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यूपी के पंचायत चुनाव में वो काम हो गया है कि भाजपा चक्कर में पड़ जाएगी!

यूपी पंचायत चुनावों के नतीजे आ चुके हैं. उसी चुनाव के नतीजे, जिसके संचालन और सम्पन्न होने में ये दावा भी सामने आया कि 700 से अधिक टीचरों ने ड्यूटी के दौरान संक्रमण से अपनी जान गंवा दी. सब बातों पर बात करेंगे. बात करेंगे कि किसकी जीत कितनी बड़ी है? सत्तारूढ़ भाजपा के ग्राफ़ के बारे में भी बात करेंगे. जानकारों की बातें सुनेंगे. और देखेंगे कि क्या चर्चाओं के मुताबिक़ भाजपा का बहुचर्चित योगी ब्राण्ड सच में फ़ेल हो चुका है? ज़िला पंचायत चुनाव की टेली अभी बहुत साफ़ नहीं है, फिर भी समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने अपनी-अपनी जीत के दावे किए हैं. लेकिन दावों से अलग हम बात शुरू करेंगे प्रमुख ज़िलों के चुनावी नतीजों से.

क्या है बड़े जिलों का अंकगणित?

मथुरा से बात शुरू करते हैं. जाट बहुल है. सांसद हैं हेमा मालिनी और सूबे में मंत्री श्रीकांत शर्मा भी यहीं से ताल्लुक़ रखते हैं. दूसरा खेमा है राष्ट्रीय लोकदल यानी रालोद का. अमर उजाला में छपी खबर के मुताबिक यहां जिला पंचायत के 33 वार्डों में से 13 पर बसपा ने जीत दर्ज कराई है. भाजपा और रालोद ने 8-8 सीटों पर कब्जा किया है. सपा ने यहां एक सीट जीती है जबकि 3 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने कब्जा किया है.

Mathura

अब बात करते हैं सीएम योगी आदित्यनाथ के जिले यानी गोरखपुर की. सांसद रवि किशन हैं. जिला पंचायत की कुल 68 सीटें हैं. मतगणना अब भी जारी है. बीजेपी ने 20 और सपा ने भी 20 सीटों पर जीत का दावा किया है. इसके अलावा बसपा को 2 और कांग्रेस व आप को 1-1 सीट मिली है. इनके अलावा निर्दलीय प्रत्याशियों ने 24 सीटों पर कब्जा किया है.

Gorakhpur

अगला ज़िला बनारस. यहां के सांसद तो सीधे पीएम नरेंद्र मोदी हैं. यहां जिला पंचायत की 40 सीटों में से बीजेपी ने 7 सीटों पर जीत दर्ज की है. सपा के खाते में 11 सीटें गई हैं. बसपा को 4, कांग्रेस को 5 सीटें मिली हैं. इसके अलावा 2 सीटें निर्दलीयों ने जीती हैं और 11 सीटें अन्य के खातों में गई हैं.

Varanasi

बनारस से सड़क पर तीन घंटे चलने पर पहुंचेंगे प्रयागराज उर्फ़ इलाहाबाद. यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का गृह जिला है. जिला पंचायत के 84 वार्डों में से 25 सीटों पर सपा, 6 सीटों पर बसपा, 15 पर भाजपा और 38 पर अन्य जीते हैं.

Prayagraj

और आख़िर में पकड़ते हैं बुंदेलखंड का सिरा. बुंदेलखंड के सभी सात जिलों यानी हमीरपुर, महोबा, बांदा, चित्रकूट, जालौन, झांसी, और ललितपुर में जिला पंचायत की कुल 148 सीटें हैं जिनमें से बीजेपी को 44, सपा को 34 और बीएसपी को 31 सीटों पर जीत हासिल हुई है. इसके अलावा कांग्रेस, अपना दल, निषाद पार्टी और निर्दलीयों ने 39 सीटों पर कब्जा किया है. हालांकि ये सभी दावे पार्टियों की तरफ से किए गए हैं. अभी चुनाव आयोग ने आंकड़े जारी नहीं किए हैं.

इन जिलों के आंकड़े भाजपा के लिए बहुत संतोषजनक तस्वीर नहीं बनाते हैं. विपक्ष समर्थित प्रत्याशियों की टैली भाजपा की जीत को पार पा जाती है. स्थानीय पत्रकार बहुत सारी बताते हैं. मथुरा के संवाददाता मदन गोपाल शर्मा बताते हैं कि किसान आंदोलन से जो शिकायतों का अंबार उठा, वो प्रदेश में कोविड मैनेजमेंट को तक जाकर पर पहुंच गया. इसके अलावा रालोद में गुटबाज़ी के भी संकेत दिखाई देते हैं, जिससे सीधा फ़ायदा पार्टी को होता नहीं दिखता है. 

