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वो चार सीटें, जो बीजेपी और कांग्रेस के लिए इज्जत का सवाल बन गई हैं

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गुजरात में 9 दिसंबर को पहले चरण की वोटिंग होनी है. कुल 182 विधानसभा सीटें हैं यहां. इनमें से 89 सीटों के लिए पहले वोट पड़ेगा. पता है, 89 सीटों के लिए कितने उम्मीदवार मैदान में हैं? 1,592. पर्चा भरने की आखिरी तारीख थी मंगलवार, 21 नवंबर. सोमवार शाम तक गिनती के 377 उम्मीदवारों ने ही नामांकन किया था. बाकी जो हैं, उन सब ने एकदम आखिरी दिन पर्चा भरा. भरने वालों को अगर नॉमिनेशन वापस लेने का मन हो, तो 24 नवंबर तक का समय है.

पहले चरण के चुनाव में कुछ बड़े हाई-प्रोफाइल नाम खड़े हैं. कुछ सीटें हैं, जहां एक-दूसरे के खिलाफ खड़े उम्मीदवार बहुत हैवीवेट हैं. दोनों में से एक ही जीत सकता है. जो हारेगा, उसकी साख को बड़ा झटका लगेगा. मुकाबले में एक तरफ कांग्रेस है और दूसरी तरफ है बीजेपी. इन बड़े नामों के मुकाबले पर सबकी नजरें हैं. कौन जीतेगा और कौन हारेगा, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है. पढ़िए उन चार सीटों का हाल, जिनका मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के लिए इज्जत का सवाल बन गया है:

बाईं ओर हैं विजय रूपानी. दाहिनी तरफ हैं इंद्रनील राजभर. इंद्रनील गुजरात में कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में हैं.
बाईं ओर हैं विजय रूपानी. दाहिनी तरफ हैं इंद्रनील राजभर. इंद्रनील की गिनती भारतीय राजनीति के सबसे अमीर नेताओं में होती है.

सीट: राजकोट पश्चिम
बीजेपी के उम्मीदवार: विजय रूपानी, मुख्यमंत्री, गुजरात
कांग्रेस के उम्मीदवार: इंद्रनील राजगुरु

क्यों है ये गुजरात चुनाव का सबसे बड़ा मुकाबला
ये सीट बीजेपी के लिए इज्जत की लड़ाई है. विजय रूपानी दूसरी बार यहां से चुनाव लड़ रहे हैं. 1985 से ही ये सीट बीजेपी की सबसे सुरक्षित सीटों में से एक रही है. राजकोट वेस्ट की ये सीट सौराष्ट्र में बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का गढ़ मानी जाती है. मगर इस बार के हालात थोड़े अलग हैं. कांग्रेस ने रूपानी के खिलाफ इंद्रनील राजगुरु को खड़ा किया है. इंद्रनील कांग्रेस के सबसे मजबूत नेताओं में से एक हैं. इससे पहले इंद्रनीय राजकोट ईस्ट की सीट से चुनाव लड़ते थे. मगर इस बार पार्टी ने उन्हें रूपानी का विजय रथ रोकने की जिम्मेदारी सौंपी है. इंद्रनील बहुत पैसे वाले हैं. राजनीति में इनका एक नाम ‘धन कुबेर’ भी है. 2012 के विधानसभा चुनाव में भी वो सबसे अमीर प्रत्याशी थे. इस बार तो उनकी दौलत और बढ़ गई है. 141 करोड़ की संपत्ति के मालिक इंद्रनील पैसा और ताकत, कोई भी कसर नहीं छोड़ेंगे. ऐसे में बीजेपी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है.

