Submit your post

Follow Us

पश्चिम बंगाल: जंगलमहल और यहां के आदिवासी वोटरों में किसका कितना है प्रभाव?

पश्चिम बंगाल के जंगलमहल इलाके की बीजेपी को 2019 लोकसभा चुनावों में बढ़त दिलाने में अहम भूमिका थी. जंगलमहल इलाक़े में कुल चार ज़िलें हैं. इनमे पुरुलिया, बांकुडा, झाड़ग्राम और पश्चिम मिदनापुर शामिल हैं. ये ज़िले झारखंड और ओडिशा के साथ अपनी सीमा साझा करते हैं. इन चार ज़िलों में 6 लोकसभा और 39 विधानसभा सीटें हैं. बीजेपी ने 2019 में इन 6 लोकसभा सीटों में से 5 पर जीत दर्ज़ की थी और तृणमूल महज़ एक सीट पर सिमट गई थी. यह चारों ज़िले आदिवासी बाहुल्य हैं और अगर इनके वोटिंग पैटर्न को गौर से देखें तो इनका झुकाव हमेशा से किसी एक पार्टी के तरफ़ ही रहा है. इस इलाक़े में पैठ बनाने से किसी भी पार्टी को सत्ता तक पहुंचने में मदद मिलती है. तो आइए देखते हैं इस इलाक़े और यहां के आदिवासी वोटों का पैटर्न और इतिहास क्या रहा है.

जंगल महल का इलाक़ा
जंगलमहल का इलाक़ा

वामपंथी पार्टियों का दौर

यह के चारों ज़िले वाम मोर्चे को सत्ता तक पहुंचाने और उसे 34 साल तक उस सत्ता पर बनाए रखने के केंद्र में थे. 1977 में जब सीपीएम के नेतृत्व वाली वाममोर्चे की सरकार आई थी, तब इस इलाक़े की कुल 41 सीटों में से वाम मोर्चे को 35 सीटें हासिल हुईं थीं. कांग्रेस 3 सीटों पर ही सिमट गई थी. यह सिलसिला 2006 तक चला.

लेकिन परिसीमन के बाद यहां 39 सीटें रह गई थी. जिसमें से वाम मोर्चे ने 2006 में 36 सीटें जीतीं. 3 कांग्रेस के खाते में गईं. ज़्यादातर सीटों पर बीजेपी का उम्मीदवार भी नहीं था. वामपंथी पार्टियों को बंगाल में पहला झटका साल 2009 के लोकसभा चुनाव में लगा था. कांग्रेस और तृणमूल के गठबंधन ने 25 सीटें जीतीं. लेकिन इस इलाक़े में कोई प्रभाव नहीं पड़ा. 2009 में वाम मोर्चे ने यहां की 6 की 6 सीटों में जीत दर्ज़ की थी. स्थानीय पत्रकार पार्थो बताते हैं की वाम मोर्चे की लैंड रिफ़ॉर्म पॉलिसी से आदिवासियों और खेतिहर मज़दूरों को ज़मीने मिलीं. जिसके कारण लंबे समय तक लोगों ने पार्टी का झंडा उठाए रखा था.

तृणमूल का दौर

2011 से तृणमूल का दौर शुरू हो गया. इलाक़े में भी तृणमूल मज़बूत होती गई. इसके पीछे कई कारण थे. इनमे से एक कारण माओवादी थे. माओवादियों का इन इलाक़ों में काफ़ी प्रभाव था. इलाक़े में माओवादी हिंसा की कई घटनाएं भी हुई थीं. उस दौर के सबसे बड़े माओवादी नेता किशन जी ने 2011 में ममता बनर्जी को समर्थन देने का ऐलान भी किया था. इस इलाक़े में एक और बड़े माओवादी नेता चत्रधर महतो भी कई सालों तक जेल में रहने के बाद हाल ही में बाहर आए हैं. इन्हें तृणमूल ने पार्टी का राज्य महासचिव भी बनाया है. 2011 में तृणमूल और कांग्रेस के गठबंधन ने इस इलाक़े में 26 सीटों में जीत दर्ज की थी. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल ने सीपीएम का सूपड़ा साफ़ कर दिया और लोकसभा की 6 की 6 सीटों पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया. फिर 2016 में तृणमूल अकेले अपने दम पर 30 सीट जीतने में कामयाब हुई. लेकिन इस इलाक़े में बीजेपी की एंट्री हो चुकी थी. खड़गपुर सदर की सीट से बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष जीत कर विधानसभा पहुंच चुके थे और यहां से बीजेपी ने इस इलाक़े में काम करना शुरू किया.

