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योग सिर्फ हिंदू ही नहीं है, इसमें इस्लाम का भी तगड़ा हाथ लगा है

यह लेख डेली ओ से लिया गया है, जिसे माधवी मेनन  ने लिखा है.  
दी लल्लनटॉप के लिए हिंदी में यहां प्रस्तुत कर रही हैं शिप्रा किरण.


भले ही पूरी दुनिया के सामने योग को ‘प्राचीन हिन्दू परंपरा’ की देन के रूप में प्रचारित किया जा रहा हो लेकिन सच तो ये है कि योग भी भारत की मिली-जुली संस्कृति का ही हिस्सा है. योग शब्द का सबसे पहला ज़िक्र ऋग्वेद में मिलता है. लेकिन वहां इसका ज़िक्र ध्यान या तप के अर्थ में नहीं किया गया है. बल्कि योग शब्द का इस्तेमाल लोहे के एक ऐसे क्लैम्प के लिए किया गया है जिसकी मदद से पहिए और घोड़े रथ से जोड़े जाते थे.

योग की उत्पत्ति अंग्रेज़ी के ‘योक’ से हुई है. महाभारत में रथ के साथ घोड़ों का जुता होना बड़े ही प्रतीकात्मक अर्थों में लिया गया है. यहां रथ, पहियों और घोड़ों को शरीर, इन्द्रियों और मस्तिष्क के अर्थ में लिया गया है. ‘योक’ इन सबको संतुलित करने और इनकी एकता का प्रतीक है. आगे बौद्ध और जैन श्रोतों में इसका प्रयोग मस्तिष्क और शरीर पर नियंत्रण करने के लिए किया गया है.

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पतंजलि ने अपने ‘योग-सूत्र’ में बताया है कि इस तरह के ‘योग-ध्यान’ का एकमात्र लक्ष्य है- समाधि की प्राप्ति. मन-मस्तिष्क की शांति. बाहर से अपने भीतर तक की यात्रा करना. सूफियों ने भी ध्यान केंद्रित करने और मन-मस्तिष्क को एकाग्र करने के लिए योग को अपनाया. भारत में सूफियों और योग के बीच बहुत करीबी रिश्ता रहा. सूफियों ने योग की विधियों को ही नहीं अपनाया बल्कि मांसाहार और शराब का सेवन भी छोड़ दिया.

औरग़ज़ेब के भाई दारा शिकोह की भी योग और वेदांत में दिलचस्पी थी जिसकी वजह से उसके छोटे भाइयों ने उसपर धर्म-विरोधी होने का आरोप लगाया. उसे मुग़ल सिंहासन तक नहीं पहुंचने दिया. भारत में योग के साथ मुसलमानों का इतना गहरा सम्बन्ध रहा है कि आज ये कहने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि आज हम योग का जो रूप देख रहे हैं उसे आकार देने में मुसलमानों का भी उतना ही योगदान रहा है. 11वीं सदी में अल-बरुनी ने पतंजलि के योग-सूत्र का अरबी में अनुवाद किया. अल-बरुनी के इस अनुवाद ने पतंजली के योग-सूत्र का पूरे विश्व में प्रचार किया. उसने पतंजली के योग-सूत्र में लोगों की रूचि भी जगाई. लेकिन ये भी एक सच है कि पतंजलि के योग-सूत्र (संस्कृत और अल-बरुनी के अरबी अनुवाद दोनों में ही) में योग का जो रूप दिखाई देता है वो इस योग से बिलकुल अलग है, जिसे हम आज योग के रूप में जानते हैं.

yoga

ये अलगाव आसनों के स्तर पर है. पतंजली के 196 सूत्रों में से सिर्फ 1 सूत्र में आसनों के बारे में बताया गया है. पतंजलि के लिए योग शारीरिक क्रियाकलाप या व्यायाम से कहीं ज्यादा मन-मस्तिष्क के ध्यान और एकाग्रता की एक प्रक्रिया है. सिर्फ ‘हठप्रदीपिका’ में कई आसनों की चर्चा की गई है. एक प्राचीन ग्रन्थ में 84 लाख आसनों का ज़िक्र मिलता है लेकिन उनमें से सिर्फ दो ही आसनों के बारे में विस्तार से बताया गया है. आगे चलकर 17वीं शताब्दी के ‘हठरत्नावली’ और ‘योगचिन्तामणि’ में आसनों की संख्या बढ़ी है और उनके बारे में विस्तार से बताया भी गया है. इनसे पहले के ग्रंथों में 84 आसनों के सिर्फ नाम ही हैं जबकि बाद के ग्रंथों में लगभग 35 आसनों की विस्तार से व्याख्या की गई है.

