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मोदी के पास फरियाद लेकर आई थी शहीद की बहन, रैली से घसीटकर निकाला गया

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पहले विजय रूपानी. अब नरेंद्र मोदी. लगता है दोनों को ही शहीदों के परिवार से अरुचि है. हमने आपको 1 दिसंबर की एक घटना के बारे में बताया था कि किस तरह रैली में रूपानी की आंखों के सामने एक शहीद की बेटी को घसीटकर बाहर निकाला गया. अब ऐसा ही एक वाकया प्रधानमंत्री मोदी की रैली में भी हुआ. इस बार एक शहीद की बहन को घसीटते हुए उनकी रैली से बाहर कर दिया गया. ये सुरेंद्रनगर की घटना है. दोनों घटनाओं में कुछ बातें एक जैसी हैं.

– दोनों महिलाएं थीं.
– दोनों के अपने ड्यूटी निभाते हुए शहीद हुए.
– दोनों परिवारों को राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली मदद नहीं मिली थी.
– दोनों परिवारों को सरकारी मदद का वादा किया गया, मगर हुआ कुछ नहीं.
– दोनों पिछले कई साल से नेताओं और अधिकारियों से मदद की गुहार कर रही थीं.
– तमाम जगहों पर नाउम्मीद होने के बाद दोनों ने सत्ता की सबसे ऊपरी कुर्सी से फरियाद लगाने की सोची.
– एक को मुख्यमंत्री रूपानी से मिलना था. दूसरी को प्रधानमंत्री मोदी से मिलना था.
– दोनों को ही घसीटते हुए बाहर निकाला गया.
– मोदी और रूपानी, दोनों ही बीजेपी के हैं.
– बीजेपी सेना और शहीदों का सम्मान करने वाली पार्टी है.

ये शहीद अशोक तडवी की बेटी हैं. 1 दिसंबर को मुख्यमंत्री विजय रुपानी की आंखों के सामने पुलिस इन्हें घसीटते हुए ले गई थी.
ये शहीद अशोक तडवी की बेटी हैं. 1 दिसंबर को मुख्यमंत्री विजय रूपानी की आंखों के सामने पुलिस इन्हें घसीटते हुए ले गई थी.

पांच साल पहले शहीद हुए बशीद अहमद मुल्तानी, परिवार अब भी मदद आने की राह देख रहा है

पीएम मोदी 3 दिसंबर को सुरेंद्रनगर पहुंचे. उनकी रैली थी. जहां रैली होनी थी, वहां मोदी पहुंच भी गए थे. नसीम मुल्तानी हाथ में एक चिट्ठी लिए मंच की ओर बढ़ीं. वो यहीं सुरेंद्रनगर में रहती हैं. यहां एक फिरदौस सोसायटी है, वहीं. नसीम ने बताया कि वो शहीद बशीर अहमद मुल्तानी की बहन हैं. बशीर अहमद मुल्तानी सीमा सुरक्षा बल (BSF) की 172वीं बटालियन में थे. जम्मू-कश्मीर में पोस्टेड थे. एक दिन सीमा पर लड़ते हुए मारे गए. सॉरी, जवान मरते कहां हैं! वो तो शहीद होते हैं. तो बशीर अहमद मुल्तानी पांच साल पहले शहीद हो गए.

ये शहीद बशीर अहमद मुल्तानी की बहन हैं. बशीर पांच साल पहले शहीद हुए थे. जम्मू-कश्मीर में सीमा पर तैनात थे. ड्यूटी निभाते हुए उनकी मौत हुई.
ये शहीद बशीर अहमद मुल्तानी की बहन हैं. बशीर पांच साल पहले शहीद हुए थे. जम्मू-कश्मीर में सीमा पर तैनात थे. ड्यूटी निभाते हुए उनकी मौत हुई. बहन का कहना है कि पांच साल बाद भी परिवार को सरकारी मदद नहीं मिली है.

शहीद की बहन ने कहा: जिला कलेक्टर और CM तक पहुंचा चुकी हूं शिकायत

नसीम का कहना है कि वो कई बार सरकारी मदद न मिलने की शिकायत कर चुकी हैं. जिला कलेक्टर और यहां तक कि मुख्यमंत्री तक भी अपनी बात पहुंचा चुकी हैं. बावजूद इसके कोई सुनवाई नहीं हुई. उनके परिवार को वो मदद अब तक नहीं मिली, जो कि शहीदों के परिवार वालों को मिलती है. मिलनी चाहिए. हर तरफ से निराश होने के बाद नसीम ने मोदी जी तक अपनी बात पहुंचाने का फैसला किया. हाथ में अपने कागजात थामे PM की रैली में पहुंचीं. उनके पास उस आवेदन की भी कॉपी थी, जो कि उन्होंने मुख्यमंत्री के पास भेजी थी. नसीम को मोदी जी से एक सवाल पूछना था. उनका सवाल था:

शहीदों के परिवार को जो आर्थिक मदद मिलनी चाहिए, वो हमें क्यों नहीं मिली है?

