के रिश्तों में गैप है, उन्हें ये फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए.
क्योंकि ‘रुई का बोझ’ के बाद ये दूसरी ऐसी फिल्म है जो मृत्यु के ख़यालों, वद्धावस्था के दौरान की मनःस्थिति और रिश्तों के सफल होने के सूत्रों के बारे में बात करती है.
क्योंकि ये सबसे सरलतम संप्रेषण वाला सिनेमा है जो विश्व में आला दर्जे का माना जाता है. इसे हासिल कर पाना दर्शक और फिल्ममेकर दोनों के लिए चरम होता है.
क्योंकि ये 2017 की उन हिंदी फिल्मों में से एक है जिसकी कास्टिंग निराली है. सिर्फ ललित बहल, आदिल हुसैन, गीतांजलि कुलकर्णी और नवनिंद्र बहल के अभिनय के लिए ‘मुक्तिभवन’ को बार-बार देखा जा सकता है.

पिता-पुत्र की भूमिका में आदिल हुसैन और ललित बहल. इस फिल्म के डायरेक्टर हैं सुभाशीष भूटियानी.
पिता-पुत्र की भूमिका में आदिल हुसैन और ललित बहल. इस फिल्म के डायरेक्टर हैं सुभाशीष भूटियानी.

कहानी हैः
पेशे से स्कूल टीचर रहे दयानंद कुमार (ललित बहल) की जो 77 बरस के हो गए हैं. एक दिन उनको लगता है कि उनकी मौत करीब है. घर में मझले स्तर का कारोबारी बेटा राजीव (आदिल हुसैन), बहू लता (गीतांजलि) और पोती सुनीता (पालोमी घोष) हैं. दयानंद कहते हैं कि उन्हें बनारस जाना है क्योंकि वहां जो प्राण त्यागता है वो पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है. बेटा समझाने की बहुत कोशिश करता है लेकिन वो नहीं मानते. इस बाप-बेटे का रिश्ता बहुत तनावपूर्ण रहा है, ऐसे में उस पिता की मृत्यु की संभावना और उनके साथ बनारस जाना राजीव के लिए आसान नहीं होता लेकिन वो और उनका पूरा परिवार इस जर्नी पर उनके साथ जाता है.

कहां देखें: हॉटस्टार पर.

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#4. लिपस्टिक अंडर माई बुर्क़ा

इस लिस्ट में है:
क्योंकि इंडियन सिनेमा में इससे पहले कभी, किसी बुजुर्ग महिला की यौन फैंटेसियों को नहीं दिखाया गया. ये एक वजह ही इसे साल की सर्वोत्कृष्ट फिल्मों में शामिल करती है.
क्योंकि ये फिल्म हर उम्र की स्त्री को देखनी चाहिए ताकि वो समझ सकें कि कैसे पुरुष (पिता, पुत्र, प्रेमी) उन्हें सदा बेड़ियों में बांधते आए हैं और उन्हें खुद को आज़ाद करने की ज़रूरत है.

बुआजी के किरदार में रत्ना पाठक शाह. इस फिल्म को डायरेक्ट किया है अलंकृता श्रीवास्तव ने.
बुआजी के किरदार में रत्ना पाठक शाह. इस फिल्म को डायरेक्ट किया है अलंकृता श्रीवास्तव ने.