इसके अलावा गांवों के इलाक़ों में फिर से पलायित मज़दूरों की आमद हो रही है. इससे उपजे रोष का असर भी नतीजों पर पड़ा है, ऐसा भी कुछ जानकार बताते हैं.

पूरे राज्य में किसको कितना मिला?

खबरों के मुताबिक यूपी में जिला पंचायत की 3050 सीटें हैं. अभी तक की खबरों के मुताबिक बीजेपी को 690, सपा को 747, बीएसपी को 322, कांग्रेस को 77 सीटों पर निर्दलीयों को जीत हासिल हुई है. आम आदमी पार्टी ने भी कुछ सीटें जीती हैं. बीजेपी का दावा है कि अधिकतर निर्दलीय उसके संपर्क में हैं. वहीं सपा की ओर से भी ऐसा ही दावा किया गया है.

पश्चिमी यूपी में एक बार फिर रालोद को संजीवनी मिलती दिख रही है. मथुरा में भी पार्टी का खाता खुला है और मेरठ में भी उसके 5 उम्मीदवार जीते हैं. मेरठ जिला पंचायत की 33 सीटों में से बसपा को 9 पर जीत मिली है जबकि सपा और भाजपा को 6-6 सीटों पर जीत मिल सकी है. यहां रालोद ने पांच जिला पंचायत सीटों पर जीत दर्ज की है जबकि निर्दलीयों को 7 सीटों पर जीत मिली है.

All Up

तो भाजपा की इस स्थिति के क्या कारण हो सकते हैं? क्या कोरोना मैनेजमेंट फ़ेल होने का ठीकरा फूटा? क्या तमाम चेतावनियों के बाद चुनाव करवाने का ग़ुस्सा फूटा? योगी की वो वाली ब्रांडिंग फ़ेल हो गयी, जिसकी हमने शुरुआत में बात की थी? क्रमवार देखते हैं.

कोरोना में असफलता

सनद रहे कि यूपी में कोरोना को लेकर स्थितियां बेहद ख़राब हैं. प्रदेश सरकार के दावों से इतर, अभी भी अस्पताल में बेड, ऑक्सिजन और दवा की क़िल्लत सामने आ रही है. क्या इन चुनौतियों ने भाजपा का गेम गड़बड़ कर दिया है? अमर उजाला के पूर्व संपादक कुमार भवेश चंद्र कहते हैं कि तंत्र की जो हाल के दिनों में असफलता रही है, उसका क्रोध पार्टी पर फूटा है.

“इस वक्त पूरे प्रदेश में कोरोना को लेकर जो हालात हैं उससे लोगों में काफी गुस्सा और नाराजगी है. बीजेपी विधायक और पार्टी के अन्य लोग भी कोरोना के चलते जान गंवा चुके हैं. कोरोना की इस दूसरी लहर के मैनेजमेंट में सरकार फेल रही है. दूसरी बात ये कि टीचर्स और अन्य सरकारी कर्मचारियों का जैसा इस्तेमाल चुनाव में किया गया है उससे भी सत्ताधारी पार्टी के प्रति नाराजगी बढ़ी है. और ये नाराजगी आने वाले विधानसभा चुनाव में भी दिखाई दे सकती है.”

बताते चलें कि विधायक और नेताओं ने कोरोना के चलते बस जान ही नहीं गंवाई, बल्कि कई मौक़े पर प्रदेश सरकार को ख़त लिखा और क़िल्लत की अवस्थाओं से उनको अवगत कराया. इसके इतर प्रदेश सरकार के दावे रहे कि प्रदेश में कहीं कोई क़िल्लत नहीं है. भले ही बढ़ते केसों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्यों न चेतावनी दी हो? भले ही मीडिया रपटें एक़दम उलटा सच क्यों न दिखाती हों, लेकिन प्रदेश में बेतहाशा जानें गयी हैं. और, बक़ौल जानकार, इसने भाजपा का गेम थोड़ा गड़बड़ किया है. इस बात के अलावा वेस्ट यूपी का हाल भी वरिष्ठ पत्रकार उत्कर्ष सिन्हा बताते हैं,

“पहले वेस्ट यूपी से शुरू करते हैं. किसान आंदोलन की वजह से ये साफ था कि वहां बीजेपी को नुकसान होगा जो हुआ भी. रालोद का दोबारा उभार भी इसी कारण से हुआ है. अवध और पूर्वांचल के इलाकों में कोविड को लेकर गुस्सा देखने को अधिक मिला है. सोशल मीडिया देखिए, लोगों ने ‘जिद्दी सरकार और असफल सरकार’ वाली बातें कही हैं.”

