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गुजरात की इस सीट पर कांग्रेस को छोटू वसावा से दोस्ती काम आ सकती है

पंचमहल को ये नाम मिला है उसकी पांच तालुकाओं के कारण. ग्वालियर के जिवाजीराव सिंधिया ने ये तालुकाएं ब्रिटिश हुकूमत को सौंपी थीं. एक बार में पंचमहल में ध्यान खींचने जैसा कुछ नहीं लगता. लेकिन जैसे ही ये बताया जाता है कि पंचमहल ही वो जगह जहां ‘गोधरा’ पड़ता है, तो दुनियाभर की दिलचस्पी हो लेती है. पंचमहल जिले का मुख्यालय है गोधरा. 2002 के गुजरात दंगों के बाद गोधरा ही पंचमहल की पहचान बन गया है.

वैसे गोधरा मुगलों के जमाने से ही इस जिले का केंद्र है. पुराने वक्त की बात करें, तो पंचमहल का सबसे बड़ा और नामी शहर था चंपानेर. आमिर खान की फिल्म ‘लगान’ वाले गांव का नाम भी तो चंपानेर ही था. चंपानेर की नींव डाली थी वनराज चावड़ा ने. आठवीं सदी में. वनराज जो थे वो चावड़ा वंश के चश्म-ओ-चिराग थे. वनराज के एक दोस्त थे. चंपाराज. ये ही चंपाराज वनराज के सेनापति भी
थे. मुहब्बत से लोग उनको चंपा बुलाया करते थे.

चंपानेर का किला आज एक प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट है. (ग्लोबल गुजरात न्यूज़)
चंपानेर का किला आज एक प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट है. (ग्लोबल गुजरात न्यूज़)

इसी दोस्ती में वनराज ने चंपानेर शहर बसा दिया. इसके बाद चौहान वंश ने इसपर अपना कब्जा कर लिया. फिर गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने सन् 1482 में चंपानेर पर हमला किया. जंग में चंपानेर की हार हुई. यहां के राजा थे जय सिंह. वो भागकर पावागढ़ चले गए. चंपानेर के ऊपर ही है पावागढ़ का किला. सुल्तान ने 20 महीनों तक किले के बाहर घेरा बांधकर रखा और आखिरकार 1484 में उसकी जीत हुई.

पंचमहल का नाम लेते हुए महमूद बेगड़ा का नाम छोड़ा नहीं जा सकता. 23 सालों तक उसने चंपानेर शहर को संवारा. उसे नए सिरे से बसाया और फिर उसका नाम रखा मुहम्मदाबाद. फिर उसने इसी को अपनी राजधानी भी बना लिया. इससे पहले अहमदाबाद हुआ करती थी उसकी राजधानी. बेगड़ा ने यहां एक खूबसूरत और भव्य मस्जिद भी बनवाई थी. नाम रखा उसका, जामा मस्जिद. गुजरात के
स्थापत्य नगीनों में इस मस्जिद की भी गिनती होती है. हुमायूं भी आया था यहां. 300 मुगल सेना के सहारे उसने भी किले पर चढ़ाई की थी. 13वीं सदी में चौहान वंश ने इसे अपने कब्जे में ले लिया. फिर बारी आई मराठाओं की.

महमूद बेगड़ा की मस्जिद समेत चंपानेर की कई इमारतें यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित कर दी गई हैं. (फोटोःविकिपीडिया कॉमन्स)
महमूद बेगड़ा की मस्जिद समेत चंपानेर की कई इमारतें यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित कर दी गई हैं. (फोटोःविकिपीडिया कॉमन्स)

सिंधिया वंश ने 18वीं सदी में पंचमहल को जीता. फिर जब अंग्रेजों की ताकत बढ़ी, तो मराठों को ये जिला पंचमहल ब्रिटिश राज के सुपुर्द करना पड़ा. यहां अब चंपानेर-पावागढ़ आर्कियोलॉजिकल पार्क है. यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट (वैश्विक विरासत) का दर्जा दिया हुआ है. 1899-1900 में यहां बहुत बड़ा अकाल आया था. 1891 से 1901 के बीच अकाल के कारण यहां की 17 फीसद आबादी का सफाया हो गया था. 1997 में पंचमहल का बंटवारा हुआ और इसके कुछ हिस्सों को अलग करके दाहोद जिला बनाया गया.

