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मायावती और अखिलेश बीजेपी को एक और खुशखबरी देने की तैयारी कर चुके हैं!

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कहावत है कि भारत में चुनावों का मौसम कभी नहीं बीतता. अभी लोकसभा चुनाव ख़त्म हुए हैं. नतीजे आए ही हैं. अगले चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है. और आने वाले समय में होंगे विधानसभा उपचुनाव.

कौन-से विधानसभा उपचुनाव? उन सीटों पर, जिनके विधायकों ने लोकसभा चुनाव लड़ा और जीतकर लोकसभा चले गए. नियमानुसार अब नवनिर्चाचित सांसदों को अपनी विधानसभा सीटों को खाली करना होगा. खाली करने के बाद इन सीटों पर फिर से उपचुनाव होंगे और अगले चुनाव तक के लिए एक नया विधायक चुना जाएगा.

माया के बयान के बाद अखिलेश ने भी अलग लड़ने पर विचार करने की बात की है.
मायावती के बयान के बाद अखिलेश ने भी अलग लड़ने पर विचार करने की बात की है.

यूपी के सन्दर्भ में बात करें तो कुल 11 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जिनपर आने वाले वक़्त में उपचुनाव होने हैं. इन सभी विधानसभा सीटों के प्रतिनिधियों ने इस साल लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की. इन ग्यारह सीटों में एक सपा विधायक की सीट थी. एक बसपा विधायक की. एक अपना दल (सोनेलाल) की और आठ विधानसभा सीटें भाजपा की थीं.

अखिलेश और माया 2018 के लोकसभा उपचुनावों के दौरान साथ आए थे.
अखिलेश और मायावती 2018 के लोकसभा उपचुनावों के दौरान साथ आए थे.

लेकिन मायावती और अखिलेश यादव इन सीटों पर चुनाव अलग-अलग लड़ने की बात करने लगे हैं. उनके रास्ते अब अलग होते दिखाई दे रहे हैं. बसपा प्रमुख मायावती ने यूपी की इन 11 सीटों पर अलग-अलग चुनाव लड़ने की घोषणा की. इसके ठीक बाद अखिलेश यादव का भी बयान आ गया. अखिलेश यादव ने भी कहा कि अगर गठबंधन टूटता है तो समाजवादी पार्टी भी अलग चुनाव लड़ने के बारे में सोचेगी.

सपा-बसपा का गठबंधन लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र हुआ था. इसमें रालोद और भी शामिल हुआ था. अब देखना ये है कि क्या सपा-बसपा आगामी विधानसभा उपचुनाव में अपना गठबंधन बनाए रख पाते हैं? इतनी बयानबाजी के बावजूद? और अलग लड़ते हैं, जैसी खबरें आ रही हैं, तो क्या होगा? क्या कहता है चुनाव का गणित.

1. लखनऊ कैंट (लखनऊ)

लखनऊ कैंट विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव परिणाम
लखनऊ कैंट विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव परिणाम

पूर्व विधायक भाजपा नेता रीता बहुगुणा जोशी.

सीट क्यों खाली हुई? रीता बहुगुणा जोशी इस लोकसभा चुनाव में इलाहाबाद से सांसद चुन ली गईं.

विधानसभा चुनाव में मिले लगभग 95 हज़ार वोट. उनके सामने थीं यादव परिवार की सदस्या और सपा प्रत्याशी अपर्णा यादव. अपर्णा यादव हार गयीं. बसपा के योगेश दीक्षित ने भी पर्चा भरा था. उन्हें लगभग 26 हज़ार वोट मिले.

चर्चा है कि लखनऊ लोकसभा के अन्दर लगने वाली लखनऊ कैंट पर आगामी उपचुनाव बहुत रोचक साबित होने वाला है. लखनऊ लोकसभा से राजनाथ सिंह फिर से सांसद चुने गए हैं. उन्होंने सपा प्रत्याशी और पूर्व भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को लगभग 3.47 लाख वोटों से हराया था.

अगर सपा-बसपा गठबंधन बना रहता है तो इस सीट पर भाजपा को कड़ी टक्कर देखने को मिल सकती है. गठबंधन के वोटों को मिला दें तो गठबंधन के प्रत्याशी को लगभग 87 हज़ार वोट मिलते हैं. भाजपा फिर भी फायदे में है, लेकिन मार्जिन कम होता है.

