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ज़मीनी हकीकत (पार्ट-1) : स्वच्छ भारत अभियान के नाम पर चल रहा है टारगेट पूरा करने का गंदा खेल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की 10 बड़ी योजनाओं पर बेस्ड हमारी ख़ास सीरीज है - 'ज़मीनी हकीकत.' इसकी पहली किस्त में पड़ताल "स्वच्छ भारत मिशन - ग्रामीण" की.

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“मित्रों, मेरी पहचान तो है हिंदुत्ववादी की. लेकिन मेरी रीयल सोच क्या है, मैं आपको बताता हूं. मैंने मेरे राज्य (गुजरात) में, बड़ी हिम्मत के साथ एक बात कही है और लगातार कहता हूं. जो मेरी छवि है, वो ये हिम्मत नहीं कर सकता है. लेकिन मैं करता हूं. मैं कहता हूं – पहले शौचालय, फिर देवालय.”
– नरेंद्र मोदी, 3 अक्टूबर 2013. (त्यागराज स्टेडियम, नई दिल्ली)

अक्टूबर 2013. नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हो चुके थे और अपने तूफानी प्रचार अभियान में जुटे हुए थे. 2002 में हुए गोधरा दंगे उनकी छवि के साथ चस्पा थे. इन सबके बीच ‘देवालय से पहले शौचालय’ वाले बयान से उन्होंने अपने आलोचकों को दांतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर दिया था. मई 2014 में सत्ता हासिल करने के तक़रीबन चार महीने बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के राजपथ पर खड़े हुए थे. 2 अक्टूबर 2014 को गांधी जयंती के मौके पर इंडिया गेट पर जल रही अमर जवान ज्योति को साक्षी मानकर उन्होंने कहना शुरू किया –

“पूज्य बापू ने हमें संदेश दिया था – क्विट इंडिया, क्लीन इंडिया. देशवासियों ने आन्दोलन चलाकर, पूज्य बापू के नेतृत्व में देश को गुलामी से मुक्त करवाया. लेकिन पूज्य बापू का क्लीन इंडिया का सपना अभी अधूरा है. हमने क्राउड सोर्सिंग के माध्यम से देशभर से इस अभियान के लिए लोगो और घोषवाक्य मंगवाए थे. हजारों की तादाद में लोगो आए थे. जब मैंने इस लोगो को देखा तो यह मुझे सबसे सटीक लगा. मैं देख रहा हूं, इन चश्मों से महात्मा गांधी देख रहे हैं कि बेटे, भारत को स्वच्छ किया कि नहीं किया.

भारत माता की संतान के रूप में हमारा यह दायित्व बनता है कि हम हमारे देश को ऐसा ना रखें. मैं जानता हूं कि पुरानी आदतें बदलने में वक़्त लगता है. ये प्रचार अभियान से होने वाला नहीं है. कठिन काम है, मैं जानता हूं. हमारे पास पांच वर्ष का समय है. 2019 में हम महात्मा गांधी का 150वां जन्मदिन मनाएंगे. हम यह कर सकते हैं. भारतवासी अगर दुनिया में सबसे कम खर्चे में मंगल गृह पर जा सकते हैं तो क्या भारत को स्वच्छ नहीं कर सकते?”

2 अक्टूबर 2014. नरेंद्र मोदी ने राजपथ से स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी. इसके तहत भारत को अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच मुक्त करना था.
2 अक्टूबर, 2014. नरेंद्र मोदी ने राजपथ से स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी. इसके तहत भारत को अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच से मुक्त करना था.

भारत जैसे बड़े देश को पांच साल के भीतर स्वच्छ बनाना सच में बहुत कठिन लक्ष्य था. मोदी ने इस अभियान को जनआंदोलन में तब्दील करने की बात कही थी. आंकड़ों की मानें तो सरकार ने इस मोर्चे पर युद्ध स्तर पर काम किया है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर 2014 से अब तक देश में 9,24,33,198 शौचालय बनाए जा चुके हैं. 5,55,405 गांव, 616 जिले और 30 राज्य खुले में शौच मुक्त हो चुके हैं. अब तक देश का 98.90 फीसदी क्षेत्रफल खुले में शौच मुक्त घोषित किया जा चुका है. लेकिन सरकारी मशीनरी की टारगेट पूरा करने की “अतुलनीय प्रतिभा” के चलते स्वच्छ भारत अभियान के साथ भी वही हादसा दोहरा दिया गया जो किसी जमाने में इंदिरा आवास योजना के साथ घटित हुआ था.

