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गुजरात चुनाव रिजल्ट: कांग्रेस या बीजेपी किसकी सरकार बन रही है

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गुजरात चुनाव में बीजेपी ने बहुमत हासिल कर लिया है. 182 सीटों की विधानसभा के लिए वोटों की गिनती का काम पूरा हो चुका है. बीजेपी को कुल 99 सीटें मिली हैं. कांग्रेस को 77 सीटों पर कामयाबी मिली. उसकी सहयोगी भारतीय ट्रायबल पार्टी (BTP) को दो सीटें मिली हैं. दलित नेता जिग्नेश मेवानी, जिन्हें कांग्रेस ने समर्थन दिया था, जीत गए हैं. सहयोगियों को मिलाकर कांग्रेस को मिली सीटों का आंकड़ा है 80.

शक्तिसिंह गोहिल का हारना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है. पार्टी जिसे CM बनाने की सोच रही थी, वो ही हार गया.
शक्तिसिंह गोहिल का हारना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है. पार्टी जिसे CM बनाने की सोच रही थी, वो ही हार गया.

कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता चुनाव हार गया है
कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं ने अपनी सीट गंवा दी है. इनमें सबसे बड़ा नाम है शक्तिसिंह गोहिल का. गोहिल मांडवी सीट से चुनाव लड़ रहे थे. उनके खिलाफ लड़ रहे थे वीरेंद्रसिंह बहादुरसिंह जडेजा. गोहिल 9,046 वोटों से हार चुके हैं. माना जा रहा था कि अगर कांग्रेस गुजरात में जीत जाती है, तो गोहिल मुख्यमंत्री होंगे. न कांग्रेस जीती और न ही गोहिल मुख्यमंत्री बन रहे हैं. मुख्यमंत्री क्या, वो तो विधायक भी नहीं बने.

अर्जुन मोदवाडिया ने प्रचार में बड़ी कसर छोड़ दी. वो राहुल गांधी के साथ ज्यादा नजर आ रहे थे.
अर्जुन मोदवाडिया ने प्रचार में बड़ी कसर छोड़ दी. वो राहुल गांधी के साथ ज्यादा नजर आ रहे थे.

कुछ और बड़े नाम भी धराशायी हो गए
पोरबंदर सीट पर बाबू बोखिरिया के खिलाफ लड़ रहे अर्जुन मोढवाडिया भी 1,855 वोटों से हार चुके हैं. वो भी कांग्रेस के बड़े नेता हैं. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं. राजकोट वेस्ट की सीट पर मुख्यमंत्री विजय रुपानी के खिलाफ लड़ रहे इंद्रनील राजगुरु भी 53,755 वोटों से हार चुके हैं. बीजेपी के भी कुछ बड़े नेताओं को हार का सामना करना पड़ा है. इनमें से एक हैं शंकर चौधरी, जो वाव सीट पर गनीबेन ठाकोर से हार गए हैं.

ऊना कांड के बाद से ही जिग्नेश मेवानी का कद बतौर दलित नेता लगातार बड़ा होता गया. उनकी जीत के पीछे कांग्रेस की तरफ से मिला समर्थन भी काफी मायने रखता है.
ऊना कांड के बाद से ही जिग्नेश मेवानी का कद बतौर दलित नेता लगातार बड़ा होता गया. उनकी जीत के पीछे कांग्रेस की तरफ से मिला समर्थन भी काफी मायने रखता है.

राजनीति में नए आए इस युवा नेता ने जीत लिया मैदान
कुछ और बड़े नामों पर भी नजर थी लोगों की. इनमें से एक थे दलित नेता जिग्नेश मेवानी. मेवानी अपनी वड़गाम सीट से जीत गए हैं. उन्होंने बीजेपी के विजयकुमार वरखाभाई चक्रवर्ती को 19,696 वोटों से हराया. मेहसाणा सीट पर बीजेपी नेता और गुजरात के उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल 7,137 वोटों से जीत गए हैं. उन्होंने कांग्रेस के जीवाभाई अंबालाल पटेल को हराया. कांग्रेस के OBC नेता अल्पेश ठाकुर भी अपनी राधनपुर सीट से जीत गए हैं. उन्होंने बीजेपी के लाविंजजी ठाकोर सोलंकी को 14,857 वोटों से हराया.