अगर गठबंधन टूटता है,  तो भाजपा को निर्णायक बढ़त मिल सकती है. लोकसभा सीट के सापेक्ष देखें तो भी भाजपा मजबूत है. राजनाथ सिंह को मिली बढ़त और उस जीत के सामने सपा का लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा में भी कमज़ोर प्रदर्शन, ऐसे में सीट पर भाजपा को कुछ टक्कर देने के लिए सपा-बसपा को गठबंधन बनाए रखना होगा.

2. टूंडला विधानसभा (फिरोजाबाद)

टूंडला सीट पर 2017 विधानसभा चुनावों के परिणाम
टूंडला सीट पर 2017 विधानसभा चुनावों के परिणाम

पूर्व विधायक एसपी सिंह बघेल.

सीट क्यों खाली हुई? लोकसभा चुनाव में बघेल आगरा की सुरक्षित सीट से जीते.

योगी सरकार में पशुधन मंत्री बघेल 2017 में टूंडला सीट पर 1,18,584 वोट पाकर जीते थे. दूसरे नंबर पर बसपा प्रत्याशी राकेश बाबू थे, जो लगभग 56 हज़ार वोटों से चुनाव हार गए. ये अंतर लगभग उतना ही है, जितने वोट कुल मिलाकर सपा प्रत्याशी शिव सिंह चक को मिले.

अगर सपा-बसपा गठबंधन नहीं टूटा होता तो भाजपा को दिक्कत हो सकती थी. जीत के अंतर की कमी को सपा-बसपा साथ आकर ही पूरा कर देते.

3. गोविंदनगर विधानसभा (कानपुर)

गोविंद नगर विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव परिणाम
गोविंद नगर विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव परिणाम

पूर्व विधायक भाजपा के सत्यदेव पचौरी.

सीट खाली होने का कारण? सत्यदेव पचौरी ने कानपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत गए.

2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस में गठबंधन में हो गया था. “यूपी को ये साथ पसंद है” मार्का नारे चले थे. सपा और कांग्रेस के बीच सीटें बंट गई थीं. लिहाजा कानपुर के गोविंदनगर की सीट पर टिकट कांग्रेस को मिला. कांग्रेस के अम्बुज शुक्ला लगभग 72 हजार वोटों से चुनाव हार गए थे. और जीत का अंतर इतना बड़ा था कि बसपा के निर्मल तिवारी को मिले वोट भी वो कमी पूरा नहीं कर सकते थे.

कानपुर सीट पर भाजपा की जीत का मार्जिन भी लगभग डेढ़ लाख वोटों का था. ऐसे में भाजपा इस ज़ोन में मजबूत साबित होती है. और गणित के आधार पर बात करें तो सपा या कांग्रेस और बसपा साथ रहकर भी इस सीट पर भाजपा के लिए कोई मुश्किल खड़ी करने की स्थिति में नहीं दिखते. अगर साथ होते तो थोड़ी इज्जत बचती, सीट के लिए फिर भी फाईट करनी होती.

4. प्रतापगढ़ सदर विधानसभा (प्रतापगढ़)

प्रतापगढ़ सदर की विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव परिणाम
प्रतापगढ़ सदर की विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव परिणाम

पूर्व विधायक अपना दल के संगमलाल गुप्ता

सीट क्यों खाली हुई? संगमलाल गुप्ता भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर प्रतापगढ़ से सांसद चुने गए.

2017 में संगमलाल गुप्ता प्रतापगढ़ सदर से चुनाव जीते. सपा के नागेन्द्र सिंह चुनाव हार गए. हार का अंतर लगभग 34 हज़ार का था. प्रतापगढ़ लोकसभा सीट से इस साल संगमलाल गुप्ता जीते तो जीत का अंतर 1.17 लाख वोटों का था. सीट पर सपा के सहयोगी रहे राजा भईया का प्रभाव रहता है. वे खुद कुंडा से विधायक हैं. सपा और बसपा के वोटों को जोड़कर देखें तो अपना दल – भाजपा के प्रत्याशी लगभग 7 हज़ार वोटों से हार रहे हैं. कुल मिलाकर गठबंधन और लोकल समीकरण भाजपा के खिलाफ जा रहे हैं. अगर महागठबंधन बच जाता, तो बहुत संभव होता कि इस सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ता. लेकिन मायावती और अखिलेश के बयान बताते हैं कि बचा है नहीं.

5. गंगोह विधानसभा (सहारनपुर)

गंगोह सीट पर 2017 के विधानसभा चुनाव परिणाम
गंगोह सीट पर 2017 के विधानसभा चुनाव परिणाम

पूर्व विधायक प्रदीप कुमार.

