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सबसे गरीब सांसद जिसे मोदी ने मंत्री बनाया

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30 मई, 2019 को राष्ट्रपति भवन में शपथ ग्रहण समारोह हुआ. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सबसे पहले नरेंद्र मोदी को शपथ दिलाई. वो अपने बूते खड़ी सरकार के प्रधानमंत्री बने. लगातार दूसरी बार. इतिहास बना. तुलना जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से हुई. खूब तालियां बजीं. और मोदी के बाद शपथ लेने जितने नेता आए, दर्शकों ने उनके लिए भी तालियां बजाईं. लेकिन जैसा स्वागत 56 वें नंबर पर शपथ लेने आए प्रताप चंद्र सड़ंगी का हुआ, वैसा कम ही लोगों को नसीब हुआ. कई लोग अपनी जगह पर खड़े होकर उनके लिए तालियां बजा रहे थे, नारे लगा रहे थे.

प्रताप चंद्र सड़ंगी. जी हां, यही सही नाम है. अंग्रेज़ी की स्पेलिंग देखकर कई लोग इन्हें सारंगी बुलाते हैं. इसमें उनकी गलती भी नहीं है. बहुतों ने ये नाम पहली बार तभी सुना जब इसे राष्ट्रपति भवन के फोरकोर्ट में पुकारा गया. लेकिन ओडिशा में ऐसा शख्स खोजना मुश्किल है जिसने ये नाम पहले न सुना हो. खासकर बालासोर और मयूरभंज के आदिवासी इलाकों में. लोग प्यार से उन्हें नाना भी कहते हैं. सड़ंगी के आलोचक उन्हें एक टिपिकल हिंदूवादी नेता बताते हैं. लेकिन वो भी मानते हैं कि सड़ंगी ने सर्वहारा वर्ग के लिए शिक्षा और स्वास्थय के क्षेत्र में जो काम किया है, वो उन्हें किसी एक पार्टी के नेता से कहीं बड़ा बनाता है.

ओडिशा के बालासोर का नाम हमने ज़्यादातर सुना है चांदीपुर फायरिंग रेंज के चलते. भारत की बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण यहीं होते हैं. आज के बाद आप बालासोर को एक और वजह से जानेंगे. वो ऐसे कि यहां एक कस्बा है नीलगिरी. इसी के पास एक गांव पड़ता है गोपिनाथपुर. 1955 में यहीं जन्म हुआ सड़ंगी का. द टेलिग्राफ को दिए अपने इंटरव्यू में सड़ंगी बताते हैं,

”बचपन में दो लक्ष्य बनाए थे – या तो संन्यासी बनूंगा या मात्रभूमि के लिए कुछ करूंगा. तो कलकत्ता के रामकृष्ण मठ गया. मेरा बायोडाटा से मठ के लोगों को मालूम चला कि घर पर विधवा मां हैं. तो मुझसे कहा गया कि घर लौटकर मां की सेवा करो. लौटने के बाद मैंने समाज के लिए काम करना शुरू किया. उसी क्रम में राजनीति में भी आ गया.”

मठ से लौटाए गए तो सड़ंगी ने फिर पूरा वक्त अपना दूसरा लक्ष्य पूरा करने में लगाया. शादी नहीं की. शपथ लेने तक 64 बसंत देख चुके सड़ंगी ने गण शिक्षा मंदिर योजना के तहत सैकड़ों आदिवासी गावों में स्कूल खोले. इन स्कूलों को समकरा केंद्र कहा जाता है. सड़ंगी खुद भी पढ़ाई के शौकीन रहे हैं. दर्शन से लेकर विज्ञान से जुड़ी किताबें पढ़ते हैं. उड़िया, हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज़ी बोल लेते हैं. धुरंधर वक्ता हैं. दुनिया का कोई विषय हो, सड़ंगी उसपर बात कर लेंगे. सड़ंगी ने शराब के खिलाफ भी कई आंदोलन किए हैं.

जब ओडिशा भाजपा अध्यक्ष बनने से चूक गए

सड़ंगी बजरंग दल ओडिशा के अध्यक्ष रहे हैं. विश्व हिंदू परिषद ओडिशा के संयुक्त सचिव भी. लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुयायी रहे लेकिन 2004 और 2009 में नीलगिरी से निर्दलीय विधायकी का चुनाव लड़े और जीते. 2014 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर बालासोर लोकसभा से पर्चा भरा था. लेकिन बीजू जनता दल के रबिंद्र कुमार जेना से हार गए थे.

