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इन चार निर्दलीयों के आगे गुजरात और हिमाचल में बीजेपी कैंडिडेट्स ने पानी नहीं मांगा

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मेन आइटम के अलावा जो होता है, उसे ही शास्त्रों में ‘अन्य’ कहा गया है. गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 के संदर्भ में ‘अन्य’ का अर्थ निर्दलीय प्रत्याशियों से है. इनका पर्चा भाजपा, कांग्रेस तो दूर, किसी अंजानी पार्टी तक से नहीं भरा होता. इसलिए अमूमन चुनाव के मौसम में ये गुमनाम रहते हैं और चुनाव के बाद गायब. लेकिन ऐसा नहीं है कि ‘अन्य’ हमेशा हल्के में ही लिए जाते हैं. जब विधानसभा को त्रिशंकु रोग हो जाता है तो ये अन्य ही बड़ी पार्टियों को तारते हैं. इस बार न गुजरात न हिमाचल में ये नौबत आने वाली है.

फिर भी इस बार के ‘अन्य’ खास हैं. क्योंकि दोनों राज्यों में उन्होंने उस पार्टी को हरा कर अपनी सीट पक्की की, जो सरकार बनाने जा रही है – ‘दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी’ भाजपा. इन गुमनाम ‘अन्य’ लोगों के नाम खोज लाए हैं:

गुजरात में जीते ‘अन्य’

1. भूपेंद्रसिंह वेचातभाई खांट 

सीटः मोरवा हडफ

मोरवा हडफ पंचमहल में पड़ता है. आदिवासी ज़िला है. यहां से भूपेंद्रसिंह वेचातभाई खांट ने निर्दलीय पर्चा भरा था. मतों की गिनती के बाद वो भाजपा के विक्रमसिंह रामसिंह डिंडौर से कुल 4,366 वोटों से आगे रहे. भूपेंद्र को 58,513 वोट मिले. विक्रमसिंह डिंडौर का आंकड़ा रहा 54,147. तीसरे नंबर पर भारतीय ट्राइबल पार्टी के दामोदर अल्पेशभाई तेरसिंहभाई 8,246 वोटों के साथ आगे रहे.

2. रतनसिंह राठौड़

सीटः लूनावाड़ा

रतनसिंह राठौड़ भाजपा से पंचायत चुनाव जीत चुके हैं 2015 में.
रतनसिंह राठौड़ भाजपा से पंचायत चुनाव जीत चुके हैं 2015 में.

रतनसिंह राठौड़ को कुल 55,098 वोट मिले. वे दूसरे नंबर पर रहे भाजपा के मनोज पटेल से पूरे 3,200 वोट आगे रहे. इस सीट पर खबर इससे बनी कि एक निर्दलीय जीत गया, और इस बात से भी खबर बनी कि तीसरे नंबर पर रहने वाले कांग्रेस प्रत्याशी परंजयादित्य परमार, कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह के दामाद लगते हैं. राठौड़ पूरी तरह से निर्दलीय नहीं कहे जा सकते. क्योंकि कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया इसीलिए निर्दलीय पर्चा भरा और पार्टी से बर्खास्त हुए. जो भी हो, राठौड़ जो चाहते थे, वो पा चुके हैं.

हिमाचल के ‘अन्य’ विजेता

3. होशियार सिंह

सीटः देहरा

होशियार सिंह मांग करते रहे कि सीट पर विधायक स्थानीय ही होना चाहिए
होशियार सिंह मांग करते रहे कि सीट पर विधायक स्थानीय ही होना चाहिए

भाजपा के वरिष्ठ नेता और मंत्री रहे रविंदर रवि को इस चुनाव में हार मिली है. 24,206 वोट पाकर अव्वल रहे निर्दलीय उम्मीदवार होशियार सिंह जीत गए. दोनों में अंतर रहा 3,914 वोटों का. रविंदर रवि देहरा से सिटिंग एमएलए थे. इस बार भी भाजपा ने टिकट दिया था, पर बात बनी नहीं.

4. प्रकाश राणा

सीटः जोगिंदर नगर

सऊदी अरब से चुनाव लड़ने आए परकाश सिंह राणा
सऊदी अरब से चुनाव लड़ने आए परकाश सिंह राणा

जोगिंदर नगर से निर्दलीय प्रकाश राणा 6,625 मतों के अंतर से भाजपा के गुलाब सिंह ठाकुर से जीत गए हैं. गुलाब सिंह जोगिंदर नगर से सिटिंग एमएलए थे. उन्हें इस बार भी टिकट दिया गया था, क्योंकि जोगिंदर नगर की सियासत में भाजपा के लिए वे बड़ा चेहरा थे और 2017 के चुनाव को इन्होंने अपना आखिरी चुनाव घोषित किया था. इस बार ये सिर्फ विधायक बनने के लिए नहीं, बल्कि मंत्री बनने के लिए वोट मांग रहे थे. PWD मंत्री रहते हुए सड़कें बनवाने की वजह से लोग इन्हें ‘सड़क वाला मंत्री’ कहते थे. लेकिन अब उनकी बनाई सड़कों पर बतौर विधायक चलेंगे प्रकाश राणा.

5. राकेश सिंघा (CPIM)

सीटः ठियोग

राकेश सिंघा विद्या स्टोक्स के भतीजे हैं.
राकेश सिंघा विद्या स्टोक्स के भतीजे हैं.

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस के अलावा हर कोई ‘अन्य’ है. राज्य में CPIM के इकलौते सफल प्रत्याशी राकेश सिंघा को 24,791 वोट मिले. दूसरे नंबर पर रहे राकेश वर्मा को 22,808 वोट मिले. इन दोनों के मुकाबले की नौबत और फिर CPIM की जीत की नौबत इसलिए आई कि हिमाचल में कांग्रेस की कद्दावर नेता विद्या स्टोक्स यहां से चुनाव लड़ नहीं पाईं. राकेश सिंघा विद्या स्टोक्स के भतीजे हैं और उन्होंने विद्या के वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की खूब कोशिश की थी. वहीं भाजपा के राकेश वर्मा ने स्टोक्स के चुनाव न लड़ पाने में खुद की जीत की उम्मीद लगा ली थी. वर्मा तीन बार विधायक रहे चुके हैं. पहली बार 1993 में भाजपा के टिकट पर उन्होंने चुनाव लड़ा था.

राकेश सिंघा को छोड़ दें तो गुजरात और हिमाचल प्रदेश का हर निर्दलीय कैंडिडेट भाजपा को हराकर जीता है. अब ये पढ़ के मोटा भाई को कैसा लग रहा होगा, वो तो आप जानते ही हैं.


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