सीट खाली होने का कारण? प्रदीप कुमार कैराना लोकसभा से लड़े और जीत गए.

इस सीट का समीकरण रोचक है. सहारनपुर में लगने वाली इस सीट पर सपा, बसपा और कांग्रेस तीनों ने अलग अलग चुनाव लड़ा. वह भी तब, जब सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन घोषित हो चुका था. कांग्रेस के नौमान मसूद ने अच्छे वोट खींचे थे और दूसरा स्थान बनाया था. सपा और बसपा इस सीट पर मिलकर एक हद तक टक्कर तो दे पाते. सहारनपुर लोकसभा बसपा के हाजी फजलुर्रहमान के खाते में गई है. जीत का अंतर महज़ 22 हज़ार का है. लेकिन कांग्रेस के इमरान मसूद भी हैं, जिन्होंने लोकसभा में गठबंधन को अच्छा ख़ासा नुकसान पहुंचाया है. अब जब गठबंधन नहीं है, और संख्या भी उतनी मजबूत नहीं है तो बहुत हद तक संभव है कि सीट फिर से भाजपा के खाते में जाए.

6. मानिकपुर विधानसभा (बांदा)

मानिकपुर विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव परिणाम
मानिकपुर विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव परिणाम

पूर्व विधायक भाजपा के आरके सिंह पटेल.

सीट क्यों खाली हुई? पटेल ने बांदा लोकसभा से चुनाव लड़ा. जीत गए. और बांदा के ही अंदर आने वाली मानिकपुर सीट अब उपचुनाव की राह देख रही है.

2017 विधानसभा चुनाव के दौरान सपा और कांग्रेस का गठबंधन. सीट गयी कांग्रेस के खाते में. बुंदेलखंड से ही ताल्लुक रखने वाली सोशल एक्टिविस्ट संपत पाल ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा. हालिया लोकसभा चुनाव में सपा ने श्यामाचरण गुप्ता को उतारा था, जो लगभग 58 हज़ार वोटों से चुनाव हार गए. बसपा के पिछले प्रत्याशी चंद्रभान सिंह पटेल लगभग 32 हज़ार वोट बटोर पाए थे.

लोकसभा सीट है भाजपा के खाते में. उपचुनाव के दौरान अगर गठबंधन बना रहता, तो भी बसपा और सपा (इस सीट के अर्थ में कांग्रेस) मिलकर भाजपा को बहुत नुकसान नहीं पहुंचा पाते.

7. ज़ैदपुर विधानसभा (बाराबंकी)

बाराबंकी की ज़ैदपुर विधानसभा का चुनाव परिणाम

पूर्व विधायक भाजपा के उपेन्द्र सिंह रावत.

सीट खाली इस वजह से हुई क्योंकि भाजपा ने उपेन्द्र सिंह रावत को बाराबंकी लोकसभा से सांसदी का टिकट दिया. उपेन्द्र चुनाव लड़कर जीत गए.

2017 विधानसभा चुनाव में ये सीट तब कांग्रेस के खाते में आई थी. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीएल पुनिया के बेटे तनुज पुनिया सामने थे. चुनाव में तो लगभग 82 हज़ार वोट मिले. लेकिन इसे उनके बढ़े कद के रूप में देखा गया. तभी इस साल लोकसभा चुनाव में भी तनुज पुनिया को टिकट दिया गया. तनुज पुनिया फिर से चुनाव हार गए. बसपा की मीता गौतम भी थीं. तीसरे स्थान पर आयीं.

अब ये लोकसभा सीट है भाजपा के पास. उपेन्द्र सिंह रावत ने सपा के राजाराम रावत को लगभग 1.10 लाख वोटों से हरा दिया है. अब गठबंधन नहीं रहने की स्थिति में सपा और बसपा के पास कोई बड़ा नेता दिखता नहीं है, जो उन्हें संभाल सके. अलग-अलग लड़ तो लेंगे, लेकिन अगर कांग्रेस यहां फिर से किसी मजबूत प्रत्याशी को उतारती है तो दोनों क्षेत्रीय दलों का समीकरण खराब हो सकता है.

8. बलहा विधानसभा (बहराइच)

बहराइच की बलहा विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव परिणाम
बहराइच की बलहा विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव परिणाम

पूर्व विधायक अक्षयवर लाल गोंड.

कहां गए? बहराइच लोकसभा से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़कर सांसद हो गए.