एक वक्त वो भी था जब सड़ंगी का नाम ओडिशा भाजपा अध्यक्ष के लिए चला था. सड़ंगी तब दिल्ली गए थे. तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मिले भी. बकौल सड़ंगी राजनाथ उन्हें सूबे में भाजपा की कमान देना चाहते थे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. डेढ़ महीने बाद उन्होंने मन बनाया तो पार्टी का मन बदल गया था. हाल के दिनों में सड़ंगी के पार्टी अध्यक्ष न बनने को लेकर एक थ्योरी और दी जाती है. वो ये कि सड़ंगी धर्मेंद्र प्रधान के उतने करीब नहीं हैं. ओडिशा में भाजपा के ”गो टू” पर्सन फिलहाल प्रधान ही हैं.

ओडिशा की राजनीति में अपनी जगह बनाने के बावजूद सड़ंगी बेहद सादगी की ज़िंदगी जीते हैं. अमूमन उन्हें सफेद कपड़ों में देखा जाता है. साइकिल उनकी प्रिय सवारी है. जब वो विधायक होकर भुवनेश्वर गए, तो गाहे ब गाहे लोगों को केशरी टॉकीज़ के पास वड़ा और आलू चॉप खाते नज़र आ जाते. जब सांसदी की बारी आई तो 2014 में सड़ंगी को बालासोर से टिकट मिला. 2009 में इस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार जीता था. उससे पहले ये सीट लगातार तीन बार भाजपा नेता खरबेला स्वैन के पास रही थी. लेकिन 2014 में सड़ंगी का सामना हुआ बीजू जनता दल के करोड़पति उम्मीदवार रबिंद्र कुमार जेना से. उद्योगपति जेना ‘न्यूज़ वर्ल्ड ओडिशा’ नाम से न्यूज़ चैनल चलाते हैं. बालासोर अलॉयज़ नाम की कंपनी के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर भी रह चुके हैं. फिर बालासोर में बीजू जनता दल का संगठन मज़बूत था. और बोनस था नवीन पटनायक का नाम. नतीजा – सड़ंगी जेना से हार गए. अंतर रहा 1.42 लाख वोट का.

लेकिन इस हार के बावजूद सड़ंगी का कद कम हुआ हो, ऐसा नहीं है. इंटरनेट पर थोड़ा खोजने पर आपको तमाम बड़े नेताओं के साथ सड़ंगी की तस्वीरें मिल जाएंगी. नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथा, शिवराज सिंह चौहान, मुरली मनोहर जोशी, धर्मेंद्र प्रधान. कई तस्वीरों में सड़ंगी मोदी के साथ मंच पर नज़र आते हैं. सड़ंगी भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं. लेकिन तस्वीरें सिर्फ नेताओं के साथ हों ऐसा नहीं है. किसी तस्वीर में पौधा रोपते नज़र आते हैं तो किसी में राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के कार्यक्रम में बोलते. किसी में वो भीड़ से घिरे नज़र आते हैं, लोग उनके साथ सेल्फी लेना चाहते हैं.

मोदी से करीबी

हाल के दिनों में सड़ंगी को लगातार ‘ओडिशा का मोदी’ कहा गया है. इस तरह के किस्से भी खूब चलते हैं कि सड़ंगी और नरेंद्र मोदी ने साथ-साथ साइकिल से संगठन का काम किया है. सड़ंगी इसे गलत बताते हैं. कहते हैं कि पहली बार मोदी से 2004 में मिला था, जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री होते थे. एक और बात का ज़िक्र ज़रूरी है. इस तरह की बातें भी खूब चलीं कि मोदी ओडिशा आते हैं तो सड़ंगी से मिले बिना जाते नहीं. अप्रैल 2019 में भी मोदी ओडिशा आए तो एयरपोर्ट पर सड़ंगी से हाथ मिलाने के लिए रुके. उन्हें पार्टी का सबसे पुराना सैनिक बताया. सड़ंगी बताते हैं कि बिना मिले न लौटने वाली बात अतिरंजना में कही जाती है. कहते हैं, मोदी आते हैं और मिलना संभव होता है तो मिल लेता हूं. सिर्फ मुझे मिलने आते हैं, ये बात गलत है. सड़ंगी से करीबी वजह रही या कुछ और, मोदी ने लोकसभा चुनाव 2019 में एक सभा बालासोर में भी की.

