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भारत में मिला ज़ीका वायरस का पहला केस, क्या लक्षण और क्या इलाज है? सब पढ़िए

ज़ीका वायरस को लेकर पहली बार चिंता तब ज्यादा बढ़ गई थी जब 2015 में इसके असर से अजीब शक्ल के बच्चे पैदा होने लगे थे.

केरल में 8 जुलाई को ज़ीका वायरस (Zika Virus) का पहला मामला सामने आया है. केरल की स्वास्थ्य मंत्री वीणा जॉर्ज ने इसकी पुष्टि कर दी है. तिरुवनंतपुरम की रहने वाली 24 साल की गर्भवती महिला इस वायरस से संक्रमित मिली है. डॉक्टर्स और हेल्थ वर्कर्स समेत 13 और लोगों के संक्रमित होने का आशंका जताई जा रही है. आइए जानते हैं कि आखिर ये ज़ीका वायरस है क्या और इसका इलाज क्या है.

2015 में दक्षिण अमेरिका से आईं थी चौकाने वाली तस्वीरें

ज़ीका वही वायरस है जिसके चलते 2015 से दक्षिण अमरीका (खासकर ब्राज़ील) में ऐसे बच्चे पैदा हो रहे हैं जिनके सिर आम बच्चों से काफी छोटे होते हैं. इन बच्चों को माइक्रोसिफैली नाम की बीमारी है. जब इन बच्चों की पहली तस्वीरें दुनिया के सामने आई थीं, पूरी दुनिया सकते में रह गई थी. काफी पड़ताल के बाद सामने आया था कि माइक्रोसिफैली ज़ीका वायरस की वजह से फैलती है. इसलिए भारत में ज़ीका के केस कंफर्म होना परेशान करने वाली बात है.

साल 2015 में ज़ीका वायरस की वजह से दक्षिण अमेरिकी देशों में खास तरह के बच्चे पैदा होने से हड़कंप मच गया था.

ज़ीका नाम कैसे पड़ा?

ज़ीका की खोज 1947 में युगांडा के ज़ीका जंगलों में हुई थी. इसीलिए वायरस का नाम ज़ीका वायरस है. वैज्ञानिक वहां के बंदरों में यलो फीवर पर रिसर्च कर रहे थे तब ये वायरस पहचान में आया था. इंसानों में इसके पहले केस 1952 में युगांडा और तंज़ानिया में मिले थे. इस वायरस के संपर्क में आने पर उसी तरह के लक्षण नज़र आते हैं जैसे डेंगू होने पर होते हैं. मसलन बुखार, सरदर्द, आंखों में जलन और बदन दर्द. इसीलिए इसे डेंगू का कज़िन भी कहा जाता है. 2015 में ब्राज़ील में सामने आए माइक्रोसिफैली के मामलों से पहले वैज्ञानिक ये नहीं जानते थे कि ज़ीका से माइक्रोसिफैली भी हो सकती है. किसी बच्चे को माइक्रोसिफैली होने की संभावना तब होती है जब कोई प्रेगनेंट औरत ज़ीका की चपेट में आए. माइक्रोसिफैली के अलावा ज़ीका से गुलियन बार सिंड्रोम और दूसरी न्योरोलॉजिकल बीमारियां भी हो सकती हैं.

कैसे फैलता है?

ज़ीका डेंगू का मौसेरा भाई है तो फैलता भी उसी तरह है जैसे डेंगू फैलता है. माने एडीज़ मच्छर के काटने से. यही मच्छर चिकन गुनिया भी फैलाता है. ये मच्छर नम और गर्म जगहों में पाया जाता है. इसलिए भूमध्य रेखा के आसपास मौजूद देशों में इसके मामले ज़्यादा पाए जाते हैं. भूमध्य रेखा भारत से नहीं गुज़रती, लेकिन यहां भी इस मच्छर के पैदा होने और परिवार बढ़ाने के लिए पर्याप्त गर्मी और नमी है.

एक प्रेगनेंट मां से ज़ीका उसके बच्चे तक पहुंच सकता है. इसके अलावा ज़ीका सेक्स के दौरान भी एक पार्टनर से दूसरे तक पहुंच सकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि इसका मतलब ये हुआ कि ज़ीका ब्लड ट्रांसफ्यूज़न (एक व्यक्ति का खून दूसरे को चढ़ाने से) से भी फैल सकता है.

जीका वायरस मुख्य रूप से मच्छरों से फैलता है. मच्छरों से बच कर रहना ही इससे बचने का मुफीद तरीका है.

कैसे मालूम करें कि ज़ीका से बीमार हैं ?