30 सितंबर, 2018. स्वच्छता और पेयजल महकमे की मंत्री उमा भारती के संसदीय क्षेत्र झांसी को ODF या खुले में शौच मुक्त घोषित किया गया. जिला प्रशासन को 2 अक्टूबर, 2018 तक जिले को ODF घोषित करने की मोहलत दी गई थी और यह काम तीन दिन पहले कर दिखाया गया. चार साल की कड़ी मेहनत और लगन से जिला प्रशासन ने 731 गांवों में 1.14 लाख शौचालय बनवाने में कमयाबी हासिल की थी. इस पूरे अभियान में सरकार ने करीब 137 करोड़ रुपए खर्च किए थे. शौचालय तो बन चुके थे लेकिन एक दिक्कत थी जिसे दूर किया जाना था. गांव में कई लोग शौचालय होने के बावजूद आदतन खुले में शौच करना छोड़ नहीं रहे थे. इन लोगों को जागरूक किया जाना जरूरी था. ऐसे में प्रशासन ने निर्णय लिया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और स्कूली छात्र गांव-गांव में रैली निकालेंगे और अपने नारों के जरिए लोगों को समझाएंगे.

स्वच्छ भारत अभियान के तहत पिछले 4 साल में 9 करोड़ 23 लाख शौचालय बनवाए गए हैं.
स्वच्छ भारत अभियान के तहत पिछले 4 साल में 9 करोड़ 23 लाख शौचालय बनवाए गए हैं. मंत्रालय की वेबसाइट पर ऐसा दावा किया गया है.

झांसी जिले की चमरुआ पंचायत का गांव बंडा. अक्टूबर की एक सुबह यहां भी कुछ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ‘खुले में शौच करना बंद करो’ के नारे लगाते हुए गांव में पहुंचीं. गांव के ही गुलाब सिंह राजपूत गांव की चौपाल के चबूतरे पर बैठे हुए थे. उन्होंने जानकारी के लिए नारा लगा रही महिला से पूछा कि वो किस चीज की जागरूकता फैलाने के लिए गांव में आई हैं? जवाब में उन्हें स्वच्छ भारत अभियान को लेकर हो रहे सरकारी प्रयासों के बारे में पूरी जानकारी दी गई. सारा माजरा समझने के बाद गुलाब सिंह ने उनसे पूछा कि जिसके पास शौचालय नहीं है, उसे क्या करना चाहिए? इस पर महिला ने लिस्ट देखकर बताया कि बंडा गांव के 95 घरों में पहले से शौचालय बने हुए हैं. ऐसे में यहां कोई घर ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें शौचालय ना हो. इसके बाद वो नारे लगाते हुए आगे बढ़ गईं.

गुलाब सिंह ने 95 शौचालय की सूचना गांव के दूसरे लोगों को दी. इसके बाद पास ही के जनसेवा केंद्र से गांव में बने शौचालयों की लिस्ट निकलवाई गई. इस लिस्ट के अनुसार बंडा गांव के सभी 95 घरों में शौचालय पहले से बने हुए थे. जबकि जमीन पर स्थिति एकदम उलटी थीं. गांव में ऐसे गिनती के ही लोग थे जिनके घर पर शौचालय मौजूद थे.

पिछले चार साल में भारत के 30 राज्य ODF घोषित किए जा चुके हैं.

उसके ढहते घर में सरकार ने शौचालय खोज लिया

35 साल की कृष्णा के लिए जिंदगी किसी जद्दोजहद से कम नहीं है. वो चार बच्चों की मां हैं. सबसे बड़ी बिटिया संगीता स्कूल छोड़ चुकी हैं. संजू और आदेश स्कूल में पढ़ रहे हैं. सबसे छोटा संदेश अभी महज दो साल का है. उनके पति प्रतिपाल को कच्ची शराब की लत है और वो पूरे दिन घर से गायब रहते हैं. पति के बिगड़ते स्वास्थ्य और घर चलाने की चिंता के बीच पिछला मानसून उनके लिए किसी दुर्घटना सा बीता. उनके दो कमरे वाले कच्चे घर का बायां हिस्सा ढह गया. अब उनके पास घर के नाम पर खपरैल वाला एक छोटा सा कमरा बचा है. वो घर और खेत का सारा काम अकेले कर रही हैं ताकि छह लोगों का परिवार पाला जा सके.

