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गुजरात चुनावः उस ज़िले की कहानी जिसे अंग्रेज़ कभी नहीं जीत पाए

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गुजरात का सबसे छोटा जिला है डांग. इसका मुख्यालय है अहवा. जहां भारत के ज्यादातर इलाकों में लड़कियों की गिनती लड़कों से कम हैं, वहीं डांग का लिंगानुपात जानकर आपको खुशी मिलेगी. हर 1,000 पुरुष पर 1,007 महिलाएं हैं. डांग में रहने वालों को डांगी कहते हैं. कुल आबादी का करीब 93 फीसद हिस्सा आदिवासियों का है. ज्यादातर लोग आज भी अपनी रोजी-रोटी के लिए जंगलों पर निर्भर हैं. गरीबी बहुत ज्यादा है. करीब 73.84 फीसद आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीती है. गुजरात के सबसे पिछड़े और सबसे गरीब इलाकों में गिनती होती है इसकी. 2006 में पंचायती राज मंत्रालय ने डांग जिले को सबसे गरीब जिलों में शुमार किया था.

कोटवाली कबीले से एक बुज़ुर्ग बांस की टोकरी बुनते हुए (फोटोः टीआरटीआई)
कोटवाली कबीले से एक बुज़ुर्ग बांस की टोकरी बुनते हुए (फोटोः टीआरटीआई)

यहां रहने वाले कोटवाली कबीले के लोग बांस की खूबसूरत टोकरियां बनाते हैं. काठोड़ी कबीला खैर के पेड़ों से कत्था जमा करता है. ये ही कत्था पान में इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे ही परंपरागत पेशे हैं इनके. ये गुजरात के उन छह जिलों में से एक है, जिसे पिछड़ा प्रदेश फंड (बैकवर्ड रीजन्स ग्रांट फंड प्रोग्राम) के तहत पैसा मिलता है. आंकड़ों की ही बात हो रही है, तो ये भी बता देते हैं कि डांग जिले की गिनती गुजरात के सबसे कम आबादी वाले जिलों में होती है. कई लोग काम की तलाश में सूरत, वालसाड़ और बारडोली जैसे शहरों में चले जाते हैं. कई लोग महाराष्ट्र भी जाते हैं. ज्यादातर पलायन करने वाले बाहर जाकर भी खेतिहर मजदूरी का ही काम करते हैं.

डांग के आदिवासियों द्वारा बजाया जाने वाला एक बाजा. (फोटोः गुजरात टूरिज़म)
डांग के आदिवासियों द्वारा बजाया जाने वाला एक बाजा. (फोटोः गुजरात टूरिज़म)

अंग्रेज कभी डांग को नहीं जीत सके

इस इलाके में टीक (सागौन) के पेड़ बहुत हैं. स्थानीय लोग इसको साग भी कहते हैं. डांग के लोग इन पेड़ों अपनी बहुत बड़ी पूंजी मानते हैं. इन्हीं पेड़ों के लालच में अंग्रेज इस इलाके पर कब्जा करना चाहते थे. 1800 के दौर में जब अंग्रेजों ने डांग को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की, तो यहां के पांच भील राजा जमकर लड़े. ये भील राजा असल में अपने-अपने कबीलों के मुखिया थे. ये इतनी बहादुरी से लड़े कि
उनकी मिसाल दी जाती है.

अंग्रेजों ने लड़कर बहुत कोशिश की, मगर डांग को गुलाम नहीं बना सके. फिर उन्होंने बुद्धि भिड़ाई. 1842 में इन मुखियाओं के साथ मिलकर एक समझौता किया और टीक के पेड़ों को लीज़ पर ले लिया. डांग के लोग सागौन की खूबियों से वाकिफ थे, मसलन उसका पानी खाकर भी टिके रहना और सीधा रेशा जिससे बढ़िया फिनिशिंग मिलती है. लेकिन वो नहीं जानते थे कि सागौन की लकड़ी सामरिक महत्व की भी हो सकती है. लीज़ पर लिए पेड़ों को अंग्रेज़ों ने काटा और नौसेना (रॉयल नेवी) के लिए जहाज बनाए. कहते हैं कि ताजमहल की नींव में भी टीक की ही लकड़ी लगी है.

अंग्रेज़ नौसेना का जहाज़ एचएमएस रॉयल ओक. डांग कबीलों से समझौते के बाद यहां की सागौन से इस तरह के जहाज़ बनाए गए. (फोटोःविकिपीडिया कॉमन्स)
अंग्रेज़ नौसेना का जहाज़ एचएमएस रॉयल ओक. डांग कबीलों से समझौते के बाद यहां की सागौन से इस तरह के जहाज़ बनाए गए. (फोटोःविकिपीडिया कॉमन्स)

कबीलों का भरोसा जीतने के लिए अंग्रेज़ों ने एक काम और किया. उनके मुखिया को राजा का दर्जा दिया. फिर उन राजाओं को खुश रखने के लिए अंग्रेजों ने एक खास त्योहार की परंपरा शुरू की यहां. 15-दिन तक चलने वाला ‘डांग दरबार’. ये राजा के सम्मान में आयोजित कराया जाता था. राजा घोड़े पर बैठकर अपना सालाना लगान वसूलने आता.