पंचमहल की विधानसभा सीटें

* शेहरा
* मोरवा हडफ (ST)
* गोधरा
* कलोल
* हलोल

गोधरा सीट

गोधरा से कांग्रेस के सी के राउलजी को जीत मिली थी. इस बार राउलजी कांग्रेस से बगावत करके बीजेपी में आ गए हैं. बीजेपी ने उन्हें टिकट भी दिया है. राउलजी गोधरा पांच बार विधायक चुने जा चुके हैं. राजनीति में उनकी सबसे पहली पार्टी थी जनता दल. गोधरा में करीब ढाई लाख वोटर हैं. कुल आबादी में करीब एक चौथाई मुसलमान हैं. राउलजी के बीजेपी में जाने से गोधरा के मुस्लिम वोटर नाराज हैं. राउलजी शंकरसिंह वाघेला के नजदीकी माने जाते हैं. गुजरात राज्यसभा चुनाव से पहले राउलजी बीजेपी में शामिल हो गए थे. वैसे 90 के दशक में भी राउलजी बीजेपी में रह चुके हैं. दो बार बीजेपी के टिकट पर विधायक भी बन चुके हैं. मतलब, पांच विधायकी में से एक जनता दल से, दो बीजेपी से और दो कांग्रेस से. अब फिर बीजेपी से टिकट मिला है.

गोधरा का सिग्नल फालिया इलाका. यहीं से निकली भीड़ ने साबरमती एक्सप्रेस पर हमला किया था.
गोधरा का सिग्नल फालिया इलाका. यहीं से निकली भीड़ ने साबरमती एक्सप्रेस पर हमला किया था.

गोधरा में एक जगह है, सिग्नल फालिया. 2002 में साबरमती एक्सप्रेस जलाने के मामले में ज्यादातर दोषी यहीं से आते हैं. यहां के मुसलमान कह रहे हैं कि जब राज्यसभा चुनाव में राउलजी ने अहमद पटेल को वोट नहीं दिया, तो वो लोग अब राउलजी को क्यों वोट दें? यहां के मुसलमान वोटर कह रहे हैं कि वो राउलजी को इसलिए वोट देते थे कि वो कांग्रेस में थे. अब चूंकि वो बीजेपी में चले गए हैं, तो अब मुसलमान उनको वोट नहीं देंगे. ओबीसी वोट मिलने के भी लाले हैं राउलजी को. ओबीसी नेता जसवंतसिंह परमार पहले बीजेपी में थे. अब परमार निर्दलीय लड़ रहे हैं. गोधरा पूर्वी में ओबीसी वर्ग के काफी वोट हैं. अगर ये परमार को चले गए, तो राउलजी के लिए और मुश्किल पैदा हो जाएगी. कांग्रेस की तरफ से राजेंद्र पटेल के नाम की चर्चा है. इस सीट पर मुकाबला दिलचस्प होगा.

गोधरा में सांप्रदायिक बंटवारा अभी भी खूब है

अभी नवंबर की ही बात है. गोधरा के करीब 10 इलाकों को डिस्टर्ब्ड एरिया ऐक्ट के अंतर्गत डाल दिया गया है. इसके कारण अब यहां के लोग अपनी जमीन किसी दूसरे धर्म के लोगों को नहीं बेच पाएंगे. ऐसा करने के लिए उन्हें पहले जिला कलेक्टर से इजाजत लेनी होगी. कुछ स्थानीय नेता इस ऐक्ट को लागू करने की मांग कर रहे थे. उनका कहना था कि यहां एक खास धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों को अपना घर-जमीन बेच रहे हैं. आरोप है कि एक संप्रदाय विशेष के दबाव में लोग मजबूर होकर ये कर रहे हैं. शिकायत करने वाले नेता बीजेपी के थे. उन्होंने गृह विभाग में भी शिकायत पहुंचाई थी अपनी. खैर, ये दसों इलाके गोधरा टाउन बी डिवीजन पुलिस स्टेशन में आते हैं. ये इलाके हैं: जहूरपुरा शाक मार्केट, हेड पोस्ट ऑफिस, स्टेशन रोड, जैन डेरासार, पुलिस आउटपोस्ट नंबर टू, महाप्रभुजी नी बैठक, जैन खिड़की, पटेल वाडा, सैयद वाडा और सावलिवाड.

Video: गोधरा में हिंदू-मुसलमान एक दूसरे के बारे में क्या सोचते हैं?

शेहरा सीट
2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के जेठाभाई घेलाभाई अहिर भारवाड़ ने कांग्रेस के तख्तसिंह सोलंकी को हराया था. बीजेपी ने इस बार भी जेठाभाई को ही टिकट दिया है. वो इसी शेहरा तालुके के अनियाड गांव से ताल्लुक रखते हैं. जहां तक जानकारी है, तो जेठाभाई के ऊपर एक आपराधिक मामला भी दर्ज है.

