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गुजरात का वो ज़िला, जहां सत्याग्रह कराके वल्लभ भाई आगे चलकर सरदार पटेल बने

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सरदार पटेल की पैदाइश का जिला है खेड़ा. यहीं है वो नाडियाड, जहां पटेल पैदा हुए थे. तब ये इलाका बॉम्बे प्रेसिडेंसी में आता था. खेड़ा जिला 1997 में गठित हुआ. पहले एक जिला हुआ करता था, कैरा. इसका बंटवारा हुआ और इसमें से दो जिले निकले. दक्षिणी हिस्सा बना आनंद जिला. उत्तरी हिस्सा बना खेड़ा जिला. कैरा जिले में चार तालुका थे- आनंद, बोरसाड, नाडियाड और पेटलाद. जब जिले का बंटवारा हुआ, तब नाडियाड तालुका खेड़ा में मिला दिया गया. बाकी तीनों आनंद के हिस्से गए. और इस तरह सरदार पटेल की जन्मभूमि और पहली कर्मभूमि खेड़ा जिले की पहचान बन गई. कांग्रेस मजबूत मानी जाती है खेड़ा में. कुल छह विधानसभा सीटों में से चार कांग्रेस के पास गई थीं.

आजादी की लड़ाई में खेड़ा का अपना इतिहास है. अपनी विरासत है. खेड़ा का सत्याग्रह तो मशहूर है. चंपारण के बाद जो दूसरा बड़ा सत्याग्रह आंदोलन हुआ, वो खेड़ा में ही हुआ. गांधी जी की शुरुआती सफलताओं में से एक. खेड़ा के किसान बड़ी बुरी हालत में थे. अंग्रेजों को लगान चुकाने की हालत में नहीं थे. एक तो फसल बर्बाद हो गई थी और दूसरी मुश्किल ये कि प्लेग की महामारी फैली थी.

1928 में बारदोली सत्याग्रह के दौरान गांधी जी के साथ सरदार पटेल. इस समय तक पटेल खेड़ा सत्याग्रह कामयाब कराने के लिए गुजरात भर में पहचाने जाने लगे थे.
1928 में बारदोली सत्याग्रह के दौरान गांधी जी के साथ सरदार पटेल. इस समय तक पटेल खेड़ा सत्याग्रह कामयाब कराने के लिए गुजरात भर में पहचाने जाने लगे थे. (विकिमीडिया कॉमन्स)

ऐसे में भी अंग्रेजों ने लगान इतना ऊंचा तय किया हुआ था. फिर गांधी जी ने किसानों का साथ दिया. लगान न देने का आंदोलन शुरू हुआ. प्रेरणा गांधी थे, मगर जमीन पर काम किया सरदार वल्लभभाई पटेल ने. खेड़ा सत्याग्रह किसी एक धर्म या समुदाय का नहीं था. सब शामिल थे इसमें. किसानों ने एक याचिका दायर की. इसमें ब्रितानिया हुकूमत से उस साल का लगान माफ कर देने की अपील की गई थी. सरकार ने उस याचिका को खारिज कर दिया. बल्कि धमकी दी. कहा, अगर लगान नहीं चुकाया तो घर और खेत जब्त कर लेंगे. मगर किसानों ने हिम्मत नहीं हारी. डटे रहे.

ब्रिटिश सरकार ने किसानों की संपत्ति जब्त करने के लिए अपने लोगों को भेजा. जब्ती हुई भी. कई किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया. मगर किसान पीछे नहीं हटे. न हिंसा की. सत्याग्रह चलता रहा. बहुत अनुशासित था ये आंदोलन. कितनी कोशिश की ब्रिटिश सरकार ने, मगर किसानों की एकता नहीं टूटी. जमीन, खेत सब जब्त हो गए उनके, मगर उन्होंने सरदार पटेल का साथ नहीं छोड़ा. खेड़ा के किसानों का संघर्ष बाकी गुजरातियों से अनदेखा नहीं किया गया. वो भी साथ देने लगे.

सरदार पटेल और साथी, खेड़ा सत्याग्रह के दौरान. (फोटोः http://sardarpatel.nvli.in)
सरदार पटेल और साथी, खेड़ा सत्याग्रह के दौरान. (फोटोः http://sardarpatel.nvli.in)

लोग खेड़ा के किसानों की मदद के लिए आगे आने लगे. इसे अखिल भारतीय आंदोलन बनाने की कोशिश भी हुई, मगर गांधी और पटेल ने ऐसा होने नहीं दिया. उनका कहना था कि ये खेड़ा के किसानों की परेशानी है. अगर इसमें बाकी जगहों को शामिल किया, तो ब्रिटिश सरकार जिद्दी रवैया इख्तियार कर लेगी. फिर आंदोलन का जो असर होना चाहिए, वो नहीं होगा. रणनीति कामयाब रही. अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा. समझौता हुआ. उस साल का लगान माफ हुआ. इतना ही नहीं, अगले साल का लगान भी निलंबित कर दिया गया. लगान की दर बढ़ाने का प्रस्ताव भी वापस ले लिया गया. किसानों की जो संपत्ति जब्त की गई थी, वो लौटा दी गई.

