Submit your post

Follow Us

सरकारी रेट की दुकान और एक अंगुली के 2600 रुपए

4
शेयर्स

धरमपाल पालमपुर के पास एक गांव के रहने वाले हैं. 1959 में उन्होंने आईटीआई नुमा एक ट्रेनिंग ली. दो साल की. उस दौरान लकड़ी काटना सीखा. फिर उन्हें काम मिल गया. पालमपुर में खुली सरकारी फैक्ट्री में. हैंडिक्राफ्ट डिपार्टमेंट के तहत ये फैक्ट्री चलती थी. अभी भी चलती है. मगर थी और है के बीच में एक कहानी है. जो आपको सुनानी है. चुनावी शोर के बीच.

इस सत्य कथा का पहला सिरा हमें धर्मशाला में मिला. वहां हैंडिक्राफ्ट के सरकारी शोरूम में एक शीशे के पीछे से कई जोड़ी आंखें हमें निहार रही थीं. ये लकड़ी से बने गुड्डा-गुड़िया थे. हिमाचली आदमी और औरत. अपने पारंपरिक लिबास में. दोनों अपनी पीठ पर एक डोलची टांगे. बड़ी सी. उसमें ऊपर तक सेब भरे. किसी भी नई जगह जाओ तो वहां की चिन्हारी ले आओ, ऐसा आग्रह रहता है. तो अपने राम ने ये जोड़ा पसंद कर लिया. दाम 300 रुपये. पैकिंग में पीछे की तरफ एक स्टीकर चिपका था. टॉय सेंटर, पालमपुर. बड़ा उत्साह मिश्रित अचरज हुआ. आज भी खिलौना फैक्ट्री चल रही है, जहां लकड़ी के खिलौने बनाए जा रहे हैं. ये तो कमाल जगह होगी. ऐसा सोच डायरी में लिखा. जब पालमपुर जाऊंगा तो पॉलिटिक्स के बीच से वक्त निकाल यहां भी जाऊंगा.

टॉय सेंटर, पालमपुर के बाहर अनाथ की तरह पड़ा बोर्ड
टॉय सेंटर, पालमपुर के बाहर अनाथ की तरह पड़ा बोर्ड

गया तो देखा एक बेहद जर्जर दो तल्ला इमारत. सीलिंग से सरिया मुंह दिखाई कर रही. सब तरफ मकड़ी के जाले, टूटे खिड़की-दरवाजे. बीच में गांधी जी का एक जंग खाया टिन का पोस्टर, दीवार पर ठोका गया. ग्राहक भगवान है. एक गलियारा, जिसका पहला कमरा स्टोर रूम है. यहां भी वैसा ही बेहाल आलम. एक अलमारी में बने अधबने खिलौने रखे. वहीं बोरियों में सिले कांगड़ा चाय के गत्ते भी. ये भी सरकारी खरीद. आगे के कमरों में मेज-कुर्सी. एक चपरासी. एक सहायक. बाकी दो सरकारी दौरे पर गए थे. हमीरपुर में एक वर्कशॉप चल रही थी वहीं. इन चारों का सरकारी काम, लिखा-पढ़ी और आवभगत का.

असली काम तो करते हैं वो कारीगर, जो खिलौने बनाते हैं. मगर कारीगर तो हैं ही नहीं. ठहरिए. एक हैं. जो कुछ बरस पहले रिटायर हो गए. फिर कुछ बरस बाद दोबारा कॉन्ट्रैक्ट पर बुला लिए गए. उनका नाम है धरमपाल. इसके अलावा जो एक सहायक हैं, वह हैं देशराज. धरमपाल और देशराज के साथ हमने ये फैक्ट्री देखी. आप भी देखिए.

टॉय सेंटर के अंदर वक्त जाने कब ठहर गया था
टॉय सेंटर के अंदर वक्त जाने कब ठहर गया था

एक बड़ा सा हॉल है. जो एक छोटे हॉल में खुलता है. और ये छोटा हॉल एक और छोटे कमरे में. सबमें लकड़ी की कटाई, छंटाई के औजार लगे हैं. जो सप्ताह में एक आध बार चलते होंगे. बिजली के बोर्ड उखड़े हैं और स्विच अपनी ढक्की खो चुके हैं. बुरादे का ढेर है. आखिरी तक पहुंचते पहुंचते कुछ देसी शराब की बोतलें भी. देशराज जी ने बताया कि बगल के खुले इलाके में रात में लोगों का जमावड़ा लगता है, वही फेंक जाते हैं.