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35 साल की कृष्णा के लिए जिंदगी जद्दोजहद का दूसरा नाम है. उनके पति प्रतिपाल शराब की लत का शिकार हैं. चार बच्चों को पालने और ढहते घर को बचाने के लिए उन्हें ऐड़ी से चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है. (फोटोः दी लल्लनटॉप / मनोज कुमार)

दिल्ली से हाशिए के लोगों की बेहतरी के लिए योजनाओं का जो सोता फूटता है वो गांव तक पहुंचते-पहुंचते सूख जाता है. कृष्णा के मामले में भी ऐसा ही हुआ. जब हम कृष्णा के घर पर पहुंचे तो वो हमें गोबर के उपले थापते हुई मिलीं. उन्हें ना प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिला, ना ही उज्ज्वला योजना का. लेकिन शौचालय के नाम पर तो वो त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था की ठगी के दशकों पुराने तरीके का शिकार हुईं. लिस्ट में मौजूद बंडा गांव के 95 घरों में से प्रतिपाल का नाम 68वें नंबर पर है. इस लिस्ट के अनुसार प्रतिपाल के घर पर सर्वे से पहले ही शौचालय मौजूद था. कृष्णा को इस बात की हवा तक नहीं लगी कि कब उनके घर पर सर्वे हुआ और कब शौचालय बन गया. वो कहती हैं –

“हमें कुछ पता ही नहीं है. कोई अधिकारी आया ही नहीं. ना हमें प्रधान ने कुछ बताया. सब अपना-अपना काम करवा ले रहे हैं. गरीबों की कोई नहीं सुनता. हमारे पास यही एक मकान है जो कि आधा गिर चुका है. ना हमें कोई गैस सिलेंडर मिला ना आवास और ना ही कोई शौचालय. वोट के दिन ये लोग हमारे घर पर पर्ची तो लेकर पहुंच जाते हैं लेकिन जब काम की बारी आती है तो हम लोग इन्हें याद नहीं आते.”

उसे कुछ पता ही नहीं था

कृष्णा अकेली ऐसी नहीं हैं जिन्हें शौचालय के बारे में कुछ पता ना हो. गांव की प्रधान कामिनी को भी शौचालय के सर्वे में हुए घपले की हवा तक नहीं लगी. कामिनी फिलहाल झांसी की सबसे नौजवान प्रधान हैं. इससे पहले उनकी मां प्रधान हुआ करती थीं. उनके देहांत के बाद कामिनी यहां से उप चुनाव जीतकर प्रधान बनी हैं. चमरुआ महिला सीट है. कामिनी कहने के लिए प्रधान हैं लेकिन उनका दायरा घर तक ही सिमटा हुआ है. बाहर का सारा काम उनके पिता और भाई संभालते हैं. जब हमने कामिनी से बंडा गांव के शौचालय सर्वे में हुए घपले के बारे में पूछा तो उनका कहना था-

“बंडा गांव का सारा काम पंचायत सचिव और पवन साहू नाम के ठेकेदार के पास था. उन्होंने हमसे कहा कि शौचालय बने हुए हैं. हमें पता ही नहीं चला कि वो लोग इसमें घपला कर रहे हैं. अब हमें पता चला है तो हम शौचालय बनवा रहे हैं.”

कृष्णा का सबसे छोटा बेटा संदेश अभी महज 3 साल का है. उसके लिए योजनाओं के चमकीले कागज महज मनबहलाव की चीज है.
कृष्णा का सबसे छोटा बेटा संदेश अभी महज 3 साल का है. उसके लिए योजनाओं के चमकीले कागज महज मनबहलाव की चीज है. (फोटोः दी लल्लनटॉप / मनोज कुमार).

टारगेट पूरा करना है

जनसेवा केंद्र से लिस्ट बाहर आने के बाद गांव में काफी हंगामा शुरू हो गया. इसके बाद गांव की प्रधान हरकत में आईं और आनन-फानन में ‘टारगेट’ पूरा करने की कवायद शुरू हो गई. गांव में नए सिरे से शौचालय बनने शुरू हुए. इसमें उन 95 परिवारों को दूर रखा गया जिनमें लिस्ट के मुताबिक पहले से शौचालय मौजूद थे. लाभार्थियों की नई लिस्ट बनी और तेजी से काम शुरू हुआ. बंडा गांव के रमेश का नाम लाभार्थियों की नई सूची में शामिल था. उन्हें प्रधान की तरफ से कहा गया कि वो उनके घर पर शौचालय बनाने जा रहे हैं. उन्हें इसके लिए चार-चार फीट के दो गड्ढे खोदने पड़ेंगे. रमेश कहते हैं-

“जो चार-चार फीट के गड्ढे हमसे खुदवाए गए हैं सारा मल इसी में इकठ्ठा होगा. इन गड्ढों को नीचे से कच्चा छोड़ दिया गया है ताकि मल इसी में सूख जाए. इन गड्ढों को सीमेंट के ढक्कन से बंद कर दिया गया है. पहली चीज तो आने वाले समय में इसमें से बदबू आना तय है. इसके अलावा कच्चे होने की वजह से बारिश के वक्त ये ओवरफ्लो करेंगे. इससे गंदगी और बढ़ेगी. ऐसे में कोई इनको क्यों काम में लेगा.”