मगर वो ये सवाल पूछ नहीं पाईं. सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें पीएम तक पहुंचने ही नहीं दिया. घसीटते हुए वहां से बाहर कर दिया. नसीम चीखती रहीं. मदद मांगती रहीं. अपनी परेशानी बताती रहीं. मगर कोई सुनवाई नहीं हुई.

मोदी जी अक्सर खास मौकों पर सेना के जवानों से मिलने जाते हैं. उनके साथ समय बिताते हैं. कहते हैं, सैनिक उनका परिवार हैं.
मोदी जी अक्सर खास मौकों पर सेना के जवानों से मिलने जाते हैं. उनके साथ समय बिताते हैं. कहते हैं, सैनिक उनका परिवार हैं.

नेताओं-मंत्रियों तक अपनी बात कैसे पहुंचाए कोई? 

एक सवाल है मन में. क्या नेता और जनता के बीच एकतरफा रिश्ता होता है? क्या हमारे हाथों चुने हुए हमारे प्रतिनिधि हमें नजरअंदाज करने के लिए आजाद हैं? वो रैली में आएंगे. भाषण देंगे. अपनी बात कहेंगे. मगर कोई मदद मांगने आए तो उसकी नहीं सुनेंगे? पहले के जमाने में राजा होते थे. अच्छा राजा जनता की बात सुनता था. रात को भेष बदलकर राज्य में घूमता था. ये देखने के लिए कि सब ठीक तो चल रहा है. जनता परेशान तो नहीं है. कई राजा अपने महल के बाहर एक बड़ा सा घंटा टंगवा देते थे. ताकि कोई जरूरतमंद वक्त पड़ने पर घंटा बजा दे. और राजा को मालूम चल जाए कि किसी को उसकी जरूरत है.

अब कई लोग ट्वीट वगैरह कर देते हैं नेताओं-मंत्रियों को टैग करते हुए. मगर सबका जवाब नहीं आता. कभी जब जवाब आता है तो खबर बन जाती है. फलां मंत्री ने एक ट्वीट पढ़कर मदद पहुंचाई. मतलब हम कितने नाउम्मीद हो चले हैं अपने नेताओं से. कि वो अपनी साधारण सी जिम्मेदारी भी पूरी करें तो हम भावुक हो जाते हैं. गदगद हो जाते हैं. अगर किसी को ट्वीट वगैरह करना न आए, तो? वो चिट्ठी भेजेगा. आवेदन भेजेगा. मगर आवेदन तो नसीम ने भी कई भेजे? फिर सुनवाई क्यों नहीं हुई?

अगर विपक्ष ने मुद्दा कैच किया तो फौरन जाग जाएगी सरकार

रूपानी वाले मामले में राहुल गांधी ने ट्वीट कर दिया था. जो काम शहीद की बेटी नहीं कर सकी, वो राजनीति ने कर दिया. रूपानी ने फटाफट सुध ले ली. ट्विटर पर मदद का ऐलान कर दिया. विरोधी (राहुल) को कोसकर राजनीति भी साध ली. शायद उसी घटना के बारे में पढ़कर नसीम ने सोचा होगा कि ऐसे तो कोई सुन नहीं रहा, शायद पीएम की रैली में पहुंचने से कोई सुनवाई हो. जैसे शहीद अशोक तडवी परिवार के दिन फिरे, वैसे शायद हमारे भी फिर जाएं! मगर नसीम और उनका परिवार मोदी जी की रैली से भी खाली हाथ लौटा. शायद उनको थोड़ा इंतजार करना चाहिए. हो सकता है कि कोई विपक्षी नेता इस घटना के बारे में ट्वीट कर दे. फिर एक बार राजनीति की मजबूरी के कारण रूपानी सरकार और मोदी जी शहीद के परिवार को उनका हक भिजवा दें. ये सवाल कौन करे कि शहीदों के परिवारों को अपने हक के लिए दर-दर को ठोकरें क्यों खानी पड़ती हैं? इतने साल बीत जाने पर भी सरकारी मदद उन तक क्यों नहीं पहुंचती? इसके लिए किसे लताड़ें? विपक्ष को!

बाकी सब ठीक है. दीवाली अभी एक बरस दूर है. मोदी जी अपने त्योहार सेना के साथ मनाते हैं. उनकी तस्वीरें आती हैं. सैनिकों को मिठाई खिलाते हुए. इस साल भी आईं थीं तस्वीरें. अगले साल भी आएंगी तस्वीरें. मोदी जी को सेना से बहुत प्यार है. मोदी जी जवानों का बहुत ध्यान रखते हैं. जाते-जाते ये ट्वीट देख लीजिए. 1 दिसंबर को BSF रेजिंग डे के मौके पर मोदी जी ने किया था: 


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