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष के काफ़िले को निशाना बनाया गया है. (फोटो- ANI)
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष के काफ़िले को निशाना बनाया गया है. (फोटो- ANI)

बीजेपी का इलाक़े में काम

पत्रकार पार्थो बताते हैं, “तभी से आदिवासियों को केंद्र में रखकर बीजेपी ने काम करना शुरू कर दिया था. और बीजेपी ने माओवादी हिंसा से प्रभावित हुए परिवारों के बीच भी काम करना शुरू किया. उन परिवारों से मिलने खुद बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय भी आए थे.”

मैं जब 2019 के लोकसभा चुनाव दौरे पर था, तब मेरी मुलाक़ात झाड़ग्राम ज़िले में माओवादी हिंसा में मारे और अपहरण किए गए लोगों की यूनियन के एक नेता से हुई थी. नाम ना बताने की शर्त पर उन्होंने बताया था कि इस बार वो बीजेपी को वोट करने वाले हैं. उन्होंने बताया था कि माओवादी हिंसा में प्रभावित लोगों की तादाद ज़िले भर में 400 से भी ज़्यादा है. उन्होंने ये भी बताया था कि उनके यूनियन से जुड़े परिवारों के वोट 50,000 से भी ज़्यादा हैं और इन सभी लोगों ने तृणमूल के आतंक से परेशान होकर बीजेपी को वोट करने का फ़ैसला किया है.

यूनियन के नेता ने मुझसे आगे कहा, “कई लोग सिर्फ़ इस वजह से मारे गए थे क्योंकि ये लोग सीपीएम को वोट करते थे. फिर दीदी की सरकार आने के बाद, सरकारी योजना के तहत माओवादियों ने सरेंडर किया, सज़ा काटने के बाद उन्हें सरकारी नौकरी मिल गई. लेकिन हमें कुछ भी नहीं मिला. हमारी यूनियन में ज़्यादातर लोग आदिवासी हैं. बीजेपी हमारे लोगों के लिए ज़रूर कुछ करेगी.”

ग़ौरतलब है कि बीजेपी के कुनार हेंबरम ने यहां से जीत दर्ज़ की. ऐसा ही प्रदर्शन बीजेपी का बाक़ी सीटों पर भी था, दरसल बीजेपी ने सुनियोजित तरीक़े से इस इलाके में संगठन को मज़बूत करने का काम किया जिसका फ़ायदा भी उनको मिला.

2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे

2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टियों के प्रदर्शन की बात करें और सीटों पर नज़र डालें तो यह साफ़ पता चलता है की सबसे ज़्यादा नुक़सान तृणमूल कांग्रेस को हुआ है. इलाक़े की 6 सीटों में बीजेपी ने औसतन लगभग 47% वोट हासिल किए, तृणमूल ने 41% और वाम मोर्चा 6% तक ही पहुंच पाई. लेकिन वोटों के मामले में का सबसे ज्यादा नुक़सान सीपीएम को हुआ. 2016 के चुनावों में सीपीएम को इस इलाक़े में औसतन 20% वोट आए थे जो की घटकर सिर्फ़ 6% रह गए.

2019 में इस इलाक़े की लोकसभा सीटों को विधानसभा सीटों में विभाजित करके जो आंकडे मिलते हैं, उसमें बीजेपी को मिला समर्थन और साफ़ हो जाता है. कुल 6 लोकसभा सीटों में 42 विधानसभा सीटें आती हैं, इन 42 सीटों में बीजेपी ने 33 में लीड किया और तृणमूल सिर्फ़ 9 सीटों में, लिहाज़ा तृणमूल सिर्फ़ घाटल लोकसभा जीतने में कामयाब हो पाई.

इस वजह से तृणमूल इस इलाक़े के वोटरों को लुभाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है. इसी कड़ी में चत्रधर महतो को संगठन में अहम भूमिका दी गई है. लेकिन जानकार मानते हैं की महतो का इलाक़े के लोगों में अब कोई ख़ासा प्रभाव नहीं है.

आंकडें और उनके वोटिंग ट्रेंड के आंकलन से इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि इस इलाक़े के वोटर हर चुनाव में अपनी पार्टी नहीं बदलते हैं. जैसे की वोटरों ने वाम मोर्चे को 34 सालों तक, फिर ममता बनर्जी को दो विधानसभा चुनावों में समर्थन दिया. लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी की तरफ़ हुआ शिफ़्ट, आने वाले समय में भी बरकरार रह सकता है.

