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गुजरात का वो जिला, जहां से निकला नारा गुजरात चुनाव का सबसे हॉट टॉपिक बन गया

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गुजरात में चुनावी सरगर्मी अपने पूरे उफान पर है. नेताओं के दौरे, मीडिया का जमावड़ा, आरोप-प्रत्यारोप और नारेबाजी के इस शोर के बीच कुछ दिन पहले एक नारा उछला था. नारा था-

“विकास गांड़ो थाई गयो छे”

इसका मतलब है कि विकास पागल हो गया है. कांग्रेस के साथ ही हार्दिक पटेल और बीजेपी विरोधियों ने इस नारे को खूब धार दी थी. लेकिन ये नारा कांग्रेस ने नहीं इंडुस यूनिवर्सिटी के सिविल इंजिनियरिंग स्टूडेंट सागर सावलिया ने दिया था. सागर सावलिया के पास एक फोटो आई थी. ये फोटो गुजरात के अमरेली जिले की थी. फोटो में दिखाया गया था कि एक बस का टायर अपने आप निकल गया और बस सड़क किनारे खड़ी रही. सागर ने इसे अपने फेसबुक पेज पर डाला और टैगलाइन लिख दी-

‘विकास गांड़ो थाई गयो छे’ .

इसी फोटो के साथ सागर ने टैगलाइन दी थी.
इसी फोटो के साथ सागर सावलिया ने टैगलाइन दी थी.

टैगलाइन हिट हो गई और फिर लगातार उनके पास ऐसी तस्वीरें आने लगीं, जो गुजरात के विकास की पोल खोल रही थीं. इसके बाद से ही गुजरात के विकास की धज्जियां उड़ाने के लिए इस टैगलाइन का इस्तेमाल होने लगा. अमरेली से निकली एक तस्वीर ने गुजरात के विकास की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी.

savji dholakia
सवजीभाई ढोलकिया अमरेली जिले के ही रहने वाले हैं, जो अपने कर्मचारियों को कार और फ्लैट गिफ्ट कर चर्चा में आए थे.

अमरेली जिले की एक पहचान सवजी भाई ढोलकिया के नाम से भी है. सवजी भाई ढोलकिया हीरा बनाने वाली कंपनी हरि कृष्णा एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक हैं, जो अमरेली के दुधाला गांव के रहने वाले हैं. हर दीपावली में अपने कर्मचारियों को बोनस में कार और फ्लैट देने के बाद चर्चा में आए सवजी 1977 में अपने घर से 12.50 पैसे लेकर निकले थे और आज उनके पास 6000 करोड़ रुपए के सालाना टर्नओवर वाली कंपनी है.

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अमरेली का नागनाथ मंदिर यहां के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है.

ये अमरेली पूर्वी सौराष्ट्र के बड़ौदा के गायकवाड़ राज्य में एक जगह हुआ करती थी. आजाद भारत में यह गुजरात का एक जिला है. पाटीदार बहुल इस जिले में पांच विधानसभा सीटे हैं. इस जिले में लगभग 30-40 फीसदी वोटर पाटीदार हैं. जुलाई-अगस्त 2015 में जब हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पाटीदार अनामत आंदोलन समिति ने आंदोलन शुरू किया था, तो उसके केंद्र में अमरेली जिला भी था. हालांकि पाटीदारों के 30 फीसदी वोटों में बहुलता लेउआ पाटीदारों की है, जबकि हार्दिक खुद कड़वा पाटीदार समूह से ताल्लुक रखते हैं.

1. अमरेली

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कांग्रेस नेता परेश धनानी (बाएं) ने बीजपी के मंत्री रहे दिलीप संघानी को 2012 के चुनाव में हराया था.

