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गुजरात के इस जिले में नौ बार से एक कांग्रेसी नेता बीजेपी को छका रहा है

गुजरात चुनाव-2017 के दौरान हम बता रहे हैं अलग-अलग विधानसभाओं के हाल, वहां का जीवन और ऐसी कहानियां जो कम ही जानने में आती हैं.

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तीन विधानसभा सीटों वाला छोटा उदयपुर जिला गुजरात का आदिवासी मेजॉरिटी इलाका है. तीनों सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं. मध्य प्रदेश की सीमा से सटा हुआ ये जिला पहले वड़ोदरा जिले का हिस्सा था. 26 जनवरी, 2013 को इसे अलग कर गुजरात का 28वां जिला बना दिया गया.

इतिहास में देखें, तो आजादी के पहले छोटा उदयपुर एक देसी रियासत हुआ करती थी. उदयसिंहजी रावल ने सन् 1743 में इसकी नींव रखी थी. ये जो उदयसिंह रावल थे, वो चंपानेर के पटवाई रावल के वंशज थे. 10 मार्च, 1948 को ये आजाद भारत का हिस्सा बन गया. यहां आपको बड़े खूबसूरत घर मिलेंगे. मिट्टी के कच्चे घरों पर बेहद सुंदर पिथौड़ा पेंटिंग बनी होती हैं.

रावठा समुदाय के घरों में इस तरह की पिथौरा पेंटिंग बनी होती हैं.
रावठा समुदाय के घरों में इस तरह की पिथौड़ा पेंटिंग बनी होती हैं.

ऐसी खूबसूरत लगती हैं कि क्या बताएं. ये चित्रकारी यहां की खासियत है. हजारों साल पुरानी है ये शैली. आसपास के गांवों में जो लोकल हाट-बाजार लगता है, वहां भी आपको इस पिथौड़ा पेंटिंग की कई चीजें मिल जाएंगी. हर  शनिवार को लोकल हाट में खूब सारा  सुंदर-सुंदर सामान मिल जाएगा. ज्यादातर राठवा समुदाय के लोग करते हैं ये पेंटिंग. इसके रंग बनाने का तरीका बड़ा दिलचस्प है. शराब और दूध में रंग मिलाया जाता है और फिर इससे फूल-पत्तियां उकेरी जाती हैं.

यहीं से घर-घर वोट मांगना यहीं शुरू किया था अमित शाह ने

यहां एक गांव है. देवलिया. अमित शाह ने गुजरात के आदिवासी इलाकों में एक खास योजना शुरू की थी. घर-घर जाकर वोट मांगने वाली. उसकी शुरुआत देवलिया से ही हुई थी. यहीं एक आदिवासी के घर में खाना खाया था अमित शाह ने. बीजेपी इन आदिवासी इलाकों को जीतने में सारा जोर लगा रही है. जब चुनाव के नतीजे आएंगे, तो पता चलेगा कि अमित शाह के देवलिया जाने और आदिवासी के घर खाना खाने से क्या असर हुआ. मालूम चलेगा कि ये नेता लोग जो आम लोगों-दलितों-आदिवासियों के घर खाना खाते हैं, उस दांव का कोई असर होता भी है या नहीं.

मई 2017 में अमित शाह ने देवलिया में एक राठवा आदिवासी परिवार के घर खाना खाया था. (फोटोःपीटीआई)
मई 2017 में अमित शाह ने देवलिया में एक आदिवासी परिवार के घर खाना खाया था. (फोटोःपीटीआई)

जिले में कुल तीन विधानसभा सीटें हैं:
छोटा उदयपुर (ST)
पावी जेतपुर (ST)
संखेड़ा (ST)

छोटा उदयपुर सीट
2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मोहनसिंह छोटूभाई राठवा जीते थे यहां से. राठवा नौ बार विधायक रह चुके हैं. बहुत मजबूत उम्मीदवार माने जाते हैं. शंकर सिंह वाघेला जब कांग्रेस छोड़कर चले गए, तब इन्हें ही नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. मोहनसिंह राठवा 10 बार विधायक बने होते. मगर 2002 में हार गए थे. ये 11वीं बार है, जब वो चुनाव लड़ने जा रहे हैं. बीजेपी ने जित्तू राठवा को उनके खिलाफ उतारा है. जित्तू राठवा नए चेहरे हैं. दो साल पहले बीजेपी ने उन्हें जिला अध्यक्ष बनाया था. इनकी छवि अच्छी है. बीजेपी कह रही है कि इतने साल से मोहनसिंह राठवा जीतते आए हैं, लेकिन उन्होंने किया? मामला किस ओर झुकेगा, ये कहा नहीं जा सकता. हां, इतना तय है कि जित्तू राठवा को खारिज नहीं किया जा सकता है.

