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पश्चिम बंगाल में सीटें हैं 294, लेकिन रिजल्ट 292 सीटों का ही क्यों आया?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Election) की तस्वीर अब साफ हो चुकी है. 294 सीट वाली विधानसभा में अब तक जो रुझान आए हैं, उसमें राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस पार्टी को प्रचंड बहुमत मिलता हुआ दिख रहा है. पार्टी फिलहाल 215 सीटों पर आगे है. वहीं बीजेपी 76 सीटों पर आगे है. कांग्रेस-लेफ्ट और अब्बास सिद्दीकी का संयुक्त मोर्चा गठबंधन पूरी तरह से फ्लॉप हो गया है. संयुक्त मोर्चे को अभी तक एक भी सीट नहीं मिली है.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार 294 में से 292 सीटों के ही रिजल्ट आए हैं. दो सीटों पर चुनाव नहीं हुआ है. ऐसा इसलिए क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान इन दो सीटों के प्रत्याशी कोरोना संक्रमित हो गए और उनकी मौत हो गई. अब इन सीटों पर चुनाव बाद में होगा.

इस बार के बंगाल चुनाव में चार उम्मीदवारों की जान गई है. चारों की मौत का कारण कोरोना ही रहा. इनमें से दो सीटों पर चुनाव जहां आगे बढ़ाया चुका है, वहीं दो के परिणाम आ रहे हैं. जिन चार प्रत्याशियों की मौत हुई, उनके नाम काजल सिन्हा, प्रदीप नंदी, रेजाउल हक और समीर घोष हैं. जहां काजल सिन्हा तृणमूल कांग्रेस, प्रदीप नंदी रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, रेजाउल हक कांग्रेस की तरफ से चुनाव में उतरे थे, वहीं समीर घोष निर्दलीय थे.

इन उम्मीदवारों की सीटों की बात करें तो काजल सिन्हा ने खारदाह सीट से अपनी दावेदारी पेश की. प्रदीप नंदी जंगीपुर और रेजाउल हक शमशेरगंज से चुनाव लड़ रहे थे. वहीं समीर घोष वैष्णवनगर विधानसभा सीट से मैदान में उतरे थे.

केवल दो सीटों के चुनाव ही आगे क्यों बढ़े?

अब आप सोच रहे होंगे कि जब मौत चार उम्मीदवारों की हुई, तो केवल दो सीटों के चुनाव ही स्थगित क्यों किए गए? इसके पीछे की वजह जनप्रतिनिधित्व कानून है. इस कानून में कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जो चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और उसके बाद किसी प्रत्याशी की मौत होने पर आगे की कार्यवाही निर्धारित करते हैं. यह पूरी कार्यवाही चुनाव आयोग करता है.

सबसे पहले 16 अप्रैल को कांग्रेस उम्मीदवार रेजाउल हक की मृत्यु हुई थी. वे दो दिन पहले की कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे. इसके अगले ही दिन यानी 17 अप्रैल को प्रदीप नंदी की भी कोरोना वायरस संक्रमण से मौत हो गई. प्रदीप नंदी और रेजाउल हक की सीटों पर मतदान 22 अप्रैल को होना था. दोनों की मौत के बाद चुनाव आयोग ने इन दोनों सीटों पर चुनाव को स्थगित कर दिया. दरअसल, कानून कहता है कि अगर मतदान से पहले किसी मान्यता प्राप्त पार्टी के उम्मीदवार की मौत हो जाती है, तो उस सीट पर चुनाव को स्थगित किया जाना चाहिए.

TMC के नेता Kajal Sinha. वे नॉर्थ 24 परगना जिले की खारदाह सीट से खड़े थे. (फोटो-ट्विटर से)
TMC के नेता Kajal Sinha. वे नॉर्थ 24 परगना जिले की खारदाह सीट से खड़े थे. (फोटो-ट्विटर से)

यहां मान्यता प्राप्त पार्टी शब्द पर जोर है. अगर केवल रजिस्टर्ड पार्टी या फिर किसी निर्दलीय पार्टी के उम्मीदवार की मृत्यु मतदान से पहले होती है, तो उस सीट पर चुनाव को स्थगित नहीं किया जाता. पहले ऐसा किया जाता था. लेकिन फिर ऐसा होने लगा कि लोग किसी निर्दलीय प्रत्याशी को खड़ा करने लगे और वोटिंग से पहले उसकी हत्या कर चुनाव स्थगित करा देते. इसे देखते हुए कानून में बदलाव किया. सुप्रीम कोर्ट ने भी 2012 में अपने एक फैसले में इस बात पर जोर दिया था.

