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धूमल के सीएम कैंडिडेट होने के बावजूद कैसे चुनाव जीत गए राजिंदर राणा

हिमाचल प्रदेश में बीजेपी के सीएम कैंडिडेट प्रेम कुमार धूमल चुनाव हार गए. उन्हें उनके ही शागिर्द रहे राजिंदर राणा ने सुजानपुर सीट पर 1,919 वोटों से हराया. पूर्व-मुख्यमंत्री के टाइटल के अलावा धूमल के पास अब एक और परिचय है. वो बीजेपी के इकलौते ऐसे नेता हैं, जिन्हें सीएम कैंडिडेट बनाकर पार्टी चुनाव जीत गई, लेकिन कैंडिडेट हार गया. राणा क्यों जीते और धूमल क्यों हारे, इसके कुछ रेशे.

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पहले एक किस्सा सुनिए, जब प्रेम कुमार धूमल दूसरी बार मुख्यमंत्री थे. वो बमसन से विधायक बने थे. ये सीट हमीरपुर जिले में आती थी, जहां धूमल का गांव समीरपुर है. 2008 में हुए परिसीमन में बमसन खत्म हो गई और सुजानपुर नाम की नई सीट बन गई. तो धूमल के खासमखास माने जाने वाले राजिंदर राणा धूमल के दफ्तर पहुंचे.

हाथ में कागजों का पुलिंदा था और जुबान पर एक दरख्वास्त कि सुजानपुर में SDM ऑफिस बनवा दिया जाए. कागज़ के पुलिंदे में करीब 12 हज़ार लोगों ने अपनी सहमति दस्तखत की शक्ल में दर्ज करा रखी थी. धूमल ने कही हुई बातें सुन लीं और लिखी हुई बातों को हवा में उछालकर कहा, ‘ऐसे नहीं होता है.’

कैसे होता है, ये हमें 2012 के चुनाव के बाद पता चला. धूमल कैंप से अलग हो चुके राजिंदर राणा सुजानपुर से निर्दलीय लड़े और जीते. जीतकर उन्होंने पहला काम यही किया कि नए मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से पैरवी कर SDM ऑफिस बनवा दिया. सुजानपुर का मिनी सचिवालय. 2017 के चुनाव में जब बीजेपी ने धूमल को सुजानपुर भेजा, तो 23 अक्टूबर 2017 को उन्होंने इसी ऑफिस की छत के नीचे अपना नामांकन भरा. फिर 18 दिसंबर 2017 के जनादेश ने धूमल को दोबारा इस इमारत में आने के कष्ट से मुक्त कर दिया.

नामांकन दाखिल करने के दौरान प्रेम कुमार धूमल
नामांकन दाखिल करने के दौरान प्रेम कुमार धूमल

चुनाव लड़े तो साम-दाम-दंड-भेद से जाते हैं, लेकिन जीते तासीर के बल पर जाते हैं. हिमाचल ने फिर अपनी तासीर बता दी है. पहाड़ पर निगाह ऊंची, लेकिन रीढ़ झुकाए रखना होता है. ये सबक भूल चुके करीब एक दर्जन बड़े नेताओं को जनता ने ये दोबारा समझाया है… हिमाचल अतीत में भी ऐसा कर चुका है. कभी वीरभद्र हारे तो कभी शांता कुमार. ये राज्य सीएम या सीएम फेस का लोड नहीं लेता. फिर मंत्रियों या अध्यक्षों की तो बिसात ही किया. 

ये हासिल है सुजानपुर में राजिंदर राणा की जीत का. हिमाचल दस्तक के संपादक हेमंत कुमार ज़मीनी हाल बताते हैं, ‘राणा धूमल के खास हैं, ये बात पुरानी हो गई है. ऐसा 2003 से 2012 तक था. राणा करीब 15 सालों से सर्वहित कल्याणकारी नाम की एक संस्था चला रहे हैं. इसका काम सुजानपुर के गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करना है. कोई पंचायत या यूथ क्लब नहीं होगा, जहां राणा का दखल न हो. लड़की की शादी हो या किसी की मय्यत, राणा लोगों के लिए उपलब्ध हैं.’ राणा की संस्था किसी पैरलल संगठन की तरह है और आर्थिक रूप से मज़बूत हैं, इसलिए लोगों की मदद भी कर पाते हैं.

