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जिसके रथ ने भाजपा को आगे बढ़ाया, उसके इलाके में कांग्रेस भाजपा से आगे कैसे है?

गांधीनगर. गुजरात की राजधानी. अहमदाबाद से बस 23 किलोमीटर दूर. कई लोग अहमदाबाद को गुजरात की राजधानी समझते हैं. मगर असली राजधानी ये है.
‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ वाली जो साबरमती नदी है, उसके ही किनारे बसा है गांधीनगर.

देश के सबसे करीने से बसे शहरों में गिनती होती है इसकी. देखने में चंडीगढ़ का भाई लगता है. मुहल्ले कितने लंबे-चौड़े होंगे, ये भी तय है. कुल 30 सेक्टर हैं शहर में. एक-एक किलोमीटर लंबे-चौड़े. सारे सेक्टर्स में एक प्राथमिक स्कूल है, एक हायर सेकेंडरी स्कूल है, एक डिस्पेंसरी है और एक बाजार है.

जब गांधीनगर शहर को बसाया गया था, तब ये सोचा गया था कि इसे बनाने वालों, प्लान करने वालों में कोई विदेशी नाम न हो. फिर दो भारतीय खोजे गए. प्रकाश एम आप्टे और एच के मेवादा. उन्होंने ही मिलकर इस शहर का खाका खींचा. कागज पर शहर बसा दिया. मेवादा चीफ आर्किटेक्ट थे. आप्टे उनके सहायक थे. बीजेपी का गढ़ माना जाता है ये शहर. लालकृष्ण आडवाणी की लोकसभा सीट. बीजेपी की सबसे सुरक्षित सीटों में से एक. दिल्ली की तरह यहां भी एक अक्षरधाम मंदिर है. दिल्ली वाला पर्यटक स्थल ज्यादा है, जबकि गांधीनगर वाला अक्षरधाम गुजरात के सबसे लोकप्रिय हिंदू मंदिरों में से एक है.

अक्षरधाम मंदिर गुजरात के सबसे लोकप्रिय हिंदू मंदिरों में से है (फोटोः अक्षरधाम डॉट कॉम)
अक्षरधाम मंदिर गुजरात के सबसे लोकप्रिय हिंदू मंदिरों में से है (फोटोः अक्षरधाम डॉट कॉम)

एक गांधीनगर शहर है और एक गांधीनगर जिला है. जिले का हेडक्वॉर्टर है शहर. 1964 में गठन हुआ था इसका. गांधीनगर जिला तीन हिस्सों में बंटा है- चांदखेड़ा, मोटेरा और अदालाज. चार तहसीलें हैं इसमें- गांधीनगर, कलोल INA, दाहेगम और मनसा. जिले के अगल-बगल में साबरकांठा, अरावली, खेड़ा, अहमदाबाद और मेहसाना जिले. दिल्ली और मुंबई के बीच जो इंडस्ट्रियल कॉरिडोर है, उसके बीच में पड़ता है ये जिला. विधानसभा की कुल पांच सीटें हैं यहां:

दहेगाम (विधानसभा सीट नंबर 34)
गांधीनगर दक्षिण (सीट नंबर 35)
गांधीनगर उत्तर (सीट नंबर 36)
मनसा (सीट नंबर 37)
कलोल (सीट नंबर 38)

कैसी है गांधीनगर में लड़ाई?

गांधीनगर में कांग्रेस और बीजेपी के बीच कड़ा मुकाबला है. ऐसा लग रहा है कि दोनों एक-दूसरे के दांत में दबी रोटी निकालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. लोकसभा सीट तो पिछले कई सालों से बीजेपी के पास है. लड़ाई विधानसभा को लेकर है. इससे पहले 2002 और 2007 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का पलड़ा भारी रहा था. उसने पांच में से तीन सीटें जीती थीं. 2012 में कांग्रेस का पलड़ा भारी हो गया. उसने पांच में से तीन सीटें जीत लीं. मगर उसके कुछ खास चेहरे साथ छोड़कर जा चुके हैं.

गांधीनगर से सांसदी लालकृष्ण आडवाणी के पास है.
गांधीनगर से सांसदी लालकृष्ण आडवाणी के पास है.

गांधीनगर जिले में दो समुदाय सबसे मजबूत स्थिति में हैं. एक पाटीदार, दूसरे रबारी. रबारी की गिनती पिछड़ी जातियों में होती है. दोनों समुदायों के बीच हमेशा एक होड़ सी रहती है. कांग्रेस के पास मुस्लिमों का समर्थन है. पाटीदार भी उसका साथ दे सकते हैं. अगर ऐसा होता है, तो कांग्रेस को बढ़त मिल सकती है. हालांकि
वाघेला का जाना नुकसान भी दे सकता है. खासकर ओबीसी वोट के मामले में. अल्पेश ठाकुर कितनी मदद कर पाते हैं, ये तो नतीजे आने पर ही मालूम चलेगा.