कहानी हैः
भोपाल की चार स्त्रियों की. जो पास-पास ही रहती हैं. एक कॉलेज में जाने वाली लड़की रेहाना (प्लाबिता बोरठाकुर) है जिसके रुढ़िवादी मुसलमान माता-पिता चाहते हैं कि वो बुर्क़े में रहे और सिलाई का काम करे. वो चाहती है कि रॉक म्यूजिक के अपने पैशन को फॉलो करे. उन्मुक्त होकर लाइफ को एंजॉय करे. लेकिन ये उसके लिए सपना ही है. दूसरी है एक बाग़ी तेवरों वाली लड़की लीला (अहाना कुमरा) जो ब्यूटी पार्लर में काम करती है. उसकी मां उसकी शादी उसकी मर्जी के खिलाफ एक जॉइंट फैमिली में कर रही है. उसे वो लड़का पसंद नहीं. वो एक फोटोग्राफर के साथ भाग जाना चाहती है. उसका सपना है कि वो शादियों में हनीमून और फोटोग्राफी का पैकेज देने का बिजनेस करे. तीसरी स्त्री है शिरीन (कोंकना सेनशर्मा) जो चार बच्चों की मां है और उसका पति उसे सिर्फ सेक्स करने और बच्चा जनने की मशीन समझता है. लेकिन शिरीन चाहती है कि आर्थिक रूप से संबल हो. वो बिना पति को बताए सेल्सवुमन का काम करती हैऔर अपने काम में बेस्ट है. चौथी स्त्री हैं उषा बुआजी (रत्ना पाठक शाह). बेहद सक्षम बुजुर्ग महिला जिनके इशारे पर उनकी जॉइंट फैमिली और मुहल्ला चलता है. विधवा हैं. उनके मन में यौन फैंटेसियां हैं जो जाग जाती हैं. वे इनको एक्सप्लोर करना चाहती हैं. चारों स्त्रियां अपने-अपने लिपस्टिक वाले सपनों को पूरा करने की कोशिशें करती हैं और अंत में एक निष्कर्ष पर पहुंचती हैं.

कहां देखें: एमेज़ॉन प्राइम पर.

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#5. न्यूटन

इस लिस्ट में है:
क्योंकि भारत में ऐसी पोलिटिकल फिल्में न के बराबर बनती हैं.
क्योंकि ये भारत में लोकतंत्र और मतदान प्रक्रिया के जुमलों की असल हकीकत को दिखाती है जिसे देखने की हमें सख्त जरूरत है.
क्योंकि फिल्ममेकिंग के ग्रामर के लिहाज से ये साल की एक उत्कृष्ट फिल्म है. अपने लिहाज से ये इस विषय के प्रति वस्तुपरक भी रहती है.

न्यूटन के रोल में राजकुमार राव. इस फिल्म को डायरेक्ट किया है अमित मासुरकर ने.
न्यूटन के रोल में राजकुमार राव. इस फिल्म को डायरेक्ट किया है अमित मासुरकर ने.

कहानी हैः
छत्तीसगढ़ के उन जंगलों में स्थित, जहां वोट पड़ने जा रहे हैं और जहां पर माओवादियों का कब्जा है. वहां का पोलिंग ऑफिसर जान के डर से पीठ दिखा देता है तो न्यूटन कुमार (राजकुमार राव) को वहां भेजा जाता है. न्यूटन बेहद आदर्शवादी है. उसे लोकतंत्र में अगाध श्रद्धा है और वो उसके किताबी स्वरूप को ही सच मानता है. लेकिन जब वो पोलिंग की प्रक्रिया से गुजरता है तो उन जंगलों में लोकतंत्र का असली चेहरा देखता है. वहां वो एक-एक वोट के लिए जिस प्रकार की कोशिशें करता है, उन्हें देखकर सिहरन होने लगती है.

कहां देखें: एमेज़ॉन प्राइम पर.

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#6. शुभ मंगल सावधान

इस लिस्ट में है:
क्योंकि, इससे पहले erectile dysfunction यानी पुरुष के लिंग में शिथिलता दोष जैसे विषय पर हिंदी फिल्म नहीं बनी.
क्योंकि, समाज जिस विषय पर खुलकर बात नहीं करता, उसे शर्म से जोड़कर देखता है, उसकी वर्जनाओं को ये फिल्म हंसी-मजाक में कब तोड़कर चली जाती है लोगों को पता भी नहीं चलता.
क्योंकि, साल की चंद स्वास्थ्यवर्धक (बेहद) मनोरंजन वाली फिल्मों में ‘शुभ मंगल सावधान’ बहुत ऊपर रहती है.

मुदित के रोल में आयुष्मान खुराना. इस फिल्म के डायरेक्टर हैं आर. एस. प्रसन्ना.
मुदित के रोल में आयुष्मान खुराना. इस फिल्म के डायरेक्टर हैं आर. एस. प्रसन्ना.