जैसा कि हमने पहले बताया कि  बुखार, सरदर्द, आंखों में जलन और बदन दर्द जैसी लक्षण ज़ीका वायरस के सामान्य लक्षण हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) संगठन के अनुसार ज़ीका वायरस का इंक्यूबेशन यानी लाइफ साइकल 3 से 14 दिन का होता है. इसमें भी ज्यादा लक्षण दूसरे से सातवें दिन दिखाई देते हैं. ज्यादातर लोगों को ज़ीका वायरस इंफेक्शन होने पर लक्षण दिखाई नहीं देते. ज़ीका वायरस का पता खून, पेशाब या फिर वीर्य की जांच से चल जाता है. अमेरिकी सेंटर फॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) ने टेस्टिंग को लेकर कुछ सुझाव दिए हैं. इनके अनुसार

# मॉलिक्युलर टेस्टिंग के जरिए पता लगाया जा सकता है कि शरीर में वायरस है कि नहीं.

# इसके अलावा एंटीबॉडी टेस्ट से भी शरीर में बनी एंटीबॉडी से वायरस की मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है.

# अगर ऐसे इलाके में गए हैं जहां ज़ीका वायरस पाया गया है तो किसी भी तरह के लक्षण दिखने पर टेस्ट कराएं.

# अगर अल्ट्रासाउंड टेस्ट के दौरान बच्चे में कोई ऐसी कमी दिखती है जो ज़ीका की वजह से हो सकती है तो प्रेग्नेंट महिलाएं जरूर ज़ीका का टेस्ट कराएं.

# लक्षण दिखने पर फौरन टेस्ट कराना चाहिए.

इलाज क्या है ?

अमेरिका के सेंटर फॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के मुताबिक ज़ीका के लिए किसी खास इलाज की ज़रूरत नहीं पड़ती. ज़ीका इंफेक्शन होने पर डॉक्टर ये काम करने की सलाह देते हैं.

# जमकर आराम करें

# भरपूर पानी पिएं, जिससे शरीर डिहाइड्रेट न होने पाए.

# डॉक्टर की सलाह लेकर बुखार और दर्द कम करने की दवा लें.

# जब तक जांच में यह न पता चल जाए कि डेंगू नहीं तब तक एस्प्रिन या सूजन कम करने वाली दूसरी नॉन स्टेरॉयड दवाएं न लें. डेंगू और ज़ीका के लक्षण एक से होते हैं और डेंगू के मरीज़ को एस्प्रिन नुकसान पहुंचा सकती है.

# अगर पहले से ही किसी बीमारी का इलाज चल रहा है तो बिना डॉक्टर की सलाह लिए दूसरी दवाएं न शुरू करें.

हालांकि ज़ीका को 2015 से पहले ज्यादा हो-हल्ला नहीं था. लेकिन माइक्रोसिफैली से ज़ीका का संबंध सामने आने के बाद ज़ीका को लेकर डर फैला है. कोशिश की जा रही है कि ज़ीका के लिए एक टीका बनाया जाए. टीका बनाने का काम साल 2016 से चल रहा है. इस काम में दुनियाभर की 18 कंपनियां लगी हैं. हालांकि उनका कहना है कि इसमें कम से कम 10 साल का वक्त लगेगा. कुछ समय पहले खबर आई थी कि भारत में ज़ीका का एक टीका बना लिया गया है. लेकिन वो भी फिलहाल बाज़ार में उपलब्ध नहीं है. तो फिलहाल ये समझिए कि रोकथाम ही इलाज है.

वैज्ञानिक लगातार इस बीमारी पर कारगर वैक्सीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है. (फाइल फोटो- REUTERS)

तो बचें कैसे?

इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक भारत में इसे लेकर ‘क्रॉस रिएक्टिव इम्यूनिटी’ मौजूद हो सकती है. ऐसा अखबार ने एम्स में माइक्रोबायल़ॉजी के प्रोफेसर डॉक्टर ललित डार के हवाले से लिखा है. डॉक्टर ललित का कहना है कि

“ जब किसी वायरस के प्रोटीन एक जैसे होते हैं तो तब उनके एंटीबॉडी भी एक जैसे ही होते हैं. चूंकि भारतीय पहले ही डेंगू के चारों स्ट्रेन को लेकर एक्सपोज़ हैं ऐसे में शरीर ने उनके खिलाफ एंटीबॉडी बना ली हैं. चूंकि ज़ीका वायरस इसके जैसा ही है ऐसे में शरीर में पहले से मौजूद एंटीबॉडी इनके खिलाफ भी काम कर सकती हैं.”

माने कई भारतीयों का शरीर इस वायरस के हमले को झेलने के लिए तैयार है. लेकिन फिर भी ज़ीका से बचने का सबसे बढ़िया तरीका यही है कि मच्छरों की पैदावार को रोका जाए. पानी जमा न होने दिया जाए जिसमें मच्छर अंडे देते हैं. मच्छरों वाली जगह पर रहते हों तो हल्के रंग के कपड़े पहनें, पूरी बांह वाले. और मच्छरों से बचने का सबसे अच्छा उपाय है कि मच्छरदानी लगा के सोएं. किसी ऐसी जगह की यात्रा करके आए हों जहां ज़ीका के मामले सामने आए हैं तो जांच कराएं. ज़रूरत पड़ने पर आईसोलेशन में कुछ समय बिताएं.

वीडियो – जीका वायरस का इलाज़ खोजने वाली कंपनी ने कोरोना का टीका बना लिया है?

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