विधानसभा सीटों का थोड़ा हाल-चाल

दहेगाम:

जब गुजरात पर खिलजी वंश का शासन हुआ, तब शुरू हुआ दहेगाम का इतिहास. करीब 800 साल पुराना है इसका इतिहास. खिलजियों के बाद तुगलक वंश, फिर मुगल, फिर मराठा आए यहां. दामजी गायकवाड़ के समय में दहेगाम तालुका बना. साल था 1875. धीरे-धीरे दहेगाम अहम राजनैतिक केंद्र के रूप में विकसित होता गया. 1998 में अहमदाबाद जिले का बंटवारा हुआ. बंटवारे में दहेगाम गांधीनगर के हिस्से में आया. दहेगाम में एक 500 साल पुराना बरगद का पेड़ है. इसको कंथारपुरा का बरगद कहते हैं. इसकी देखभाल सांस्कृतिक विरासत के तौर पर किए जाने की घोषणा की गई थी. 2013 में. जब मोदी मुख्यमंत्री थे. खुद गए थे यहां
सशरीर.

500 साल पुराने कंथारपुरा के बरगद को सांस्कृतिक विरासत माना गया है. (फोटोः नरेंद्र मोदी डॉट इन)
500 साल पुराने कंथारपुरा के बरगद को सांस्कृतिक विरासत माना गया है. (फोटोः नरेंद्र मोदी डॉट इन)

2012 के चुनाव में कांग्रेस की कामिनीबा भूपेंद्रसिंह राठौड़ ये सीट निकाल ले गईं. उन्होंने बीजेपी के रोहितजी चंदूजी ठाकोर को हराया था. जीत का अंतर बहुत कम था. महज 2,297 वोटों ने जीत-हार तय कर दी थी. कांग्रेस ने इस बार भी कामिनीबी के ऊपर ही भरोसा किया है. बीजेपी ने बलराजसिंह कल्याणसिंह चौहान को मैदान में उतारा है. दहेगाम सीट पर काफी मुश्किल लड़ाई होती है. 1995 से ही यहां बहुत कड़ा मुकाबला होता आया है. 1995 और 1998 में बीजेपी ने ये सीट जीती. मगर उसके पास कांग्रेस आ गई. कामिनीबेन राठौड़ बस 1.8 फीसद वोटों के अंतर से जीती थीं पिछला चुनाव. दहेगाम ग्रामीण सीट है. गुजरात के ग्रामीण इलाकों में जाति का गणित बहुत बड़ा मुद्दा होता है. इसलिए मुकाबला भी बहुत कड़ा होता है. जहां तक दहेगाम की बात है, तो जीत-हार तय करने में कोली समुदाय के वोटों की अहम भूमिका होती है.

दक्षिणी गांधीनगर सीट:

बीजेपी के नेता हैं शंभू दी चेलाजी ठाकोर. 2012 के चुनाव में इस सीट पर जीते थे. उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार सुरेशकुमार चतुरदास पटेल को हराया था. वोटों का अंतर था 4,225 वोट. 2007 में भी शंभुजी ही ये सीट जीते थे. इस बार भी बीजेपी ने शंभूजी चेलाजी ठाकोर को ही उतारा है. ये तीसरी बार है कि वो बीजेपी के टिकट पर यहां से लड़ रहे हैं. उनके खिलाफ कांग्रेस ने गोविंद ठाकोर को खड़ा किया है.

गांधीनगर उत्तर सीट:

2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के अशोककुमार रणछोड़भाई पटेल को ये सीट मिली थी. अशोककुमार ने कांग्रेस के जुगाजी नाथजी ठाकोर को 8,011 वोटों से हराया था. बीजेपी ने इस बार भी अशोकभाई पटेल को उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस के प्रत्याशी हैं सी जे चावड़ा.

गांधीनगर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने टिकट वितरण से नाराज़ होकर कांग्रेस दफ्तर में तोड़फोड़ कर दी थी.
गांधीनगर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने टिकट वितरण से नाराज़ होकर कांग्रेस दफ्तर में तोड़फोड़ कर दी थी.

