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गुजरात: उधर दंगा हो रहा था, इधर BJP मुस्लिम DCP का ट्रांसफर कराने को बवाल काट रही थी

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ये चल रहा है 2017. जाने वाला ही है समझिए. ये वाला किस्सा अभी का नहीं है. 27 कैलेंडर पीछे का है. 1990 का. इस साल गुजरात में चुनाव हुए थे. और हुए थे दंगे. हिंदू-मुसलमान वाले दंगे. इससे पिछली बार 1985 में चुनाव हुआ था. तब भी दंगे हुए थे. सरकार बने हुए बस एक महीना गुजरा था. जनता दल और बीजेपी की गठबंधन सरकार थी. मुखिया थे चिमनभाई पटेल. एकाएक दंगा शुरू हुआ. इससे पहले की कुछ समझ आता, दंगा फैल गया. पूरे गुजरात में. पाटन, भालेज, आनंद, भरूच, वडोदरा. सब जगह. अहमदाबाद का नाम नहीं गिनाया. क्योंकि वो तो जाहिर है. गुजरात दंगों की परमानेंट एंट्री- अहमदाबाद. सरकारी आंकड़े 60 मौतों की गवाही देते हैं. इनमें से 45 का दाग अकेले अहमदाबाद के सिर था. जो मर गए, वो तो गए. बाकी हजारों लोग ऐसे थे, जो बुरी तरह से जख्मी हुए. हजारों बेघर हो गए. लाखों की संपत्ति स्वाहा हो गई. उस नुकसान का तो कोई नामलेवा भी नहीं था. दंगे का इतना बुरा हाल था कि राज्य सरकार को बोरिया-बिस्तर लेकर शिफ्ट होना पड़ा. शहर का इतना बुरा हाल था कि अहमदाबाद के सर्किट हाउस से सरकार चलने लगी. इसी दंगे का वो वाकयाा भी है, जब मुसलमान DCP का ट्रांसफर करवाने पर अड़ी बीजेपी ने बात मनवाने के लिए खुद ही बवाल काटना शुरू कर दिया.

एक अफवाह के कारण पूरे राज्य में दंगे फैल गए. बाद में सरकार ने कहा कि इसके पीछे राजनैतिक ताकतों का भी हाथ हो सकता है.
एक अफवाह के कारण पूरे राज्य में दंगे फैल गए. बाद में सरकार ने कहा कि इसके पीछे राजनैतिक ताकतों का भी हाथ हो सकता है. (सांकेतिक तस्वीर)

छोटी सी घटना से पूरे गुजरात में फैल गया दंगा
दंगे की चिंगारी सबसे पहले पाटन में भड़की. एकदम छोटी. 3 अप्रैल का दिन था. किसी ने किसी को चाकू मार दिया. जिसे चाकू लगी, वो इत्तेफाक से मुसलमान था. किसी भी शहर में होने वाले आम अपराध की तरह थी ये घटना. मगर फिर अफवाह तैरने लगी. जाने कहां से बात फैल गई कि किसी हिंदू ने मुसलमान को चाकू मारा है. कोई सबूत नहीं था, मगर अफवाहों को सबूत की दरकार ही क्या? अगले दिन कांड शुरू हो चुका था. तीन लोगों की हत्या की जा चुकी थी. बदले में. सबसे बुरी बात क्या हुई, पता है? एक सरकारी बस के अंदर चार लोगों के गैंग ने 11 लोगों की चाकू मारकर हत्या कर दी. मरने वाले सारे हिंदू थे. मारने वाले मुसलमान. इसके बाद हिंदू भड़क गए. भड़के ज्यादा वो, जो कट्टर थे. अगले दिन उन्होंने भी वो ही हैवानियत दिखाई. मुसलमानों की दुकानों को जला दिया. लूटा. फिर तो चेन चल पड़ी. दोनों समुदाय बदले के नाम पर फसाद करने में जुट गए.

खुद भी झूठ बोल रहे थे मुख्यमंत्री और दूरदर्शन से भी झूठ बुलवा रहे थे
जब ये सब होता है, तब प्रशासन कर्फ्यू लगाकर चैन पा लेता है. यहां भी ये ही हुआ. जो प्रभावित इलाके थे, वहां कर्फ्यू लगा दिया गया. कई जगह फसादियों पर पुलिस फायरिंग भी हुई. इसके कारण और भी लोग मरे. मामला और हाथ से निकल गया. उधर सरकार को अपनी पड़ी थी. चिमनभाई पटेल की सरकार बिल्कुल बेअसर लग रही थी. बल्कि मुख्यमंत्री तो झूठ भी बोल रहे थे. 6 अप्रैल को कम से कम 17 लोगों की मौत हुी थी. मगर उस शाम जब दूरदर्शन पर खबर आई, तो मरने वालों की संख्या बस एक बताई गई. दूरदर्शन खबर क्या देता था, सरकार का एजेंडा पूरा करता था. यहां तक कि खुद CM ने कहा कि बस तीन लोग मरे हैं. जनता दल के विधायक और पूर्व पुलिस कमिश्नर जसपाल सिंह से तब नाराजगी में कहा था:

जो पार्टी आजाद मीडिया की बात करती है, उसके नेता को इस तरह से सच्चाई छुपाना शोभा नहीं देता.

3 अप्रैल, 1985 को मामला शुरू हुआ. एक मुसलमान को किसी ने चाकू से मार दिया. अफवाह फैली कि इसके पीछे हिंदुओं का हाथ है. फिर तो ये क्रम सा चल निकला. दोनों ओर के लोग बदले के नाम पर सड़कों पर उतर गए.
3 अप्रैल, 1985 को मामला शुरू हुआ. एक मुसलमान को किसी ने चाकू से मार दिया. अफवाह फैली कि इसके पीछे हिंदुओं का हाथ है. फिर तो ये क्रम सा चल निकला. दोनों ओर के लोग बदले के नाम पर सड़कों पर उतर गए. (सांकेतिक तस्वीर)

तमाम चेतावनियों के बाद सरकार ने कुछ सही न किया
जसपाल सिंह का नाराज होना बनता था. एक तो वो बात सही कर रहे थे. दूसरा ये कि उन्होंने एक महीने पहले ही चेतावनी दी थी. विधानसभा में खड़े होकर कहा था कि माहौल खराब हो रहा है. चेताया था कि हिंदू-मुस्लिम माहौल खराब हो रहा है. ये ही बात उन्होंने 3 अप्रैल को भी दोहराई थी. उस दिन, जिस दिन दंगा शुरू हुआ था. सरकार की नाकामी साफ दिख रही थी. राज्य के बाकी हिस्सों से लगातार सांप्रदायिक हिंसा की खबरें आ रही थीं. इसके बावजूद सरकार ने कोई तैयारी नहीं की. जरा भी हाथ-पैर नहीं हिलाए. अहमदाबाद वैसे भी आग की ढेर पर बैठा रहता है. सांप्रदायिक दंगों के नजरिये से वो बड़ा संवेदनशील इलाका है. बात बिगड़ते देर नहीं लगती. सरकार ने एक तो अपनी तरफ से कुछ नहीं किया. फिर जब पुलिस ने कुछ करने की कोशिश की, तो बीच में टंगड़ी मार दी. जैसे, 14 अप्रैल की बात है. तब अहमदाबाद में ये मामला शुरू ही हुआ था. पुलिस ने 40 उपद्रवियों को उठवा लिया. एहतियातन. मगर फिर गृहमंत्री नरहरि अमीन बीच में आ गए. उन्होंने दबाव डाला और पुलिस ने उन सबको रिहा कर दिया.

एक तो मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल में खुद कमियां थीं. दूसरी बात ये थी कि बीजेपी भी उन्हें खुलकर चलने नहीं दे रही थी.
एक तो मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल में खुद कमियां थीं. दूसरी बात ये थी कि बीजेपी भी उन्हें खुलकर चलने नहीं दे रही थी. सरकार के सामने हिंदूवादी संगठनों का अलग दबाव था.

बीजेपी और वीएचपी ने सर्किट हाउस में ही तोड़-फोड़ शुरू कर दी
चिमनभाई पटेल की एक मुश्किल बीजेपी भी थी. जो गठबंधन सरकार में शामिल थी. बीजेपी का झुकाव हिंदुओं की ओर था. बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद (VHP) दोनों मुख्यमंत्री से DCP का तबादला करने को कह रहे थे. उस वक्त DCP थे फजल गार्ड. मुसलमान थे. बीजेपी और वीएचपी उनपर पक्षपात करने का इल्जाम लगा रहे थे. मुख्यमंत्री ने तबादला करने से इनकार कर दिया. CM के इनकार करने पर बीजेपी-वीएचपी ने पता है क्या किया? उन्होंने सर्किट हाउस में ही हंगामा मचा दिया. जमकर तोड़-फोड़ की. खिड़कियां तोड़ दीं. फर्नीचर फेंक दिया. सोचिए, गठबंधन सरकार में शामिल पार्टी इतने संवेदनशील वक्त में इतनी बदतमीजी दिखा रही थी!


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