राजकोट वेस्ट के लिए बीजेपी ने बनाया है गुप्त वॉर रूम
बीजेपी की तैयारियों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो इस मुकाबले को बहुत गंभीरता से ले रही है. चुनाव की तैयारियों के लिए एक गुप्त वॉर रूम बनाया गया है. वॉर रूम माने वो जगह, जो चुनाव की तैयारियों का अड्डा होता है. ये वॉर रूम खासतौर पर इस सीट के लिए बनाया गया है. मुंबई, दिल्ली और पटना से IT विशेषज्ञों को बुलाया गया है. ये लोग 9 दिसंबर तक राजकोट में ही डेरा डाले रहेंगे. मीडिया खबरों की मानें, तो इस वॉर रूम के बारे में बीजेपी के बाकी IT एक्सपर्ट्स तक को कोई जानकारी नहीं है. इसे लेकर इतनी सतर्कता बरती जा रही है कि बिना इजाजत यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता टाइप स्थिति है. यहां तक कि पार्टी कार्यकर्ताओं का भी अंदर आना मना है. इस वॉर रूम के कुछ एक्सपर्ट बीजेपी के साथ पहले भी काम कर चुके हैं. 2014 में मोदी की टीम के साथ. सोशल मीडिया पर खूब ध्यान दिया जा रहा है.

किसमें कितना है दम
रूपानी मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपने निर्वाचन क्षेत्र का बराबर हाल-चाल लेते रहे. कई बार शनिवार और रविवार यहीं गुजारते थे. ये एक बात रूपानी का बोनस है. दूसरी तरफ इंद्रनील पिछले काफी समय से यहां अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे. राजकोट के लिए इंद्रनील का नाम और चेहरा वैसे भी नया नहीं है. जानकार बताते हैं कि एक साल से भी ज्यादा समय से इंद्रनील राजकोट वेस्ट सीट के अंदर अपने लिए माहौल तैयार करने में जुटे हुए हैं.

पिछले चुनाव का हाल
2012 के चुनाव में बीजेपी को 56 फीसद वोट मिले थे. कांग्रेस के पाले में 40 पर्सेंट वोट आए थे.

बाईं ओर हैं बाबू बोखीरिया. दाहिनी तरफ हैं
बाईं ओर हैं बाबू बोखीरिया. दाहिनी तरफ हैं अर्जुन मोढवाडिया. मोढवाडिया गुजरात कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में से एक हैं.

सीट: बाबू बोखीरिया
बीजेपी के उम्मीदवार: बाबू बोखीरिया
कांग्रेस के उम्मीदवार: अर्जुन मोढवाडिया

क्यों इस मुकाबले पर सबकी नजरें जमी हैं
बाबू बोखीरिया और अर्जुन मोढवाडिया दोनों में छत्तीस का आंकड़ा बहुत पुराना है. करीब दो दशक पुराना. मोढवाडिया कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं. पिछला चुनाव हारने के बाद ये पद उनके हाथ से निकल गया था. ये जो पोरबंदर की सीट है, वो इन दोनों के बीच का अखाड़ा है. बोखीरिया तीन बार यहां से विधायक रह चुके हैं और मोढवाडिया दो बार. अब तक तीन बार दोनों एक-दूसरे के खिलाफ लड़ चुके हैं. 1998 के चुनाव में बोखीरिया जीते. फिर 2002 में मोढवाडिया को जीत मिली. फिर 2012 के विधानसभा चुनाव में दोबारा ये दोनों एक-दूसरे के खिलाफ खड़े थे. इस बार बोखीरिया को जीत मिली. इस समीकरण से देखें, तो इस बार जीत की बारी मोढवाडिया की है. वैसे भी, पिछली बार हारने के बाद मोढवाडिया ने अपनी इस सीट पर बहुत ध्यान दिया है. उन्होंने यहां बहुत समय गुजारा है. लोगों से मिलते रहे हैं.

पिछले चुनाव का हाल
बोखीरिया को 53 फीसद वोट मिले थे. वहीं मोढवाडिया को मात्र 41 पर्सेंट मत मिले.

बाईं ओर हैं गुजरात में बीजेपी के सबसे बड़े नेता रमनलाल वोरा. दाहिनी ओर कांग्रेस के नौशाद सोलंकी हैं. ये सीट SC रिजर्व है.
बाईं ओर हैं गुजरात में बीजेपी के सबसे बड़े नेता रमनलाल वोरा. दाहिनी ओर कांग्रेस के नौशाद सोलंकी हैं. ये सीट SC रिजर्व है.

