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आपने किसे देखा था भीगी साड़ी में ज़ीनत अमान को या भगवान शिव को?

शिव हमारे बीच फिल्मों में लगातार मौजूद रहे हैं. फिल्मी कहानियों में हम ध्यान नहीं देते लेकिन रूपकों की बहुत सी परतें दिखती चीजों के पीछे चल रही होती हैं. शिव के मेटाफर को यूज़ करने वाली ऐसी ही कुछ फिल्मों की यहां बात करेंगे.

#1. निगाहें: नगीना-2

ये फिल्म 1989 में रिलीज हुई थी. तीन साल पहले इस सीक्वल की मूल फिल्म ‘नागिन’ आई थी. कहानी इच्छाधारी सांप की थी. और सांप की मौजूदगी ही शिव का संदर्भ बन जाती है क्योंकि वो उनके गले का हार है. सब शिव भक्त तो ऐसी कहानियां जरूर ही देखते हैं. इस कहानी में जो अन्य रेफरेंस है वो है सावन मास का. आनंद (सनी देओल) की फिल्म में जब एंट्री होती है तो गाना आता है, “सावन के झूलों ने मुझको बुलाया, मैं परदेसी घर लौट के आया”. शिव भक्तों के लिए ये समय श्रावण सोमवारों को करने का होता है जब मनोकामनाएं पूरी होती हैं. आनंद को बचपन में गोरखनाथ नाम का तांत्रिक किडनैप कर लेता है. बड़ा होने पर वो उसे नीलम (श्रीदेवी) को फंसाने भेजता है जो कि रजनी नाम की इच्छाधारी नागिन की बेटी होती है. तांत्रिक चाहता है कि आनंद उसे प्रेम जाल में फंसाकर बेपनाह ताकत वाली मणि का पता करे. अगर उसने ऐसा नहीं किया तो गोरखनाथ आनंद को सांप बना देगा. अन्य शब्दों में आनंद शिवजी के सांप की तरह है जो उन्हीं के शुभ श्रावण मास में लौटकर आता है.

#2. दाग़

दिलीप कुमार और निम्मी स्टारर ये फिल्म 1952 में रिलीज हुई थी. इसमें हीरो का नाम शंकर होता है. और नायिका का नाम पारो यानी पार्वती. न सिर्फ इसमें हीरो-हीरोइन के नाम शिव-पार्वती पर आधारित हैं, बल्कि कहानी भी वैसी ही है जैसी भगवान की थी. जैसे सती-शिव का प्रेम होता है, फिर पिता दक्ष के यज्ञ में सती अपनी जान दे देती है. पार्वती के रूप में उनका फिर जन्म होता है. इस दौरान शिव तपस्या करते और विरह की अग्नि में तड़पते हुए फिरते हैं. आत्म-संहार की मुद्रा में. नशे करते हुए. कुछ हजार वर्ष बाद दोनों का विवाह होता है. इसमें भी ऐसा ही है. शंकर गरीब घर से है. मिट्‌टी के खिलौने बनाता है. कर्जा बढ़ता है तो वो शराब पीने लगता है. पारो से प्यार करता है. फिर वो पैसा कमाने शहर चला जाता है. लौटता है तो कर्ज चुकाता है. लेकिन तब तक पार्वती का विवाह कहीं और तय हो जाता है. वो फिर से शराब पीने लगता है. आत्म-संहारक बन जाता है. उसे सिर्फ पार्वती मिले तभी बच सकता है. अंत में वैसा ही होता है जैसे भगवान शिव-पार्वती की कहानी में होता है.

फिल्म दाग़ का एक दृश्य.
फिल्म दाग़ का एक दृश्य.

#3. दीवार

सलीम जावेद की लिखी और यश चोपड़ा के डायरेक्शन वाली 1975 की फिल्म ‘दीवार’ में शिवजी बहुत सीधे और प्रमुख रूप से कथा में मौजूद रहते हैं. विजय वर्मा (अमिताभ बच्चन) कभी मंदिर नहीं जाता लेकिन जब मां की तबीयत ख़राब हो जाती है तो वो जाता है. शिव की बड़ी सी मूर्ति के सामने खड़ा होकर उनसे संवाद करता है – “आज खुश तो बहुत होगे तुम.”