बहरहाल चुनावों में आंकड़ों के अलावा बहुत कुछ माहौल और समीकरण पर भी निर्भर करता है. ऐसी भी चर्चाएं हैं कि झारखंड मुक्ति मोर्चा यानी की झारखंड की सत्ताधारी पार्टी और उनके नेता हेमंत सोरेन अपना समर्थन ममता बनर्जी को दे सकते हैं. ऐसे में ममता को कुछ फ़ायदा पहुंच सकता है. हालांकि पहले जेएमएम को कोई बड़ी कामयाबी इन इलाक़ों में नही मिली है. मगर यह भी कहना गलत नहीं होगा की बंगाल की राजनीतिक परिस्थिति इतनी अस्थिर भी कभी नहीं रही है.

ख़ैर! आने वाले वक्त में जीत किसकी होगी यह साफ़ हो जाएगा, लेकिन इलाक़े और यहां के आदिवासी वोटों की बंगाल की राजनीति में अहमियत बनी रहेगी.


 

वीडियो- चुनाव से पहले नीतीश और ममता के सामने BJP का प्लान ‘खेल’ बिगाड़ सकता है

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गुजरात चुनाव 2017

गुजरात और हिमाचल में सबसे बड़ी और जान अटका देने वाली जीतों के बारे में सुना?

गुजरात और हिमाचल में सबसे बड़ी और जान अटका देने वाली जीतों के बारे में सुना?

एक-एक वोट कितना कीमती होता है, कोई इन प्रत्याशियों से पूछे.

गुजरात विधानसभा चुनाव के चार निष्कर्ष

गुजरात विधानसभा चुनाव के चार निष्कर्ष

बहुमत हासिल करने के बावजूद चुनाव के नतीजों से बीजेपी अंदर ही अंदर सकते में है.

गुजरात में AAP का क्या हुआ, जो 33 सीटों पर लड़ी थी!

गुजरात में AAP का क्या हुआ, जो 33 सीटों पर लड़ी थी!

अरविंद केजरीवाल का गुजरात में जादू चला या नहीं?

गुजरात चुनाव के बाद सुशील मोदी को खुला खत

गुजरात चुनाव के बाद सुशील मोदी को खुला खत

चुनाव के नतीजे आने के बाद भी लिचड़ई नहीं छोड़ रहे.

इस चुनाव में राहुल और हार्दिक से ज्यादा अफसोस इन सात लोगों को हुआ है

इस चुनाव में राहुल और हार्दिक से ज्यादा अफसोस इन सात लोगों को हुआ है

इन लोगों ने थोड़ी मेहनत और की होती, तो ये गुजरात की विधानसभा में बैठने की तैयारी कर रहे होते.

राहुल गांधी ने चुनाव में हार के बाद ये 8 बातें बोली हैं

राहुल गांधी ने चुनाव में हार के बाद ये 8 बातें बोली हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क्रेडिबिलिटी पर ही सवाल खड़े कर दिए.

गुजरात में हारे कांग्रेस के वो बड़े नेता जिन पर राहुल गांधी को बहुत भरोसा था

गुजरात में हारे कांग्रेस के वो बड़े नेता जिन पर राहुल गांधी को बहुत भरोसा था

इनके बारे में कांग्रेस पार्टी ने बड़े-बड़े प्लान बनाए होंगे.

बीजेपी के वो 8 बड़े नेता जो गुजरात चुनाव में हार गए

बीजेपी के वो 8 बड़े नेता जो गुजरात चुनाव में हार गए

इनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाएं और तमाम टोटके नहीं जिता सके.

पीएम नरेंद्र मोदी ने गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जीत के बाद ये 5 बातें कहीं

पीएम नरेंद्र मोदी ने गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जीत के बाद ये 5 बातें कहीं

दोनों प्रदेशों में भगवा लहराया मगर गुजरात की जीत पर भावुक दिखे पीएम.

ये सीट जीतकर कांग्रेस ने शंकरसिंह वाघेला से बदला ले लिया है

ये सीट जीतकर कांग्रेस ने शंकरसिंह वाघेला से बदला ले लिया है

वाघेला ने इस सीट पर एक निर्दलीय प्रतायशी को वॉकओवर दिया था.