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कहानी उस सीट की, जिसने सबसे बुरे वक्त में बीजेपी का साथ दिया

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वो कौन लोग होते हैं, जो किस्मत को मानते हैं? क्यों मानते हैं?

ये सवाल कई बार मन में आता है. इसका जवाब तो नहीं मिला कोई आज तक, मगर कुछ किस्से ज़रूर मिल जाते हैं. क्या से क्या बनने के किस्से. आज फकीर है, कल राजा बन गया. ऐसे किस्से. फिर लगता है कि शायद ऐसे ही किस्सों से भाग्य का किस्सा बना होगा. राजनीति में तो ऐसी कई कहानियां हैं. भिखारी के राजा बनने की कहानियां. राजा के भिखारी बनने की कहानियां. ऐसा ही एक किस्सा है बीजेपी का. कहां से चली थी और कहां पहुंच गई है. ये किस्सा तब का है, जब बीजेपी खाली हाथ थी. उसके खाली हाथ में बस दो टुकड़े थे. दो सीटें. एक सीट का नाता था गुजरात से. सोचिए, कितनी कीमती और खास होंगी ये सीटें बीजेपी के लिए.

आज बीजेपी बहुत आगे आ गई है. 2014 के लोकसभा चुनाव में 282 सीटें मिलीं उसे. मगर किस्मत का खेल देखिए. गाढ़े दिनों की साथी रही वो सीट अब बीजेपी का सिरदर्द बन गई है. लगता है, हाथ नहीं आएगी इस बार. बीजेपी के लिए इस सीट को जीतना इज्ज़त का सवाल है. इसको गंवाना ऐसे होगा, जैसे अमेठी और रायबरेली में कांग्रेस हार जाए.

1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पूरे देश के अंदर केवल दो सीटें ही मिली थीं. उनमें से एक ये मेहसाना सीट थी.
1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पूरे देश में केवल दो सीटें ही मिली थीं. उनमें से एक ये मेहसाणा सीट थी.

लगा कि लोग इंदिरा गांधी का कर्ज उतारने के लिए कांग्रेस को वोट दे रहे हैं

जिस साल की ये कहानी है, वो साल था 1984. उस साल सच में चार मौसम आए थे. साल के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग माहौल बना रहा. स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ. इसकी ज़रूरत इसलिए पड़ी कि भिंडरावाले ने गोल्डन टेम्पल को अपना अड्डा बना लिया था. पंजाब के आतंकवाद का किला बन गया था स्वर्ण मंदिर. ये ऑपरेशन कामयाब रहा. ऑपरेशन ब्लू स्टार की वजह से सिख बिफर गए. इंदिरा से नफ़रत करने लगे. इसी नफ़रत ने आगे चलकर इंदिरा की जान ले ली. उनके अपने ही बॉडीगार्ड्स ने उनकी हत्या कर दी. किसी ने नहीं सोचा था कि इंदिरा मारी जा सकती हैं. ऐसे बेदर्दी से कत्ल की जा सकती हैं.

इंदिरा की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ़ जमकर हिंसा हुई. हजारों सिख मारे गए. इंदिरा जा चुकी थीं. संजय गांधी पहले ही विमान दुर्घटना में मारे जा चुके थे. नेहरू-गांधी परिवार के इकलौते चश्मो-चिराग थे राजीव गांधी. बेदिली से ही सही, मगर राजीव ने पॉलिटिक्स को स्वीकार किया. इंदिरा की हत्या के बाद लोकसभा चुनाव हुआ. लोग कांग्रेस को वोट देने के लिए टूट पड़े. लग रहा था, लोग वोट नहीं दे रहे, बल्कि इंदिरा गांधी का कर्ज उतार रहे हैं. पूरा मुल्क गमगीन था. 533 सीटों की लोकसभा में कांग्रेस को 404 सीटें मिलीं. बस यहीं से एंट्री होती है किस्से की उस कड़ी की, जिसका मैंने ऊपर जिक्र किया था.

खुफिया एजेंसियों ने इंदिरा को आगाह किया था कि उनकी हत्या की कोशिश हो सकती है. मगर इंदिरा को अपने सिख बॉडीगार्ड्स पर बहुत भरोसा था.
खुफिया एजेंसियों ने इंदिरा को आगाह किया था कि उनकी हत्या की कोशिश हो सकती है. मगर इंदिरा को अपने सिख बॉडीगार्ड्स पर बहुत भरोसा था.

