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वो शहर जो 650 साल तक गुजरात की राजधानी बना रहा

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पटोला साड़ियों का नाम सुना है. सुना ही होगा. बेहद खूबसूरत होती हैं. पूरी दुनिया में इन साड़ियों की दीवानगी है. हथकरघे पर इसकी बुनाई होती है. दो मजदूर मिलकर एक साड़ी को तैयार करने में छह महीने से एक साल का वक्त लेते हैं. साड़ी दोनों तरफ से बुनी जाती है, जिसपर कोई लड़की, हाथी, तोता, पीपल की पत्ती, फूल और ऐसी ही आकृति उकेरी जाती है. इसके लिए रेशम के धागों का इस्तेमाल किया जाता है. एक साड़ी की शुरुआती कीमत तकरीबन एक से डेढ़ लाख रुपए होती है. साड़ी बनाने की ये प्रथा करीब 700 साल पुरानी है. ये साड़ी गुजरात के पाटन जिले में बनती है.

पाटन पटोला साड़ी.
पाटन पटोला साड़ी.

पाटन की स्थापना 745 ईस्वी में वनराज छावड़ा ने की थी. स्थापना के वक्त इसका नाम रखा गया था अन्हिलपुर पाटन या अन्हिलवाड़ पाटन. मध्यकालीन इतिहास देखेंगे तो पाएंगे कि ये पाटन गुजरात की राजधानी था. ये 650 साल तक पाटन गुजरात की राजधानी बना रहा था. लोककथाओं के मुताबिक इस शहर की स्थापना सरस्वती नदी के किनारे हुई थी. शहर को वनराज छावड़ा ने अपने दोस्त अनहिल भारवाड़ की याद में बनाया था. इस राज्य पर सोलंकी राजाओं ने तकरीबन 300 सालों तक शासन किया. सोलंकी शासनकाल 942 से 1244 तक माना जाता है. सन 1000 के आस-पास ये शहर दुनिया का 10वां सबसे बड़ा शहर था. इस वक्त में पाटन ने व्यापार, शिक्षा और आर्किटेक्चर में महारत हासिल कर ली थी.

इसके अलावा पाटन जैन धर्म का भी केंद्र बिंदु बन गया था. सोलंकी राजाओं में भी करनदेव और सिद्धराज के शासन के दौरान पाटन ने खूब विकास किया था. इन राजाओं ने पाटन में 7224 कुएं और 5125 तालाब बनवाए थे, ताकि लोगों को किसी तरह से पानी की दिक्कत न हो. 13वीं शताब्दी के अंत में पाटन पर अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलूग खान ने हमला कर दिया और पूरे शहर को बर्बाद कर दिया. 1304 से 1411 के दौरान पाटन दिल्ली सल्तनत का सूबा मुख्यालय हुआ करता था. 1411 में सुल्तान अहमद शाह ने राजधानी अहमदाबाद ट्रांसफर कर दी. 18वीं शताब्दी में पाटन बड़ौदा रियासत का एक हिस्सा था. देश की आजादी के दौरान बड़ौदा रियासत बॉम्बे स्टेट में शामिल था. 1960 में इसे महाराष्ट्र और गुजरात दो भागों में बांटा गया, तो पाटन गुजरात के हिस्से में आ गया.

रानी की कीव, पाटन.
रानी की वाव, पाटन.

इस शहर की दो ऐतिहासिक इमारतों सहस्त्रलिंग सरोवर और रानी की वाव का आर्किटेक्चर पूरे देश-दुनिया में जाना जाता है. रानी की वाव को तो यूनेस्को ने संरक्षित इमारतों का दर्जा दिया है. इस वाव को रानी उदयमति ने अपने पति भीमा की याद में बनवाया था. भीमा ने 1022 से 1063 तक शासन किया था. इस पाटन को 2 अक्टूबर 1997 को जिले का दर्जा दिया गया था. मेहसाना और बनासकांठा जिले के हिस्से को काटकर बनाया गया था. इस जिले में विधानसभा की चार सीटें हैं-

