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वो शहर जिसने सदी की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक का सामना किया था

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गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में एक नदी है मच्छू. समुद्र से इसकी दूरी तकरीबन 30 किलोमीटर है. इस नदी के किनारे एक शहर बसा हुआ है मोरबी. आजादी से पहले यह देसी राज्य पूर्वी काठियावाड़ सब-एजेंसी में शामिल था. यहां पर जडेजा राजपूतों का शासन था, जो खुद को कच्छ के राव का वंशज मानते थे. फिलहाल मोरबी का जो स्वरूप है, वो वाघजी की देन है, जिन्होंने 1879 से 1948 तक मोरबी पर शासन किया था.

अपने शासन काल के दौरान वाघजी ने सड़कों का जाल बिछवाया. इसके अलावा वढ़वाड और मोरबी को जोड़ने वाले रेलमार्ग का भी निर्माण करवाया. नमक और कपड़े का कारोबार करने के लिए वाघजी ने दो छोटे बंदरगाह नवलखा और ववानिया का भी निर्माण करवाया था. मोरबी में जो रेलवे स्टेशन है वो स्थापत्य कला का एक नमूना है, जिसमें भारतीय और यूरोपीय स्थापत्य कला का नमूना देखने को मिलता है. 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ उसके कुछ महीनों के बाद मोरबी को 15 फरवरी 1948 को सौराष्ट्र में शामिल कर लिया गया.

मोरबी का दरबारगढ़ पैलेस.
मोरबी का दरबारगढ़ पैलेस.

जब आया था सैलाब

मोरबी को देश की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक त्रासदी का भी सामना करना पड़ा था. वो साल था 1979 और महीना था अगस्त का. मोरबी के आसपास के इलाके में पिछले 10 दिनों से बारिश हो रही थी. 9 अगस्त से बारिश ने और रफ्तार पकड़ ली थी. 11 अगस्त 1979 को दिन के 3 बजे थे. अचानक से सड़कों पर तेजी से पानी भरने लगा. पानी की ऊंचाई बढ़ती जा रही थी. 5 फीट, 10 फीट. देखते-देखते ये 25 फीट तक हो गई. पूरे मोरबी में अफरा-तफरी मच गई. रात 8 बजे तक सब तहस-नहस हो चुका था. जो लोग किसी तरह बच गए थे, वो सदमे में थे. ऐसा सदमा जो वक्त के साथ भी खत्म न होने वाला था. दावा किया गया कि 7000 लोगों को बचा लिया गया था. पर जो मरे, वो बेहिसाब थे.

11 अगस्त 1979 को गुजरात के मोरबी में डैम टूटने के इतिहास में सबसे बड़ी त्रासदी हुई थी.
11 अगस्त 1979 को गुजरात के मोरबी में डैम टूटने के इतिहास में सबसे बड़ी त्रासदी हुई थी.

ये आपदा मच्छू डैम के टूटने से आई थी. डैम का सारा पानी बहकर इस गांव के ऊपर से गुज़र गया था और सब तहस-नहस कर गया था. इंडिया टुडे में 1979 में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटना से पूरा गुजरात, देश और दुनिया अगले 24 घंटे तक अनजान रहे. 12 अगस्त को रेडियो पर इस घटना के समाचार सुनाए गए थे. और तब तक मोरबी गांव में मदद के लिए जाने को बहुत देर हो चुकी थी. खुद मोरबी प्रशासन को मच्छू डैम के टूटने की घटना की जानकारी 15 घंटे बाद मिली थी. तब तक जो मोरबी में थोड़ा पानी पहुंचा था, उसे मच्छू नदी से ओवरफ्लो हुआ पानी समझा जा रहा था. इसीलिए लोगों को सतर्क तक नहीं किया गया. नतीजतन पूरा कस्बा उजड़ गया.

मोरबी त्रासदी में सरकारी आंकड़ों में 1000 तो विपक्ष के अनुसार 20 हजार मौतें हुईं थीं.
मोरबी त्रासदी में सरकारी आंकड़ों में 1000 तो विपक्ष के अनुसार 20 हज़ार मौतें हुई थीं.

एक अनुमान के मुताबिक इस हादसे में कम से कम 10 हजार लोग मारे गए थे. पीएम मोदी ने जब पिछले दिनों 28 नवंबर को मोरबी में एक जनसभा की थी तो उसमें इस हादसे का और उस वक्त की केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार का ज़िक्र कर उन्हें कटघरे में खड़ा किया था.

हादसे के वक्त मोरबी जिला नहीं, एक कस्बा भर था. 15 अगस्त 2013 को जब गुजरात में सात नए जिले बने तो उनमें से एक मोरबी भी था. मोरबी में पांच तालुका हैं. इनमें से मोरबी, मालिया, टंकारा और वाकांनेर पहले राजकोट जिले में शामिल थे, जबकि एक तालुका हलवाद सुरेंद्रनगर जिले में शामिल था. सभी को मिलाकर एक जिला बना दिया गया. इस जिले में तीन विधानसभा की सीटें हैं.

