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शहीद की बेटी को पुलिस घसीटती रही, गुजरात के CM खड़े देखते रहे

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देश की सबसे ज्यादा किसको पड़ी है? हाल-फिलहाल ये सवाल पूछें तो जवाब आएगा बीजेपी. कइयों को लगता है कि बीजेपी से राष्ट्रवादी दूजा कोई नहीं. भारत माता, देशभक्ति और राष्ट्रवाद के अलावा जो एक शब्द बीजेपी सबसे ज्यादा इस्तेमाल करती है, वो है सेना. ‘हमारे जवान सीमा पर मर रहे हैं,’ ये एक राष्ट्रीय वाक्य बन गया है. इसी बीजेपी के नेता हैं विजय रूपानी. गुजरात के मुख्यमंत्री हैं. 1 दिसंबर को वडोदरा जिले में चुनाव प्रचार कर रहे थे. एक रैली में भाषण दे रहे थे जब उनकी आंखों के सामने पुलिस एक शहीद जवान की बेटी को घसीटकर दूर ले गई. मगर CM ने कुछ नहीं किया. वो लड़की बस मुख्यमंत्री से मिलना चाहती थी. उन्हें अपनी और अपने परिवार की तकलीफ बताना चाहती थी. रूपानी चाहते तो एक झटके में उसकी मुश्किल दूर कर सकते थे. मगर उन्होंने ऐसा किया नहीं. उनका बर्ताव देखकर लगा कि क्या नेताओं के अंदर राजनीति छोड़कर बाकी कुछ नहीं होता? इंसानियत और जिम्मेदारी कुछ भी मायने नहीं रखती?

जितने टाइम में एक के बाद एक जवाबी ट्वीट किया विजय रुपानी ने, उससे तो कम ही समय लगता रुपल तडवी से मिलने में. शर्मिंदगी से भी बच जाते और CM होने का फर्ज भी निभ गया होता.
देखिए, पुलिस कैसे घसीटकर ले जा रही थी रूपल को. जिस समय ये हो रहा था, उस समय रूपानी वहीं मंच पर खड़े होकर राहुल गांधी का जिक्र करते हुए भाषण दे रहे थे.

कश्मीर में शहीद हुए थे अशोक तडवी

रूपल तडवी की उम्र 26 साल है. उनके पिता का नाम था अशोक तडवी. सीमा सुरक्षा बल (BSF) में तैनात थे. 15 साल पहले एक रोज कश्मीर में मारे गए. ड्यूटी पर तैनात जवान जब दुश्मनों के हाथों मारा जाता है, तो उसको शहीद ही तो कहते हैं. तो अशोक तडवी भी ‘शहीद’ हो गए थे. शहीदों के परिवार की सरकार मदद करती है. नौकरी, जमीन, पैसा, काफी कुछ देती है. ताकि घर के कमाऊ इंसान की मौत के बाद परिवार को किसी का मोहताज न होना पड़े. मतलब, जिस जवान ने देश के लिए जान दी, उसकी पारिवारिक जिम्मेदारियां सरकार पूरी करे. टैक्स देने वालों के पैसे से. देश के पैसे से.

ऐसा ही वादा अशोक तडवी के परिवार से भी किया गया होगा. वादा पूरा नहीं हुआ शायद. पिछले कई साल से तडवी परिवार सरकार को उन वादों की याद दिला रहा है. उनका कहना है कि सरकार ने जमीन देने का वादा किया था, मगर इतने साल बाद भी दिया नहीं. इसी की शिकायत करने रूपल तडवी एक दिसंबर को मुख्यमंत्री की रैली में पहुंची. जब रूपानी मंच पर भाषण दे रहे थे, तभी रूपल उनकी ओर बढ़ीं. ये कहते हुए कि मुझे CM से मिलना है, मुझे CM से मिलना है. मगर वो मुख्यमंत्री से मिल नहीं पाईं. महिला पुलिस ने रूपल को रोक दिया. वो लोग मुख्यमंत्री की आंखों के सामने रूपल को जबरन घसीटते हुए ले गए. मगर रूपानी ने कुछ नहीं किया. मंच पर कहा कि रैली के बाद मिलेंगे. मगर इस वादे को भी पूरा नहीं किया. ‘शहीद की बेटी’ से मिलने के लिए पांच मिनट का समय नहीं निकाल सके गुजरात के मुख्यमंत्री.

राहुल गांधी ने ट्वीट क्या कर दिया, एकदम से एक्टिव हो गए रूपानी

इतने साल से सत्ता में रहकर बीजेपी को शहीद तडवी परिवार का ध्यान नहीं आया था. उनके बार-बार विरोध करने पर भी कोई सुनवाई नहीं हुई. शिकायतें नजरअंदाज कर दी गईं. शहीद की बेटी को पुलिस सामने से घसीटकर ले गई, तब भी असर नहीं पड़ा. फर्क तब पड़ा, जब इस पर राजनीति शुरू हुई. जब राहुल गांधी ने इस घटना का वीडियो ट्वीट कर दिया, तब जाकर रूपानी जागे. और आयं-बायं बोलने लगे. बीजेपी ने सैनिकों के लिए क्या-क्या किया है, उसका बखान करने लगे. लिखा:

श्रीमती रेखाबेन (शहीद अशोक तडवी की विधवा) को भाजपा सरकार की ओर से 4 एकड़ जमीन, 10,000 रुपए मासिक पेंशन और 36,000 रुपए सालाना पेंशन मुहैया कराया गया है. इसके अलावा, सड़क के पास की एक 200 वर्ग मीटर की जमीन भी दी जा रही है, ताकि वो वहां घर बना सकें.

