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कहानी गुजरात के उस कांग्रेसी नेता की, जो निर्विरोध विधायक बना

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26 जून 1975. भारतीय इतिहास का काला दिन. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी. राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के बाद 19 महीने तक देश में आपातकाल लगा रहा. हजारों लोग जेलों में ठूंस दिए गए. जिस किसी ने कांग्रेस या उसकी नीतियों का विरोध किया, सत्ता को जेल से कम कुछ भी मंजूर नहीं हुआ. 21 मार्च 1977 को जब आपातकाल हटा तो देश में चुनाव की घोषणा हुई. चुनाव हुए तो कांग्रेस 153 सीटों पर सिमट गई और आजाद भारत में पहली बार केंद्र में कोई गैर कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार बनी. दो साल के अंदर ही 1979 में नई सरकार में मतभेद हुए और सरकार गिर गई. जनवरी 1980 में एक बार फिर चुनाव हुए और लोगों ने आपातकाल को भुलाकर इंदिरा गांधी के हाथों में फिर से सत्ता सौंप दी. जो कांग्रेस इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में 153 सीटों पर सिमट गई थी, दो साल में ही उसे 353 सीटें मिलीं.

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आपातकाल के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी की बुरी तरह से हार हुई थी.

जब इंदिरा फिर से प्रधानमंत्री बन गईं तो 1980 में गुजरात में भी विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई. इस चुनाव में कांग्रेस पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरी. कांग्रेस ने बाजी जीत भी ली, लेकिन गुजरात में विधानसभा की एक ऐसी भी सीट थी, जहां से कांग्रेस के विरोध में कोई उम्मीदवार ही खड़ा नहीं हुआ. इस सीट का नाम था कुतियाना. ये वही कुतियाना है, जहां की विधायक रही संतोखबेन को दुनिया गॉडमदर के नाम से जानती है. इस चुनाव में कुतियाना की पहचान ये है कि यहां के एनसीपी के अभी के विधायक हों या बीजेपी के उम्मीदवार, दोनों के नाम पुलिस रिकॉर्ड में अपराधी के तौर पर दर्ज हैं.

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1980 में जब गुजरात के लिए चौथी विधानसभा के चुनाव हुए तो 1977 की सरकार में शामिल भारतीय जनसंघ अपना नाम बदल चुका था और उसक नया नाम था भारतीय जनता पार्टी. लेकिन पार्टी कुतियाना सीट पर चुनाव नहीं लड़ी. कांग्रेस ने इस सीट से महंत विजयदासजी वीरदासजी को उम्मीदवार बनाया. उनके खिलाफ कोई भी उम्मीदवार निर्दलीय भी खड़ा होने की हिम्मत नहीं दिखा सका. चुनाव हुए और महंत विजयदासजी निर्विरोध जीतकर विधानसभा पहुंचे. गुजरात विधानसभा चुनाव के इतिहास में 1980 वो ऐतिहासिक साल है, जब कोई उम्मीदवार निर्विरोध चुनाव जीता था. कांग्रेस ने उन्हें उनकी जीत का रिवॉर्ड भी दिया और उन्हें राज्य में मंत्री बना दिया गया. इसके अलावा 1981 में उन्हें गुजरात कांग्रेस की कमान भी सौंप दी गई, जो 1985 तक उनके पास रही.

पोरबंदर के माधवपुर गांव में महंत विजयदासजी की मूर्ति लगी हुई है.
महंत विजयदासजी के नाम सबसे ज्यादा वोट पाने का रिकॉर्ड है.

चुनाव के पांच साल बीत गए. विधानसभा का वक्त पूरा हुआ और एक बार फिर 1985 में चुनावी घड़ी आ गई. भारतीय जनता पार्टी को भी बने पांच साल हो गए थे. कुतियाना सीट से कांग्रेस ने एक बार फिर महंत विजयदासजी वीरदासजी को उम्मीदवार बनाया. इस बार उनकी राह आसान नहीं थी. उनके सामने बीजेपी के सतरेगा मिराग चुनावी मैदान में उतरे.

इसके अलावा विजयदासजी के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए 9 और उम्मीदवार मैदान में थे. जब नतीजे आए तो पता चला कि विजयदासजी वीरदासजी चुनाव जीत गए हैं और कुल वोट का 94.40 फीसदी वोट उन्हें अकेले हासिल हुआ है. इस सीट पर कुल 55592 वोट पड़े थे, जिनमें से 612 वोट रिजेक्ट हो गए थे. वैलिड वोटों में से अकेले विजयदासजी को 52214 वोट मिले थे. बीजेपी उम्मीदवार सतरेगा मिराग को मात्र 1211 वोट मिले. इस सीट पर मारू भोजा भी निर्दलीय उम्मीदवार थे, जिन्हें 570 वोट मिले थे. इस तरह से 1985 के चुनाव में भी महंत विजयदासजी वीरदासजी ने सबसे बड़ी जीत हासिल की थी. एक बार फिर उन्हें कैबिनेट में कृषि मंत्री बनाया गया.गुजरात चुनाव में अकेले 94. 40 फीसदी वोट पाने और 92.21 फीसदी वोटों से जीतने का रिकॉर्ड अब भी महंत विजयदासजी के नाम पर ही है.

पति सरमन जडेजा (दाएं) की हत्या के बाद संतोखबेन पहले जरायम में और फिर राजनीति में उतरी.
पति सरमन जडेजा (दाएं) की हत्या के बाद संतोखबेन पहले जरायम में और फिर राजनीति में उतरी.

पांच साल बाद जब 1990 में एक बार फिर चुनावी घड़ी आई तो महंत विजयदासजी ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया. उन्होंने राजनीति से ही संन्यास ले लिया. उनके हटने पर इस सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर संतोखबेन जडेजा ने चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की. संतोखबेन को गॉडमदर के नाम से जाना जाता है, जिसके गैंग पर 500 से अधिक मुकदमे दर्ज थे. इस तरह से जिस कुतियाना सीट के लोगों ने एक महंत को निर्विरोध जिताकर विधानसभा में पहुंचाया था, वहीं के लोगों ने एक कुख्यात महिला को भी जिता दिया. 2012 के चुनाव में भी यहां से एनसीपी के टिकट पर कांधल जडेजा जीते थे, जो संतोखबेन के बेटे हैं और उनपर भी कई मुकदमे दर्ज हैं.

5 अक्टूूबर 2002 को 79 साल की उम्र में विजयदासजी का राजकोट में निधन हो गया. दो साल पहले 2015 में उनके गांव माधवपुर में गांववालों ने उनकी एक प्रतिमा लगवाई है.


वीडियो में देखें कहानी गुजरात के उस मुख्यमंंत्री की, जिसपर सियासत में खरीद-फरोख्त के आरोप लगे

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