किराए के ऑटो में प्रचार किया

सड़ंगी को 2019 में बालासोर लोकसभा सीट से फिर भाजपा टिकट देकर उतारा गया. बीजू जनता दल के रबिंद्र कुमार जैना तो सामने थे ही, कांग्रेस प्रत्याशी नबज्योति पटनायक भी कम नहीं थे. नबज्योति के पिता निरंजन पटनायक ओडिशा कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. नबज्योति के चाचा माने निरंजन के छोटे भाई सौम्य रंजन पटनायक ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री जेबी पटनायक के दामाद हैं. सौम्य को बीजू जनता दल ने राज्यसभा में सीट दे रखी है. सांसदी के साथ-साथ सौम्य रंजन ओडिशा का सबसे बड़ा मीडिया हाउस ईस्टर्न मीडिया लिमिटेड (EML). EML सबसे ज़्यादा बिकने वाले उड़िया अखबार संवाद और टीवी न्यूज़ चैनल कनक टीवी की मालिक है. पटनायक परिवार खनन समेत कई औद्योगिक उपक्रम चलाता है.

कांग्रेस और बीजू जनता दल के कैंडिडेट गाड़ियों के काफिले में प्रचार करते. सड़ंकी देश की सबसे साधन संपन्न पार्टी के कैंडिडेट थे. फिर भी किराए के ऑटो में प्रचार किया. बालासोर में मुकाबला त्रिकोणीय था, लेकिन किसी ने सड़ंगी की जीत के विचार को गंभीरता से नहीं लिया था. लेकिन 23 मई, 2019 का दिन आया और सबने देखा कि अजेय माने जाने वाले जेना 12,956 वोट से हार गए हैं. और जीते हैं प्रताप चंद्र सड़ंगी. ये सड़ंगी की सादगी की जीत थी. उस इमानदारी की जीत, जिसका लोहा विरोधी भी मानते हैं.

सादा जीना, खरा-खरा बोलना

सड़ंगी के इंटरव्यू भी उनके बारे में काफी कुछ कहते हैं. धुरंधर वक्ता हैं, तेज़ दिमाग के भी. लेकिन किसी बात पर बिदकते नहीं. खरा-खरा बोलते हैं. द टेलिग्राफ वाले इंटरव्यू में सड़ंगी से उनकी दाढ़ी और साधु जैसे पहनावे के बारे में पूछा गया. उनका जवाब था,

”नहीं, मैं एक राजनेता हूं. मैंने साधु बनने की कोशिश की थी. नाकाम रहा. पहले दाढ़ी नहीं रखता था. अब रखने लगा हूं.”

इंडिया टुडे से बातचीत में सड़ंगी से पूछा गया कि आप साइकिल बहुत पसंद करते हैं. क्या संसद भी साइकिल से जाएंगे? सड़ंगी का जवाब था,

”नहीं-नहीं, मैं दिखावे के लिए कुछ नहीं करता. साइकिल मुझे प्रिय है क्योंकि पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करती. सबसे सस्ता माध्यम है. लेकिन काम के लिए मुझे गाड़ी में भी चलना होता है. संसद भवन मैं साइकिल पर क्यों जाऊं. यहां तो 10 रुपए में संसद भवन के लिए गाड़ी की व्यवस्था है.”

दो बार के विधायक सड़ंगी ने जब हलफनामे में अपनी संपत्ति की घोषणा की, तो कुल धन बताया 10 लाख. इस हिसाब से वो मोदी मंत्रिमंडल के सबसे गरीब मंत्री होते हैं. लेकिन ये उनका इकलौता परिचय नहीं है. उनकी सही परिचय एक ऐसे नेता के रूप में है जो ओडिशा से दिल्ली आ गया, लेकिन यहां भी अपने लोगों का खाना – पखाल भात ही खाना चाहता है. क्योंकि उसे वही पसंद है.

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