वर्कशॉप के अंदर भी चीजें फेंके हुए अंदाज में ही पड़ी हैं. पुराना फर्नीचर. अब नया नहीं बनता. क्यों. क्योंकि अब सरकारें सरकारी फैक्ट्री को ऑर्डर नहीं देतीं. बाहर बाजार से खरीद लेती हैं. और इस तरह बिना डिमांड के सप्लाई नहीं होती. फिर सप्लाई करने वाला तंत्र बुरादे में बदलने लगता है. कुछ पुराने स्टूल पड़े दिखे. जो बनावट में सुंदर थे और दाम में सस्ते. पर सस्ता होना अब काफी नहीं. अगर उसकी सही ब्रैंडिंग और सप्लाई न हो.

धरमपाल जी की कटी उंगली. इसके बदले उन्हें 2600 रुपए मिले
धरमपाल जी की कटी उंगली. इसके बदले उन्हें 2600 रुपए मिले

सबसे बड़ा झटका अभी हमारा इंतजार कर रहा था. एक सबक, जो रिपोर्टिंग के बरसों बरस बाद भी याद रहेगा. हमारे कैमरे को देख और देशराज जी के कहने पर धरमपाल जी खिलौना बनाकर दिखाने लगे. लकड़ी का एक सपाट टुकड़ा लैथ मशीन में फंसा दिया गया. कैमरा उनकी करतब कैद करने लगा. तेजी से घूमता टुकड़ा. उस पर एक शार्प ब्लेड चला तरतीबी, गोलाई देते धरमपाल जी. और तभी कैमरे की तेज और वर्कशॉप की डिम रोशनी के बीच मेरी नजर धरमपाल जी के हाथों पर गई. उनके दाएं हाथ की एक उंगली गायब थी. मशीन रुकवाई और इसके बारे में पूछा. बताया, कि यहीं काम करते हुए कट गई थी. सरकार ने 2600 रुपये मुआवजा दिया था.

उनके हाथ पर अपना हाथ रख दिया. सख्ती मापने के लिए. पर ये बीच में ही ठिठक गया. क्योंकि अभ्यासवश उनका दूसरा हाथ भी हथेली को बराबर ला चुका था. रंदाई में दोनों हाथ काम करते हैं, यहां भी दोनों हाथ सामने थे. दूसरे हाथ की भी एक उंगली गायब थी. ये कैसे कटी. आरी पर लकड़ी काटते वक्त. यहीं वर्कशॉप में. इसका भी 2600 रुपये मुआवजा मिला क्या. नहीं, इसके बदले मिली एक फाइल और थोड़ा सा इलाज. दरअसल दूसरी दुर्घटना में एक उंगली और एक अंगूठा गया था. अंगूठा डॉक्टरों ने जोड़ दिया. उंगली बुरादे के ढेर में नहीं मिली. जब तक मिली, जोड़ने लायक नहीं रही. ये किसी की प्राथमिकता में नहीं था. तब भी. अब भी. और वो फाइल. दशकों बीत गए. धरमपाल जी रिटायर होकर फिर काम पर लौट गए. मगर फाइल अभी तक चल रही है. जैसे सरकार चल रही है. जैसे लोकतंत्र चल रहा है. जैसे विकास चल रहा है.

धरमपाल जी उसी फैक्ट्री में कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे हैं, जहां वो कभी पक्की नौकरी पर थे, जहां उनकी उंगली कटी थी
धरमपाल जी उसी फैक्ट्री में कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे हैं, जहां वो कभी पक्की नौकरी पर थे, जहां उनकी उंगली कटी थी

धरमपाल जी की उंगली देख बीच रेकॉर्डिंग शब्द कटने लगे. सूझ ही नहीं रहा था क्या बोलूं. वो खुद ही बोल पड़े. बहुत जगह पूछा साहब, बस यही कहते हैं कि देखते हैं, मामला आगे बढ़ रहा है. देशराज जी के पास भी इसकी कोई सफाई नहीं थी. और हो भी क्यों. वह तो महज सहायक भर हैं. जिनके पास सफाई होगी, उनके पास एक कतार होगी. कि ये पिछला मामला है. कि देखते हैं. कि देख रहे हैं. यही वो बार-बार धरमपाल जी से बोलते हैं.

