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हरियाणा के उन 7 निर्दलीय विधायकों की कहानी, जिनकी कृपा से BJP सरकार बन रही

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24 अक्टूबर को हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के रिजल्ट आए. मगर जनता की नजर आकर टिक गई हरियाणा पर. कारण गेंद न इस पाले में गिरी न उस पाले में. हंग एसेंबली. बीजेपी 40 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी मगर बहुमत के लिए 6 और विधायकों की जरूरत थी. ये जरूरत पूरी की हरियाणा में चुनके आए 7 निर्दलीय विधायकों ने. 24 अक्टूबर को दिनभर बात होती रही कि दुष्यंत होंगे किंगमेकर. मगर असल किंगमेकर ये 7 विधायक साबित हुए. धनतेरस में सच्ची-मुच्ची में देखा जाए तो इन्हीं की लॉटरी निकली है.

1. धर्मपाल गोंडर

कहां से जीते – नीलोखेरी विधानसभा, करनाल

रिजल्ट – करीब 2 हजार वोटों से जीते.

धर्मपाल गोंडर – 42879 वोट
भगवानदास, बीजेपी – 40631 वोट
बंटा राम, कांग्रेस – 19692 वोट

dharampal

कौन हैं – कृषि विभाग में ड्राफ्ट मैन के पद पर नौकरी करने वाले धर्मपाल गोंडर 2004 में नौकरी छोड़ भाजपा से जुड़े थे. बीस साल तक नौकरी करने के बाद नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी और बिजेनस शुरू किया. 2009 में भाजपा ने उन्हें नीलोखेड़ी से टिकट दिया मगर वो हार गए. मात्र 5700 वोट मिले. 2010 से 2015 तक वो भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश सचिव रहे. 62 साल के गोंडर अनुसूचित मोर्चा के प्रदेश कार्यकारणी के सदस्य रहे.

क्यों जीते – नीलोखेरी विधानसभा आरक्षित सीट है. यहां से 2014 में बीजेपी के भगवानदास ने जीत दर्ज की थी. इस बार के चुनाव में भगवानदास के साथ धर्मपाल गोंडर ने भी पार्टी से टिकट की दावेदारी पेश की. लेकिन पार्टी के सीनियर नेताओं ने पिछली बार जीतने वाले भगवानदास पर ही भरोसा जताया. कार्यकर्ताओं का साथ गोंडर के साथ था. सो उन्होंने नामांकन के आखिरी दिन प्रक्रिया खत्म होने के दो घंटे पहले नामांकन कर दिया. नतीजा वो वो भगवानदास को पिछाड़ते हुए जीते.

2. बलराज कुंडू

कहां से जीते – मेहम विधानसभा, रोहतक

रिजल्ट – करीब 12000 वोटों से जीते

बलराज कुंडू – 49324
आनंद दांगी, कांग्रेस – 37086
शमशेर सिंह, बीजेपी – 35911

balraj

कौन हैं – 48 साल के बलराज कुंडू भी बीजेपी के नेता थे. प्रदेश के बड़े ठेकेदारों में गिनती होती है. राजनीति में 2014 के आसपास सक्रिय हुए. तब टिकट मांगी नहीं मिली. इसके जिला परिषद के चेयरमैन बन गए. बीजेपी से टिकट की उम्मीद में उन्होंने जिला परिषद से इस्तीफा दिया था. दरअसल बीजेपी ने साफ कर दिया था कि वो किसी जिला परिषद चेयरमैन को टिकट नहीं देगी. सो वो इस्तीफा देकर बैठे थे. टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय ही पर्चा भर दिया.

क्यों जीते – बलराज कुंडू ने जिला परिषद में रहते हुए काफी काम करवाया. सरकार से जुड़े लोगों के काम करवाए. पांच साल सक्रिय रहे. विधायकी की तैयारी काफी समय से थी. सामाजिक क्षेत्र में उन्होंने कुछ ऐसे काम किए जिनसे गांवों में बड़ा संदेश गया. जैसे 12 बसें गांव की बच्चियों को स्कूले ले जाने-छोड़ने के लिए बसें चलाईं. इससे उन परिवारों को अपने साथ जोड़ा. इसके अलावा दो कोचिंग सेंटर चलवाए जहां आधार कार्ड में मेहम का एड्रेस दिखाके कोई भी मुफ्त पढ़ सकता है. खिलाड़ियों की आर्थिक मदद की. इसके अलावा कुंडू का गांव कलानौर में पड़ता है मगर वो अठगांवां गांव के अंतर्गत आता है. अठगांवां मतलब आठ गांवों का समूह. जिनमें आपस में बड़ी एकता है तो इसका भी कुंडू को फायदा मिला.