राजिंदर राणा
राजिंदर राणा

राणा का गांव पटलांदर हमीरपुर से सुजानपुर के रास्ते में आता है. हिमाचल के वरिष्ठ पत्रकार चंदेल राणा के पुराने सफर का रेशा-रेशा खोल देते हैं. वो बताते हैं, ‘राणा धूमल के प्यादे रहे हैं. वो गांव से नौकरी करने निकले थे, लेकिन चंडीगढ़ में एक बिजनेसमैन के तौर पर स्थापित हो गए. तब PGI और दूसरे हॉस्पिटल्स में पर्ची कटती थीं. राणा मिलनसार थे, तो ये पर्चियां छापने का ठेका पा गए. इससे बड़ा ठेका भी मिल सकता था, लेकिन कुछ वजहों से ऐसा नहीं हो पाया. यहीं से राणा ने और सक्षम होने की ठान ली और राजनीति में आ गए. 2002 में जब उन्हें मीडिया मैनेजमेंट के लिए लाया गया, तो हिमाचल की राजनीति में ये नई बात थी.’ धूमल के साथ आने पर राणा ने प्रॉपर्टी डीलिंग में भी हाथ डाला और खूब पैसा बनाया.

राजिंदर राणा
राजिंदर राणा

राणा के बहाने हेमंत हिमाचल का बदलता ट्रेंड बताते हैं. वो कहते हैं, ‘आप लोगों से कितना मिलते हैं, उनके सुख-दुख में कितना साथ हैं और आपका व्यवहार कैसा है. अब वोटर्स इसी बात पर वोट देते हैं. हिमाचल का ये मेसेज डेमोक्रेसी के लिए अच्छा है और पूरे देश में जाना चाहिए कि अगर आप लोगों के बीच नहीं गए, तो नहीं जीतेंगे.’ राणा लोगों के बीच गए. नतीजा ये निकला कि 2012 में अगर कांग्रेस की अनीता वर्मा (10,431) और बीजेपी की उर्मिल ठाकुर (8,716) के वोट मिला दिए जाते, तब भी राणा (24,523) ही चुनाव जीतते.

लेकिन 2003 से 2012 के बीच बहुत कुछ हुआ, जिसने धूमल और राणा की सियासत को शक्ल दी. चंदेल बताते हैं कि धूमल ने राणा को पहले संगठन में जगह दी, फिर लाल बत्ती दी. मीडिया सलाहकार कमेटी का सदस्य होने के नाते राणा ने वीरभद्र के खिलाफ सालभर में पांच-पांच सौ बयान दिए. सत्ता से सामंजस्य बैठ जाने पर जैसे चलता है, वैसे कई सालों तक सब कुछ बहुत अच्छा चला. फिर 2010 में शिमला के एक होटल में पड़ी रेड ने सब बदल दिया. किसी ने सेक्स स्कैंडल बताया, किसी ने पॉलिटिकल सेटलमेंट कहा. गनीमत यही थी कि दोनों पक्षों ने शालीनता बरतते हुए व्यक्तिगत हमले नहीं किए.

राजिंदर राणा और प्रेम कुमार धूमल: पुराने दिन
राजिंदर राणा और प्रेम कुमार धूमल: पुराने दिन

राणा पर केस लद गया. आरोप धूमल पर भी लगे कि ये सब उन्होंने कराया है. दोनों में मनमुटाव हुआ और फिर राणा ने पार्टी छोड़ने की औपचारिकता निभाई. इतने के बावजूद राणा धूमल के लिए निष्ठावान बने रहे. वो बीजेपी दफ्तर के सामने से रामजुहारी करते हुए निकलते थे. फिर 2012 में धूमल ने हमीरपुर सीट जीती और राणा ने सुजानपुर सीट. यहां आते-आते दोनों की राहें अलग हो चुकी थीं. इलाकाई राजनीतिक पंडित बताते हैं कि धूमल किसी और ठाकुर नेता को पनपने नहीं देना चाहते थे और उनकी प्राथमिकता में उनके दोनों बेटे ही थे. अनुराग ठाकुर को तो उन्होंने स्थापित कर ही दिया.

हेमंत 2012 के बाद का राणा का सफर बताते हैं. 2012 में कांग्रेस की सरकार बनी और वीरभद्र सीएम बने. वीरभद्र ने राणा की कीमत समझी. पहले उन्हें असोसिएट मेंबर बनाया, फिर डिजास्टर मैनेजमेंट का वाइस-चेयरमैन बनाया और 2014 में पार्टी जॉइन करा दी. 2014 में राणा ने कांग्रेस के टिकट पर हमीरपुर सीट से धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर के खिलाफ चुनाव भी लड़ा.

