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Gujarat Elections 2017: ख़ाक निष्पक्ष चुनाव कराएगा चुनाव आयोग, नियम तक तो पता नहीं हैं

9 दिसंबर. ये आज की तारीख है. आज गुजरात में पहले चरण के चुनाव के लिए वोटिंग हो रही है. कल, यानी 8 दिसंबर को दोपहर दो बजे के करीब बीजेपी ने अपना मेनिफेस्टो जारी किया. इसे मेनिफेस्टो न कहकर ‘संकल्प पत्र’ का नाम दिया. आचार संहिता लागू हो चुकी थी. इसके बाद बीजेपी का मेनिफेस्टो निकालना नियमों के खिलाफ है या नहीं, ये जानने के लिए हमने चुनाव आयोग से बात की. गुजरात के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) हैं बी बी स्वैन. भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी हैं. इनके ऊपर गुजरात में निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी है. हमारे सवाल का जवाब देने के लिए इनसे ज्यादा मुफीद कोई और नहीं था.

बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां भी सुभानअल्लाह

हमने CEO स्वैन के दफ्तर में फोन किया. उनके सेक्रटरी ने नितिन आचार्य का नंबर देकर उनसे बात करने को कहा. नितिन आचार्य डेप्युटी सेक्रटरी हैं. हमने नितिन आचार्य से सीधा-सादा सवाल पूछा कि वोटिंग के एक दिन पहले मेनिफेस्टो जारी कर सकते हैं या नहीं? नियम क्या कहते हैं इस बारे में? नितिन आचार्य ने भी कोई जवाब नहीं दिया. कहा, ‘कंसीडर’ कर रहे हैं. हमने फिर सवाल दोहराया कि नियम क्या कहते हैं. उन्होंने कहा ये बात बताई नहीं जा सकती. मानो, बहुत गोपनीय बात होगी कोई. उनका रवैया काफी आक्रामक था. एक साधारण सी बात न बतानी पड़े, इसके लिए उन्होंने काफी बहस की. अंत में बिना जवाब दिए फोन रख दिया. इसके बाद दोबारा CEO बी बी स्वैन के दफ्तर में फोन मिलाया. नितिन आचार्य के बर्ताव के बारे में बताए जाने के बाद उनके सेक्रेटरी ने हमारी बात CEO से कराई.

गुजरात के मुख्य चुनाव अधिकारी (बीच में) का बर्ताव बताता है कि न केवल आयोग की तैयारी अधूरी है, बल्कि उसमें आत्मविश्वास की भी कमी है.
गुजरात के मुख्य चुनाव अधिकारी (बीच में) का बर्ताव बताता है कि न केवल आयोग की तैयारी अधूरी है, बल्कि उसमें आत्मविश्वास की भी कमी है. (फाइल फोटो)

साधारण से सवाल का जवाब नहीं पता?

CEO स्वैन से हमने पूछा कि चुनाव आयोग के नियम आचार संहिता लागू हो जाने के बाद मेनिफेस्टो जारी करने की इजाज़त देते हैं या नहीं. उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है. मतलब, नियमों की जानकारी नहीं है. दो-तीन बार जोर देकर पूछे जाने के बाद उन्होंने थोड़ा समय मांगा. कहा, नियमावली देखकर जवाब देंगे. हमने पूछा कितनी देर बाद दोबारा फोन करें आपको. उन्होंने कहा, कम से कम दो घंटे बाद. हमें उनके जवाब पर ताज्जुब हुआ. गुजरात के मुख्य चुनाव अधिकारी को इतने बुनियादी नियम की जानकारी नहीं है? ये बात हैरान करने वाली थी. खैर. दोपहर 2.56 मिनट पर हमने दोबारा CEO ऑफिस में फोन किया. मालूम चला कि वो लंच के लिए निकले थे. उनके सेक्रेटरी ने बताया कि लंच के बाद उनको किसी मीटिंग में शरीक होना है. सो वहीं पर हैं. हमें उनसे बात करने के लिए थोड़ा इंतजार करने को कहा गया. कहा, आधे घंटे बाद फोन मिलाएं. आपको बता दें कि बीजेपी दोपहर पौने दो बजे के करीब अपना ‘संकल्प पत्र’ उर्फ मेनिफेस्टो उर्फ चुनावी घोषणापत्र जारी कर चुकी थी. वित्तमंत्री अरुण जेटली के हाथों ये काम संपन्न हो चुका था.

