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गुजरात चुनाव: बीजेपी के पास जनता को देने के लिए कुछ नहीं बचा है

एक ग्लास पानी में चीनी घोलिए. खूब सारी चीनी. एक टाइम के बाद चीनी घुलनी बंद हो जाएगी. वो होगा सैचुरेशन पॉइंट. कि उतने पानी में जितनी चीनी घुलनी थी, घुल चुकी. अब कितना भी चम्मच हिलाओ, नहीं घुलेगी. लगता है बीजेपी भी वो ही ग्लास भर पानी जैसी हो गई है. अब जनता को देने के लिए कोई सपना नहीं बचा उसके पास. मतलब, कुछ बेहतर करने को नहीं बचा. 


चुनाव के टाइम में राजनैतिक दल मैनिफेस्टो निकालते हैं. अंग्रेजी नाम है. हिंदी में कहिए, तो घोषणापत्र होगा. इसको भी अपनी जुबान में समझें, तो मेनिफेस्टो माने वादों का पर्चा. चुनाव जीतने के बाद क्या करना है, कैसे करना है, इस सबका वायदा. अब तक का रिकॉर्ड देखें, तो ये कागज की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं. पार्टियां मेनिफेस्टो निकालती हैं और उसको भूल जाती हैं. मगर फिर भी, निकालती जरूर हैं. उनको वोट देकर आने वाली 95 फीसद जनता ने मेनिफेस्टो में झांकने की जहमत नहीं उठाई होती. न ही जीतने के बाद कोई पूछता है कि वादे का क्या हुआ. फिर भी, मेनिफेस्टो एक दस्तूर है. आदर्श की बात करें, तो जरूरी है. ताकि लोग जान सकें कि कौन सी पार्टी चुनाव जीतकर क्या करना चाहती है. देश को किस ओर ले जाना चाहती है. मेनिफेस्टो का न होना, यानी लोकतंत्र की ऐसी की तैसी. कोई सपना नहीं, कोई वादा नहीं. फिलहाल जो देश की सबसे बड़ी पार्टी है, वो ये ही करने जा रही है. 9 दिसंबर को गुजरात चुनाव के लिए पहले चरण का मतदान होना है. अभी जो मैं ये खबर लिख रही हूं, तो 24 घंटे से भी कम वक्त बच गया है वोटिंग शुरू होने में. अभी तक बीजेपी ने कोई घोषणापत्र जारी नहीं किया. अब तो चुनाव प्रचार भी बंद हो चुका. अगर बीजेपी अब घोषणापत्र लाती है, तो ये चुनाव के नियमों का उल्लंघन होगा.

2014 के लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी ने न केवल मेनिफेस्टो निकाला था, बल्कि उसका गाजे-बाजे के साथ प्रचार भी किया था.
2014 के लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी ने न केवल मेनिफेस्टो निकाला था, बल्कि उसका गाजे-बाजे के साथ प्रचार भी किया था.

चुनाव अधिकारियों को ही नियम-कानूनों की जानकारी नहीं है
ये नियम वाली बात पक्की करने के लिए हमने गुजरात चुनाव अधिकारी को फोन किया. पहले बात हुई डेप्युटी चुनाव अधिकारी नितिन आचार्य से. हमने सीधा-सादा सा सवाल पूछा था. कि वोटिंग होने के एक दिन पहले मेनिफेस्टो निकाल सकते हैं या नहीं? नियम क्या कहते हैं इस बारे में? नितिन आचार्य ने कोई भी जवाब देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा ये बात बताई नहीं जा सकती. मानो, बहुत गोपनीय बात होगी कोई. उनका रवैया काफी आक्रामक था. एक साधारण सी बात न बतानी पड़े, इसके लिए उन्होंने काफी बहस की. अंत में बिना जवाब दिए फोन रख दिया. साधारण सी बात पर इतना रहस्य बनाने का क्या तुक है? गुजरात के मुख्य चुनाव अधिकारी बी बी स्वाइन से भी बात हुई. उन्होंने कहा कि उन्हें नियमों की जानकारी नहीं है. कहा कि दो घंटे बाद जवाब देंगे. क्या ये है चुनाव आयोग की तैयारी? जिनके ऊपर चुनाव ठीक से कराने की जिम्मेदारी है, उन्हें नियम-कानून का ही नहीं पता. चुनाव आयोग को चाहिए कि चुनाव तारीखों का ऐलान करने से पहले अपने अधिकारियों को सही ट्रेनिंग दे दें.

और तो और, उत्तर प्रदेश में अभी जो निकाल चुनाव हुए, उसमें भी बीजेपी ने मेनिफेस्टो निकाला था. स्थानीय स्तर के चुनाव में वो घोषणापत्र निकालती है, मगर गुजरात चुनाव के लिए उसके पास कोई वादा नहीं है?
और तो और, उत्तर प्रदेश में अभी जो निकाल चुनाव हुए, उसमें भी बीजेपी ने मेनिफेस्टो निकाला था. स्थानीय स्तर के चुनाव में वो घोषणापत्र निकालती है, मगर गुजरात चुनाव के लिए उसके पास कोई वादा नहीं है?