डांग दरबार आज भी लगता है, जिसमें पाचों कबीलों के राजा आते हैं. (फोटोःवॉन्डरइंक)
डांग दरबार आज भी लगता है, जिसमें पाचों कबीलों के राजा आते हैं. (फोटोःवॉन्डरइंक)

पहला ‘डांग दरबार’ 1894 में आयोजित किया गया. ये परंपरा अब भी कायम है. इसकी याद में अब भी हर साल एक तीन दिन का सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है. वेन्यू होता है जिला मुख्यालय अहवा. पहले अंग्रेज इस कार्यक्रम की मेजबानी करते थे, अब जिला कलेक्टर करता है. डांग दरबार में अब भी राजा के परिवार को सालाना पेंशन दी जाती है. ‘डांग दरबार’ में यहां के 311 गांवों के 13 आदिवासी समाज के लोग शामिल होते हैं. पारंपरिक नाच-गाना होता है. तरह-तरह के पारंपरिक मुखौटे लगाते हैं. यहां का एक मशहूर नाच है, जिसमें औरतें पुरुषों के कंधों पर चढ़कर डांस करती हैं.

डांग के पांच राजघराने

डांग में कुल पांच राजघराने हैं. गढ़वी के राजा हैं किरण यशवंत राव पावर. दाहेर के राजा हैं तापत राव आनंद राव पावर. लिंगा के राजा हैं भावर हरशु सिंह सूर्यवंशी. वसुराना के राजा हैं धनराज सिंह चंद्र सिंह सूर्यवंशी. पिंपरी के राजा हैं टीकमराव साहेबराव पावर. पांचों जघरानों के राजा बग्घियों में बैठकर ‘डांग दरबार’ पहुंचते हैं. इस कार्यक्रम में नेता और सरकारी अधिकारी भी शिरकत करते हैं. राज्यपाल सभी  राजाओं को शॉल और प्रशस्ति पत्र देते हैं.

जब अमित शाह (मध्य) डांग दरबार में बतौर डांग के प्रभारी मंत्री शामिल हुए थे
जब अमित शाह (मध्य) डांग दरबार में बतौर डांग के प्रभारी मंत्री शामिल हुए थे

जब डांग के आदिवासी सरकार से लड़े

डांग के कबीलों का इतिहास संघर्ष से भरा रहा है. डांग में करीब 14 बड़े विद्रोह हुए. अंग्रेजों के राज में भी और उनके जाने के बाद भी. 1972 में जब वाइल्डलाइफ प्रॉटेक्शन एक्ट लागू हुआ, तब जंगल में रहने वाले इन आदिवासियों पर भी कई तरह के प्रतिबंध लग गए. इसके खिलाफ भी इन आदिवासियों ने संघर्ष किया. फिर 2006 में फॉरेस्ट राइट्स एक्ट आया. इनमें आदिवासियों की कई मांगें मानी गईं. आदिवासी कह रहे थे कि वन्य संसाधनों पर उनका जो पारंपरिक अधिकार है, वो बरकरार रखा जाए. इस नए कानून में उनकी ये बात काफी हद तक मानी गई.

ट्राइबल टूरिज़म

सरकार इन आदिवासियों की कमाई के तरीके बढ़ाने की कोशिश कर रही है. पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है. लोग आते हैं, होम-स्टे करते हैं. आदिवासियों के पारंपरिक कच्चे रंग-बिरंगे घरों में रहते हैं. यहां सरकार ने ‘रिस्पॉन्सिबल टूरिज्म’ नाम से एक स्कीम शुरु की है. इसमें पर्यटक मेहमान बनकर आते हैं और आदिवासी परिवार उनके मेजबान बनते हैं. जाहिर है, पर्यटक इस अनुभव के बदले पैसे देते हैं.

डांग में आज भी सरकारी कार्यक्रमों में लोकनृत्यों के ज़रिए जागरूकता संदेश दिए जाते हैं.
डांग में आज भी सरकारी कार्यक्रमों में लोकनृत्यों के ज़रिए जागरूकता संदेश दिए जाते हैं.