1. राधानपुर

राधानपुर में 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नागरजी हरचंदजी ठाकोर ने जीत दर्ज की थी. नागरजी ने कांग्रेस के भावसिंहजी दयाजी राठौड़ को 3800 से अधिक वोटों से हराया था. 2007 के चुनाव में भी ये सीट बीजेपी के ही पास थी. बीजेपी के शंकरभाई लगधीरभाई चौधरी ने कांग्रेस के रघुभाई मेराजभाई देसाई को 27 हजार से अधिक वोटों से हराया था. इस बार बीजेपी ने लविंगजी ठाकोर को उम्मीदवार बनाया है. उनके सामने कांग्रेस से अल्पेश जाला मैदान में हैं.

लविंगजी ठाकोर.
लविंगजी ठाकोर.

इस बार जुलाई-अगस्त में भारी बारिश की वजह से जो बाढ़ आई थी, उसमें राधानपुर भी प्रभावित हुआ था. राहत और बचाव कार्य देखने के लिए उस वक्त खुद मुख्यमंत्री विजय रूपानी राधानपुर गए थे. वहां उन्होंने घोषणा की थी कि प्रभावित किसानों को 30,000 रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मुआवजा दिया जाएगा, लेकिन किसानों का कहना है कि उन्हें मुआवजा नहीं मिला. सरकारी आंकड़ों में मुआवजा बांटा जा चुका है. किसानों का कहना है कि जिनकी फसल को नुकसान नहीं हुआ, उन्हें पैसे दे दिए गए. जिनकी फसलों को नुकसान हुआ है, उन्हें अब भी मुआवजे का पैसा नहीं मिला. मुख्य व्यवसाय खेती होने और किसानों की आबादी ज्यादा होने की वजह से यहां के लोगों में स्थानीय विधायक और साथ ही बीजेपी सरकार से भी नाराजगी है.

2. चनस्मा

2012 के चुनाव में ये सीट बीजेपी के खाते में थी. बीजेपी के दिलीपकुमार विराजभाई ठाकोर ने कांग्रेस के दिनेशभाई आटाजी ठाकोर को करीब 17 हजार वोटों से चुनाव में मात दी थी. 2007 के चुनाव में बीजेपी के रजनीकांत सोमाभाई पटेल ने कांग्रेस के मलजीभाई देवाजीभाई देसाई को 16 हजार से अधिक वोटों से मात दी थी. इस बार भी बीजेपी ने दिलीपजी वीरजी ठाकोर को ही उम्मीदवार बनाया है. उनके सामने कांग्रेस से रघु देसाई हैं.

दिलीप ठाकोर.
दिलीप ठाकोर.

चनस्मा पाटन का सबसे पिछड़ा हुआ इलाका है, जहां मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है. स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और ट्रांसपोर्टेशन की सुविधाएं अब भी यहां के लोगों से कोसो दूर हैं. यहां पर एक गांव है सांबे, जहां पाकिस्तान से आए करीब 70 परिवार रहते हैं. आजादी के ठीक बाद ये परिवार भारत आ गए थे, लेकिन अब भी इन्हें भारतीय नागरिकता नहीं मिल पाई है. वोट बैंक न होने की वजह से ये लोग सरकारी तौर पर भी उपेक्षित हैं.

3. पाटन

पाटन सीट भी 2012 के चुनाव में बीजेपी के खाते में गई थी. इस सीट से बीजेपी के रणछोड़भाई महीजीभाई देसाई ने जीत दर्ज की थी. उन्होंने कांग्रेस के जोधाजी गलाबजी ठाकोर को करीब 6 हजार वोटों से हराया था. 2007 के चुनाव में भी इस सीट पर बीजेपी ने ही जीत दर्ज की थी. उस वक्त इस सीट से बीजेपी की आनंदीबेन पटेल ने जीत हासिल की थी, जो मोदी के पद छोड़ने के बाद गुजरात की मुख्यमंत्री बनी थीं. आनंदीबेन पटेल ने कांग्रेस के कांतिलाल नानालाल पटेल को 6 हजार से अधिक वोटों से मात दी थी. आनंदीबेन 2002 में भी इस सीट से ही चुनाव जीती थीं. 2017 के चुनाव के लिए भी बीजेपी ने रणछोड़भाई महीजीभाई देसाई को ही उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस से इस सीट पर किरीट पटेल मैदान में हैं.