लेकिन आज हम योग का जो रूप देख रहे हैं असल में वो 16वीं शताब्दी के फ़ारसी टेक्स्ट ‘बहर-अल-हयात’ से लिया गया है. ये अरबी के ‘हवद-अल-हयात’ का अनुवाद है. कहा जाता है कि ‘हवद-अल-हयात’ संस्कृत के ‘अमृतकुंड’ का अनुवाद है. विद्वानों का मानना है कि ‘बहर-अल-हयात’ के लेखक सूफी शेख मोहम्मद गौथ ग्वालियरी ने उस समय के योगियों से बातचीत करके ये ग्रन्थ लिखा होगा क्योंकि इसके पहले लिखे ग्रंथों में उन आसनों का कोई ज़िक्र नहीं मिलता. उनके इस ग्रन्थ में आसनों के बारे में बड़ी ही खूबसूरती से बताया गया है. इस किताब में 21 योगियों द्वारा कठिन से कठिन आसन वर्णित किए गए हैं. जबकि पतंजलि के योग-सूत्र में आसनों की व्याख्या नहीं की गई है. आज हम योग के जिन आसनों का अभ्यास कर रहे हैं असल में वो फारसी पांडुलिपियों की देन है. और यहीं से भारत में योग का प्रारंभ होता है.

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लेकिन जब अंग्रेज़ों का एक ऐसी सभ्यता से सामना हुआ जिसमें इच्छाएं और धार्मिक आस्थाएं आपस में घुली-मिली थीं, उन्होंने इसे पूरी तरह नष्ट कर देने का निर्णय लिया. पहले उन्होंने योगियों को अपराधी साबित कर के उन्हें बदनाम किया. अंततः 18 वीं शताब्दी के अंत में बंगाल के सन्यासियों और फकीरों के दमन में सफल रहे. (योगी 18वीं शताब्दी के दौरान, तीर्थ मार्गों को व्यापार मार्गों में परिवर्तित करने में कामयाब हो गए थे. वे धन और प्रभाव के लिए सीधे अंग्रेजों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे थे) अंग्रेज़ों का तर्क था कि हिंदुत्व एक बेहद कामुक पंथ है और इसलिए ये बेहद खतरनाक भी है.

अपनी किताब In Reading the Kamasutra : The Mare’s Trap and Other Essays on Vatsyayana’s Masterpiece में वेंडी डॉनिगर एक सन्दर्भ देते हुए कहती हैं – ‘1862 में अंग्रेज़ी सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि ‘16,000 राजकुमारियों का पति और भारत के प्रेम कहानियों के नायक, कृष्ण ने पूरी व्यवस्था (हिंदुत्व) को कामुकता और वासना के रंग में रंग रखा है’. भारत एक ऐसा देश है जो जितना ही अध्यात्मिक है, उतना ही सांसारिक भी. लेकिन अंग्रेजों के लिए ‘अध्यात्म’ और ‘काम’ दो बिल्कुल अलग और अजीब बातें थीं.

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तब योग का शारीरिक इच्छाओं के साथ बहुस्तरीय सम्बन्ध है. स्पष्ट है कि योग एक ऐसा माध्यम था जो भौतिक इच्छाओं और काम-सुख को एक नई दिशा देता था. उसे एक नए तरह के गैर-भौतिक या अध्यात्मिक आनंद की तरफ मोड़ता था. लेकिन उस आनंद तक पहुंचने का मार्ग सांसारिक और शारीरिक ही है. सुख और योग की उत्पत्ति एक ही है. सुख और योग दोनों ही अंततः आनंद देने वाले और इच्छाओं की पूर्णता से जुड़े हैं. बिना योग को समझे, भारत के सौंदर्य और इसकी प्राचीनता को नहीं समझा जा सकता. योग की इच्छा से ही दुनिया के कई मशहूर लोग भारत से जुड़े रहे हैं. दशकों से योग का मार्ग ही उन्हें हिन्दुस्तान तक पहुंचाता रहा है.

‘बीटल्स’ का महर्षि योगी के आश्रम में ठहरना हो या योग के अलग-अलग आसनों में ‘मर्लिन मोनेरो’ की तस्वीरें हों. बेयोंस हों, जॉर्ज क्लूनी हों या मडोना का अध्यात्मिक रुझान, हिन्दुस्तान को करीब से जानने के लिए सबने योग के मार्ग को ही चुना है. या यूं कहें कि योग को समझने के क्रम में ही उन्होंने भारत को भी समझा है.


ये लेख माधवी मेनन की किताब Infinite Variety : A History Of Desire In India का एक अंश है.


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