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कहानी उस महिला की, जो चूल्हा-चौका करते हुए बन गई 'गॉडमदर'

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गुजरात में हो रहे विधानसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल लगातार रैलियां कर रहे हैं. खूब ज़ोर आजमाइश हो रही है. एक दूसरे पर हमले हो रहे हैं, एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए ऑडियो-वीडियो सीडी रिलीज की जा रही हैं, सोशल मीडिया पर बयानबाज़ी हो रही है. चुनाव है तो ये सब होगा ही और हर चुनाव में कमोबेश ऐसा ही होता है. सीधी-सादी भाषा में कहा जाए तो चुनाव के दौरान सब कुछ स्क्रिप्टेड होता है. कब क्या करना है, कब क्या बोलना है और कब कहां जाना है, पार्टियां पहले से सब तय कर लेती हैं.

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फिल्म रिलीज होने के बाद संतोखबेन को लोग गॉडमदर कहने लगे.

एक स्क्रिप्ट 1999 में भी लिखी गई थी. इस स्क्रिप्ट को लिखने वाले थे विनय शुक्ला. ये स्क्रिप्ट चुनावी नहीं, फिल्मी थी और इस पर फिल्म भी बनी थी. नाम था गॉडमदर. विनय शुक्ला ने ही इसे डायरेक्ट भी किया था. शबाना आज़मी, मिलिंद गुनाजी, निर्मल पांडेय, गोविंद नामदेव, राइमा सेन और शरमन जोशी फिल्म की मुख्य भूमिकाओं में थे. संगीत दिया था विशाल भारद्वाज ने और फिल्म का डिस्ट्रीब्यूशन यशराज के पास था. इस फिल्म के लिए गाने लिखे थे जावेद अख्तर ने. फिल्म को उस साल कई अवार्ड मिले, जिसमें अलग-अलग कटेगरी में छह नेशनल फिल्म अवार्ड के साथ ही एक फिल्मफेयर भी मिला था. इस फिल्म का गुजरात और गुजरात के चुनाव से गहरा नाता था. वजह ये कि फिल्म में शबाना आज़मी ने जो किरदार निभाया था, वो काल्पनिक न होकर वास्तविक था. इस किरदार का नाम था संतोखबेन, जिसे गुजरात के लोग गॉडमदर के नाम से जानते हैं.

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पोरबंदर का समुद्रतट बहुत समृद्ध है. वहां पर नेवी की बटालियन है.

गुजरात का एक जिला है पोरबंदर. वही पोरबंदर जहां पर महात्मा गांधी पैदा हुए थे. इस महात्मा ने पूरी दुनिया को सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाया था. इस बात को तकरीबन 100 साल हो गए. इसी पोरबंदर की एक और कहानी है, जो अहिंसा की नहीं, हिंसा की है. ये कहानी करीब 35 साल पुरानी है. 1980 के दशक में पोरबंदर में एक ही कपड़ा मिल हुआ करती थी. नाम था महाराणा मिल. यूपी-बिहार के अलावा आस-पास के लोग भी इसी मिल में नौकरी खोजने के लिए जाते थे. उस दौरान पोरबंदर के एक गांव कुतियाना से एक शख्स मिल में काम की तलाश में आया. नाम ता सरमन जडेजा. उसके साथ उसकी पत्नी भी थी, जिसका नाम था संतोखबेन. उसे मिल में काम मिल गया. उस दौरान मिल में काम करने वाले मजदूरों से हफ्तावसूली हुआ करती थी. ठीक वैसे ही, जैसा दीवार फिल्म में होती थी. मजदूरों से पैसे वसूलने का जिम्मा देबू बाघेर के पास था, जिसका मजदूरों में आतंक था. देबू ने सरमन से भी पैसे मांगे, लेकिन सरमन ने दीवार फिल्म के अमिताभ बच्चन की तरह पैसे देने से इनकार कर दिया. देबू और सरमन में लड़ाई हुई. नतीजा ये हुआ कि देबू मारा गया और फिर सरमन ने देबू के काम पर अपना अधिकार कायम कर लिया.

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कहा जाता है कि संतोखबेन ने अपने हाथ से कभी गोली नहीं चलाई थी.

मिल के धंधे पर कब्जा जमाने के बाद सरमन ने अवैध शराब का कारोबार शुरू कर दिया. इस दौरान उसकी मुलाकात राजनेताओं से भी हुई. अपराध की दुनिया में जब तक सरमन कोई बड़ा मुकाम हासिल कर पाता, उसके पहले ही उसके प्रतिद्वंद्वी गिरोह के कालिया केशव और उसके साथियों ने दिसंबर 1986 को सरमन की गोली मारकर हत्या कर दी. सरमन का एक भाई भूरा था, जो लंदन में रहता था. जब उसने भाई की हत्या की खबर सुनी तो भागा हुआ पोरबंदर आया. उसने सरमन के गिरोह के लोगों को इकट्ठा करने की कोशिश की, लेकिन सरमन की पत्नी संतोखबेन ने ऐसा करने से मना कर दिया और गैंग की कमान खुद अपने हाथ में ले ली.

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संतोखबेन और उसके पति सरमन जडेजा (दाएं). सरमन की हत्या ही संतोखबेन को फ्रंट पर लेकर आई थी.