बुंदेलखंड की हालत पर उत्कर्ष कहते हैं,

“बुंदेलखंड की स्थिति को भाजपा समझने में नाकाम रही है. सपा का जोरदार उदय ये बताता है कि आने वाले वक्त में वह सबसे प्रमुख कंपटीटर रहेगी. बसपा को जितना फायदा हो सकता था, खासकर वेस्ट यूपी में, वह हुआ नहीं. और भाजपा को जितना नुकसान होने का अंदेशा था वह भी नहीं है. यानी सरकार के पास एक आखिरी मौका है चीजों को संभालने का.”

टीचरों और सरकारी कर्मचारियों की नाराज़गी

आगे चलें. यूपी पंचायत चुनाव के दौरान जो गुस्सा टीचरों और सरकारी कर्मचारियों में देखा गया है वो पहले ही शायद कभी देखा गया था. टीचरों को चुनाव के कामों में लगाया गया. उनको ट्रेनिंग दिलाई गई. फिर पोलिंग सेंटरों पर भेजा गया. फिर मतगणना कराई गई. जिस टीचर ने इंकार किया, उसके खिलाफ कार्रवाई और FIR की धमकियां दी गईं. इस तरह के आरोप और ऐसी ख़बरें सामने आती रहीं. यूपी माध्यमिक शिक्षक संघ ने भी बताया कि चुनाव ड्यूटी में 135 टीचरों की मौत हुई. इसके बाद ये आंकडा 500 को पार कर गया और आखिर में 700 से अधिक शिक्षकों की मौत की खबरें रिपोर्ट की गईं.

Panchayat Election
बुलंदशहर के एक टीचर ने ये तस्वीर भेजी है. साफ दिखता है कि सोशल डिस्टेंसिंग नहीं है.

केवल टीचर ही नहीं बल्कि राज्य सरकार की नौकरी करने वाले कर्मचारियों के संगठनों ने भी 800 से अधिक कर्मचारियों की मौत का दावा किया. चुनाव आयोग के अधिकारियों की भी तबीयत ख़राब हो गयी. एक आकलन के मुताबिक़ 1500 से अधिक लोगों की मौत पंचायत चुनाव कोरोना से हुई. हजारों कर्मचारी संक्रमित हुए. बहुत से लोगों ने अपने परिवार तक वायरस पहुंचाया और संक्रमण व मौतों का आंकडा बढ़ता चला गया. इस बात से हजारों हजार लोग दुखी और नाराज हैं. सपा, बसपा और कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा था (लेकिन चुनाव उन्होंने भी लड़ा ही था). पीड़ितों के लिए मुआवजे और अनुकंपा नौकरी की मांग की थी. राज्य के वरिष्ठ पत्रकार और चुनावी एक्सपर्ट मानते हैं कि 2022 के विधानसभा चुनावों में इसका नुकसान बीजेपी को हो सकता है. लेकिन अगर आपको लगे कि एक नाराज़ सरकारी कर्मचारी सत्तारूढ़ दल का कितना नुक़सान कर सकता है, आप बनारस के एक शिक्षक की बात सुनिए. पंचायत चुनाव में पीठासीन अधिकारी के पद पर काम किया और हमसे नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं,

“सरकार से इतनी अपेक्षा की जाए कि आप अपने ही कर्मचारियों की जीवन की रक्षा करेंगे तो क्या ग़लत है क्या? 700 से ज़्यादा लोग मारे गए. कई के घरों में लाशें बिछ गयी, क्योंकि योगी आदित्यनाथ को फ़िक्र थी कि चुनाव में झोंक दो. आपको बताता हूं कि कैसे होता है चुनाव. मैं पीठासीन अधिकारी हूं. चुनाव प्रक्रिया मुझे ग़ुस्सा निकालने की इजाज़त नहीं देती है. लेकिन पोलिंग बूथ मेरे अधिकार में है. कोई पार्टी का वहाँ काम नहीं चलता है. एक पीठासीन अधिकारी सेक्टर मजिस्ट्रेट या सुरक्षा बलों को बोल देगा तो एक पार्टी के पोलिंग एजेंट को हटा दिया जाएगा. फिर आप चिल्लाते रहिए. सरकारी कर्मचारी ने असंवैधानिक ही सही, लेकिन अपना ग़ुस्सा तो दिखा दिया न. 

ब्रांड योगी फ़ेल?