Video: क्या पोलिंग बूथ में कैमरे लगे होने की धमकी दी गई

पावी जेतपुर सीट
2012 के चुनाव में बीजेपी के जयंतीभाई सावाजीभाई राठवा को जीत मिली थी. जयंतीभाई दबंग नेता माने जाते हैं. कांग्रेस ने अपने पुराने चेहरे सुखराम को ही टिकट दिया है.

संखेड़ा सीट 
2012 के चुनाव में कांग्रेस के धीरूभाई चुनीलाल भील ने जीत हासिल की थी. धीरूभाई काफी लोकप्रिय नेता हैं. जीतने के बाद भी लोगों से मेल-जोल बनाए रखते हैं. गुरुवार को इनका स्थानीय दफ्तर खुलता है. वहां बैठकर धीरूभाई लोगों की दिक्कतें सुनते हैं. पाटीदार फैक्टर भी यहां एक मुद्दा है. आबादी के हिसाब से देखें, तो भील और तड़वी दोनों समुदायों की करीब-करीब बराबर मौजूदगी है. इसीलिए कांग्रेस के भील उम्मीदवार के खिलाफ बीजेपी ने अभयसिंह तड़वी को उतारा है.

राठवा तिकड़ी में लड़ाई से कांग्रेस को नुकसान हो सकता है
यहां कांग्रेस के तीनों बड़े स्थानीय नेता आपस में ही लड़ रहे हैं. छोटा उदयपुर जिले की अब तक की राजनीति राठवा तिकड़ी के इर्द-गिर्द घूमती आई है. मोहनसिंह राठवा, पूर्व जूनियर रेलमंत्री नारन राठवा और सुखराम राठवा. नारन छोटा उदयपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते थे. मोहनसिंह छोटा उदयपुर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ते और सुखराम पावी जेतपुर सीट से लड़ते थे. अब तीनों में कलह हो गई है.

संग्रामसिंह राठवा (बाएं) के टिकट मिलने की घोषणा करने से कांग्रेस में घमासान शुरू हो गया था (फोटोःफेसबुक)
संग्रामसिंह राठवा (बाएं) के टिकट मिलने की घोषणा करने से कांग्रेस में घमासान शुरू हो गया था (फोटोःफेसबुक)

ये हुआ नारन राठवा के बेटे संग्रामसिंह की एंट्री के कारण. संग्रामसिंह नगरपालिका प्रमुख भी हैं. 2012 के चुनाव में भी संग्रामसिंह अपने लिए फिल्डिंग लगा रहे थे. मगर बात बनी नहीं. इस बार भी संग्रामसिंह ने टिकट मांगा, मगर बात फिर नहीं बनी. पार्टी आलाकमान ने कहा कि उनके पिता को लोकसभा टिकट मिलता है. सो संग्रामसिंह को विधानसभा टिकट नहीं दिया जा सकता. संग्रामसिंह ने तो लिस्ट जारी किए जाने से पहले ही एक वीडियो बनाकर जारी कर दिया था. टिकट दिए जाने का शुक्रिया जताते हुए. ये वीडियो सोशल मीडिया पर फैल भी गया. उनकी और पार्टी की, दोनों की किरकिरी हुई इससे. संग्रामसिंह के कारण तीनों नेताओं के बीच का पूरा जमा-जमाया समीकरण बिगड़ गया. इस मनमुटाव के कारण कांग्रेस के लिए स्थितियां थोड़ी मुश्किल हो गई हैं. टिकट की इस लड़ाई में राजनीति के साथ-साथ परिवार का भी टंटा खड़ा हो गया है. सुखराम राठवा की बेटी मोहनसिंह की बहू हैं. उनके बेटे राजू की शादी हुई है उसके साथ.

पाटीदार फैक्टर
पाटीदार नेता हार्दिक पटेल भी यहां चुनाव प्रचार के लिए आए थे. उन्होंने संखेड़ा तालुका के टिंबा गांव का दौरा किया था. यहां पाटीदारों की अच्छी-खासी तादाद है. छोटा उदयपुर जिले में करीब 30,000 पाटीदार हैं. हार्दिक ने अपने भाषण में कहा कि पाटीदारों को भी दलितों की ही तरह एकजुट हो जाना चाहिए. तभी सत्ता उनकी बात सुनेगी. हार्दिक ने कहा कि जिस तरह दलित जिग्नेश मवानी के साथ हैं, वैसे ही पाटीदारों को भी उनका (हार्दिक का) साथ देना चाहिए.