CM रूपानी से पूछा जाना चाहिए कि राहुल गांधी के ट्वीट के बाद ही उनकी नींद क्यों खुली? क्योंकि राजनीति में नंबर गंवाने का डर था? क्योंकि चुनाव पास हैं? हद है. सामने दो मिनट मिलने का वक्त नहीं निकाल सके, मगर ट्विटर पर बड़ी-बड़ी बातें करने और आदर्शवादी बनने का वक्त मिल गया? हद है इन नेताओं की. सारे काम भूल जाते हैं, मगर राजनीति करना नहीं भूलते. अगर राहुल का ट्वीट नहीं आता और मीडिया इस खबर को कवर नहीं करती, तो शायद मुख्यमंत्री रूपानी इस मामले को अनदेखा ही कर देते. ऐसे ही जैसे पुलिस का रूपल को घसीटना नजरअंदाज कर दिया था.

पिछले 15 साल से फरियाद कर रहा है तडवी परिवार

ये पहली बार नहीं था, जब रूपल ने CM से मिलने की कोशिश की. उनका परिवार पिछले 15 साल से संघर्ष कर रहा है. जिनके हाथों में पूरे सिस्टम की चाभी होती है, उस सरकार से मिलने की कोशिश कर रहा है. यहां तक कि सारे स्थानीय पुलिसवाले भी इन्हें पहचानते हैं. गुजरात पुलिस के मुताबिक, तडवी परिवार ने पहले भी कई बार CM का सुरक्षा घेरा तोड़कर उनसे मिलने की कोशिश की है. जब हर अपील बेअसर जाएगी तो और क्या करेंगे? मुख्यमंत्री अगर उनके ऊपर चंद मिनट खर्च ही कर देते तो क्या बिगड़ जाता? पूछे लेते कि क्या परेशानी है. पता करवा लेते कि शिकायत सच्ची है या नहीं. अगर सच्ची है तो 15 साल बाद भी जमीन क्यों नहीं दी गई है. इसका जिम्मेदार कौन है? मुख्यमंत्री हैं रूपानी. इतनी जिम्मेदारी तो बनती है उनकी. 15 साल से अगर उस परिवार को जमीन नहीं मिली तो इसकी जिम्मेदारी सरकार की ही हुई ना. अपने कमाऊ सदस्य की मौत के बाद जाने उस परिवार ने कैसे-कैसे गुरबत के दिन देखे होंगे! मुख्यमंत्री जनता की दिक्कतें दूर करने के लिए होता है या चुनावी रैलियां करने और भाषण देने के लिए?

रैली के बाद नेता कई बार वहां मौजूद लोगों से हाथ मिलाते हैं. जैसे, कोई बड़ा मैच जीतने के बाद क्रिकेट और फुटबॉल के खिलाड़ी पूरे स्टेडियम का चक्कर लगाकर दर्शकों की तरफ हाथ हिलाते हैं, वैसे ही. मोदी जी भी खूब करते हैं ऐसा. 
रैली के बाद नेता कई बार वहां मौजूद लोगों से हाथ मिलाते हैं. जैसे, कोई बड़ा मैच जीतने के बाद क्रिकेट और फुटबॉल के खिलाड़ी पूरे स्टेडियम का चक्कर लगाकर दर्शकों की तरफ हाथ हिलाते हैं, वैसे ही. मोदी जी भी खूब करते हैं ऐसा.

मुख्यमंत्री के पास भाषण देने का टाइम है, फर्ज निभाने का टाइम नहीं है

जब कोई जवान मरता है तो सब उसके गुण गाते हैं. फिर भूल जाते हैं. पलटकर देखते भी नहीं कि उस मरने वाले का परिवार किस हाल में है. ऊंचे अधिकारियों के परिवार के पास फिर भी कुछ साधन होते हैं. निचले पदों पर तैनात जवान अक्सर अपने परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य होते हैं. पूरे परिवार का ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ उनकी कमाई से चलता है. ऐसे में जब वो ड्यूटी करते हुए मर जाते हैं तो परिवार पर दोहरी शामत आती है. एक तो उनके मर जाने की तकलीफ और दूसरा बेसहारा होने की परेशानी. उस परिवार की देखभाल करना सरकार और देश की जिम्मेदारी होनी चाहिए. और रूपानी जैसे मुख्यमंत्रियों के लिए क्या ही कहें हम? रैली में भाषण देने का टाइम है. जोड़-तोड़ के लिए टाइम है. मगर मुख्यमंत्री का फर्ज निभाने का टाइम नहीं. जरूरतमंदों पर पांच मिनट नहीं खर्च कर सकते. जनता के हाथों चुने हुए ऐसे नेताओं पर तो लानत है. लानत है. लानत है.


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