उस कांग्रेस लहर में बीजेपी के हाथ आईं दो सीटें

उस साल के लोकसभा चुनाव में पार्टियों का बुरा हाल हुआ. कांग्रेस की ऐसी लहर थी कि उसके आगे कोई नहीं टिका. कई पार्टियां तो दहाई सीटों पर भी नहीं पहुंच पाईं. इन्हीं पार्टियों में बीजेपी का भी नाम शामिल था. बीजेपी कहने को नई पार्टी थी. 1980 में बनी थी. इंदिरा गांधी ने जो इमरजेंसी लगाई थी, उसके खत्म होने के बाद चुनाव हुए थे. इसमें जनता पार्टी की सरकार बनी. इस सरकार में जन संघ भी शामिल था. इसी जन संघ के सदस्यों ने आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) बनाई थी. यानी, नाम भले ही BJP का नया हो, पहचान पुरानी थी. 1984 के लोकसभा चुनाव से BJP को बड़ी उम्मीदें थीं. मगर इंदिरा की हत्या के बाद तो सबकुछ बह गया. पूरे देश में केवल दो सीटें मिलीं BJP को. एक आंध्र प्रदेश में और दूसरी गुजरात में.

पाटीदार आंदोलन के दौरान बहुत बड़े स्तर पर हिंसा हुई थी. इस हिंसा में करीब 14 युवा मारे गए थे.
पाटीदार आंदोलन के दौरान बहुत बड़े स्तर पर हिंसा हुई थी. इस हिंसा में करीब 14 युवा मारे गए थे.

बहुत गाढ़े वक्त में मेहसाणा ने दिया था बीजेपी का साथ

उत्तरी गुजरात में एक जिला है. मेहसाणा. इसने बीजेपी को तब जिताया, जब कांग्रेस के सिवा किसी और के जीतने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं थी. जब चुनाव के नतीजे आए तो लगा ये कुछ अजूबा हो गया. जब कोई बुरे वक्त में काम आता है तो खास बन जाता है. मेहसाणा भी बीजेपी के लिए बहुत खास बन गया. आप कहेंगे कि गुजरात विधानसभा चुनाव के वक्त हमको लोकसभा चुनाव की याद क्यों आ रही है? तो जवाब है कि ये लोकसभा और विधानसभा की नहीं, बल्कि जगह की कहानी है. ये जिक्र इसलिए भी खास है कि इतने लंबे समय से बीजेपी की भरोसेमंद रही ये जगह इस बार रूठने का संकेत दे रही है.

हार्दिक पाटीदार समाज से आते हैं. हार्दिक के कारण गुजरात की राजनीति में पाटीदार आरक्षण एक बड़ा मुद्दा बन गया. पाटीदार बीजेपी के पारंपरिक वोटर रहे हैं. मगर इस बार चीजें उतनी आसान नहीं लग रही हैं.
हार्दिक पाटीदार समाज से आते हैं. हार्दिक के कारण गुजरात की राजनीति में पाटीदार आरक्षण एक बड़ा मुद्दा बन गया. पाटीदार बीजेपी के पारंपरिक वोटर रहे हैं. मगर इस बार चीजें उतनी आसान नहीं लग रही हैं.

मालूम नहीं, वोटर किस करवट बैठेंगे

यहां से खड़े हैं नितिन पटेल. गुजरात सरकार के उप मुख्यमंत्री. इतना ही नहीं, बल्कि ये मेहसाणा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह जिला भी है. वो वडनगर से आते हैं. ये वडनगर मेहसाणा में ही आता है. इस बार यहां बहुत तगड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है. बीजेपी ही जीतेगी, ये पक्का कहा नहीं जा सकता है. वजह? मेहसाणा पाटीदार आंदोलन का गढ़ था. समझिए तो पाटीदार आंदोलन का किला था. ग्राउंड जीरो. यहीं से पूरा बवाल शुरू हुआ. यहां पाटीदार खूब रहते हैं. सबसे ज्यादा तादाद, सबसे ज्यादा मजबूत. सबसे ज्यादा बूता है कड़वा पाटीदारों का. सरदार पटेल भी इसी बिरादरी के थे. हार्दिक पटेल भी इसी बिरादरी के हैं. ये ऐसे हैं कि चाहें तो बना दें, चाहें तो बिगाड़ दें.

बीजेपी को मिलने वाली जीतों में इन पाटीदारों ने खूब साथ दिया है. मगर अब वो नाराज़ हैं. पाटीदार आरक्षण पर बीजेपी ने जो बेदिली दिखाई, वो उनको टीस रही है. पाटीदार आरक्षण जब चरम पर था, तब यहां खूब हिंसा हुई थी. उसकी भी पीड़ा है लोगों को. ऊपर से सब शांत लगता है. मगर अंदर-अंदर बड़ी हलचल है. अंदर की बात बताने वाले कहते हैं कि पाटीदार हार्दिक के साथ जा सकते हैं.

कांग्रेस भी उम्मीद से है. उसको लगता है कि इस बार मेहसाणा में वापसी का चांस बन सकता है. देखते हैं, मेहसाणा में वोटर किस करवट बैठते हैं. वैसे भी, वोटिंग बूथ के अंदर किसने किसके नाम का बटन दबाया, ये तो गुप्त रहता है. तो जब 18 दिसंबर को वोटों की गिनती होगी, तभी मालूम चलेगा कि बीजेपी का ये पुराना विश्वासपात्र इस बार भी उसका साथ देता है या फिर साथ छोड़ देता है.


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