इस नियम से साफ है कि आखिर निर्दलीय प्रत्याशी समीर घोष की सीट वैष्णवनगर की सीट पर मतगणना क्यों हुई. क्योंकि समीर घोष किसी मान्यता प्राप्त पार्टी से नहीं थे. वैष्णवनगर सीट पर आखिरी चरण में 29 अप्रैल को मतदान हुआ. इसके दो दिन पहले ही समीर घोष कोरोना के सामने जिंदगी की जंग हार गए.

अब काजल सिन्हा की खारदाह सीट की बात भी कर लेते हैं. खारदाह सीट पर मतदान 22 अप्रैल को हुआ. इससे एक दिन पहले सिन्हा कोविड पॉजिटिव पाए गए. 25 अप्रैल को उन्होंने आखिरी सांस ली. यानी मतदान के बाद उनकी मौत हुई. ऐसे में नियम कहता है कि अगर किसी उम्मीदवार की मौत मतदान के बाद होती है, तो उस सीट पर मतगणना होगी. जिस उम्मीदवार की मौत हुई है, अगर वो चुनाव जीत जाता है तो उस सीट पर फिर से चुनाव कराया जाता है. अगर उस उम्मीदवार की हार होती है, तो जीते हुए उम्मीदवार को ही विजेता माना जाएगा. ऐसी स्थिति में चुनाव स्थगित नहीं होगा.

जिन उम्मीदवारों की मौत हुई, उन सीटों का हाल

फिलहाल अगर खारदाह सीट की बात करें तो चुनाव आयोग के मुताबिक यहां से काजल सिन्हा ही आगे चल रहे हैं. उनके पास 9 हजार से अधिक वोटों की लीड है. काजल सिन्हा TMC के पुराने नेता थे, ममता बनर्जी के भी काफी करीब थे. उन्हें इस बार ही खारदाह सीट से टिकट दिया गया था. खारदाह सीट को 2011 में TMC ने CPM से छीन लिया था. इससे पहले नॉर्थ 24 परगना जिले में आने वाली इस सीट पर CPM का एकछत्र राज रहा. दशकों तक यहां लाल झंडा लहराता रहा. 2011 में TMC के अमित्र मित्रा ने यहां जीत हासिल की. 2016 में उन्होंने अपनी जीत बरकरार रही. अमित मित्रा पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री भी है

रुझानों में TMC को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद जश्न मनाते पार्टी के कार्यकर्ता. इस दौरान किसी ने कोविड प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया. (फोटो: PTI)
रुझानों में TMC को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद जश्न मनाते पार्टी के कार्यकर्ता. इस दौरान किसी ने कोविड प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया. (फोटो: PTI)

वहीं अगर शमशेरगंज विधानसभा सीट की बात करें तो परिसीमन के बाद यह सीट बनी. 2011 में इस सीट पर पहला चुनाव हुआ. जिसमें CPM के तौअब अली ने 46 फीसदी वोट के साथ जीत हासिल की. अगले चुनाव यानी 2016 में TMC के अमीरुल इस्लाम ने उनसे यह सीट छीन ली. इसी तरह अगर जंगीपुर विधानसभा सीट और यहां के दिवंगत उम्मीदवार प्रदीप कुमार नंदी की अगर बात करें तो नंदी रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता थे. वे 73 साल के थे. वहीं जंगीपुर विधानसभा सीट 2016 में कांग्रेस के खाते से निकलकर तृणमूल की झोली में आ गई थी. इससे पहले साल 2006 और 2001 में यहां से रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने जीत हासिल की थी. पार्टी 1991 और 1967 में भी यहां से जीती थी.

आखिर में वैष्णवनगर विधानसभा सीट की बात. जहां से समीर घोष निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर लड़ रहे थे. परिसीमन के बाद 2011 में इस सीट पर पहली बार चुनाव हुआ था. जिसमें कांग्रेस के ईशा खान चौधरी ने जीत हासिल की थी. 2016 में जो चुनाव हुए, उसमें वैष्णवनगर उन तीन विधानसभा सीट में शामिल थी, जिन्हें BJP ने जीता था. BJP के स्वाधीन कुमार सरकार ने कड़े मुकाबले में कांग्रेस के अजीजुल हक को हराया था. इस बार भी स्वाधीन कुमार सरकार इस सीट पर लगभग चार हजार वोटों से बढ़त बनाए हुए हैं.


 

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