अब क्या होगा? और क्या, फिर से चुनाव होगा. गठबंधन रहता या न रहता तो भी सपा और बसपा शायद भाजपा का कुछ न बिगाड़ पातीं. अब तो गठबंधन वैसे भी नहीं है. मिलाजुलाकर भी लगभग 86 हज़ार वोट पा रहे हैं. 18 हज़ार वोटों से फिर भी हार रहे हैं. अलग-अलग लड़ेंगे तो और नुकसान. गणित कहता है कि अगर सपा और बसपा साथ रहते तो शायद कुछ अच्छी लड़ाई लड़ पाते, लेकिन दोनों पार्टी प्रमुखों के बयानों को देखकर ऐसा लगता नहीं है.

9. इगलास विधानसभा (अलीगढ़)

इगलास सीट पर 2017 के विधानसभा चुनाव परिणाम
इगलास सीट पर 2017 के विधानसभा चुनाव परिणाम

पिछले विधायक थे बीजेपी के राजवीर सिंह.

सीट कैसे खाली हो गयी? राजवीर सिंह ने हाथरस से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत गए.

अब अलीगढ़ में आने वाली इस इगलास सीट पर चुनाव होंगे तो महागठबंधन के घटक कहां जाएंगे? 2017 में इस सीट पर खेल चार कोणों पर खेला गया. कांग्रेस और बसपा तो थीं ही, साथ में रालोद की सुलेखा सिंह भी थीं, जिन्हें लगभग 28 हज़ार वोट मिले थे. अब रालोद किसके साथ जाएगा, इस बारे में तो कोई खबर नहीं है. लेकिन कांग्रेस, बसपा और रालोद को मिला भी लें तो भी जीत से लगभग 27 हज़ार वोट पीछे रह जाते हैं. अलीगढ़ से भाजपा के सतीश गौतम जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं. वो भी लगभग सवा दो लाख वोटों के अंतर से. ऐसे में सपा-बसपा का एक साथ जुड़े रहना कम से कम चुनाव में टक्कर भर देने के लिए ज़रूरी लगता है. लेकिन इन दलों के लिए “ज़रूरी लगना” शायद कुछ और ही है. तभी कुछ ही दिनों के भीतर गठबंधन में लगभग टूट दिखाई देने लगी है.

10. रामपुर विधानसभा (रामपुर)

मुरादाबाद मंडल में आने वाली रामपुर विधानसभा सीट के पिछले चुनाव परिणाम
मुरादाबाद मंडल में आने वाली रामपुर विधानसभा सीट के पिछले चुनाव परिणाम

सपा के वरिष्ठ नेता आज़म खान थे पूर्व विधायक.

अब वही आज़म खान रामपुर लोकसभा सीट जीत चुके हैं. चुनाव होने हैं.

सपा और बसपा का गठबंधन न भी हो तो क्या फर्क पड़ता है? आज़म खान के बारे में बातचीत होती है कि वे मजबूत हैं. उनका अपना वोटबैंक है. लोग कहते हैं कि खुद तो लड़ेंगे नहीं, लेकिन इतना माद्दा रखते हैं कि टिकट बंटवारे में खुद की ही चलाएंगे. गठबंधन ज़िंदा होता तो भी टिकट सपा के ही कोटे में जाता. बसपा के तनवीर अहमद खान 54 हज़ार वोट पा पाए थे. ये ऐसी कुछेक सीटों में से एक है, जहां गठबंधन का न होना सपा के लिए फायदेमंद माना जा रहा है.

11. जलालपुर विधानसभा (अंबेडकर नगर)

जलालपुर विधानसभा परिणाम
जलालपुर विधानसभा परिणाम

बसपा के लिए फायदेमंद साबित होती सीट. बसपा नेता रितेश पाण्डेय थे पूर्व विधायक.

रितेश पाण्डेय ने सीट खाली की अंबेडकर नगर से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए. बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत भी गए.

अब अगर सपा और बसपा साथ होते, तो बहुत हद तक संभव है कि बसपा यहां पर सपा को “रामपुर” का जवाब देती. रामपुर की ही माफिक बसपा यहां लोकसभा सीट के साथ विधानसभा में भी मजबूत है. लेकिन यह भी तथ्य है कि जीत का अंतर उतना तगड़ा नहीं है. लगभग 90 हज़ार वोट पाकर रितेश जीते थे. भाजपा प्रत्याशी राजेश सिंह 77 हज़ार वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे थे. अगर बसपा लगभग 58 हज़ार वोट पाने वाली सपा को साथ रखे तो जीत का अंतर बड़ा कर सकती है, लेकिन ऐसा होता दिखता नहीं है.


 

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