कुछ पैसा सागौन से भी आ जाता है

वयस्क हो चुके एक टीक के पेड़ की औसत कीमत एक लाख से ज़्यादा होती है. अंधाधुंध कटाई से बचाने के लिए सागौन की कटाई पर कड़े प्रतिबंध हैं. लेकिन सरकार ने डांग आदिवासियों को सागौन लगाने / काटने का विशेष अधिकार दिया है. इस विशेषाधिकार की कुछ सीमाएं भी हैं मगर. कितने पेड़ काटे जा सकते हैं, इसकी संख्या तय है. पांच साल में एक बार ही पेड़ काटे जा सकते हैं. 120 सेंटीमीटर मोटाई वाला पेड़ ही काटा जा सकता है.

कोंकण और मराठी प्रभाव भी है
14वीं और 15वीं सदी में कोंकण तट से पलायन करके आए लोग यहीं बस गए. इन्हें कोंकणी कबीला कहा जाता है. इसके अलावा एक वरली कबीला है. ये भी महाराष्ट्र से ही आया. उनके तरीकों में अब भी मराठी संस्कृति का असर है. खाने-पीने, पहनने, लोककला, सब महाराष्ट्र के असर से लिपा-पुता.

काठोडी कबीले के लोग कत्था बनाने का काम करते हैं (फोटोः टीआरटीआई)
काठोडी कबीले के लोग कत्था बनाने का काम करते हैं (फोटोः टीआरटीआई)

अब पॉलिटिक्स की बात करते हैं

डांग में केवल एक विधानसभा सीट है. चुनाव आयोग के रेकॉर्ड में इसका नाम ‘डांग्स’ दर्ज है. डांग की कुल आबादी करीब ढाई लाख है. इसका 95 फीसद हिस्सा आदिवासी हैं. ये जिला पारंपरिक तौर पर कांग्रेस को पसंद करता रहा है.

पिछले चुनाव का हाल
2012 के चुनाव में कांग्रेस के मंगलभाई गंगाजीभाई गावित ने बीजेपी के उम्मीदवार विजय पटेल को हराया था. जीत का अंतर था मात्र 2,422 वोट. इतने कम अंतर से मिली हार का ही असर है कि बीजेपी ने दोबारा अपने हारे हुए प्रत्याशी विजय पटेल पर भरोसा जताया है.

Video: डांग के मुख्यालय अहवा से लोक नृत्य देखें

पब्लिक गावित से नाराज़ है
डांग अपने कांग्रेस विधायक से नाराज है. लोगों का कहना है कि मंगलभाई गावित कभी उनके दुख-दर्द पूछने नहीं आए. साल में कभी एक-आध बार आते भी थे, तो बिना खोज-खबर लिए निकल जाते थे. अब यहां लोग बीजेपी के हाथों हुए विकास की बात कर रहे हैं. उनका कहना है कि अब बीजेपी को मौका देकर देखेंगे. पूछो कि बीजेपी ने क्या किया है, तो लोग गिनाते हैं. स्कूल में मिलने वाला मिड-डे मील, अच्छी सड़कें, बिजली, पानी की आपूर्ति और सबसे बढ़कर प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत घर. गांव में जितना भी विकास दिखता है, उसका श्रेय लोग बीजेपी को देते हैं. लोगों का कहना है कि बीजेपी ने यहां अस्पताल और स्कूल भी खुलवाए हैं. उज्ज्वला योजना को लेकर भी लोगों में काफी अच्छा रिस्पॉन्स है.

डांग के लोग अपने विधायक मंगलभाई गवित से नाराज़ चल रहे हैं
डांग के लोग अपने विधायक मंगलभाई गवित से नाराज़ चल रहे हैं

ये समर्थन दिलचस्प है. वजह है पड़ोसी जिला तापी. वहां के लोग बीजेपी से खफा हैं. कहते हैं, काम बिल्कुल नहीं हुआ. तापी के लोगों का कहना है कि न उनको बिजली मिलती है, न अच्छी सड़क और न ही कोई और सुविधाय अड़ोस-पड़ोस में बसे तापी और डांग की राजनैतिक हवा बिल्कुल अलग है. दोनों की बातें अलग हैं. डांग में बदलाव का माहौल साफ दिख रहा है. पारंपरिक तौर पर कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले इस इलाके ने साल 2007 में अपने लिए बीजेपी विधायक को चुना था. वो ही, विजय भाई पटेल. फिर 2012 में डांग ने विजय पटेल को हरा दिया. अब फिर उनके जीतने के पूरे आसार हैं. जैसे तापी इन दिनों खुलकर कांग्रेस को वोट देने की बात करता है, वैसे ही डांग खुलेआम बीजेपी को वोट देने की बात करता है.

मुद्दे जो चुनाव प्रभावित कर सकते हैं
– स्कूलों में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कई सीटें खाली हैं. लोग इसकी शिकायत करते हैं.
– बेरोजगारी खूब है. इसके चलते पलायन भी होता रहता है.


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