राजिंदर राणा और वीरभद्र सिंह: सब अच्छा-अच्छा
राजिंदर राणा और वीरभद्र सिंह: सब अच्छा-अच्छा

किसी को भी सहज ही कौतूहल हो सकता है कि 2012 में इतनी शानदार जीत के बाद राणा को क्या सूझा कि वो लोकसभा लड़ने चले गए. हेमंत बताते हैं कि कांग्रेस के पास कोई अच्छा कैंडिडेट नहीं था, वहीं चंदेल बताते हैं कि ये राणा के लिए वीरभद्र का प्यार था. बहरहाल, नतीजा राणा ने अकेले भुगता. विधायकी छोड़ चुके थे, सांसदी जीत नहीं पाए और विधानसभा उप-चुनाव में पत्नी अनीता राणा भी कांग्रेस के टिकट पर हार गईं. इसके बाद से राणा सुजानपुर विधानसभा सीट पर फेवीकोल जैसा जोड़ लगाकर चिपक गए. कहीं और गए ही नहीं.

ये तो राणा के हिस्से की कहानी हुई. लेकिन सुजानपुर में सिर्फ राणा जीते ही नहीं, बल्कि प्रेम कुमार धूमल हारे भी हैं.

राजिंदर राणा (बाएं) और सतपाल सिंह रायजादा. रायजादा वही कैंडिडेट हैं, जिन्होंने 2017 चुनाव में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती को हराया.
राजिंदर राणा (बाएं) और सतपाल सिंह रायजादा. रायजादा वही कैंडिडेट हैं, जिन्होंने 2017 चुनाव में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती को हराया.

‘धूमल क्यों हारे’ के जवाब में हेमंत बताते हैं, ‘सुजानपुर में आधा हिस्सा बमसन का था. धूमल के लिए ये जगह नई भी थी और पुरानी भी. लेकिन वीरभद्र ने सीएम रहते सुजानपुर को कई प्रॉजेक्ट्स दिए. राणा को इसका फायदा मिला.’ कई इलाकाई लोग बताते हैं कि धूमल बड़े कद के नेता हो गए थे और स्थानीय लोगों के प्रति उतनी आसानी से उपलब्ध नहीं थे. कई लोगों ने उनके और उनके बेटों के रुखे व्यवहार का भी जिक्र किया. लल्लनटॉप को अपनी फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान सुजानपुर के चौगान मैदान में कई ऐसे लोग मिले, जिन्होंने एक स्वर में कहा कि जब दो बार मुख्यमंत्री होते हुए भी धूमल राणा जितना काम नहीं कर पाए, तो इस बार भी जिताकर क्या होगा. यहां सुजानपुर के बुजुर्ग सुभाष की बात याद करने लायक है, ‘हिमाचली जब अपने पर आता है, तो कद नहीं देखता.’

अनुराग ठाकुर भी हार में बराबर के हिस्सेदार हैं

अनुराग ठाकुर और प्रेम कुमार धूमल: खटाई ही खटाई
अनुराग ठाकुर और प्रेम कुमार धूमल: खटाई ही खटाई

धूमल परिवार के आलोचकों ने बताया कि धूमल के बेटे अनुराग भी इस हार में बराबर के ज़िम्मेदार हैं. वो एरिस्टोक्रेट नेता जैसा बर्ताव करते हैं. दिन में आठ बार कपड़े बदलेंगे, चार बार सेंट लगाएंगे, दो सौ रुपए की बोतल से पानी पिएंगे, दिल्ली की सियासत करेंगे, लेकिन ज़मीन पर लोगों से नहीं मिलेंगे. ऐसे में अंडर-करंट कैसे पता चलेगा. धूमल के दूसरे बेटे अरुण को कुछ आभास हुआ भी, पर उनके अकेले क्या होता.

सीएम कैंडिडेट बनने के बाद धूमल को हेलिकॉप्टर मिला, जो उन्हें उनके गांव समीरपुर से उठाता और रात में यहीं छोड़ देता. लेकिन धूमल अपनी सीट पर लोगों से नहीं मिल पाए. अब सिर्फ प्रचार के वक्त मिलेंगे, तो एक गांव में कितनी बार जा पाएंगे. दूसरी तरफ राणा पांच साल से सिर्फ यही कर रहे थे.

