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इस बार राष्ट्रवादियों से देश बचाने का जिम्मा हिंदू-मुस्लिम ने नहीं किसी और धर्म ने लिया है

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कितना अच्छा शब्द है सलाहियत. इसका मतलब होता है सलाह देना, जिसे आप चाहें या न चाहें, लोग-बाग गाहे-बगाहे देते ही रहते हैं. लेकिन अब सलाहियत देने वाले सहूलियत भी बरतने लगे हैं. और जब गुजरात में चुनाव हों, राहुल गांधी चुनाव के लिए गुजरात दौरे पर हों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जाने वाले हों, तो फिर सलाहियत वालों के लिए तो सहूलियत बनती ही है. सहूलियत के हिसाब से कभी किसी के लिए देश खतरे में पड़ जाता है, कभी किसी के लिए उनका धर्म खतरे में पड़ जाता है. चुनाव के दौरान आम तौर पर बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के लिए देश खतरे में होता है, वहीं मुस्लिम के लिए उनका धर्म खतरे में होता है. इस बार फिर से देश खतरे में है, लेकिन खतरा हिंदू या मुस्लिम धर्म ने नहीं किसी और ने जताया है. इस बार देश को खतरा राष्ट्रवादी ताकतों से है, जिसका मुद्दा उठया है गांधीनगर के आर्कबिशप थॉमस मैकवान ने. उन्होंने ईसाई समुदाय के लोगों को एक पत्र लिखा है, जिसमें लोगों से देश को ‘राष्ट्रवादी ताकतों’ से बचाने की अपील की गई है.

church radhanpur
गांधीनगर का राधनपुर चर्च चुनाव के वक्त अपने लोगों को सलाह देने के लिए पत्र लिखता रहता है.

थॉमस मैकवान ने 21 नवंबर को एक पत्र लिखा था. उन्होंने अपने पत्र में ईसाई समुदाय के लोगों से प्रार्थना सेवाएं आयोजित करवाने की अपील की थी, ताकि उनका समुदाय ऐसे लोगों को वोट दे, जो जीतकर आएं, तो संविधान के प्रति वफादार रहें और बिना भेदभाव किए हुए सभी का सम्मान करें. आर्कबिशप ने पत्र में गुजरात चुनाव को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि अल्पसंख्यकों, ओबीसी और गरीबों में असुरक्षा का भाव पैदा हो रहा है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक थॉमस मैकवान ने कहा कि जब भी चुनाव होते हैं, वो पत्र लिखते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि लोगों को सही राह दिखाई जा सके.

letter bishop

आर्कबिशप ने लिखा था-

हमारे देश का सेक्युलर और संवैधानिक ढांचा खतरे में है. मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है. संवैधानिक अधिकारों से छेड़छाड़ की जा रही है. एक भी दिन ऐसा नहीं बीतता है, जब किसी चर्च, चर्च के किसी शख्स या ऐसी किसी संस्था पर हमला नहीं होता है. अल्पसंख्यकों, ओबीसी और पिछड़ों में असुरक्षा का भाव बढ़ता जा रहा है. राष्ट्रवादी ताकतें देश पर कब्जा करती जा रही हैं और ऐसे में गुजरात का विधानसभा चुनाव का परिणाम इसे रोक सकता है. इस देश में केवल सवर्ण हिंदू और धनी लोग ही सुरक्षित हैं और ये ही लोग राष्ट्रवादी ताकतों के संरक्षक हैं.

थॉमस मैकवान के पत्र का मजमून जब बीजेपी के खिलाफ बताया जाने लगा तो मैकवान फिर से सामने आए और कहा कि उनका पत्र किसी पार्टी विशेष के पक्ष में या उसके खिलाफ नहीं था. उन्होंने कहा कि मैंने किसी पार्टी के पक्ष में वोट करने या किसी पार्टी के विरोध में वोट देने की बात नहीं कही थी. मैंने तो सिर्फ इतना कहा था कि लोग अपने ईमान के आधार पर उन्हीं को वोट दें, जो ज्यादा सेक्युलर हों और जिनमें संविधान के प्रति सम्मान हो. थॉमस मैकवान ने अपने बयान में कहा है कि राष्ट्रवादी ताकतों से उनका मतलब संकीर्ण विचारधारा वाले लोगों से था.

अब थॉमस मैकवान भले ही अपने पत्र को किसी पार्टी विशेष के पक्ष या विपक्ष में लिखने की बात को खारिज करें, लेकिन एक बात तो तय है. और बात ये है कि जब भी राष्ट्रवादी ताकतों का नाम लिया जाता है, तो उसमें राजनीतिक पार्टी के तौर पर कांग्रेस नहीं, बीजेपी को ही शामिल किया जाता है. जब भी राष्ट्रवादी नाम लिया जाता है, तो उसमें राहुल गांधी या सोनिया गांधी या किसी कांग्रेस नेता का नाम नहीं होता है, हमेशा इस श्रेणी में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह और सुब्रमण्यन स्वामी समेत बीजेपी और आरएसएस नेताओं का ही नाम लिया जाता है. ऐसे में थॉमस मैकवान चाहे जितना भी कहें कि उनका पत्र किसी के विरोध में नहीं है, बीजेपी और उसके समर्थकों के गले तो ये बात नहीं ही उतरेगी.


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