सीट: दसाडा
बीजेपी के उम्मीदवार: रमनलाल वोरा
कांग्रेस के उम्मीदवार: नौशाद सोलंकी

क्यों इस मुकाबले पर सबकी नजरें जमी हैं
दसाडा सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है. बीजेपी ने रमनलाल वोरा को यहां अपना उम्मीदवार बनाया है. वोरा 2016 में विधानसभा अध्यक्ष बनाए गए थे. गुजरात में बीजेपी के सबसे बड़े दलित चेहरों में गिनती होती है उनकी. इसके पहले वो साबरकांठा की इडर सीट से चुनाव लड़ा करते थे. 1995 से लेकर 2012 तक हुए पांच चुनावों में रमनलाल वोरा को इडर सीट पर कामयाबी मिली. इस बार पार्टी ने उन्हें दसाडा से खड़ा किया है. उनके आने के बाद से ही सुरेंद्रनगर की इस सीट का मुकाबला बहुत खास हो गया है. उनके खिलाफ खड़े हैं नौशाद सोलंकी. सोलंकी गुजरात कांग्रेस के अनुसूचित जाति कल्याण विभाग को संभालते हैं. उसके अध्यक्ष हैं. सुरेंद्रनगर की ये सीट उनके लिए कतई नई नहीं है. पिछले कुछ समय से वो लगातार यहां काम करते आ रहे हैं. ये सीट दोनों पार्टियों के बड़े दलित नेताओं का अखाड़ा बन गया है. गुजरात की कुल आबादी में करीब सात फीसद हिस्सा दलितों का है. देखना होगा कि दलित इस बार बीजेपी का साथ देते हैं या फिर कांग्रेस का.

पिछले चुनाव का हाल
बीजेपी को 49 फीसद वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस को करीब 41 प्रतिशत मत मिले थे.

शक्ति सिंह गोहिल को गुजरात कांग्रेस का सबसे सधा हुआ दिमाग माना जाता है.
शक्ति सिंह गोहिल को गुजरात कांग्रेस का सबसे सधा हुआ दिमाग माना जाता है.

सीट: मांडवी
बीजेपी के उम्मीदवार: वीरेंद्र सिंह जडेजा
कांग्रेस के उम्मीदवार: शक्ति सिंह गोहिल

क्यों इस मुकाबले पर सबकी नजरें जमी हैं
गुजरात कांग्रेस में शक्ति सिंह गोहिल का बड़ा कद है. प्रदेश में कांग्रेस के सबसे मजबूत और प्रभावी चेहरों में गिनती होती है उनकी. गोहिल भावनगर से आते हैं. सबको लग रहा था, वहीं से चुनाव भी लड़ेंगे. मगर फिर कांग्रेस ने उनको मांडवी से मैदान में उतार दिया. ये बड़े अजरज की बात थी. मतलब आखिरी समय तक भी किसी को भनक नहीं थी कि गोहिल मांडवी से चुनाव लड़ेंगे. मांडवी सीट कच्छ जिले में आती है. यहां बीजेपी की पकड़ है. 2012 के चुनाव में भी ये सीट बीजेपी के पास गई थी. ये सब जानते-बूझते हुए भी कांग्रेस ने गोहिल को यहां से खड़ा करने का जोखिम लिया है. उसको लगता है कि गोहिल की छवि यहां कमाल कर जाएगी. पिछली बार बीजेपी ताराचंद छेड़ा जीते थे यहां से. छेड़ा मंत्री भी रह चुके हैं गुजरात सरकार में. मगर इस बार पार्टी ने उनकी जगह वीरेंद्र सिंह जडेजा को मौका दिया है. देखना होगा कि गोहिल की छवि उनके अपने इलाके के बाहर भी असर करती है या नहीं.

पिछले चुनाव का हाल
बीजेपी को 44 फीसद वोट मिले थे. कांग्रेस के पक्ष में 38 फीसद वोटिंग हुई थी.


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