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गुजरात के इन "राष्ट्रद्रोहियों" को बीजेपी ने किस हक से अपनी पार्टी में शामिल किया है?

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गुजरात चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा चर्चा में कोई है तो वो हैं हार्दिक पटेल. दो साल से थोड़ा ही ज्यादा वक्त हुआ है, जब गुजरात के साथ ही पूरे देश के लोगों ने इस नाम को सुना था. पाटीदार अनामत आंदोलन समिति बनाकर पाटीदारों के लिए आरक्षण मांगने और इसके लिए आंदोलन कर चर्चा में आए हार्दिक इस चुनाव में भी हॉट टॉपिक बने हुए हैं. कभी कांग्रेस से मुलाकात, कभी सेक्स सीडी और कभी कांग्रेस से दूरी की बातों के बीच हार्दिक पटेल ने 22 नवंबर की सुबह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. हार्दिक ने कहा कि बीजेपी ने हार के डर से उन्हें खरीदने की कोशिश की और इसके लिए बीजेपी ने 200 करोड़ रुपये खर्च किए.

हार्दिक ने कहा-

“पाटीदार अनामत आंदोलन समिति ने कांग्रेस से किसी सीट की मांग नहीं की थी. अनामत आंदोलन समिति का इकलौता लक्ष्य पाटीदारों को आरक्षण दिलवाना है, जिसपर कांग्रेस ने मंजूरी दे दी है और कांग्रेस का फॉर्मूला हमें मंजूर है. बीजेपी ने पास (पाटीदार अनामत आंदोलन समिति) के एक-एक नेता के लिए 50-50 लाख रुपए ऑफर किए थे, लेकिन पास पाटीदारों के हक और हुकूक की लड़ाई लड़ती रहेगी.”

हार्दिक ने ये भी साफ कर दिया है कि उन्होंने किसी से कांग्रेस को वोट देने की अपील नहीं की थी, लेकिन उन्होंने कहा कि लोग किसी निर्दलीय को वोट न दें. प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हार्दिक ने 29 नवंबर को रैली का भी ऐलान किया. इसी 29 तारीख से ही पीएम मोदी भी गुजरात में बीजेपी का प्रचार करने के लिए उतर रहे हैं.

Hardik feature
हार्दिक पटेल ने 22 नवंबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बीजेपी पर हमला बोलते हुए लड़ाई जारी रखने की बात कही.

अब जब हार्दिक ने अपने पत्ते खोल दिए हैं तो उन्हें अपने तुरुप के उस इक्के की भी जरूरत होगी, जिसके जरिए वो चुनावी मैदान में पाटीदार वोटरों को लामबंद कर सकें. ऐसा इसलिए है, क्योंकि हार्दिक ने जिन पुराने लोगों के भरोसे अपने आंदोलन को खड़ा किया था, वो एक-एक करके साथ छोड़ते गए हैं. साथ छोड़ने वालों में वो लोग भी हैं, जिनपर हार्दिक के साथ राजद्रोह का केस दर्ज हुआ था और वो जेल भी गए थे. ऐसे लोग अब बीजेपी के साथ हैं और हार्दिक के खिलाफ ही ताल ठोक रहे हैं. बीजेपी ने किस हक से राजद्रोह के इन आरोपियों को अपने साथ शामिल कर लिया है, ये एक सवाल है, जिसका जवाब हार्दिक और बीजेपी दोनों को ही देना होगा.

अपने एक-एक साथियों के छिटकने से परेशान हार्दिक ने 20 नवंबर को एक ट्वीट किया.

Hardik tweet

ट्वीट में लिखी गई कविता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की है. इन लाइनों के जब अलग-अलग मतलब निकाले जाने लगे तो हार्दिक ने अपने इस ट्वीट को डिलीट कर दिया. इसके बाद 21 नवंबर को हार्दिक ने एक और ट्वीट किया.

कदम मिलाकर चलने की बात करने वाले हार्दिक का ट्वीट डिलीट करना और दूसरे द्वीट में रोकने वालों की मनमानी बदलने वाला ये ट्वीट यूं ही नहीं है. दरअसल हार्दिक पटेल ने जिन लोगों के सहारे पाटीदार अनामत आंदोलन समिति बनाकर लाखों लोगों को एक जुट कर लिया था, वो सहारा देने वाले लोग अब हार्दिक के विरोधी हो गए हैं. बीजेपी का खुला विरोध करते हुए हार्दिक के नजदीकियों ने हाथ भी मिलाया है, तो बीजेपी से. पाटीदार अनामत आंदोलन समिति बनने से लेकर अब तक कुल सात बड़े पाटीदार नेताओं ने हार्दिक का साथ छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया है. वहीं उनका एक साथी कांग्रेस के साथ आ गया है, जबकि एक और विश्वासपात्र ने हार्दिक की रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं.

1. केतन पटेल

ketan patel
केतन (बाएं) ने 18 नवंबर को बीजेपी का दामन थाम लिया.

पाटीदार आंदोलन में हार्दिक के सहयोगी रहे केतन पटेल ने 18 नवंबर को बीजेपी का दामन थाम लिया था. 2015 में जब पाटीदारों का पूरे गुजरात में आंदोलन चल रहा था तो हार्दिक पटेल के साथ सबसे ज्यादा जो चेहरा दिखता था, वो था केतन पटेल का. आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के बाद जब हार्दिक को राजद्रोह का आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया था तो उस वक्त केतन पर भी राजद्रोह का केस दर्ज हुआ था.