धरमपाल जी की तरह इस फैक्ट्री की उंगली भी सरकारी लापरवाही ने काट दी. शिमला में बैठे अफसरान अपने रंग रोगन में व्यस्त हैं. मंत्रालय कैलेंडर में हैंडिक्राफ्ट के नमूने दिखा खुश है. यहां एक फैक्ट्री है, जो तिल-तिल मर चुकी है. मगर जिसे सर्टिफिकेट नहीं दिया गया. क्योंकि सरकार ने उसे मरा नहीं माना. इसीलिए चार सरकारी कारिंदे उसकी हिफाजत और निगरानी के लिए लगा रखे हैं.

फैक्ट्री के बारे में बताते देशराज. धरमपाल साथ में खड़े हैं
फैक्ट्री के बारे में बताते देशराज. धरमपाल साथ में खड़े हैं

बाकी शहर का क्या है. खूब तरक्की हुई. आगे भी होगी. शांता कुमार ने बीजेपी काल में विकास किया. बुटेल परिवार ने कांग्रेस काल में. ऐसा दोनों के समर्थक कहते हैं. कुछ दिखते हैं. कुछ नहीं दिखते.

और ये फैक्ट्री, इसके बारे में शहर की नई पीढ़ी को नहीं पता. नए लोग यहां नहीं आते. नए कारीगर वर्कशॉप में नहीं आते. नए खरीदार नहीं आते. नए सप्लायर नहीं आते. यहां सब कुछ पुराना है. यहां सब कुछ कटी उंगली की खाली जगह सा है.


हिमाचल चुनाव कवरेज का लल्लनटॉप वीडियो देखें- 

और पढ़ेंः

धर्मशाला बनेगी किसकी शाला इस बार

हिमाचल प्रदेश में शाम को बाज़ार जाने का जिम्मा महिलाओं के पास क्यों है?

तीन विधानसभाओं का हाल, बतकही के अंदाज में

हिमाचल के 3 पॉलिटिकल किस्से, जो आपको किसी किताब-मैगजीन में नहीं मिलेंगे

हिमाचल, जहां सरकारी कर्मचारियों का सरकार के खिलाफ बोलना ‘महापाप’ है

ऊना रिपोर्ट: जहां भाजपा के CM कैंडिडेट ही भाजपा अध्यक्ष का कद छांट रहे हैं

 

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें
Himachal Pradesh Elections : Report of a handicraft factory and its labors in Palampur

गुजरात चुनाव 2017

गुजरात और हिमाचल में सबसे बड़ी और जान अटका देने वाली जीतों के बारे में सुना?

एक-एक वोट कितना कीमती होता है, कोई इन प्रत्याशियों से पूछे.

गुजरात विधानसभा चुनाव के चार निष्कर्ष

बहुमत हासिल करने के बावजूद चुनाव के नतीजों से बीजेपी अंदर ही अंदर सकते में है.

गुजरात में AAP का क्या हुआ, जो 33 सीटों पर लड़ी थी!

अरविंद केजरीवाल का गुजरात में जादू चला या नहीं?

गुजरात चुनाव के बाद सुशील मोदी को खुला खत

चुनाव के नतीजे आने के बाद भी लिचड़ई नहीं छोड़ रहे.

इस चुनाव में राहुल और हार्दिक से ज्यादा अफसोस इन सात लोगों को हुआ है

इन लोगों ने थोड़ी मेहनत और की होती, तो ये गुजरात की विधानसभा में बैठने की तैयारी कर रहे होते.

राहुल गांधी ने चुनाव में हार के बाद ये 8 बातें बोली हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क्रेडिबिलिटी पर ही सवाल खड़े कर दिए.

गुजरात में हारे कांग्रेस के वो बड़े नेता जिन पर राहुल गांधी को बहुत भरोसा था

इनके बारे में कांग्रेस पार्टी ने बड़े-बड़े प्लान बनाए होंगे.

बीजेपी के वो 8 बड़े नेता जो गुजरात चुनाव में हार गए

इनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाएं और तमाम टोटके नहीं जिता सके.

पीएम नरेंद्र मोदी ने गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जीत के बाद ये 5 बातें कहीं

दोनों प्रदेशों में भगवा लहराया मगर गुजरात की जीत पर भावुक दिखे पीएम.

ये सीट जीतकर कांग्रेस ने शंकरसिंह वाघेला से बदला ले लिया है

वाघेला ने इस सीट पर एक निर्दलीय प्रतायशी को वॉकओवर दिया था.