जनाब, ये कैसा जवाब है?

खैर. वापस लौटते हैं CEO से बातचीत पर. कहे गए के मुताबिक, आधे घंटे बाद दोबारा फोन मिलाया. उनके सेक्रेटरी साहब ने बताया कि मुख्य चुनाव अधिकारी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जब वो लौटेंगे तो खुद मुझे फोन कर लेंगे. दोपहर बाद तकरीबन सवा चार बजे फोन आया. खुद CEO बी बी स्वैन ने फोन किया था. उनसे फिर वही पुराना सवाल पूछा हमने. आचार संहिता लागू हो जाने के बाद मेनिफेस्टो निकाला जा सकता है या नहीं. इसके जवाब में उन्होंने जो कुछ कहा, वो इस तरह है:

मैडम, उन्होंने मेनिफेस्टो निकाल दिया है. ऐसा लगता है कि मेनिफेस्टो में उन जगहों का जिक्र नहीं किया गया है, जहां पहले चरण की वोटिंग है. मेनिफेस्टो में फेज I की वोटिंग वाले इलाकों की बात नहीं की गई है. पहले चरण में जहां चुनाव होने हैं, वहां प्रचार बंद हो चुका है. उन इलाकों में ऐसा कोई कार्यक्रम हो भी नहीं सकता. अभी उन्होंने जो मेनिफेस्टो निकाला है, वो शायद अहमदाबाद से हुआ है. दूसरे चरण में जहां-जहां वोटिंग होनी है, वहां राजनैतिक प्रचार अभी भी हो रहा है. पाबंदी पहले चरण वाले इलाकों पर है. दूसरे चरण वाले इलाकों पर नहीं. पहले चरण में जहां चुनाव होना है, वहां के उम्मीदवारों की जानकारी देने पर पाबंदी है. हमें फिलहाल कहीं से भी कोई शिकायत नहीं मिली है. अगर कोई शिकायत मिलती है, तो देखेंगे.

बीजेपी का कहना है कि इतनी देर से मेनिफेस्टो जारी करना उसका रणनीतिक फैसला है. इसमें रणनीति है या नहीं, मालूम नहीं. लापरवाही है, ये पक्का है.
बीजेपी का कहना है कि इतनी देर से मेनिफेस्टो जारी करना उसका रणनीतिक फैसला है. इसमें रणनीति है या नहीं, मालूम नहीं. लापरवाही है, ये पक्का है.

एकदम गलत निकला मुख्य चुनाव अधिकारी का तर्क

सच कहें तो मुख्य चुनाव अधिकारी की ये बात पूरी समझ नहीं आई हमें. उन्होंने कहा कि मेनिफेस्टो में फेज़ I की वोटिंग वाले इलाकों का जिक्र नहीं है. उनकी ये बात सरासर गलत है. मसलन, बीजेपी के संकल्प पत्र में कई वादे किए गए हैं. इनमें से एक वादा सूरत में मेट्रो रेल परियोजना लाने का भी है. सूरत में तो 9 दिसंबर को वोटिंग हो रही है. पहले चरण में. बाकी वादे भी ऐसे हैं, जो पूरे गुजरात से किए गए हैं. जैसे, अगर बीजेपी दोबारा चुनकर आती है तो गुजरात की विकास दर सालान दस फीसदी तक रहेगी. इसमें किसी खास इलाके को छोड़ा या पकड़ा गया हो, ऐसा तो नहीं दिखता. ठाकुर और कोली कॉर्पोरेशन को दोगुना करने, दलित कारोबारियों को दी जाने वाली मदद बढ़ाई जाएगी, विश्व स्तर का आदिवासी विश्वविद्यालय खोला जाएगा, इन सारे वादों में किसी खास इलाके का जिक्र दिखता है क्या? एक और वादा किया है बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में. गुजरात के हर जिले में ‘आदिवासी कल्याण बोर्ड’ बनवाने का वादा. ‘हर जिले’ का जिक्र है. उन जिलों को नहीं हटाया गया है, जहां पहले चरण की वोटिंग है. बल्कि हम बताएं आपको. पहले चरण के अंतर्गत तापी, डांग, नर्मदा और वलसाड जिलों में 9 दिसंबर को वोटिंग हो रही है. ये सभी जिले आदिवासी-बहुल इलाके हैं. तो ये वादा उनको नहीं रिझाएगा क्या? पहले फेज़ की वोटिंग में कुल 14 सीटें ऐसी हैं, जो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. गुजरात के मुख्य चुनाव अधिकारी का तर्क तो सरासर गलत साबित होता है.