कहानी हैः
मुदित (आयुष्मान खुराना) और सुगंधा (भूमि पेडनेकर) की जो दिल्ली-गुड़गांव में काम करने वाले युवा हैं. मुदित एक दिन उसे देखता है और रीझ जाता है. बात करने की असफल कोशिश भी करता है. आखिर में वो उसके घर पर ऑनलाइन मैरिज प्रपोज़ल भिजवा देता है. सुगंधा के माता-पिता भी रिश्ते के इंतजार में होते हैं और इसे लपक लेते हैं. सुगंधा को पता चलता है, वो गुस्सा होती है. लेकिन फिर मान जाती है. दोनों मिलते हैं, बातें करते हैं. एक दिन मुदित को पता चलता है कि उसे मर्दों वाली प्रॉब्लम है. वो सुगंधा को बताता है. अब तक घरवाले शादी की तैयारियां शुरू कर देते हैं. सुगंधा से अधिक मुदित चिंतित है कि वो शादी के बाद उसे खुश नहीं रख पाएगा और वो शादी नहीं करना चाहता. लेकिन बारात का हरिद्वार में इंतजार हो रहा है. अब यहां से कहानी आगे बढ़ती है. मुदित-सुगंधा की प्यारी कैमिस्ट्री, दोनों के पापा लोगों (नीरज सूद और सुप्रिय शुक्ला) के हुड़दंग, ताऊजी (बृजेंद्र काला) की चुम्मियों और मां (सीमा पाहवा) के सुगंधा को दिए ‘लड़कियों की गुफा अलीबाबा के लिए ही खुलती है’ वाले ज्ञान के बीच इस समस्या का क्या हल निकलता है.

कहां देखें: इरोस नाओ पर.

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#7. अ डेथ इन द गंज / हरामखोर

इस लिस्ट में है:
क्योंकि इन दोनों फिल्मों के सिनेमाई spaces बहुत विशेष थे. ‘अ डेथ इन द गंज’ ने जितने मुकम्मल तरीके से 1979 के दौर को रीक्रिएट किया. ‘हरामख़ोर’ में पूरी कहानी को बहुत टूटते, अव्यवस्थित ढंग से घटते देखकर हम जितने बेचैन होते हैं. दोनों फिल्मों में शुतु और श्याम टीचर के भीतर क्या घट रहा है, उसे लेकर जो अमूर्त धरातलों पर ये दोनों फिल्में हमें ले जाती हैं, उस वजह से ये विशेष हैं.
क्योंकि दो बहुत गंभीर विषयों के बारे में बात करती हैं – एक, bullying यानी किसी कमज़ोर को भयभीत करना, उत्पीड़ित करना; दूसरा, स्कूल में बच्चों के साथ होने वाली हिंसा.
क्योंकि दोनों फिल्मों के कुछ किरदार हैं जिनकी बैकस्टोरी जानने की बहुत इच्छा होती है. जैसे ‘अ डेथ..’ में बिहारी नौकर (अशोक पाठक) और नौकरानी (सरस्वती विश्वकर्मा?) के किरदार जो अपने अंग्रेजीदां मालिकों के बारे में क्या सोचते हैं उसकी बातें अपनी झोंपड़ी में कहते हैं. ये दोनों बहुत अल्पविकसित किरदार हैं, जिनके बारे में और जानने की इच्छा होती है. उसी तरह ‘हरामख़ोर’ में टीचर श्याम (नवाजुद्दीन), जिसके मन में क्या चल रहा है ये जानने की बहुत अच्छा होती है और ये भी कि आखिर वो ऐसा बना तो क्यों बना.

श्याम और शुतु की भूमिकाओं में नवाजुद्दीन और विक्रांत. 'हरामख़ोर' के डायरेक्टर हैं श्लोक शर्मा और 'अ डेथ..' की कोंकना सेनशर्मा.
श्याम और शुतु की भूमिकाओं में नवाजुद्दीन और विक्रांत. ‘हरामख़ोर’ के डायरेक्टर हैं श्लोक शर्मा और ‘अ डेथ..’ की कोंकना सेनशर्मा.