छोटा उदयपुर में 30, 000 के करीब पाटीदार हैं. हार्दिक एक रैली में उनसे कह गए हैं कि दलितों की तरह संगठित हो जाएं
छोटा उदयपुर में 30, 000 के करीब पाटीदार हैं. हार्दिक इलाके में हुई एक रैली में उनसे कह गए हैं कि दलितों की तरह संगठित हो जाएं.

गोधरा के बाद बीजेपी को पहली बार कामयाबी मिली थी यहां 
2002 तक तो बीजेपी को यहां कामयाबी ही नहीं मिली थी. 2002 के समय यहां चार विधानसभा सीटें हुआ करती थीं. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण उस साल पहली बार बीजेपी को यहां कामयाबी मिली. हिंदुत्व के दम पर उसने चारों सीटें जीत लीं. फिर जिले का दोबारा गठन हुआ और छोटा उदयपुर अलग जिला बन गया. इसके हिस्से में तीन विधानसभा सीटें आईं. 2012 में दो सीटें कांग्रेस को और एक सीट बीजेपी को मिली.

साधु ने खुश होकर लाख का काम सिखाया, आज दुनिया में नाम है 

संखेड़ा की हस्तकला दुनियाभर में मशहूर है. जब भी कोई बड़ी शख्सियत गुजरात आती है, तो अक्सर उन्हें संखेड़ा की कुर्सियों पर बिठाया जाता है. इस हस्तकला की एक कहानी है. कहते हैं कि 150 साल पहले एक साधू संखेड़ा आए थे. ग्रामीणों ने साधू की बहुत सेवा की. साधू ने खुश होकर ग्रामीणों को ये फर्नीचर बनाने की कला सिखा दी. इसकी खासियत है फर्नीचर के ऊपर लगाया जाने वाला लाख और रंग का काम. इस संखेड़ा फर्नीचर की दुनियाभर में बहुत मांग है. वो याद है जब शी चिनपिंग और प्रधानमंत्री मोदी साबरमती रिवरफ्रंट पर साथ बैठकर झूला झूल रहे थे. वो झूला संखेड़ा का ही था. जब शिंजो आबे और उनकी पत्नी भारत आए थे, तब उन्हें भी संखेड़ा में बनी कुर्सियों पर ही बिठाया गया था. भारत के बड़े शहरों के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और खाड़ी देशों में भी भेजे जाते हैं यहां के फर्नीचर.

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यहां ‘नेटवर्क’ वाला ‘विकास’ नहीं पहुंचा है
जिस ‘गुजरात मॉडल’ की देश-दुनिया में चर्चा है, छोटा उदयपुर में उसकी निशानियां कम ही नज़र आती हैं. मुकेश अंबानी गुजरात से हैं. उनके जियो ने न जाने कितने लोगों का जीना का तरीका बदल दिया है. लेकिन छोटा उदयपुर के कई इलाकों से ‘जियो’ और ‘विकास’ दोनों गायब हैं. इसलिए जिला चुनाव अधिकारी ने छोटा उदयपुर जिले की कई पोलिंग बूथ के लिए अलग से सुविधाएं मांगी हैं. 37 पोलिंग बूथों को ‘शैडो जोन’ घोषित किया गया है. इनमें से 24 बूथ नसवाड़ी और संखेड़ा तालुका में आते हैं. इन इलाकों में नेटवर्क है ही नहीं. चुनाव आयोग ने संचार संपर्क कायम करने के लिए वन विभाग और पुलिस से मदद मांगी है. ताकि चुनाव ठीक तरह से कराया जा सके.

वो बातें जो चुनाव में मुद्दे बन सकती हैं

1. पानी की काफी परेशानी है. बहुत किल्लत है यहां.
2. लोगों के पास काम-धंधा है नहीं. इस कारण माइग्रेशन बहुत होता है. लोग मजदूरी की तलाश में सौराष्ट्र चले जाते हैं.
3. संखेड़ा का हैंडीक्राफ्ट और फर्नीचर मार्केट जीएसटी की मार झेल रहा है. यहां का फर्नीचर दुनियाभर में मशहूर है, मगर GST के अंदर इसको 28 फीसद वाले स्लैब में रखा गया है. इससे कारीगर परेशान हैं. काम बहुत मंदा हो गया है.
4. पूरे गुजरात की तरह ये इलाका भी बेरोजगारों से भरा पड़ा है.


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