अमरेली सीट गुजरात में कांग्रेस के बड़े नेता माने जाने वाले परेश धनानी के पास है, जिन्होंने बीजेपी के कृषि मंत्री रहे दिलीप संघानी को 29 हजार 893 वोटों से हराया था. जीपीपी को यहां पर 16 हजार 454 वोट मिले थे. 1985, 1990 और 2007 में अमरेली सीट से दिलीप संघानी जीतते आ रहे थे. वहीं 1995 और 1998 में गुजरात बीजेपी के अध्यक्ष रहे पुरुषोत्तम रुपाला ने ये सीट जीती थी. परेश धनानी ने 2002 में बीजेपी की लहर में ये सीट कांग्रेस के लिए जीत ली थी, लेकिन 2007 में वो संघानी से 4000 वोटों से हार गए थे. 2012 में उन्होंने फिर से ये सीट जीत ली. बीजेपी ने यहां से बवकुभाई नाथाभाई उधाड़ को प्रत्याशी बनाया है, जबकि कांग्रेस की ओर से परेश धनानी उम्मीदवार हैं.

2. धारी

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जयसुख काकड़िया (बाएं) कांग्रेस उम्मीदवार हैं, जबकि ये सीट अभी तक नलिन कोटादिया के पास है.

नलिन कोटादिया (गुजरात परिवर्तन पार्टी, जिसका 2014 में बीजेपी में विलय हो गया) ने कांग्रेस की कोकिलाबेन काकड़िया को 1575 वोटों से हराया था. वहीं बीजेपी यहां तीसरे नंबर पर रही थी. बीजेपी के कैंडिडेट को कांग्रेस से मात्र 975 वोट कम मिले थे. 2007 में ये सीट बीजेपी के मनसुखभाई भुआ के पास थी. जब गुजरात में राज्यसभा के चुनाव थे तो नलिन कोटादिया ने बीजेपी उम्मीदवार को वोट नहीं दिया था. इसीलिए बीजेपी ने धारी से अमरेली सीट के विधायक रहे दिलीप संघानी को उम्मीदवार बनाया है. दिलीप संघानी का मानना है कि हार्दिक की सीडी सामने आने के बाद पाटीदार बीजेपी के ही साथ आएंगे. संघानी के लिए इस सीट पर चुनौती इसलिए भी कड़ी है क्योंकि 2012 के चुनाव में बीजेपी यहां तीसरे नंबर पर रही थी. कांग्रेस की ओर से यहां पर कोकिलाबेन के पति जयसुख काकड़िया उम्मीदवार हैं, जो चलाला नगरपालिका के पूर्व प्रेसिडेंट रह चुके हैं.

3. लाठी

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कांग्रेस के वीरजी ठुम्मर (बाएं) के सामने बीजेपी के गोपाल वस्तरपारा मैदान में हैं.

लाठी में बीजेपी के बवकूभाई उन्धड़ विधायक है. बवकूभाई ने 2012 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था और जीता था. 2014 में बवकुभाई ने विधानसभा के साथ ही कांग्रेस से भी इस्तीफा दे दिया. 2014 में उपचुनाव हुए, जिसमें बवकुभाई बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े और एक बार फिर जीत हासिल की. 2012 के चुनाव में यहां पर दूसरे नंबर पर गुजरात परिवर्तन पार्टी थी, लेकिन 2014 में कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही थी और यहां हनुभाई धोराजिया बवकुभाई के खिलाफ चुनाव लड़े थे. हनुभाई 2007 में बीजेपी में थे, लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया था. इस बार कांग्रेस ने अमरेली के सांसद रहे वीरजी ठुम्मर को उम्मीदवार बनाया है, जबकि बीजेपी की ओर से गोपाल वस्तरपारा उम्मीदवार हैं.

4. राजुला

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बीजेपी के हीराभाई सोलंकी (बाएं) के सामने कांग्रेस से अमरीश जे डर मैदान में हैं.

राजुला जिले की ऐसी सीट है, जहां पर पाटीदारों का वोट मात्र पांच फीसदी है, जबकि कोली समुदाय निर्णायक भूमिका में है. यहां पर कोली का 25 फीसदी वोट है. बीजेपी के कोली समुदाय के बड़े चेहरे हीराभाई सोलंकी पिछले चार बार से यहां से चुनाव जीतते आ रहे हैं. पिछला चुनाव हीराभाई सोलंकी ने कांग्रेस के बाबुभाई राम से 18710 वोटों से जीता था. इस बार भी बीजेपी की ओर से हीराभाई सोलंकी ही उम्मीदवार हैं. कांग्रेस ने यहां से अमरीश जे डर को टिकट दिया है.