खेड़ा में कुल छह विधानसभा सीटें हैं:

कपड़वंज:

2012 के विधानसभा चुनाव में शंकरसिंह वाघेला (बापू) यहां से जीते थे. तब तो वो कांग्रेस में थे. अब बगावत करके निकल चुके हैं. अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं. जन विकल्प मोर्चा. कांग्रेस ने कालूभाई आर डाभी को मौका दिया है. वहीं बीजेपी ने कनूभाई भूलाभाई डाभी को टिकट दिया है. वाघेला की पार्टी 100 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. मगर इस सीट पर उन्होंने कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है. इसकी वजह हैं बिमल शाह. बिमल शाह निर्दलीय लड़ रहे हैं. जब बीजेपी ने कानू डाभी को टिकट दिया, तो उन्होंने बगावत कर दी. पार्टी छोड़ दी.

मेहसाणा के आत्माराम पटेल ने शंकर सिंह वाघेला को उन्ही के दांव से चित्त किया
शंकर सिंह वाघेला (बाएं से दूसरे) कपड़वंज से चुनाव लड़ते थे. लेकिन अपनी पार्टी का कैडिडेट उन्होंने यहां से नहीं उतारा है. 

ये जो कानू भाई हैं, उनको वाघेला ने पिछले चुनाव में हराया था. 2012 में भी विमल शाह ने बीजेपी छोड़ा था. वो केशुभाई पटेल की गुजरात परिवर्तन पार्टी में शामिल हो गए. फिर मार्च 2014 में वापस बीजेपी आ गए. तो उनका ये अंदर-बाहर, अंदर-बाहर चल ही रहा है. वो केशुभाई पटेल के वफादार माने जाते हैं. पूर्व बीजेपी मंत्री भी रहे हैं. वाघेला ने उनको जितवाने के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया यहां, जबकि पिछली बार वो खुद जीते थे यहां.

कपड़वंज की कुल आबादी में करीब 45 फीसद आबादी क्षत्रियों की है. ये वाघेला की मजबूत पकड़ वाले इलाकों में गिनी जाती है. तभी तो लोगों को उम्मीद थी कि या तो वो खुद, या फिर उनका बेटा महेंद्र यहां से खड़े होंगे. वाघेला ने खुलकर कहा भी कि वो विमल शाह को समर्थन दे रहे हैं.

मातर:

2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के देवुसिंह जेसिंहभाई चौहान जीते थे. फिर 13 सितंबर, 2014 को यहां उपचुनाव हुए. इसमें केसरीसिंह जेसंगभाई सोलंकी ने जीत हासिल की. बीजेपी ने इस बार भी उनको ही टिकट दिया है. कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं संजयभाई एच पटेल.

महुधा:

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नटवरसिंह फूलसिंह ठाकोर जीते थे यहां से. वो 2007 में भी जीते थे इस सीट पर. इस बार कांग्रेस ने इंद्रजीतसिंह नटवरसिंह ठाकोर को टिकट दिया है. ये विधायक नटवरसिंह फूलसिंह ठाकोर के बेटे हैं. इसी बात पर नाराज होकर कांग्रेस के एक बड़े स्थानीय नेता भरतसिंह परमार तीन महीने पहले पार्टी छोड़कर बीजेपी में चले गए. बीजेपी ने उनको ही मैदान में उतारा है. अमितशाह उनके लिए रैली करने भी आए थे. महुधा में बहुत गांववालों को अब तक नहीं पता कि भरतसिंह कांग्रेस छोड़ चुके हैं. उनको लगता है कि अब भी वो कांग्रेस में ही हैं. वैसे नटवरसिंह की पकड़ तो है यहां.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह 26 नवंबर को अमहदाबाद में मन की बात, चाय के साथ कार्यक्रम में शामिल हुए थे.
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भरतसिंह परमार के लिए प्रचार करने महुधा आ चुके हैं, लेकिन इसका खास फर्क पड़ने की उम्मीद नहीं है.

नाडियाड:

2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पंकज वीनुभाई (गोटियो) देसाई ने सीट हासिल की थी. इस बार भी बीजेपी ने उन्हें ही उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस ने जितेंद्र एस पटेल को टिकट दिया है.

मेहमेदाबाद:

2012 के चुनाव में कांग्रेस के गौतमभाई राजीवभाई चौहान ने मेहमेदाबाद की सीट निकाली थी. इस बार भी कांग्रेस ने उनको ही मौका दिया है. बीजेपी ने उनके खिलाफ अर्जुनसिंह चौहान को उतारा है.

ठासरा:

2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के रामसिंह प्रभातसिंह परमार को कामयाबी मिली थी. रामसिंह परमार पहले कांग्रेस में थे. अब बीजेपी में हैं. अमूल के अध्यक्ष भी हैं. बीजेपी ने उनको टिकट दिया है. कांग्रेस ने कांतिभाई शाभाईभाई परमार को उनके खिलाफ उतारा है.