केंद्र में जैसे पीएम मोदी ही बीजेपी की पहचान हैं वैसे ही यूपी में बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा हैं योगी आदित्यनाथ. उनके फैन और समर्थक, सोशल मीडिया पर अक्सर ‘मोदी के बाद योगी’ जैसी बात करते दिख जाएंगे. एक्शन लेने वाले सीएम और सख्त प्रशासक वाली छवि के बाद भी योगी आदित्यनाथ का जादू ना तो बंगाल में चला और ना ही उससे पहले हुए अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में. हैदराबाद से लेकर छत्तीसगढ़ तक में उन्होंने जनसभाएं कीं लेकिन बीजेपी को जीत नहीं मिल सकी.

Yogi Adityanath
सीएम योगी आदित्यनाथ. (तस्वीर: PTI)

भले ही कुछेक महीने पहले योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपनी सरकार की चार सालों की उपलब्धियों का जश्न मनाया था. क़सीदे गढ़े गए थे. सरकार चर्चा में रही है. कभी विकास दुबे एनकाउंटर को लेकर तो कभी पुलिस की लालफीताशाही को लेकर. लाखों करोड़ों के इनवेस्टमेंट लाने का सरकार ने दावा किया, वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट की योजना चलाई और क्राइम कंट्रोल का भी दावा किया. लेकिन जानकारों के पास कुछ अलग इंसाइट्स हैं. स्वतंत्र पत्रकार बृजेश शुक्ला हमसे बातचीत में बताते हैं,

“ब्रांड योगी तो फ़ेल हुआ ही है. इसका सबसे पहला कारण मानिए कि मुख्यमंत्री किसी की बात नहीं सुनते हैं. पंचायत चुनाव के पहले उनकी ही पार्टी के कई सारे विधायकों और नेताओं ने उनसे कहा कि चुनाव टाल दीजिए. कोरोना को लेकर स्थिति ये गवाही नहीं देती है. लेकिन उन्होंने किसी की भी बात मानने से इंकार कर दिया. अब आप अपनी ही पार्टी की बात नहीं मानेंगे, तो आपको लोग कैसे लेंगे?”

बात बस इतनी नहीं है. जानकार बताते हैं कि पंचायत चुनाव को लेकर काडर में बहुत असंतोष रहा. एक पत्रकार बताते हैं कि भाजपा में ही विधायकों की अपनी लिस्ट थी, सांसदों की अपनी तो पार्टी की अपनी. बीच में कुछ अधिकारी भी अपने नेता लेकर आ गए थे. फिर एकदम मनमर्ज़ी टिकट दिए गए, तो बहुत सारे महत्त्वाकांक्षियों का मन ख़राब होना लाज़िम था. इसके अलावा प्रदेश में भी कामकाज का तरीक़े पर बृजेश शुक्ला कहते हैं,

“जिस सूबे में नौकरशाह सबकुछ हों, वहां पर पार्टी का ही नुक़सान होता है. मायावती के समय भी यही हुआ, अखिलेश के समय भी और अभी योगी के समय भी यही हो रहा है. कुछ ही अफ़सर हैं, जो सरकार चला रहे हैं. अब नेता जनता के बीच है नहीं, ठीक समय था नहीं और अभी इतना बुरा समय है तो और भी नहीं है. आप चाहेंगे कि लोग बात सुनें, तो ऐसा होगा नहीं.”

उपसंहार

पार्टी की असफलता पर ये सवाल उस समय उठ रहे हैं, जब भाजपा के बारे में ये कहा जा रहा है कि पार्टी ने बहुत तैयारी और मुस्तैदी के साथ चुनाव लड़ा. बाक़ायदा प्रत्याशियों की घोषणा हुई. बस पार्टी का सिम्बल नहीं दिया गया. बृजेश शुक्ला समेत कई सारे लोग ये भी कहते हैं कि भले ही भाजपा का ग्राफ़ गड़बड़ हुआ हो, लेकिन जब ज़िला पंचायत का अध्यक्ष चुना जाएगा तो अधिक मात्रा में आपको भाजपा के ही लोग दिखेंगे. भाजपा पर लम्बे समय तक आरोप लगे कि शहर की पार्टी है. 2014 में ये समीकरण टूटा, भाजपा गांवों में पहुंची. सरकार बन गयी. फिर किसान सम्मान निधि, आवास, शौचालय, उज्जवला जैसी योजनाएं पार्टी लेकर आयी, लेकिन जानकार मानते हैं कि इस सबकुछ को बीते एकाध महीनों की त्रासदी ने ध्वस्त कर दिया है. अब यूपी का विधानसभा चुनाव थोड़ा ज़्यादा जटिल अध्याय बनने जा रहा है.


वीडियो- यूपी पंचायत चुनाव: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से क्या वादा किया था?

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