आनंदीबेन पटेल.
आनंदीबेन पटेल.

पाटन के लोगों की सबसे बड़ी मांग सड़कें और वहां का ड्रैनेज सिस्टम ठीक करना है. पाटन में रेलवे यातायात भी दुरुस्त नहीं है. मेहसाना से पाटन के लिए सुबह, दोपहर और शाम बस तीन ही ट्रेनें हैं. लोगों की मांग है कि वहां पर रेलवे की संख्या बढ़ाई जाए. इसके अलावा पटोला साड़ियों को बनाने वाले भी सरकारी उपेक्षा से दुखी हैं. करीब 100 साल पहले इस साड़ी को बनाने में 100 परिवार लगे हुए थे. सरकारी उपेक्षा और पैसे की कमी की वजह से फिलहाल छह ऐसे परिवार हैं, जो इस साड़ी को बनाने के काम में लगे हुए हैं. पहले सरकारी मदद नहीं मिली और ऊपर से जीएसटी की मार ने इन लोगों के रोजगार की कमर तोड़ दी है. पटोला साड़ी बनाने वाले परिवार किसी दूसरे को इस साड़ी को बनाने की कला नहीं सिखाते हैं. केवल उन्हीं के परिवार का ही कोई शख्स इस कला को सीख सकता है. ऐसे में ये कारोबार और भी सिमटता जा रहा है.

4. सिद्धपुर

ये पाटन जिले की इकलौती सीट थी, जिसपर 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. कांग्रेस के बलवंतसिंह चंदनसिंह राजपूत ने बीजेपी के जयनारायण व्यास को 25 हजार से अधिक वोटों से मात दी थी. 2017 में जब गुजरात में राज्यसभा के चुनाव होने थे, तो उससे ठीक पहले बलवंतसिंह राजपूत बीजेपी में शामिल हो गए. पार्टी ने उन्हें कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल के खिलाफ राज्यसभा चुनाव के मैदान में उतार दिया. अहमद पटेल ने एक वोट से बलवंतसिंह के हाथ से राज्यसभा की सीट छीन ली थी. 2007 में ये सीट बीजेपी के खाते में थी. उस वक्त बीजपी के जयनारायण व्यास ने कांग्रेस के बलवंत सिंह चंदनसिंह राजपूत को करीब 2500 वोटों से मात दी थी. बीजेपी ने इस बार फिर से जयनारायण व्यास पर ही दाव लगाया है. कांग्रेस ने चंदन ठाकोर को मैदान में उतारा है.

मुकाबला कांटे का है.
मुकाबला कांटे का है.

सिद्धपुर के लोगों की सबसे बड़ी समस्या एक रेलवे अंडरब्रिज की है. सिद्धपुर में 2002 में ही अंडरब्रिज पास हो गया था. पैदल ही रेलवे लाइन पार करने की मजबूरी की वजह से यहां पर कई लोगों की मौत हो चुकी है. 2005 में जब आनंदीबेन पटेल ने इस अंडरब्रिज को पास करवाया था, तो उस वक्त इसकी लागत 2 करोड़ रुपये थी. 2012 में जब जय नारायण व्यास विधायक थे तो उन्होंने 20 करोड़ रुपये की लागत से एक बार फिर इस अंडरब्रिज को पास करवाया. लेकिन 2012 में उनकी विधायकी चली गई, जिसके बाद फिर से काम बंद हो गया.


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