कहानी हैः
‘अ डेथ..’ शुतु (विक्रांत मेसी) नाम लड़के की. ये 1979 का काल है. वो अपने रिश्तेदारों के एक परिवार के साथ मैकलुस्कीगंज में बने उनके घर जाता है. ये संकोची सा लड़का अंदर ही अंदर परेशान है और इसीलिए इस हॉलिडे पर आया लेकिन यहां पर बड़े लोग उसके साथ जैसा बर्ताव करते हैं, वो उसे विचलित कर देता है और इन सब परिवार वालों की छुट्टियों का एक बुरा अंत होता है.

‘हरामखोर’ की कहानी मध्य प्रदेश के एक गांव में स्थित है. श्याम टेकचंद (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) यहां की स्कूल में अंकगणित पढ़ाता है और बच्चों को अपने घर में भी कोचिंग देता है. वो अपनी छात्रा संध्या (श्वेता त्रिपाठी) के साथ शारीरिक होता है, जबकि उसके एक पत्नी भी होती है. कक्षा में पढ़ने वाला कमल (इरफान खान) भी संध्या के प्रति आकृष्ट है. वो और उसका दोस्त मिंटू (मोहम्मद समाद) हर समय श्याम ट्यूटर का पीछा करते रहते हैं ताकि जान सके इनके बीच क्या है और इस कहानी का भी अंत बुरा होता है.

कहां देखें: एमेज़ॉन प्राइम पर.

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#8. अनारकली ऑफ आरा

इस लिस्ट में है:
क्योंकि, इसमें एक ऐसी युवती द्वारा छेड़छाड़ को no means no यानी ‘ना’ कहते दिखाया गया है जिसका पेशा गांव के जलसों में यौन उत्तेजना से भरी भीड़ के आगे यौन क्रियाओं और जननांगों के संकेतों वाले गाने गाकर और नाचकर मनोरंजन करना है.

फिल्म के एक दृश्य में अनार के रोल में स्वरा भास्कर. इसके डायरेक्टर हैं अविनाश दास.
फिल्म के एक दृश्य में अनार के रोल में स्वरा भास्कर. इसके डायरेक्टर हैं अविनाश दास.

कहानी हैः
बिहार के आरा ज़िले में कामुकता भरे लोकगीत गाने वाली अनारकली (स्वरा भास्कर) की जिसे उसके करीबी अनार के नाम से भी पुकारते हैं. उसके प्रोग्राम ऑर्गनाइज़ करने वाला उसका मैनेजर है रंगीला (पंकज त्रिपाठी). अनार के प्रशंसक दो तरह के हैं. एक, जो उसे कामुकता की भूख से देखते हैं, दूसरे वो जो उसकी फैंटेसी तो रखते हैं लेकिन एक गायिका के तौर पर उसके फैन बनते हुए और उसके हर गाने का इंतजार करते हुए. अनार को लोग कैसी भी नजरों से देखें वो अपने काम को एंजॉय करती है. वो एक बुलंद और आत्मविश्वासी किरदार है. लेकिन दिक्कत तब होती है जब एक नामी यूनिवर्सिटी का उप-कुलपति (संजय मिश्रा) एक जलसे में शराब पीकर उसे छेड़ता है, उत्पीड़ित करता है. अनार इसका विरोध करती है. वो ये समझती है कि उसकी मर्जी के बिना उसे छूने का हक किसी को नहीं. लेकिन वो अपने हक के लिए जिन लोगों से लड़ने निकलती है वो बहुत ताकतवर हैं और लोकतंत्र के सब संस्थानों को उन लोगों ने अपने हक में कर रखा है. कहानी का अंत अनार ताकतवर ढंग से करती है.

कहां देखें: नेटफ्लिक्स पर.