अच्छा, अब सुनिए कि अरुण जेटली ने चुनाव आचार संहिता लागू हो जाने के बाद मेनिफेस्टो जारी करने पर क्या तर्क दिया. उन्होंने कहा:

20 पन्नों के इस मेनिफेस्टो पर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर और ‘नए भारत’ का संकल्प है. ये चुनाव आयोग के ‘मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट’ का उल्लंघन नहीं करता. मुख्यमंत्री विजय रूपानी और उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल सहित बीजेपी के स्थानीय नेता, जो कि चुनाव लड़ रहे हैं, उनकी तस्वीरें मेनिफेस्टो में शामिल नहीं की गई हैं. मेनिफेस्टो की संशोधित प्रति शनिवार को शाम पांच बजे के बाद इंटरनेट पर अपलोड की जाएगी.

चुनाव आयोग को चाहिए कि वो अपने अधिकारियों को नियमावली समझाकर भेजें. उनकी तैयारी दुरुस्त हो. ऐसा नहीं कि आदमी मशीन होता है और उसे हमेशा सबकुछ याद रहता है. मगर कुछ बुनियादी बातें तो स्पष्ट रहनी ही चाहिए.
चुनाव आयोग को चाहिए कि वो अपने अधिकारियों को नियमावली समझाकर भेजें. उनकी तैयारी दुरुस्त हो. ऐसा नहीं कि आदमी मशीन होता है और उसे हमेशा सबकुछ याद रहता है. मगर कुछ बुनियादी बातें तो स्पष्ट रहनी ही चाहिए.

ऐसे अधिकारियों पर है निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी?

जेटली के बयान में हमको वो ‘फेज़ I की वोटिंग वाले इलाकों का जिक्र नहीं’ वाला तर्क सुनाई नहीं दिया. इस लिहाज से तो जेटली का कहा ज्यादा समझ आ रहा है. CEO की तुलना में. नियम क्या कहता है और क्या नहीं कहता, ये बाद की बात है. मगर जो तर्क देकर CEO ने बीजेपी मेनिफेस्टो का जवाब दिया, वो तो बिल्कुल फर्जी है. आधारहीन है. सरासर गलत है. एक और बात खटक रही है. गुजरात के मुख्य चुनाव अधिकारी और उनके मातहतों को बुनियादी नियम नहीं पता! जिन लोगों पर निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी है, उन्हें ही कुछ मालूम नहीं. एक साधारण से सवाल का जवाब देने से पहले उन्हें तीन घंटे तक तैयारी करनी पड़ी. नियमावली पलटनी पड़ी. इतना करने के बाद भी जो जवाब दिया, वो तथ्य और तर्क से खाली.

इतनी खराब तैयारी से कैसे चलेगा?

चुनाव आयोग से सवाल पूछा जाना चाहिए. ऐसे में कैसे चलेगा? इतनी खराब तैयारी से तो काम नहीं चलने वाला है. किसी भी पसोपेश की स्थिति में लोग तो चुनाव आयोग का ही मुंह जोहेंगे. उसकी तरफ से भी ऐसी लापरवाही दिखाई जाती है, तो क्या रास्ता बचता है. जिनके ऊपर चुनाव ठीक से कराने की जिम्मेदारी है, उन्हें नियम-कानून का ही नहीं पता. चुनाव आयोग को चाहिए कि चुनाव तारीखों का ऐलान करने से पहले अपने अधिकारियों को सही ट्रेनिंग दे दें. इससे शायद थोड़ी मदद मिलेगी. बाकी सत्ता में जो होता है, उसको सहूलियतें तो मिल ही जाती हैं. उससे सख्ती दिखाने में कइयों के हाथ-पांव फूल जाते हैं.


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