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हिमाचल में बीजेपी के सीएम कैंडिडेट धूमल की हार में इन दो नेताओं की जीत छिपी है

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पहले कैंडिडेट

जयराम ठाकुर
सीट- सेराज
जिला- मंडी

प्रेमकुमार धूमल के सुजानपुर की सीट पर हारने के बाद हिमाचल में असल राजनीति खुलकर सामने आ रही है. मंडी की सेराज वेली से विधायक या यूं कहा जाए कि 5 बार के विधायक जयराम अचानक उभरा वो चेहरा है जिसे मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे आगे माना जा रहा है. जहां बीजेपी के कई बड़े नाम हार गए, जयराम ने 11,254 मतों से जीत हासिल की है. धूमल न सिर्फ अपनी सीट हारे, उनके करीबी गुलाब सिंह ठाकुर, रविंदर सिंह रवि, पार्टी प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती, रंधीर शर्मा, केएल ठाकुर और विजय अग्निहोत्री भी हार गए. अब जानते हैं वो बातें जो जयराम को मुख्यमंत्री बना सकती हैंः

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मंडी में कांग्रेस को कमजोर करने में जयराम का बड़ा रोल है. मंडी में रैली के दौरान स्मृति ईरानी के साथ.

1. धूमल का विकल्प – हिमाचल में अभी तक के मुख्यमंत्रियों का इतिहास देखें तो ठाकुर चेहरे ही दिखेगें. पहले मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार से लेकर ठाकुर रामलाल, वीरभद्र सिंह, प्रेमकुमार धूमल तक राजपूत नेता इस गद्दी पर बैठे हैं. बस एक बार शांता कुमार के रूप में बदलाव 1990 में देखा गया था. वो ब्राह्मण समुदाय से आते हैं. हिमाचल की अभी तक की राजनीति इन्हीं दो जाति समूहों के इर्द-गिर्द घूमती है. जबकि ओबीसी का भी हिमाचल में काफी तादाद है. इस लिहाज से जयराम ठाकुर बीजेपी के लिए प्रेमकुमार धूमल का विकल्प हो सकते हैं. यही नहीं, मंडी की 10 सीटों में से बीजेपी ने 9 सीटें जीती हैं और इसका क्रेडिट जयराम को भी दिया जा रहा है.

2. संघ के करीबी – बीजेपी के पास हिमाचल में बहुमत का आंकड़ा है. ऐसे में मुख्यमंत्री पद के दावेदार का नाम संघ के दफ्तर से ही पास होता है. इस लिहाज से भी जयराम का रेज्यूमे काफी मजबूत लगता है. छात्र राजनीति में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP)का झंडा बुलंद करने वाले जयराम के रेज्यूमे में श्रीनगर के लाल चौक पर ABVP की रैली कराने की उपलब्धि भी लिखी हुई है. तब वे जम्मू कश्मीर में इस छात्र संगठन के प्रभारी थे. 15 अगस्त 1992 को लाल चौक पर झंडा फहराने के लिए मुरली मनोहर जोशी समेत नरेंद्र मोदी और कई दूसरे नेता लाल चौक पहुंचे थे. इस तरह संघ से भी जयराम की नज़दीकियां बनी रही और वे संघ की तरफ से मुख्यमंत्री पद के लिए काबिल नेता माने जा रहे हैं.

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ABVP और संघ के लिए काफी काम किया है.

3. संगठन और सरकार का एक्सपीरियंस – 1993 से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाले इस नेता ने मंडी में भाजपा को मजबूत किया और कद्दावर कांग्रेसी करम सिंह की पकड़ को खत्म किया. 6 जनवरी 1965 को जन्मे जयराम ने 2013 में मंडी सीट पर लोकसभा का उपचुनाव भी लड़ा था जिसमें प्रतिभा सिंह जीती थीं. 1998 से लेकर 2017 तक 5 बार विधायकी जीत चुके हैं. वहीं 2007-2009 तक स्टेट बीजेपी चीफ की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं. 2007 में धूमल सरकार में जयराम को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था. उस समय इस नेता ने ग्रामीण विकास विभाग संभाला था. इस चुनाव में जब अमित शाह मंडी में रैली के लिए आए थे तो अपने भाषण में कहा था कि जयराम को मुख्यमंत्री के बगल वाली सीट पर बिठाएंगे. अब इस बयान का यही मतलब निकाला जा रहा है कि शाह जयराम को बड़ी जिम्मेदारी देने का पहले ही मन बना चुके थे.