बाकी जगहों पर तो मेनिफेस्टो निकालती है बीजेपी, गुजरात में क्यों नहीं?
1980 से लेकर अब तक बीजेपी ने ऐसा कभी नहीं किया. बिना मेनिफेस्टो के गुजरात चुनाव नहीं लड़ी. पहले तो बड़ा जलवा रहता था. बड़े-बड़े नेता मौजूद रहते थे. सब हाथ पकड़कर मेनफेस्टो ऊपर उठाते. मुस्कुराते हुए तस्वीरें खिंचवाते. मीडियावालों का कैमरा फ्लश चमकाता. इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ. जो पार्टी 22 साल से गुजरात की सत्ता में है, उसने मेनिफेस्टो जारी करने की भी जहमत नहीं उठाई. क्या माना जाए फिर? कि बीजेपी के पास गुजरात के लिए कोई सपना नहीं है? कोई योजना नहीं है? कोई वादा नहीं है? उसको लगता नहीं कि राज्य में कुछ भी और किए जाने की जरूरत है? अगर ऐसा है, तो बीजेपी चुनाव ही क्यों लड़ रही है? उसके नेता दिन-रात एक करके प्रचार क्यों कर रहे हैं? वैसे एक बात बताएं. बीजीपे ने अभी हिमाचल प्रदेश में भी मेनिफेस्टो निकाला था. यहां तक कि उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में भी घोषणापत्र निकाला था. विधानसभा चुनाव के समय भी लंबा-चौड़ा मेनिफेस्टो निकाला था. अब इसका क्या मतलब निकालें? कि बीजेपी बस वहीं वादे करेगी, जहां वो विपक्ष में है? सत्ता में रहने के बाद वो खाली हो जाती है? कोई जिम्मेदारी नहीं बनती उसकी? बिना मेनिफेस्टो के ही मेनडेट लेने निकल पड़ती है!

दोष वोटर्स का भी है. कभी मेनिफेस्टो देखने की जहमत नहीं उठाते. मीडिया इसलिए मेनिफेस्टो देखती है कि उसको खबर करनी होती है. विपक्ष इसलिए देखता है कि उसको आलोचना करनी होती है. बाकी जनता को कोई खास सरोकार हो, ऐसा लगता तो नहीं.
दोष वोटर्स का भी है. कभी मेनिफेस्टो देखने की जहमत नहीं उठाते. मीडिया इसलिए मेनिफेस्टो देखती है कि उसको खबर करनी होती है. विपक्ष इसलिए देखता है कि उसको आलोचना करनी होती है. बाकी जनता को कोई खास सरोकार हो, ऐसा लगता तो नहीं.

बीजेपी को खारिज कर दिया जाना चाहिए!
वोटर अगर निष्पक्ष होकर सोचे, तो बस इस एक आधार पर बीजेपी को खारिज कर सकता है. उसको बल्कि शक करना चाहिए. सवाल करना चाहिए. बीजेपी नेताओं ने अपनी रैलियों में कई वादे किए हैं. मगर जुबानी बातों का क्या? कहने को तो प्रेमी भी चांद-तारे तोड़कर लाने की बातें करते हैं. कुछ ठोस नहीं होता मगर उसमें. मेनिफेस्टो एक किस्म का दस्तावेज होता है. आप किस आधार पर जनता से वोट मांग रहे हैं, उसकी दावेदारी होती है. बीजेपी ने ऐसा कुछ नहीं किया. लोगों को सोचना चाहिए. ये घमंड है या फिर लापरवाही? या फिर नीयत में ही खोट है? गांधीनगर बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष हैं विजेंद्रसिंह वाघेला. उन्होंने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए जो कहा, वो जान लीजिए जरा:

बीजेपी को मेनिफेस्टो निकालने की कोई जरूरत नहीं. हमने विकास का सारा काम कर लिया है. कुछ भी बाकी नहीं है. सो हमें नए वादे करने की भी जरूरत नहीं.

मेनिफेस्टो से क्या फर्क पड़ता है?
इतने बड़े नेता नहीं हैं वाघेला. मगर हैं तो बीजेपी के ही. सोच लीजिए कि ये कैसी सोच रखते हैं. इनकी बात मानें, तो बीजेपी सैचुरेशन पॉइंट पर पहुंच गई है. अब कुछ और बेहतर नहीं कर सकती. विपक्ष अगर इस बात को मुद्दा बनाए, तो अच्छा ही होगा. फालतू चीजों को मुद्दा बनाने से अच्छा है सही सवालों को उठाना. वैसे जनता को भी थोड़ा अपने गिरेबां में झांकना चाहिए. बिना आगे का जाने वोट देकर आ जाती है. क्या देखकर? धर्म और जाति? अगर हां, तो ऐसे लोगों को रत्तीभर भी शिकायत नहीं होनी चाहिए. मेनिफेस्टो या नो मेनिफेस्टो, ऐसों को क्या फर्क पड़ता है. वैसे बाकी दुनिया में जहां कहीं भी असली लोकतंत्र है, वहां लोगों के लिए मेनिफेस्टो बड़ा मायने रखता है. इसपर खूब बातें होती हैं. पार्टियों को जज किया जाता है. मगर ‘दुनिया के सबसे बड़े’ लोकतंत्र में ऐसा कुछ नहीं होता. इस महान लोकतंत्र के लिए तीन तालियां!


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