इस साल अगस्त में हुए राज्यसभा चुनाव से पहले जो भी कांग्रेस विधायक बीजेपी में शामिल हुआ और उसे इस चुनाव में बीजेपी ने टिकट दिया, उन सबके खिलाफ वाघेला ने अपने प्रत्याशी नहीं उतारे हैं. फिर चाहे ठासरा से लड़ रहे रामसिंह परमार हों, या फिर बालासिनोर से लड़ रहे मानसिंह चौहान हों. कई बड़े बीजेपी नेताओं के खिलाफ भी वाघेला ने अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है. उनका कहना है कि कुछ उम्मीदवारों के साथ निजी तौर पर उनके अच्छे संबंध हैं, सो उनके खिलाफ नहीं लड़ सकते वो.

फागवेल का भाथीजी मंदिर. ये गुजरात में ओबीसी राजनीति का केंद्र है. (फोटोः विकिमीडिया कॉमन्स)
फागवेल का भाथीजी मंदिर. ये गुजरात में ओबीसी राजनीति का केंद्र है. (फोटोः विकिमीडिया कॉमन्स)

फागवेल का मंदिर और ओबीसी राजनीति

यहां एक मंदिर है. फागवेल का भाथी जी मंदिर. ओबीसी वर्ग की राजनीति का अखाड़ा मानते हैं इस मंदिर को. पूरा समाजवाद है. चुनाव से पहले हर पार्टी के नेता यहां सिर टेकने आते हैं. यहां भाथी जी की मूर्ति है. घोड़े पर सवार, हाथ में तलवार. शंकरसिंह वाघेला बिल्कुल ऐसे ही तैयार होकर, माने घोड़े पर बैठकर और हाथ में तलवार थामे पहुंचते हैं यहां. हर चुनाव से पहले. अपनी नई पार्टी की घोषणा करने से पहले भी आए थे यहां.

रणछोड़जी मंदिर

खेड़ा में एक जगह है डाकोर. यहां रणछोड़जी मंदिर है. राहुल गांधी गुजरात में जिन मंदिरों के अंदर गए, उनमें से एक मंदिर ये भी है. सुना है जब वो पूजा-पाठ खत्म करके बाहर निकले, तो बीजेपी समर्थक ‘मोदी-मोदी’ चिल्लाने लगे. ये पहली बार था कि राहुल मंदिर में थे और वहां भी लोग ऐसे नारेबाजी करने पहुंच गए.

खेड़ा की राजनीति
कांग्रेस यहां पारंपरिक तौर पर मजबूत रही है. मगर उसके कई बड़े स्थानीय नेता साथ छोड़कर चले गए हैं. सो कांग्रेस इस बार मुश्किल में दिख रही है. जो चार सीटें उसने पिछले बार जीती थीं, उनमें से दो विधायक- शंकरसिंह वाघेला (कापड़वंज) और रामसिंह परमार (ठासरा) पार्टी छोड़कर जा चुके हैं. खेड़ा के किसान अपेक्षाकृत संपन्न हैं. किसानों के बीच कांग्रेस खासी लोकप्रिय है. उनका कहना है कि कांग्रेस ने उनके लिए काम किया है.

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ये जो खेड़ा है, वो चरोतर इलाके का हिस्सा है. खेड़ा और आणंद, दोनों इस इलाके में गिने जाते हैं. चरोतर पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी का घर है. KHAM वाले फॉर्म्युला को लाकर कांग्रेस का बंटाधार करने वाले सोलंकी को गुजरात राजनीति कभी नहीं भूल सकती. हालांकि इसी गणित के कारण 1985 में कांग्रेस ने 182 में से 149 सीटें जीती थीं. ये ऐसा रिकॉर्ड है, जिसे कोई तोड़ नहीं पाया अबतक. चरोतर में पाटीदार और क्षत्रिय-ठाकोर की खासी तादाद है. खेड़ा की OBC आबादी को रिझाने के लिए कांग्रेस के अल्पेश ठाकोर ने एक रैली भी की थी यहां. सेवालिया गांव में. करीब 6,000 लोग मौजूद थे. अल्पेश ने अपनी रैली में कहा कि जीतू वघानी कहते हैं कि शराब और चखना देकर क्षत्रियों और ठाकुरों को खरीदा जा सकता है. जिस दिन अल्पेश की रैली थी, उसी दिन अमित शाह की भी रैली थी.

बड़ी संख्या में खेड़ा के पाटीदार विदेशों में रहते हैं. हार्दिक ने जब पाटीदार आंदोलन किया, तो गुजरात के कई इलाकों के NRI पाटीदार भारत आए. समर्थन के लिए. मगर खेड़ा के NRI पाटीदार बहुत कम ही आए. हार्दिक का असर बहुत कम है यहां. पाटीदार कहते हैं कि उन्होंने हार्दिक को यहां नहीं आने दिया था. लोग कहते हैं कि उनके परिवारवाले विदेशों में रहते हैं, सो उन्हें दंगा-फसाद नहीं चाहिए. अब चूंकि हार्दिक कांग्रेस के साथ हैं, तो शायद इसका नुकसान हो सकता है कांग्रेस को. ऐसे में हो सकता है कि अल्पेश ठाकोर का असर कांग्रेस को बचाए.


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