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#9. कड़वी हवा

इस लिस्ट में है:
क्योंकि ये हमारे समय की शायद इकलौती ऐसी हिंदी फिल्म है जो जलवायु परिवर्तन यानी Global Warming के विनाशकारी परिणामों पर बात करती है.
क्योंकि ये दुर्लभ फिल्म उन किसानों की कहानी सुनाती है जो फसलों की असफलता, कर्ज न चुका पाने और कृषि को पर्याप्त सरकारी मदद न होने के कारण आत्महत्या करके मर रहे हैं. उन किसानों की कहानी जिनसे मुंबई का हमारा फिल्म उद्योग दूरी बनाए हुए है.
क्योंकि ये एक मस्ट वॉच है. और हमें बार-बार देखनी चाहिए.

हेडू और गुनु के रोल में संजय मिश्रा और रणवीर शौरी. ये फिल्म डायरेक्ट की है नील माधब पांडा ने.
हेडू और गुनु के रोल में संजय मिश्रा और रणवीर शौरी. ये फिल्म डायरेक्ट की है नील माधब पांडा ने.

कहानी हैः
बुंदेलखंड के एक गांव में स्थित जहां 15 साल से बारिश नहीं हुई है. यहां एक अंधा बुजुर्ग हेडू (संजय मिश्रा) रहता है जिसके किसान बेटे ने बैंक से कर्ज ले रखा है लेकिन गांव के बाकी किसानों की तरह चुका नहीं सकता. रोज गांव में खबर आती है कि फिर एक किसान ने आत्महत्या कर ली. इन्हें सुन-सुनकर हेडू को डर है कि उसका बेटा भी जान न दे दे. गांव में लोन रिकवरी एजेंट गुनू बाबू (रणवीर शौरी) भी है. उड़ीसा के तटीय इलाके का रहने वाला है. यहां अपना टारगेट पूरा करना चाहता है ताकि अपने परिवार को उस इलाके से निकालकर अपने पास बुला सके जहां विनाशकारी समुद्री तूफान आने के खतरे बढ़ गए हैं. यहां सब अपने-अपने सरवाइवल की कोशिशों में लगे हैं, शत्रु एक ही है – जलवायु परिवर्तन.

कहां देखें: इरोस नाओ पर कुछ दिनों में.

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#10. ट्रैप्ड

इस लिस्ट में है:
क्योंकि ये साल की सबसे प्रेरक फिल्म है. मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति और मौत के सामने भी हौसला बनाकर रखना सिखाती है.
क्योंकि ये हिंदी की पहली सरवाइवल ड्रामा थ्रिलर है. जैसे टॉम हैंक्स अभिनीत ‘कास्ट अवे’ थी.

एक दृश्य में राजकुमार राव. फिल्म को डायरेक्ट किया है विक्रमादित्य मोटवाने ने.
एक दृश्य में राजकुमार राव. फिल्म को डायरेक्ट किया है विक्रमादित्य मोटवाने ने.

कहानी हैः
शौर्य (राजकुमार राव) की जो अपनी ही कंपनी में जॉब करने वाली नूरी (गीतांजलि थापा) से प्यार करता है. लेकिन उसकी शादी होने वाली है. शौर्य उसे कहता है कि वो उससे शादी कर ले, वो बाकी लड़कों के साथ वाला किराए का घर छोड़कर एक अलग फ्लैट ले लेगा जहां वे दोनों रह सकेंगे. फिर वो घर ढूंढ़ने निकलता है. उसके बजट में मुंबई में घर नहीं मिलते. वे निराश होता है. लौट रहा होता है कि एक लड़का आकर कहता है कि वो उसे 15 हजार में घर दिला देगा. एक अधूरी बनी इमारत में वो एक ऊपर का फ्लैट उसे देता है जहां एक कम सुनने वाले गार्ड के अलावा कोई नहीं रहता है. शौर्य वहां रहने लगता है. लेकिन फिर वो गलती से घर में लॉक हो जाता है. न तो कोई उसे सुन सकता है, न उसका फोन काम कर रहा है, न नल में पानी है, न घर में बिजली है, न खाने को कुछ है. इस भयावह और रूह कंपा देने वाली स्थिति में वो फंस चुका है. कहानी के अंत में पता चलता है कि शौर्य जिंदा रहता है या नहीं, वो बाहर निकल पाता है कि नहीं.

कहां देखें: एमेज़ॉन प्राइम पर.

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