#4. सत्यम शिवम सुंदरम

राज कपूर के निर्देशन में 1978 में रिलीज हुई इस फिल्म की हीरोइन रूपा (ज़ीनत अमान) सच्चे मन की है, मन से सुंदर है और मन में शिव की आराधना करती है. सुबह सवेरे झरने में नहाकर, पानी भरकर मंदिर जाती है. उसे धोती है. शिवलिंग को सींचती है. यही इस फिल्म का सार है लेकिन हीरो राजीव (शशि कपूर) को उसके चेहरे पर जलने का निशान देखकर विचलन हो जाता है और दर्शक लोगों को शिव शब्द के मायने जानने से परे सिर्फ ज़ीनत की झीनी सफेद साड़ी के पार देखने की इच्छा बनी रहती है.

फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम में रूपा.
फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम में रूपा.

#5. ओमकारा

शेक्सपीयर के नाटक ऑथेलो पर निर्देशक विशाल भारद्वाज ने 2006 में ये फिल्म प्रस्तुत की. इसमें उन्होंने एक राजनेता के बाहुबली के रोल में अजय देवगन को चुना और नाम रखा ओमी. पूरा नाम, ओमकारा. शिव का नाम. क्रोधी आदमी है. तीसरी आंख खुलने को तैयार ही रहती है. शिवजी की असली कहानी में वे राम के बारे में कुछ कहने पर सती का मन में त्याग कर देते हैं, यहां पर लंगड़ा त्यागी के झांसे में आकर ओमी अपनी सती यानी डॉली की जान ले लेता है. फिल्म में एक सीन में ओमी शिव के मंदिर में पूजा करता भी दिखता है.

फिल्म ओमकारा के एक दृश्य में ओमी.
फिल्म ओमकारा के एक दृश्य में ओमी.

#6. शिवा का इंसाफ

1985 में रिलीज हुई निर्देशक राज सिप्पी की इस फिल्म में भोला (भोलेनाथ वाला भोला) नाम का बच्चा होता है जिसके मां-बाप को एक बुरा आदमी मार देता है. वो अनाथ हो गया बच्चा अपने पिता के दोस्त राम के पास पहुंचता है. वो अपने दोस्तों रहीम और रॉबर्ट के साथ मिलकर भोला को पालते हैं और उसे बुरे लोगों के संहार में दक्ष बनाते हैं. फिर शिवजी के मंदिर में उसका नामकरण होता है शिवा. यानी जैकी श्रॉफ. जब डाकू गांव की औरतों पर ज़ुल्म कर रहे होते हैं और एक बुजुर्ग आसमान की ओर देखकर पुकारता है, “हे भगवान तू कहा है, तेरा इंसाफ कहा हैं.” तभी दूर से एक त्रिशूल उड़ता आता है और डाकुओं का रास्ता रोक देता है. सुपरहीरो शिवा अपनी कॉस्ट्यूम में आता है और बोलता है, “ज़ुल्म की आग को बुझाने वाली हवा, ग़रीबों के दर्द की दवा, मेरा नाम है शिवा.” वैसे कोशिश एक सुपरहीरो फिल्म बनाने की थी. जैसे कि हॉलीवुड में सुपरमैन पर फिल्में बनीं. ‘शिवा का इंसाफ’ में बुनियादी कहानी भी वैसी ही रखी गई है. हीरो कॉस्ट्यूम पहनकर लोगों की रक्षा करता है और दुनिया के सामने एक प्रेस फोटोग्राफर का चोला पहने रखता है. जो कि सुपरमैन की कहानी है. इस कहानी का भारतीयकरण करने के लिए शिव की पैकेजिंग कर दी गई.

jjj shiva

#7. तुम मेरे हो

आमिर ख़ान के डायरेक्टर पापा ने उन्हें लेकर ये फिल्म बनाई थी जो 1990 में रिलीज हुई. उनके कैरेक्टर का नाम शिवा रखा गया जिसे सांप बहुत प्रिय हैं. जैसे अपने शिवजी को हैं. वह सपेरा है. उसकी प्रेमिका का नाम भी पारो है जो पार्वती से प्रेरित है. जैसे सती (पार्वती) के पिता दक्ष ने शिव का अपमान करने के लिए यज्ञ का आयोजन किया, वैसे ही इस कहानी में भी पारो के पापा शिवा को स्वीकार नहीं करते. उल्टे उसे मारने की कोशिश करते हैं. इसमें अतिरिक्त कहानी ये है कि शिवा को बचपन में एक इच्छाधारी नागिन में मारने की कोशिश की थी, बड़ा होने पर उसमें ज्यादा शक्तियां होती हैं और ऐसे में वो पारो को मारने की कोशिश करती है.