क्योंकि बंडा गांव का मामला झांसी को ODF घोषित किए जाने के बाद मीडिया में उछला था, इसलिए प्रशासन पर दबाव होना स्वाभाविक था. लिहाजा तेजी से शौचालय बनवाए जाने लगे. लेकिन इतनी हड़बड़ी में बने यह शौचालय क्या बरतने लायक होंगे? इस सवाल का जवाब हमें बंडा गांव के लखन देते हैं. लखन पेशे से राजमिस्त्री हैं और शौचालय के निर्माण की कमियां गिनवाते हुए कहते हैं-

“ठेकेदार कहता है कि वो एक दिन में तीन शौचालय खड़े कर रहा है. लेकिन वो ऐसे शौचालय खड़े कर रहा है जो बेहद घटिया हैं. कायदे से इसमें 12 गुम्मे (ईटों) की जाली लगनी चाहिए, लेकिन ये लोग लगा रहे हैं 6 गुम्मे की. यह लोग 10:1 का मसाला तैयार कर रहे हैं. जबकि इसमें 4:1 का मसाला लगना चाहिए. एक तरफ ये लोग सीमेंट में कटौती कर रहे हैं और दूसरी तरफ बालू की जगह डस्ट डाल रहे हैं. यह मसाला कैसे मजबूत होगा. दरवाजा भी इन्होंने बस फंसा दिया है. इसमें एक मुक्का मार दो तो यह भरभराकर नीचे गिर जाएगा. ऐसा शौचालय बनाने से अच्छा था कि वो इसे ना ही बनाते. ये हमारे लिए जी का जंजाल बन जाएगा.”

गांव में हल्ला मचने के बाद बंडा गांव में आनन-फानन में शौचालय खड़े किए जा रहे हैं.
गांव में हल्ला मचने के बाद बंडा गांव में आनन-फानन में शौचालय खड़े किए जा रहे हैं. (फोटोः दी लल्लनटॉप / मनोज कुमार)

कागजी शौचालय

यह झांसी के एक गांव या ग्राम पंचायत की कहानी नहीं थी. बबीना ब्लॉक की चमरुआ पंचायत के बाद हम लोग झांसी के ही बड़ा गांव ब्लॉक की पालर पंचायत पहुंचे. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस पंचायत के कुल 378 घरों में सर्वे किया गया. इसमें से 15 घरों में पहले से शौचालय मौजूद था. बाकी के 363 घरों में पंचायत की तरफ से शौचालय बनवा दिया गया था. हम पालर पंचायत के उड़ेना गांव में थे. यहां लोगों के सामने जब लाभार्थियों की सूची देखी तो इस योजना का कच्चा चिट्ठा खुल गया. सरकारी आंकड़ों के अनुसार गांव के 63 घरों का सर्वे किया गया. इसमें से एक भी घर में शौचालय नहीं था. सर्वे के बाद इन सभी घरों में शौचालय बनवा दिया गया था. लेकिन गांव में बने सरकारी शौचालयों की गिनती दहाई के आंकड़े को पार नहीं कर पाती है.

50 के पेटे में पहुंच चुके रमेश कुमार उड़ेना के रहने वाले हैं. लाभार्थियों की लिस्ट में 332 वीं एंट्री में उनकी बीवी किरण का नाम दर्ज है. इस लिस्ट के अनुसार सर्वे से पहले रमेश के घर में शौचालय नहीं था जिसे बाद में सरकार की तरफ से बनवा दिया गया. 345 नंबर की एंट्री में उनकी मां मन्नू देवी का नाम दर्ज है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक रमेश के पैतृक घर में भी सर्वे के बाद शौचालय बनवा दिया है. 354 नंबर पर उनके छोटे भाई संतोष की पत्नी पुष्पा का नाम दर्ज है. इसी तरह उनके बड़े भाई माधो प्रसाद की पत्नी सुधा का नाम लिस्ट में 370वें नंबर पर दर्ज है. सरकारी आंकड़ों में इन तीनों घरों में शौचालय बनवा दिए गए हैं लेकिन रमेश इस दावे को ख़ारिज करते हैं. वो कहते हैं –

“किसी ने सूचना ही नहीं दी. आज तक कोई आया ही नहीं. ना प्रधान ने कुछ बताया और ना ही कोई सर्वे हुआ. ना हमारे घर पर शौचालय है और ना ही हमारी मां के घर पर. हमें तो यह पता भी नहीं है कि लिस्ट में हमारा नाम कब चढ़ गया.”