एक मजेदार बात ये है कि आनंद सिंह दांगी पहली बार 1989 में पंचायती उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे थे और 1990 में हुए उपचुनाव में उन्होंने ओमप्रकाश चौटाला को हराया था. 30 वर्ष बाद अब बलराज कुंडू पंचायती उम्मीदवार के तौर पर उतरे और कभी पंचायती उम्मीदवार रहे दांगी को हराया. वहीं, भाजपा प्रत्याशी शमशेर खरकड़ा की यह लगातार चौथी हार है.

3. सोमबीर सांगवान

कहां से जीते – दादरी विधानसभा, चरखी दादरी

रिजल्ट- करीब 14 हजार वोटों से जीते.

सोमबीर – 43589
सतपाल सांगवान, जेजेपी – 29319
बबीता, बीजेपी – 24502

sombir

कौन हैं – 52 साल के सोमबीर सिंह सांगवान दादरी और आसपास प्रभाव रखने वाली सांगवान खाप के प्रधान हैं. 40 गांव पर इसका असर है. राजनीतिक तौर पर वो बीजेपी के नेता हैं. 2014 में इस सीट से वो ही बीजेपी के विधायक प्रत्याशी थे. मात्र 1600 वोटों से हारे थे. 2009 में भी वो इसी सीट से निर्दलीय लड़े थे. तब भी हारे थे. इस बार उनका टिकट काट बीजेपी ने दंगल गर्ल बबीता फोगाट को दे दिया. नाराज होकर सोमबीर सिंह ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा.

क्यों जीते – सोमबीर भले ही 2014 में चुनाव हार गए. मगर वो 5 साल लोगों के बीच एक्टिव रहे. सरकार से जुड़े लोगों के काम करवाते रहे. दादरी को जिला बनवाने से लेकर जिले में सरकारी कामों को करवाने में उनकी प्रमुख भूमिका रही. लोगों में उनके प्रति सहानुभूति भी थी. अचानक से बबीता के आने से ये सहानुभूति और बढ़ गई. बबीता को लोग नया और बाहर का बता रहे थे. बीजेपी के कार्यकर्ता भी बबीता के साथ नहीं दिखे. बल्कि तमाम बीजेपी कार्यकर्ताओं ने ही सोमबीर को लड़ने के लिए तैयार किया. सीट पर सांगवान वोटों का भी वर्चस्व है. सांगवान खाप भी सोमबीर के साथ नजर आई. नतीजा बबीता तीसरे नंबर पर खिसक गईं. खास बात ये है कि दादरी विधानसभा सीट पर 1952 से लेकर 2014 तक कभी निर्दलीय प्रत्याशी नहीं जीता था.

4. रंजीत सिंह चौटाला

कहां से जीते- रनिया विधानसभा, सिरसा

रिजल्ट – करीब 19 हजार वोटों से जीते

रंजीत सिंह – 53,825
गोविंद कांडा – 34394 वोट
राम चंद कंबोज, बीजेपी – 20,666

ranjit

कौन हैं – देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल के पुत्र. ओमप्रकाश चौटाला के भाई. फिलहाल कांग्रेस में थे. कांग्रेस से पहले आईएनएलडी. कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया था तो निर्दलीय लड़ गए. टिकट की पेशकश आईएनएलडी से भी थी मगर उनके समर्थक तैयार नहीं हुए. इसलिए निर्दलीय लड़ गए. रंजीत 32 साल बाद जाकर पहली बार कोई चुनाव जीत पाए हैं. इससे पहले वो 1987 में रोड़ी विधानसभा से लोकदल की टिकट पर चुनाव जीते थे.
सन 2000 में रंजीत अपने बड़े भाई ओमप्रकाश चौटाला के खिलाफ ही रोड़ी से चुनाव लड़ गए थे. करीब 22 हजार वोटों से हारे. फिर वो रनियां की तरफ आ गए. 2009 में वो यहां से 3651 वोटों से इनेलो के कृष्ण कंबोज से हारे. 2014 में तो वो तीसरे नंबर पर रहे.

क्यों जीते – रनिया विधानसभा से रंजीत सिंह दो बार हार चुके हैं. उनका ऐन मौके पर कांग्रेस ने टिकट काट दिया. इससे उनके प्रति सहानुभूति पैदा हुई. इससे एक और काम हुआ कि कांग्रेस विरोधी काफी वोट उनके खेमे में आ गया. रनिया में चौटाला परिवार के समर्थक और काफी जाट वोटर भी हैं. वो भी उन्हें मिला. इनेलो से विधायक रहे रामचंद कंबोज जो इस बार बीजेपी से लड़ रहे थे, लोग उनके काम से खुश नहीं थे. फिर पार्टी बदलने से नाराजगी और बढ़ गई. कांग्रेस के प्रत्याशी विनीत कंबोज चुनाव से पहले उतना सक्रिय नहीं थे. दूसरे नंबर पर रहे गोपाल कांडा के भाई गोविंद कांडा भी इस सीट पर पहले से सक्रिय नहीं थे. जिसका कुल फायदा रंजीत को मिला.