5. सावरकुंडला

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बीजेपी के कमलेश कनानी (बाएं) के सामने कांग्रेस के प्रताप धुद्यत हैं.

सावरकुंडला में बीजेपी के वल्लभ वाघसिया कांग्रेस के प्रताप दुधत से 2384 वोटों से जीते थे. यह सीट 1995 से ही बीजेपी के पास है. वहीं जीपीपी को 2012 में 14, 577 वोट मिले थे. बीजेपी ने इस बार सावरकुंडला से कमलेश कनानी को उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस ने इस बार भी प्रताप धुद्यत को उम्मीदवार बनाया है.

धारी से कांग्रेस प्रत्याशी जयसुख काकड़िया और सावरकुंडला से बीजेपी प्रत्याशी कमलेश कनानी की पत्नियां सगी बहनें हैं. यानी दोनों उम्मीदवार आपस में साढ़ू भाई हैं. वहीं इनके एक और साढ़ू शरद लखानी अमरेली से बीजेपी का टिकट चाहते थे. पार्टी ने शरद को टिकट नहीं दिया. काकड़िया पिछले 22 साल से कांग्रेस के साथ हैं. उनकी पत्नी कोकिला बेन ने 2012 में धारी से चुनाव लड़ा था, लेकिन वो हार गई थीं. वहीं कमलेश कनानी पिछले 24 साल से बीजेपी के साथ हैं.

2012 में जब विधानसभा के चुनाव हुए थे तो दो सीटें बीजेपी को, दो सीटें कांग्रेस को और एक सीट केशुभाई पटेल की गुजरात परिवर्तन पार्टी को मिली थी. फरवरी 2014 में केशुभाई ने अपनी पार्टी का बीजेपी में विलय कर दिया. वहीं लाठी से कांग्रेस के विधायक रहे बवकूभाई उन्धड़ ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. उपचुनाव में बवकूभाई बीजेपी की सीट से उतरे और जीत गए. ऐसे में समीकरण बदल गए. 2015 के स्थानीय निकाय चुनाव में जिले की पंचायत की 34 में से 29 सीटें कांग्रेस के खाते में गई थी. जिले की 11 तालुका पंचायतों में से आठ पर कांग्रेस का कब्जा है.

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कपास और मूंगफली के किसानों को उनकी फसलों का वाजिब दाम नहीं मिल रहा है.

अमरेली जिले में किसानों की मुख्य फसल मूंगफली और कपास है. अमरेली के किसानों को उनकी फसलों का वाजिब दाम नहीं मिल रहा है. किसानों का कहना है कि उन्हें 20 किलो मूंगफली के 700 रुपये मिल रहे हैं, जो पहले 1000 रुपये मिलते थे. कपास की भी यही हालत है. पहले कपास के 20 किलो की कीमत 1500 रुपये मिलती थी, लेकिन अब मात्र 800 रुपये ही मिल रही है. किसानों को उम्मीद थी कि चुनावी साल है तो उनको फसलों का दाम बेहतर मिलेगा, लेकिन उनकी उम्मीदें टूट गई हैं. नोटबंदी की वजह से भी किसानों को नुकसान हुआ है.

पूरे अमरेली में पीने के पानी की भी खासी किल्लत है. अमरेली में पानी की इतनी किल्लत हुई थी कि 2016 में नर्मदा नहर से किसानों को पानी चोरी करने पर मजबूर होना पड़ा था. इसे देखते हुए सरकार को अर्धसैनिक बल तैनात करना पड़ा था. इसके अलावा दुनिया में गुजरात के हीरों की जो अलग पहचान है, उसके पीछे भी पाटीदार मजदूरों की ही मेहनत है. अमरेली में खेती के अलावा कोई और विकल्प है तो वो हीरे को काटने और उसे पॉलिश करने का ही है. अमरेली में 1280 हीरे की वर्कशॉप हैं, जहां पर 48,000 लोगों को रोजगार मिला हुआ है. 1980-90 के दशक में लगभग 2.5 लाख लोग अमरेली छोड़कर सूरत चले गए थे. हीरे की पॉलिशिंग का काम छोटे शहरों में भी हो सकता है, लेकिन बिजली की किल्लत, नोटबंदी और फिर जीएसटी की वजह से बिजनेस में गिरावट आती जा रही है. एक बिना पढ़ा-लिखा मजदूर भी 10,000 से 20,000 रुपये कमा लेता था, लेकिन अब उसके काम करने पर संकट आ गया है. बिजली का अधिकांश हिस्सा जमीन से पीने का पानी निकालने में ही चला जाता है.