#8. नास्तिक

1983 में रिलीज हुई इस फिल्म में कहानी होती है कृष्ण मंदिर के पुजारी की जो अपने बेटे का नाम शंकर रखता है. शंकर भी पूजा करता है. एक बार गांव के छोटे ठाकुर को डायलॉग मारता है, “अगर आपके पास शक्ति है तो मेरे पास भक्ति है और कोई शक्ति भक्ति से बड़ी नहीं हो सकती”. लेकिन उसी रात ठाकुर को लोग मंदिर की मूर्ति चुराने वाले होते हैं. उसके पिता को मार देते हैं. उसकी मां और छोटी बहन को जिंदा जला देते हैं. उसी दिन शंकर (होने वाला अमिताभ बच्चन) मंदिर जाता है और भगवान से वैसे ही बात करता है जैसे ‘दीवार’ फिल्म में विजय (अमिताभ बच्चन) ने की थी. और उसी दिन से वो नास्तिक हो जाता है. वो उस दिन से भगवान में नहीं मानता लेकिन उसका नाम शंकर होता है और वो संहारक बन जाता है.

#9. धनवान

1993 में ये आई ये फिल्म बहुतों को याद होगी. इसमें करिश्मा कपूर ने अंजलि का रोल किया था जो बात-बात पर दवा खाती है. बरसात में नहीं जाती. मिट्‌टी के हाथ नहीं लगाती. उसकी इन आदतों से उसका दादा यानी कादर खान परेशान है. दूसरी ओर कहानी में अजय देवगन का कैरेक्टर है. नाम है उसका काशीनाथ. अब काशी का नाथ कौन है ये तो पता होगा है. ये नाम इसलिए पड़ा क्योंकि मां शिव की पूजा करती है. घर में तस्वीर भी लगी होती है. वो और इमली (मनीषा कोइराला) बचपन के दोस्त हैं लेकिन फिर वहां रहने के लिए अंजलि आती है तो सब बदल जाता है. दोनों करीब आते हैं. अजय के नाम के अलावा उनमें शिव की दो क्वालिटी रखी गई है. वो भोला भी है, इतना कि अमिताभ बच्चन की फिल्म देखने के लिए अपने पिता की आखिरी निशानी अपना घोड़ा गिरवी रख आता है. दूसरा, वो संहारक है. इतना फौलादी है कि उसके आगे कोई टिक नहीं पाता.

फिल्म धनवान में काशीनाथ.
फिल्म धनवान में काशीनाथ.

#10. दूध का क़र्ज

जैकी श्रॉफ, अरुणा ईरानी, अमरीश पुरी, सदाशिव अमरापुरकर, नीलम कोठारी अभिनीत ये फिल्म 1990 में रिलीज हुई. इसके हीरो का नाम शंकर या शिवा नहीं बल्कि सूरज होता है. उसकी कहानी में शिव का संदर्भ ये है कि उसके मां-बाप सपेरे लोग होते हैं. जब वो पैदा होने वाला होता है तो तूफानी रात में शिवजी के मंदिर का पुजारी उन्हें अपने घर में शरण देता है. उसी रात गांव का ठाकुर अपने दोस्तों के साथ अपने ही इस मंदिर से शिव की मूर्ति पर से बेशकीमती हीरो पर डाका डालता है. इसी क्रम में पुजारी को मार देते हैं. इल्ज़ाम सपेरे पर आ जाता है. ठाकुर और उसके दोस्त गांव के बीच कोड़े मार मार कर उसकी जान ले लेते हैं. तब उसकी मां प्रण लेती है कि बदला लेगी.

उसका मुंहबोला लुहार मामा उसे कड़ा फौलादी बनाता है. इस कहानी में बड़ा ही महत्वपूर्ण कैरेक्टर है सूरज का मुंहबोला भाई जो एक सांप है. सूरज की मां ने उसे भी अपना दूध पिलाया होता है लेकिन जब उसके पास सिर छुपाने का आसरा नहीं होता तो वो नाग से कहती है कि वो अब चला जाए. लेकिन वो बाद में फिर लौटता है. सूरज, उसकी मां को ठाकुर के लोग और एक तांत्रिक बंदी बना लेते हैं और उस नाग को बुलाने को कहते हैं ताकि उसे मार सकें तो सूरज बीन बजाता है गाना गाता है – “मेरे नाग राजा तू न आना भाग जाना, तेरा मेरा है दुश्मन ज़माना”. फिर अद्भुत चीज होती है. वो नाग अपने दूध का कर्ज उतारने के लिए नागों की नदी भर लाता है और बुरे लोगों और नेवलों की फौज पर कहर टूट पड़ता है.

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