हार्दिक की राजनीति फेल रही
सबसे ज्यादा घाटे में रहे हार्दिक पटेल. उनकी पाटीदार राजनीति चल नहीं पाई. मेहसाणा और सूरत, जो कि पाटीदार आंदोलन के केंद्र में रहे थे, वहां भी हार्दिक का असर नहीं दिखा. उनके लिए संतोष की बात ये रही कि वीरमगाम सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार लाखाभाई भीखाभाई भारवाड़ ने बीजेपी की तेजश्रीबेन दिलीपकुमार पटेल को हरा दिया. ये हार्दिक पटेल का अपना शहर है. शुरुआत में काफी समय तक कांग्रेस यहां पिछड़ रही थी. हालांकि जीत-हार का फर्क इतना बड़ा नहीं था कि हार्दिक फैक्टर को गिनाया जाए. महज 6,548 वोटों के अंतर से जीती कांग्रेस. जिस सूरत पर हार्दिक अपना इतना असर बता रहे थे, उसकी 16 सीटों में से 12 पर बीजेपी जीती है. यहां तक कि जिस वरछा सीट पर हार्दिक के कारण बीजेपी के हारने की आशंका जताई जा रही थी, वहां भी बीजेपी के उम्मीदवार किशोरभाई कनानी जीत गए हैं. कम शब्दों में समझें, तो हार्दिक के साथ जाकर कांग्रेस को फायदे से ज्यादा नुकसान हुआ.

गुजरात विधानसभा चुनाव के बीच में ही राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने. 19 साल तक अध्यक्ष रहने के बाद सोनिया गांधी ने उन्हें ये बैटन थमा ही दिया. ये चुनाव उनके नेतृत्व की काबिलियत साबित करने के लिहाज से भी बहुत अहम था.
गुजरात विधानसभा चुनाव के बीच में ही राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने. 19 साल तक अध्यक्ष रहने के बाद सोनिया गांधी ने उन्हें ये बैटन थमा ही दिया. ये चुनाव उनके नेतृत्व की काबिलियत साबित करने के लिहाज से भी बहुत अहम था.

कांग्रेस का जाति गणित नहीं चला
80 के दशक में कांग्रेस ने KHAM (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलमान) फॉर्म्युले के दम पर गुजरात में आज तक की सबसे बड़ी जीत हासिल की थी. इस बार कांग्रेस ने उस फॉर्म्युले को थोड़ा बदलकर इसे KHAP की शक्ल देने की कोशिश की. यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और पाटीदार. इस फॉर्म्युले में मुसलमानों का जिक्र नहीं था, मगर बिना जिक्र के भी वो थे. कांग्रेस मानकर चल रही थी कि वो मुसलमानों का नाम ले या न ले, मगर मुसलमान उसको ही वोट देंगे. पाटीदार बीजेपी छोड़कर कांग्रेस के साथ आ गए होंं, ऐसा होता दिखा नहीं. OBC वर्ग भी कांग्रेस के साथ खड़ा हो गया हो, ऐसा नहीं हुआ. कांग्रेस भूल गई कि कई जातियों को एकसाथ साधने वाली उसकी ये रणनीति आउटेडेट हो गई है. बल्कि इसी फॉर्म्युले ने कांग्रेस में उसकी लुटिया डुबाई थी. इस बार भी कांग्रेस को इसका फायदा नहीं हुआ. बाकी नतीजों पर विस्तृत बातें आगे के दिनों में होंगी. और कई आंकड़े आएंगे. और चीजें साफ होंगी.

लोग मानकर चल रहे थे कि कांग्रेस मुसलमानों से दूर नहीं हो सकती
टिकट बंटवारे से लेकर वोट अपील तक, कांग्रेस ने खुद को मुस्लिमों से दूर दिखाने की हर मुमकिन कोशिश की. मगर लोगों ने इसपर यकीन नहीं किया. राहुल गांधी ने मंदिरों के खूब चक्कर लगाए, मगर ‘हिंदू-मुसलमान फैक्टर’ में लोगों ने उसे मुसलमानों के करीब ही देखा.

राहुल गांधी के नेतृत्व के लिए भी बहुत अहम था ये चुनाव
राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए गुजरात का ये चुनाव बहुत अहम था. इससे पहले भी राहुल कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में प्रचार कर चुके हैं. मगर गुजरात चुनाव अलग है. चुनाव के बीच में ही राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष पद मिला. कांग्रेस को उम्मीद थी कि हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश पटेल जैसे युवा नेताओं के कारण एक बार फिर वो KHAM (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) जैसा 80 के दशक वाला जातिगत फॉर्म्युला बनाने में कामयाब होगी. उसने ये फॉर्म्युला बनाया भी, मगर वो उसके काम नहीं आया.

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