मोरबी में लोगों की मदद को पहुंचे आरएसएस स्वयंसेवक भी मुंह ढकने को मजबूर थे.
मोरबी में लोगों की मदद को पहुंचे आरएसएस स्वयंसेवक भी मुंह ढकने को मजबूर थे.

1. मोरबी

मोरबी में 2012 के चुनाव में बीजेपी के कांतिलाल शिवलाल अमरुतिया ने जीत दर्ज की थी. उन्होंने कांग्रेस के ब्रिजेश मेरजा को 2700 से अधिक वोटों से हराया था. 2007 में भी ये सीट बीजेपी के ही पास थी और उस वक्त भी यहां से कांतिलाल शिवलाल अमरुतिया ने ही जीत दर्ज की थी. उस वक्त उनके सामने कांग्रेस के जयंतीलाल जेराभाई पटेल को 22 हजार से अधिक वोटों से हराया था. इस चुनाव में कांग्रेस ने फिर से ब्रिजेश मेरजा को ही उम्मीदवार बनाया है. बीजेपी ने अपने विधायक कांतिलालभाई अमरुतिया को ही चुनावी मैदान में उतारा है.

मोरबी में सबसे ज्यादा वोटर पाटीदार समाज के हैं. गुजरात में जब हार्दिक के नेतृत्व में पाटीदार अनामत आंदोलन हुआ, तो मोरबी इसका केंद्र बिंदु था. आंदोलन के दौरान जब हिंसा भड़की थी, तो सबसे ज्यादा सरकारी संपत्ति का नुकसान मोरबी में ही हुआ था. आंदोलन के बाद जब स्थानीय निकाय चुनाव हुए तो बीजेपी का गढ़ रही मोरबी में जिला पंचायत की सीट कांग्रेस के खाते में चली गई. मोरबी नगरपालिका और जिले की पांच तालुका पंचायत की सीटों पर भी कांग्रेस ने कब्जा जमा लिया था. हालांकि कांग्रेस ने अपने विवाद में मोरबी नगरपालिका की सीट गंवा दी और वो बीजेपी के खाते में चली गई. गुजरात में जब नर्मदा बांध का निर्माण पूरा हो गया, तो बीजेपी सरकार ने प्रदेश में नर्मदा रथ यात्रा निकाली थी. जब यह रथयात्रा मोरबी में आई तो वहां उसका विरोध हुआ और स्थानीय लोगों ने रथ को गांवों में नहीं घुसने दिया गया.

नर्मदा रथ यात्रा रवाना होते हुए.
नर्मदा रथ यात्रा रवाना होते हुए.

पाटीदारों के बाद मोरबी सीट पर लघुमति समाज के वोटर हैं. इस शहर की सबसे बड़ी दिक्कत ट्रैफिक और पॉल्यूशन है. मोरबी का सिरेमिक उद्योग (मिट्टी के बर्तन) पूरे देश में मशहूर है. यहां लगभग एक हजार छोटे-बड़े सिरेमिक उद्योग हैं. देश में सिरेमिक टाइल्स का लगभग 75 फीसदी और दुनिया में सिरेमिक टाइल्स का लगभग 5 फीसदी यहीं बनता है. लगातार 24 घंटे चलने वाली फैक्ट्रियों की वजह से यहां के पूरे इलाके की हवा प्रदूषित है. यहां की बनी टाइल्स की सप्लाई विदेश में भी होती है, लेकिन यहां ट्रांसपोर्टेशन का सिस्टम डेवलप नहीं हो पाया है.

मोरबी के लिए सीधी रेलवे लाइन या फिर कोई सीधा समुद्री मार्ग नहीं है. इसके अलावा शिक्षा का स्तर भी नीचे है, जिससे रोजगार का भी संकट है. मोरबी में पानी का संकट एक बड़ी समस्या है. खासतौर पर किसान सिंचाई के पानी के लिए पूरे साल परेशान रहते हैं. ये दिक्कत तब है, जबकि यहां से नर्मदा कैनाल गुजरती है. सिरेमिक उद्योग के अलावा मोरबी में घड़ियों का भी उत्पादन होता है. यहां की बनी घड़ियों की सप्लाई देश-विदेश में होती है. इसके अलावा समुद्र से नजदीकी का भी फायदा मोरबी को मिलता है और यहां पर नमक उद्योग भी फल-फूल रहा है.

2. टंकारा

2012 के विधानसभा चुनाव में टंकारा सीट बीजेपी के मोहनभाई कल्याणजीभाई कुंदरिया के खाते में आई थी. उन्होंने कांग्रेस के मगनभाई धनजीभाई वडाविया को 15 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया था. 2014 में जब उपचुनाव हुए तो मोहनजीभाई कल्याणजीभाई कुंदरिया लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद पहुंच गए. उन्होंने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद फिर से चुनाव हुए. 2014 के उपचुनाव में भी बीजेपी ने बाजी मार ली. बीजेपी ने हंसराजभाई मेटालिया को चुनावी मैदान में उतारा था. उन्होंने कांग्रेस के ललितभाई करमसिंह भाई को 11 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया था.