सरकारी आंकड़ो के हिसाब से रमेश कुमार के परिवार में चार शौचालय बनवाए जा चुके हैं. लेकिन कमाल की बात यह है कि रमेश कुमार को इसके बारे में कुछ पता नहीं है.
सरकारी आंकड़ों के हिसाब से रमेश कुमार के परिवार में चार शौचालय बनवाए जा चुके हैं. लेकिन कमाल की बात यह है कि रमेश कुमार को इसके बारे में कुछ पता नहीं है. (फोटोः दी लल्लनटॉप / मनोज कुमार)

उड़ेना गांव में रमेश अकेले ऐसे नहीं हैं. लिस्ट में आखिरी एंट्री बुद्ध सिंह के बेटे विनोद कुमार की है. लिस्ट के मुताबिक इनके यहां पर भी सर्वे के बाद शौचालय बनवा दिया गया है. लेकिन विनोद कुमार की स्थिति भी रमेश कुमार जैसी ही है. उन्हें इस लिस्ट के बारे में रत्तीभर जानकारी नहीं है. विनोद के पास कुल 4 एकड़ रकबा है. लिस्ट के मुताबिक वो छोटे और सीमांत किसान की श्रेणी में आते हैं. वो कहते हैं –

“ये मेरा घर है आप खुद जाकर देख लीजिए कि शौचालय बना है कि नहीं बना. यह लिस्ट बेबुनियाद है. हमारे पास इस बात की सूचना ही नहीं है कि ऐसी कोई लिस्ट बनी भी है. यहां पर भी शौचालय का जो काम शुरू हुआ है उसे एक महीने से ज्यादा का समय नहीं हुआ. अभी तक ज्यादा से ज्यादा 6-7 सरकारी शौचालय बने हैं. लिस्ट बता रही है कि सबके बन गए हैं.”

अंगूरी, आशा, किशोरी, लक्ष्मी कुमार, विनीता, उषा, सुधा, सेववति, जैसे दर्जनों ऐसे नाम हैं जिनका शौचालय सिर्फ कागजों पर बना है. गीता के यहां शौचालय 10 मार्च 2019 को बनकर तैयार हुआ है. मल्लू और सुधा के यहां काम अभी चल ही रहा है. शौचालय बनाने की यह कवायद झांसी को ODF घोषित किए जाने के चार महीने बाद शुरू हुई है. जब हमने इस बारे में झांसी के मुख्य विकास अधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे से सवाल किया तो उनका जवाब था –

“अगर जमीन पर ऐसी अनियमितता है, जैसी आप बता रहे हैं तो यह चिंता का विषय है. हम मामले की जांच करवाएंगे और जो भी दोषी होगा उन पर कार्रवाई जरूर की जाएगी.”

झांसी के मुख्य विकास अधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे. (फोटोः दी लल्लनटॉप )
झांसी के मुख्य विकास अधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे. (फोटोः दी लल्लनटॉप )

2014 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए थे तो भारत के महज 38.7 फीसदी घरों में शौचालय की सुविधा हुआ करती थी. ग्रामीण क्षेत्रों में हालात और बदतर थे. इस लिहाज से देखा जाए तो स्वच्छ भारत मिशन बेहद जरूरी कदम था. लेकिन धरातल पर आते-आते यह योजना खांटी भारतीय ठेकेदारी व्यवस्था का शिकार हो गई. कायदे से इस योजना को अक्टूबर 2019 में पूरा होना था लेकिन चुनाव मई 2019 में होने थे. ऐसे में अधिकारियों के ऊपर टारगेट पूरा करने का भयंकर दबाव था. दिक्कत यहीं से शुरू हुई. स्वच्छ भारत मिशन का काम देख चुके एक सेवानिवृत्त अधिकारी नाम ना बताते की शर्त पर कहते हैं –

ग्रामीण इलाकों में लोग सालों से खुले में शौच कर रहे हैं. यह स्थिति एक रात में नहीं बदल जाएगी. लोगों की सोच बदलने में वक़्त लगता है. इसके लिए पूरी गंभीरता से प्रयास किए जाने जरूरी हैं. टारगेट पूरा करने से भारत स्वच्छ नहीं हो जाएगा.”

यह बयान स्वच्छ भारत मिशन की सबसे संतुलित विवेचना है.


Video: नरेंद्र मोदी की 10 बड़ी योजनाओं में से एक स्वच्छ भारत मिशन की ज़मीनी हकीकत

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