नई सीट पर चुनाव लड़ने की वजह से हारे धूमल?

प्रेम कुमार धूमल: मायूसी
प्रेम कुमार धूमल: मायूसी

कमाल की बात है कि धूमल इस सवाल से 100% बरी नहीं हो पाते. सुजानपुर में कुछ हिस्सा बमसन का भी है, इसलिए इसे पूरी तरह नई सीट नहीं कह सकते. अगर नई सीट मान भी लें, तो दो बार मुख्यमंत्री रह चुके नेता से इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वो अपना चुनाव निकाल लेगा. वीरभद्र सिंह इस मामले में नज़ीर हैं. उन्होंने दो बार सीट बदली और 2017 का चुनाव अरकी से लड़ा, जो सेफ सीट तो बिल्कुल नहीं थी. 84 की उम्र में भी वीरभद्र की पूरे सूबे में स्वीकार्यता है, लेकिन धूमल वहां भी स्वीकार नहीं किए गए, जहां उनका गांव है.

क्या बीजेपी ने ही धूमल को सेट कर दिया था?

दो थ्योरी हैं. एक थ्योरी कहती है कि पार्टी ने साज़िश के तहत धूमल को नई सीट दी, ताकि वो हार जाएं. इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि बीजेपी अब शांता-धूमल युग से बाहर आकर नया नेतृत्व खड़ा करना चाहती है. धूमल के चुनाव हारने पर उन्हें सीएम बनाने की मज़बूरी खत्म हो जाएगी. हिमाचल की नई बीजेपी की कमान जेपी नड्डा के हाथ में हो सकती है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और प्रेम कुमार धूमल: दूर-दूर ही सही
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और प्रेम कुमार धूमल: दूर-दूर ही सही

दूसरी थ्योरी कहती है कि धूमल को ठेकेदार लॉबी, शराब माफिया, करप्ट ब्यूरोक्रेट्स और आधारहीन नेता सुजानपुर ले गए. पार्टी का छोटा सा आग्रह था, लेकिन धूमल अपने लालच में सुजानपुर गए. वो बदल गए. उन्होंने सच सुनना बंद कर दिया. अगर उन्होंने बीजेपी के ही हमीरपुर कैंडिडेट नरिंदर ठाकुर की बात सुन ली होती, तो शायद कुछ समझ जाते. नरिंदर की भी सीट बदली गई और उन्होंने टीवी डिबेट में कहा था, ‘हमीरपुर तो आसान दिख रहा है, सुजानपुर में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती.’ कमाल देखिए कि नरिंदर 7,231 वोटों से अपना चुनाव जीत गए.

एक्स फैक्टर

राजिंदर राणा: राजी-खुशी
राजिंदर राणा: राजी-खुशी

#- वीरभद्र ने सुजानपुर को प्रॉजेक्ट्स दिए, जिसका फायदा राणा को मिला.
#- राणा ने पांच साल में 48 मोर्चे और प्रकोष्ठ बनाकर एकदम अमित शाह की तर्ज पर काम किया.
#- लोग मानकर चल रहे थे अगर कांग्रेस की सरकार बनी, तो वीरभद्र राणा डिप्टी सीएम न सही, लेकिन मंत्री ज़रूर बनाएंगे.
#- चुनाव प्रचार के बीच राणा के भाई का देहांत हो गया, तो राणा ने कहा, ‘अब से सुजानपुर ही मेरा बड़ा भाई है’. लोगों को जंच गया.
#- ब्राह्मण लॉबी और व्यापारी धूमल से नाराज़ थे. उनके बेटे अनुराग ठाकुर को इसका अंदाज़ा भी था. उन्होंने कई पत्रकारों से इसका ज़िक्र किया.

हिमाचल चुनाव यात्रा के दौरान दी लल्लनटॉप के एडिटर सौरभ द्विवेदी ने सुजानपुर की अपनी ग्राउंड रिपोर्ट (यहां क्लिक करके पढ़ें) में लिखा था, ‘इलाकाई राजनीतिक पंडितों की मानें, तो आखिर में धूमल आखिरी चुनाव जैसे किसी नारे का वास्ता देकर पार निकल जाएंगे. मगर राजिंदर राणा अपने गुरु को दक्षिणा में यूं ही जीत नहीं दे देंगे.’ जनता ने अपना फैसला सुना दिया है.


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