मनसा सीट:

पिछले चुनाव में कांग्रेस के अमितभाई हरिसिंहभाई पटेल यहां जीते थे. फिर उन्होंने पार्टी ही बदल ली. बीजेपी में आ गए. फिर 2012 सितंबर में यहां उपचुनाव हुआ. सीट आ गई कांग्रेस के बाबूसिंहजी मोहनसिंहजी ठाकोर ने. उन्होंने बीजेपी के डी डी पटेल को हराया था. 8,000 वोटों से भी ज्यादा के अंतर से. इस बार बीजेपी ने अमितभाई हरिसिंहभाई पटेल को टिकट दिया है. अपने इस पूर्व विधायक के खिलाफ कांग्रेस के प्रत्याशी हैं सुरेशभाई सी पटेल.

कलोल:

2012 के चुनाव में आठ ऐसी सीटें थीं, जिनमें एक फीसद से भी कम वोटों के अंदर से जीत तय हुई. इन आठों में से छह कांग्रेस के पाले में आईं. एक बीजेपी और एक NCP ने जीती थीं. इन आठ सीटों में से एक सीट कलोल भी थी. बीजेपी ने डॉक्टर अतुलभाई पटेल को टिकट दिया है. उनके खिलाफ कांग्रेस के बलदेवजी चंदूजी ठाकोर को उतारा है. पिछली बार भी बलदेवजी ने ही कांग्रेस के लिए ये सीट निकाली थी. उन्होंने बीजेपी के अतुलभाई पटेल को हराया था. मात्र 343 वोटों से. इससे पहले 2007 में अतुलभाई पटेल कलोल से जीते थे, जबकि ठाकोर कड़ी सीट से जीते थे. ठाकोर दावा कर रहे हैं कि पिछली बार ये सीट उनके लिए नई थी. सो हार का अंतर बहुत कम था. उनका कहना है कि इस बार बड़ी जीत हासिल करेंगे. 10 से 15 हजार वोटों से जीतेंगे.

कलोल में एक रैली थी पिछले दिनों. बीजेपी की. बिहार के बेगूसराय से श्रवण शाह पहुंचे इसमें. हनुमान बनकर. पूरे शरीर पर भगवा रंग पोते हुए. सिर पर एक टोपी, टोपी पर कमल का फूल. इसके ऊपर ‘स्वच्छ भारत’ लिखा हुआ. श्रवण की इस फैनगिरी को मीडिया ने भी देखा-दिखाया. इससे पहले भी वो ऐसा कर चुके हैं. बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान और अब गुजरात. श्रवण बेगूसराय के जिला कोर्ट में क्लर्क हैं.

गांधीनगर में पिछले दिनों क्या बड़ी बात हुई

गांधीनगर के आर्कडायोसिस
आर्कबिशप थॉमस मेकॉन ने कहा था कि ईसाई भाजपा को वोट न दें.

आर्कबिशप की अपील

यहां के आर्कबिशप थॉमस मेकॉन ने ईसाई समुदाय से बीजेपी को वोट न देने की अपील की थी. सीधे नहीं कहा था, मगर किसके बारे में कह रहे हैं ये साफ था. उन्होंने एक चिट्ठी जारी की. इसमें राष्ट्रवादी ताकतों को वोट न देने की अपील की गई थी. लिखा कि देश का लोकतांत्रिक ढांचा खतरे में है. धर्मनिरपेक्षता भी दांव पर लगी है. अल्पसंख्यकों के बीच एक किस्म की असुरक्षा है और ये बढ़ती जा रही है. ऐसा करने के एवज में चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा. उनसे अपनी अपील पर सफाई देने को कहा गया है. ऐसा करने के पीछे चुनाव आचारसंहिता को कारण गिनाया गया है. मोदी ने उनकी अपील पर प्रतिक्रिया करते हुए कहा कि ये अपील नहीं, फतवा है. 1571 में यूरोप के अंदर एक लड़ाई हुई थी. इसमें वेनेटियन और स्पैनिश साम्राज्य ने ओटोमन साम्राज्य को हराया था. आर्कबिशप ने अपनी चिट्ठी में ईसाई समुदाय को इसी दौर की याद दिलाते हुए कहा कि प्रार्थना में बहुत ताकत होती है.

कांग्रेस को दफ्तर का बीमा करवाना पड़ा

कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं ने गांधीनगर में पार्टी दफ्तर में जमकर हंगामा मचाया. तीसरी लिस्ट में 76 उम्मीदवारों का नाम था. कई नेता अपने नाम की उम्मीद कर रहे थे. वहीं, कुछ लोगों का नाम होने पर भी आपत्ति थी. जैसे, अहमदाबाद के अमरावाड़ी से अरविंद सिंह चौहान को टिकट दिए जाने पर काफी रोष था. फिर क्या था. खूब सारे कार्यकर्ता जमा हो गए हेड ऑफिस में. जमकर तोड़-फोड़ की उन्होंने. पुतले जलाए. इस बात से घबराकर कांग्रेस ने पार्टी ऑफिस का बीमा करवा लिया.


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