2.अमरीश पटेल

हार्दिक के सहयोगी रहे और पाटीदार आंदोलन का चेहरा रहे अमरीश पटेल ने भी केतन पटेल के साथ बीजेपी का दामन थाम लिया. अमरीश पर भी देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ था, लेकिन अमरीश पटेल गिरफ्तार नहीं हो पाए थे.

3. श्वेता पटेल

पाटीदार आंदोलन के दौरान महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला जो चेहरा था, उसका नाम था श्वेता पटेल. श्वेता पटेल ने भी 18 नवंबर को बीजेपी का दामन थाम लिया. श्वेता ने हार्दिक के कांग्रेस से बढ़ती नजदीकियों पर निशाना साधते हुए कहा था कि पाटीदार आंदोलन किसी एक पार्टी को सत्ता में लाने के लिए नहीं था. हार्दिक अब आरक्षण के मुद्दे से भटककर पैसे बनाने में लग गए हैं.

4. चिराग पटेल

चिराग पटेल भी पाटीदार आंदोलन का बड़ा चेहरा रहे हैं. हार्दिक पटेल के साथ ही चिराग पर भी देशद्रोह का केस दर्ज हुआ था और सात महीने तक उन्हें जेल में गुजारने पड़े थे. 16 नवंबर को गुजरात के उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल की मौजूदगी में चिराग ने बीजेपी का दामन थाम लिया था. चिराग ने हार्दिक पर आंदोलन को व्यक्तिगत बनाने और अय्याशी पर पैसे खर्च करने का आरोप लगाया है.

5. वरुण पटेल

reshma varun
वरुण और रेशमा ने अक्टूबर 2017 में ही हार्दिक का साथ छोड़ दिया था.

जुलाई 2015 में जब पाटीदार आंदोलन शुरू हुआ तो हार्दिक के साथ जो चेहरा सबसे पहले दिखा था, वो था वरुण पटेल का. आंदोलन के दौरान वरुण पटेल बीजेपी के खिलाफ सबसे ज्यादा हमलावर रहे. 2017 में जब गुजरात में चुनावी माहौल बनने लगा तो 21 अक्टूबर को वरुण ने हार्दिक का साथ छोड़ दिया और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में बीजेपी जॉइन कर ली. वरुण ने कहा कि बीजेपी उनकी मांगों के लिए तैयार है, इसलिए वो बीजेपी के साथ आए हैं.

6. रेशमा पटेल

पाटीदार आंदोलन में महिलाओं का खास चेहरा रहीं रेशमा पटेल ने भी 21 अक्टूबर 2017 को बीजेपी का साथ देने की ठान ली. आंदोलन के दौरान पीएम मोदी और बीजेपी नेताओं के खिलाफ खुलकर आवाज़ उठाने वाली रेशमा ने कहा कि हार्दिक का आंदोलन अब कांग्रेस को जिताने के लिए हो गया है, जबकि हमारी लड़ाई समाज के लिए थी. रेशमा ने हार्दिक पर गंभीर आरोप लगाते हुए साथ छोड़ दिया था.

7. नलिन कोटादिया

हार्दिक पटेल के करीबी नेता रहे नलिन कोटादिया ने भी हार्दिक का साथ छोड़ दिया है. नलिन कोटादिया धारी से टिकट चाहते थे, लेकिन कांग्रेस ने उनके लिए टिकट नहीं दिया. इसके बाद नलिन कोटादिया ने पास से इस्तीफा दे दिया.

8. ललित वसोया

ललित वसोया हार्दिक पटेल के करीबी थे. पाटीदारों के नेताओं से बात किए बिना कांग्रेस ने ललित वसोया को धोराजी से कांग्रेस का उम्मीदवार घोषित कर दिया. पाटीदार नेताओं ने ललित वसोया से पर्चा न दाखिल करने को कहा, लेकिन ललित ने पास से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस के टिकट पर धोराजी से उम्मीदवार बन गए.

9. दिनेश बंभानिया

dinesh bamaniya

बंभानिया पास के महत्वपूर्ण नेताओं में से एक हैं. उनके ऊपर भी हार्दिक पटेल की तरह राजद्रोह का मुकदमा चल रहा है. वह पास के कोर कमिटी के मेंबर हैं. कांग्रेस की ओर से पाटीदार नेताओं को उम्मीदवार बनाने पर दिनेश ने हार्दिक पटेल पर हमला किया और उनकी रणनीति पर सवाल उठाए. हालांकि विरोध के बाद भी दिनेश बंभानिया पास के साथ बने हुए हैं.

8 साथियों के अलगाव और एक साथी की नाराजगी झेल रहे हार्दिक ने साफ कर दिया है कि वो अगले ढाई साल तक चुनाव नहीं लड़ेंगे. गुजरात चुनाव भी 18 दिसंबर को खत्म हो जाएगा. ऐसे में हार्दिक के पास दो साल से ज्यादा का वक्त है, जब वो चुनाव में उतरने के लिए अपनी नई टीम की तलाश कर सकते हैं.


गुजरात में चुनाव हैं, लेकिन वहां का खाना कैसा है, इस वीडियो में देखिए

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