5. राकेश दौलताबाद

कहां से जीते – बादशाहपुर विधानसभा, गुरुग्राम

रिजल्ट- करीब 10 हजार वोटों से जीते.

राकेश दौलताबाद – 106783
मनीष यादव, बीजेपी – 96566

rakesh

कौन हैं – 39 साल के राकेश दौलताबाद को यूं तो आईएनएलडी का नेता माना जाता है, लेकिन पार्टी ने उनका टिकट काट दिया तो उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा. बिजनेसमैन हैं. क्षेत्र में समाजसेवा का बड़ा काम है. सामाजिक संगठन परिवर्तन संघ नाम की संस्था चलाते हैं. दो बार से इसी सीट से लड़ रहे थे मगर हार का सामना करना पड़ रहा था.

क्यों जीते – बीजेपी ने यहां से अपने मंत्री राव नरबीर का टिकट काटा था, जिनकी इस क्षेत्र में अच्छी पकड़ मानी जाती थी. टिकट मिली थी युवा मोर्चा के अध्यक्ष मनीष यादव को जो पहले इस सीट पर उतना सक्रिय नहीं थे. फिर राव नरबीर से जुड़े लोगों ने उनकी मदद भी नहीं की. राकेश चूंकि लगातार दो बार से हार रहे थे और इसके बावजूद सक्रिय थे. शादियां करवाना, लोगों की आर्थिक मदद करना, नौकरी लगवाना जैसे कामों ने उनको लोगों के बीच लोकप्रिय बना रखा था. राव नरबीर का टिकट कटने से लोगों ने एक मौका राकेश को देने का मन बना लिया था.

6. नयनपाल रावत

कहां से जीते – प्रिथला विधानसभा, फरीदाबाद

रिजल्ट – करीब 16 हजार वोटों से जीते.

नयनपाल – 64625
रघुवीत तेवतिया, कांग्रेस – 48196
सोहनपाल, बीजेपी – 21322

nayan pal

कौन हैं – नयनपाल रावत भी प्रिथला विधानसभा में बीजेपी का जाना-पहचाना चेहरा थे. 48 साल उम्र है. पिछली बार उन्होंने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा था. मगर चुनाव हार गए थे. 1179 वोटों से. इस बार पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दी तो निर्दलीय चुनाव लड़ा.

क्यों जीते – हार के बावजूद नयनपाल लोगों के बीच सक्रिय रहे. पांच साल सरकार के होने का पूरा फायदा उठाते हुए लोगों के काम करवाए. कार्यकर्ताओं के बीच पकड़ बनाए रखी. कार्यकर्ताओं ने ही उनके लिये चंदा जुटाया. बताते हैं जिस बैठक में उनके निर्दलीय लड़ने का फैसला हुआ. उसी में चंदे के लिए बात उठी. कार्यकर्ताओं ने एक दिन में उनके चुनाव के लिए 2 करोड़ 84 लाख रुपये इकट्ठा कर दिए.

7. रणधीर सिंह गोलन

कहां से जीते – पुंडरी विधानसभा, कैथल

रिजल्ट -करीब 12 हजार वोटों से जीते.

रणधीर – 40751
सतबीर भाना – 28088
वेदपाल एडवोकेट, बीजेपी – 20882

randhir

कौन हैं – 54 साल के रणधीर सिंह गोलन भी बीजेपी के नेता हैं. आरएसएस की पृष्ठभूमि का होने के साथ-साथ पार्टी में जमीनी स्तर पर उनकी अच्छी पकड़ है. वह टिकट के दावेदारों की लिस्ट में काफी ऊपर थे, लेकिन अंत में उनका नाम काट दिया गया.

क्यों जीते – हरियाणा की ये विधानसभा हवा के उलट घूमने की हमेशा से आदि रही है. खास बात ये कि वर्ष 1996 से लेकर 2014 के चुनावों में पांच बार यहां से निर्दलीय प्रत्याशी ही जीत दर्ज करते रहे हैं. अबकी बार भी ऐसा ही हुआ और हवा रणधीर सिंह के पक्ष में रही. विधानसभा में रोड़ जाति का काफी वोट है. रणधीर भी रोड़ जाति से आते हैं. समुदाय का एकजुट वोट मिलने से उनकी राह आसान हुई. इसके अलावा संगठन में उनकी अच्छी पकड़ थी. पांच साल सरकार रहते हुए लोगों की मदद की.


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