कुतियाना के कंसाबाद गांव की रहने वाली संतोखबेन ने गैंग की कमान संभालने के बाद अपने लोगों से कहा कि वो कालिया केशव और उसके गैंग के लोगों की हत्या कर दें. एक आदमी की हत्या के लिए उस वक्त उसने एक लाख रुपए का इनाम रखा था. गैंग ने कालिया केशव और उसके गैंग के 14 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी. इस दौरान कहा जाता है कि संतोखबेन ने अपने हाथ से एक भी गोली नहीं चलाई थी, लेकिन इन 14 हत्याओं ने पूरे पोरबंदर में संतोखबेन की दहशत कायम कर दी और फिर संतोखबेन को नया नाम मिला-गॉडमदर.

चार साल के अंदर ही संतोखबेन ने खुद को अपराधी के साथ ही लोगों का मसीहा भी घोषित कर दिया. लोग भी ऐसा ही मानने लगे, तभी संतोखबेन निर्विरोध पोरबंदर तालुके की अध्यक्ष चुन ली गई. 1990 में गुजरात में विधानसभा का चुनाव होना था. अपराध जगत में थोड़े ही वक्त में नाम कमाने वाली संतोखबेन ने सियासत में उतरने का मन बनाया. उसे जनता दल का साथ भी मिला और जनता दल ने उसे पोरबंदर की कुतियाना सीट से उम्मीदवार घोषित कर दिया. संतोखबेन ने ये चुनाव 35 हजार से अधिक वोटों से जीत लिया. 1995 में संतोखबेन ने फिर से विधानसभा चुनाव के लिए पर्चा भरा था, लेकिन बाद में कांग्रेस के उम्मीदवार के समर्थन में संतोखबेन ने पर्चा वापस ले लिया.

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1999 में आई फिल्म गॉडमदर का पोस्टर. संतोखबेन ने फिल्म को बैन करने की मांग की थी.

संतोखबेन के गैंग में 102 सदस्य थे, जिन पर संगठित हत्या, किडनैपिंग और पोरबंदर से गुजरने वाली चीजों पर रंगदारी वसूलने के कुल 525 मुकदमे दर्ज थे. इनमें से अकेले नौ मुकदमे संतोखबेन पर दर्ज थे. 1999 में जब गॉडमदर फिल्म आई थी तो संतोखबेन ने इस फिल्म पर प्रतिबंध भी लगाने की मांग की थी और कहा था कि यह फिल्म उनके समुदाय मेहर के साथ न्याय नहीं करती है. हालांकि फिल्म के डायरेक्टर विनय शुक्ला ने कहा था कि फिल्म संतोखबेन पर आधारित नहीं है. लेकिन संतोखबेन की ओर से देवेन देसाई ने कहा था कि आप एक ऐसी महिला के बारे में बता दीजिए जो मेहर समुदाय से ताल्लुक रखती है और अपने पति की मौत के बाद तालुका का चुनाव निर्विरोध जीतती है. इसके बाद वडोदरा के एक लेखक मनोहर देसाई ने दावा किया कि फिल्म उनके उपन्यास पर आधारित है. बाद में मामला कोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने फिल्म को रिलीज करने की इजाज़त दे दी थी.

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समुद्र तट पर अक्सर तस्करी करने वाले पकड़े जाते हैं. यहां हर नाव या जहाज पर माल लादने के बाद कुछ रकम स्थानीय गुंडों को देनी पड़ती है.

संतोखबेन की दहशत 1996 तक गुजरात में कायम रही. जब गुजरात में बीजेपी की सरकार आई तो संतोखबेन पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ और उसे 16 महीने के लिए अहमदाबाद जेल भेज दिया गया. इस दौरान उसने कहा था कि वो नहीं चाहती कि उसके परिवार का कोई शख्स इस धंधे में उतरे, क्योंकि वो अकेले ही काफी है. जेल से रिहाई के बाद संतोखबेन राजकोट रहने के लिए चली गई. 2002 में जब विधानसभा चुनाव होने थे तो संतोखबेन ने एक बार फिर से चुनाव लड़ने के लिए तैयारी शुरू की. उसने कुतियाना सीट से फिर से पर्चा भर दिया, लेकिन बाद में उसे कांग्रेस के उम्मीदवार के लिए खाली कर दिया. हालांकि इस सीट से कांग्रेस का उम्मीदवार हार गया और बीजेपी की जीत हुई. इसी दौरान 2005 में एक बीजेपी के काउंसलर की हत्या हो गई.

इस हत्या में भी संतोखबेन का नाम आया और उसे गिरफ्तार कर लिया गया. 2007 में संतोखबेन का नाम फिर चर्चा में आया, जब संतोखबेन के देवर अरसी जडेजा के बेटे नवघन अरसी की गोली मारकर हत्या कर दी गई. वहीं 2008 में एक बार फिर संतोखबेन चर्चा में आईं, जब उनकी बहू की अज्ञात लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी. संतोखबेन के चार बेटे हैं, कांधल जडेजा, करन जडेजा, भोजा जडेजा और काना जडेजा. संतोखबेन की राजनीतिक विरासत संभालने का जिम्मा कांधल जडेजा ने संभाल लिया. वो कुतियाना सीट से एनसीपी के टिकट पर विधायक हैं. 31 मार्च 2011 को हार्ट अटैक की वजह से संतोखबेन की मौत हो गई.


वीडियो में देखें गुजरात की एक ऐसी विरासत, जो माइनिंग से कभी भी खत्म हो जाएगी

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