मोहनजी भाई कुंदारिया.
मोहनजी भाई कुंदारिया.

2007 के चुनाव में भी ये सीट मोहनभाई कल्याणजीभाई कुंदरिया के खाते में ही थी. उस वक्त उनके सामने कांग्रेस के ब्रिजेश मेरजा था, जिन्हें 19 हजार से अधिक वोटों से हार मिली थी. इससे पहले के चुनावों 2002, 1998 और 1995 में भी यहां से विधायक मोहनभाई ही बने थे. ये सीट 1990 से ही बीजेपी के खाते में है. 1990 में इस सीट से केशुभाई पटेल ने चुनाव जीता था. 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने ललितभाई करमसिंह भाई को ही उम्मीदवार बनाया है. बीजेपी ने राघवजीभाई गडारा पर दाव लगाया है.

ये सीट भी पाटीदार बहुल है और यहां भी पाटीदारों का वोट ही निर्णायक होता है. इस इलाके की सबसे बड़ी दिक्कत पीने का पानी, खराब रास्ते और ट्रांसपोर्टशन की सुविधा का अभाव है. टंकारा में ही महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म हुआ था. दयानंद सरस्वती ने ही 1876 में स्वराज्य का नारा दिया था, जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने भी आगे बढ़ाया था. यहां पर सरकार एक अदद बस स्टैंड भी नहीं बनवा पाई है. यहां पर कपास की खूब खेती होती है, लेकिन किसानों को उनकी फसलों का ठीक-ठीक पैसा न मिलने के कारण सरकार से नाराजगी है. 1990 में केशुभाई पटेल इसी सीट से जीतकर गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे. बीजेपी के प्रदेश नेतृत्व के साथ ही स्थानीय विधायक हंसराजभाई बावनजीभाई से पाटीदार नाराज हैं, जिसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है.

महर्षि दयानंद सरस्वती.
महर्षि दयानंद सरस्वती.

3. वाकानेर

मोरबी जिले की ये इकलौती सीट है जहां से कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. यहां मोहम्मद जावेद अब्दुलमुतालिब पीरजादा ने बीजेपी के जितेंद्रभाई कांतिलाल सोमानी (जीतू सोमानी) को पांच हजार से अधिक वोटों से हराया था. 2007 के चुनाव में भी यहां से कांग्रेस के पीरजादा ने जीत दर्ज की थी. उस वक्त उनके सामने ज्योत्सनाबेन जितेंद्रभाई सोमानी थीं. ज्योत्सनाबेन ये चुनाव 18 हजार से अधिक वोटों से हार गई थीं. इस बार फिर से कांग्रेस ने पीरजादा को ही उम्मीदवार बनाया है. वहीं बीजेपी की ओर से फिर से जीतूभाई ही उम्मीदवार हैं. पीरजादा गुजरात के मात्र दो मुस्लिम विधायकों में से एक हैं. उनके पिता अब्दुल पीरजादा ने 1971 चुनाव में केशुभाई पटेल को पटखनी दी थी. 2002 के चुनाव में बीजेपी की ज्योत्सनाबेन ने पीरजादा को 9 हजार से अधिक वोटों से मात दी थी.

केशुभाई पटेल.
केशुभाई पटेल.

वांकानेर सीट पर लघुमति और कोली मतदाताओं का प्रभुत्व है. सबसे ज्यादा वोटर लघुमति समुदाय के हैं, जो परंपरागत तौर पर कांग्रेस के वोटर माने जाते हैं. उनके बाद कोली समुदाय का वोट है, जो परंपरागत तौर पर बीजेपी का माना जाता है. वाकांनेर मोरबी जिले की सबसे बड़ी तहसील है, लेकिन यहां विकास का नामोनिशान नहीं है. सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि राज्य में बीजेपी की सरकार है और दो बार से यहां कांग्रेस का उम्मीदवार जीत रहा है. यहां का मुख्य उद्योग सिरेमिक और सेनेटरी का है. यहां पर खेती भी बड़ी मात्रा में होती है.

मोरबी जिले में देखने के लिए बहुत सी खूबसूरत चीजें हैं. इनमें दरबारगढ़, मनि मंदिर, विलिंगडन सचिवालय, लटका हुआ पुल, आर्ट डैको महल और लखधीरजी इंजीनियरिंग कॉलेज हैं. दरबारगढ़ मच्छू नदी के किनारे स्थित है जो मोरबी शासकों का स्थायी निवास था. इस महल में प्रवेश के लिए महल के बाहरी भाग में खम्भों पर बनी हुई मेहराबों के कठिन रास्ते को पार करके जाना पड़ता था. दरबारगढ़ को अब हैरिटेज होटल में बदल दिया गया है.


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