मोरवा हडफ
मोरवा हडफ से कांग्रेस की प्रत्याशी सविताबेन वेचाटभाई खांत जीती थीं. कांग्रेस ने इस बार आदिवासी नेता और पूर्व JD (U) विधायक छोटूभाई वसावा से हाथ मिलाया है. वसावा ने अभी कुछ दिनों पहली ही अपनी नई पार्टी बनाई है. भारतीय ट्रायबल पार्टी. इसने कांग्रेस से गठबंधन किया है. पांच सीटों से चुनाव लड़ रही है वसावा की पार्टी. ये पांचों सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. वसावा बहुत बड़े आदिवासी नेता हैं. उनके कद का दूसरा आदिवासी नेता नहीं है गुजरात में. वसावा भरूच के झागाडिया से विधायक हैं. उनकी पार्टी जिन सीटों से लड़ रही है, उनमें मोरवा हडफ भी शामिल है. वसावा की पार्टी का चुनाव चिह्न है ऑटोरिक्शा. वसावा शरद यादव वाले धड़े
के साथ थे. नीतीश और शरद वाले धड़े में ‘तीर’ चुनाव चिह्न को लेकर विवाद था. चुनाव आयोग ने इस निशान पर नीतीश वाले धड़े का हक माना. इसके बाद वसावा ने ऐलान किया कि उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ेगी.

Video: ये आदिवासी नेता बन सकता है गुजरात का किंगमेकर

कलोल सीट
कलोल सीट से बीजेपी के अरविंद सिंह दामसिंह राठौड़ जीते थे. पंचमहल के सांसद हैं प्रभातसिंह चौहान. बीजेपी के नेता हैं. दिसंबर में जब कई असंतुष्ट नेता गांधीनगर स्थित पार्टी ऑफिस के बाहर हंगामा करने पहुंचे थे, तो उसमें प्रभातसिंह चौहान भी शामिल थे. अपनी पत्नी को टिकट दिलाने के लिए फिल्डिंग कर रहे थे. चौहान साहब ने चार शादियां की हैं. अपनी चौथी बीवी रंगेश्वरी चौहान के लिए टिकट मांग रहे थे. उन्होंने खुलेआम बगावत की धमकी भी दी थी पार्टी को. अब बीजेपी ने खेल कर दिया. उनकी पत्नी की जगह बहू को टिकट दे दिया. जैसे ही लिस्ट आई, रंगेश्वरी चौहान आग-बबूला हो गईं. उन्होंने खुलेआम अपने पति प्रभातसिंह चौहान की ऐसी की तैसी कर दी. पति को चुनौती देते हुए उन्होंने फेसबुक पर लिख दिया- अगर प्रभातसिंह ने अपनी मां का दूध पीया है, तो कलोल में चुनाव प्रचार के लिए आकर दिखाएं. ये मेरा चैलेंज है.

हालांकि बाद में पार्टीवालों ने रंगेश्वरी को शांत कराया. प्रभातसिंह के पांच बेटे हैं. जो दूसरे नंबर वाला बेटा है, वो हिस्ट्रीशीटर है. दो बार चुनाव लड़ चुका है. 2007 में कलोल से और 2012 में गोधरा से. दोनों बार हार गया. पिछले साल कांग्रेस में शामिल हुआ था. 2017 में लोकल क्राइम ब्रांच ने उसके घर पर छापा मारा. IPL मैचों पर सट्टाबाजी करने का आरोप था उसके ऊपर. पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार भी किया था इस मामले में. कलोल में बीजेपी ने प्रभातसिंह चौहान की बहू को टिकट दिया है. उसका नाम है सुमन प्रवीणसिंह चौहान.

हलोल सीट

हलोल सीट से बीजेपी के जयद्रतासिंहजी चंद्रसिंहजी परमार को जीत हासिल हुई थी. इस बार भी बीजेपी ने परमार को ही टिकट दिया है.

पंचमहल की खास बातें
यहां लाख से बने ब्रेसलेट और खिलौने बनाने का काम भी खूब होता है. फसल: मक्का, बाजरा, चावल, दाल और तिलहन खनिज: सैंडस्टोन, ग्रेनाइट, मैगनीज.

भारत सरकार के MSME मंत्रालय की रिपोर्ट में पंचमहल की हालत का ब्योरा कुछ ऐसा है:

पानी की बहुत कमी है. लोग खेती के लिए बारिश पर निर्भर हैं. सिंचाई के साधनों का इतना विकास नहीं हुआ है. हर दूसरे साल सूखे की स्थिति होती है. काम की तलाश में लोगों को बाहर जाना पड़ता है. बिजली बहुत महंगी है. बिजली की कमी भी है. पानी की कमी भी बड़ी दिक्कत है. इंडस्ट्रियल इस्तेमाल के पानी की भी किल्लत है.


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