दूसरे कैंडिडेट

जगत प्रकाश नड्डा
बिलासपुर
केंद्रीय स्वास्थय मंत्री

1. नड्डा और धूमल के बीच शीत युद्ध – हिमाचल में चुनाव से पहले ये हवा बन रही थी कि धूमल मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा का चेहरा नहीं होंगे. इस बीच बिलासपुर से जेपी नड्डा का नाम राजनीतिक गलियारों में घूमने लगा था. कहा जाने लगा था कि इस केंद्रीय मंत्री को वापिस हिमाचल बुलाया जाएगा. नड्डा की पत्नी मल्लिका नड्डा ने खुद एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि भाजपा को जिताइए और नड्डा जी को शिमला वापस लाइए. ऐसे में जब भाजपा को ग्राउंड लेवल पर ये पता चला कि धूमल के नाम की घोषणा न होने से नुकसान होगा, तो चुनाव से एकदम पहले धूमल के नाम की घोषणा कर दी. धूमल की लीडरशिप में पार्टी तो 44 सीटें जीत गई मगर खुद धूमल हार गए. ये हिमाचल की राजनीति में सबसे चौंकाने वाली घटना है. जानकार बता रहे हैं कि धूमल को हराने की स्क्रिप्ट दिल्ली से लिखी गई थी. उनकी सीट सुजानपुर केंद्रीय नेतृत्व का फैसला था जिसके पीछे नड्डा का बड़ा हाथ था. अब जो भी हो धूमल हार गए हैं और नड्डा का नाम वापिस मुख्यमंत्री पद के लिए उछल गया है.

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धूमल और नड्डा में चुनाव से पहले से गेम चल रहा है.

2. बीजेपी का लोअर हिमाचल प्रेम – इस पहाड़ी प्रदेश की राजनीति, अपर हिमाचल और लोअर हिमाचल के बीच में घटती दिखी है. कांग्रेस के अब तक के सभी मुख्यमंत्री अपर हिमाचल यानी शिमला के आसपास के रहे हैं. वहीं भाजपा की सरकार में मुख्यमंत्री के लिए नए हिमाचल को तरजीह दी जाती रही है. शांता कुमार इसके पहले उदाहरण हैं. उनके बाद धूमल भी इस रीजन से आते हैं. अब अगर नया चेहरा लाना है तो बीजेपी बिलासपुर के नड्डा को लाना चाहेगी. जानकार ये भी बताते हैं कि मुख्यमंत्री पद के लिए नड्डा का नाम जयराम ठाकुर से काफी आगे है. वो यूं कि जयराम जिस इलाके से आते हैं वो भी अपर हिमाचल का ही हिस्सा माना जाता है. एक और फैक्टर जो नड्डा के फेवर में है वो ये कि नड्डा बीजेपी का ब्राह्मण चेहरा हैं. यहां की राजनीति ब्राह्मणों और राजपूतों के आसपास ही घूमती रही है. बीजेपी के इसी प्रेम के चलते सिरमौर के नाहन से विधायक और 5वीं बार चुनाव जीत रहे राजीव बिंदल को भी मुख्यमंत्री पद की रेस से बाहर ही बताया जा रहा है.

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मोदी और शाह दोनों के करीबी हैं नड्डा.

3. पीएमओ के करीबी हैं नड्डा – प्रधानमंत्री मोदी की कैबिनेट में बतौर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री नड्डा की टॉप लीडरशिप के साथ अच्छी सेटिंग है. साथ ही हिमाचल से भी जुड़ाव कायम रखा है. 1993 से 1998, 1998 से 2003 और 2007 से 2012 तक हिमाचल असेंबली में रहे नड्डा के पास स्टेट में काम करने का अनुभव भी है. इस चुनाव में भी नड्डा ने कई रैलियां कीं और सक्रियता के साथ हिमाचल में भाजपा के कैंपेन को जारी रखा. नड्डा को यूं तो हिमाचल में काम करने का एक्सपीरियंस है, मगर हिमाचल में उनकी वो स्वीकार्यता नहीं है जो शांता और धूमल की रही है. एक फैक्टर ये भी है कि सुजानपुर से धूमल, ऊना से सतपाल सिंह सत्ती, देहरा से रविंद्र रवि और मंडी से गुलाब सिंह ठाकुर जैसे बीजेपी के बड़े चेहरों के चुनाव हारने से नड्डा के लिए रास्ते खुलते दिख रहे हैं.

वीडियो देखेंः


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