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पीएम मोदी ने किसानों को फसलों का वाजिब दाम दिलवाने का वादा किया था.

किसानों का गुस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी है, जिन्होंने अमरेली के किसानों से वादा किया था कि उन्हें उनकी फसलों का वाजिब मूल्य मिलेगा. यह कीमत फसलों की लागत और उसका पचास फीसदी जोड़कर होती थी. इसके अलावा किसानों को 24 घंटे बिजली का भी वादा था. फसल बीमा के प्रीमियम के भुगतान के बाद भी बीमे की रकम न मिलना भी एक मुद्दा है. फसलों के लिए लोन लेने पर उन्हें लोन पर ली गई राशि का पांच फीसदी पैसा फसलों के बीमा के तौर पर जाता है. इसके बिना लोन नहीं मिल सकता है.

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10 अगस्त 2015 को पाटीदारों ने अमरेली में आरक्षण के लिए रैली की थी.

10 अगस्त 2015 को पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के नेतृत्व में पाटीदारों ने आरक्षण को लेकर अमरेली में आंदोलन किया था. इस जिले की खासियत यहां के बब्बर शेर हैं, जो आसपास के जंगलों में पाए जाते हैं. पूरे सौराष्ट्र में पटेलों की सबसे ज्यादा आबादी इसी जिले में है. केन्द्र में मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला इसी जिले के हैं. जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने अमरेली के लिए 5 एफ का फॉर्मूला सुझाया था. इन पांच एफ में फार्म, फार्मर, फैक्ट्री, फैब्रिक और फॉरेन शामिल था. इसका सीधा सा मतलब था कि यहां की जमीन पर यहीं के किसान खेती करें, यहीं पर फैक्ट्री लगे, जिसमें कपास से कपड़ा बनाया जाए और फिर उसे यहीं से विदेश भेजा जाए. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. यहां का किसान कपास तो पैदा कर देता है, लेकिन उससे कपड़ा बनाने और उसे विदेश भिजवाने के लिए सूरत और अहमदाबाद का रुख करना पड़ता है. ऐसे में किसानों की लागत भी बड़ी मुश्किल से ही निकल पाती है. सिंचाई के लिए पानी की किल्लत की वजह से किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं.

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अमरेली की जूना मस्जिद. (फोटो : Gujrat Tourism)

अमरेली के बारे में माना जाता है कि 534 ईस्वी में इसे अनुमानजी, अमलिक और अमरावती के नाम से जाना जाता था. गुजराती में अमरावती अमरावली हो गया और फिर कालांतर में ये अमरेली हो गया. इसे गिरवानवाली के नाम से भी जाना जाता था. 18वीं सदी तक अभी के अमरेली का पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सा ही बसा हुआ था, जिसे अब जूनी या पुराना अमरेली कहते हैं. अमरेली में पुराने किले का जो परकोटा है, उसे जेल के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था और जूना मस्जिद के पास का इलाका शहर से जुड़ा हुआ था. 1730 के आसपास मराठा जनरल दमाजीराव गायकवाड़ अमरेली आया था.

1742-43 में दमाजीराव ने अमरेली और लाठी के पास अपने सैनिक कैंप बना लिए थे. 1810-15 में विट्ठलराव देवाजी ने अमरेली को 20-25 साल में शहर के तौर पर विकसित किया. गायकवाड साम्राज्य के वक्त में 1886 में अमरेली में पहली बार मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था की गई थी. आजादी के बाद यह सौराष्ट्र का जिला हो गया, बाद में 1956 में इसे बॉम्बे स्टेट में मिला दिया गया. 1960 में जब बॉम्बे स्टेट से अलग होकर गुजरात और महाराष्ट्र बना तो अमरेली गुजरात का हिस्सा बन गया.


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