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अब कोरोना की मार झेल चुके लोगों पर कहर क्यों ढा रहा है चीन?

आज शुरुआत करेंगे एक तस्वीर से. तस्वीर, जिसमें एक सड़क पर एक-के-पीछे-एक टैंक बढ़े चले आ रहे हैं. सबसे अगली टैंक के आगे सफ़ेद कमीज में एक आदमी खड़ा है. दोनों हाथों में थैलियां थामे, जिनमें हो सकता है सब्ज़ी हो. या फिर ब्रेड-दूध जैसा कोई पदार्थ हो. उस आदमी का नाम था- वैंग विलिन. 19 साल का लड़का, जिसकी अभी दाढ़ी भी नहीं आई थी ठीक से. वो अपने ही देश की तोपों के आगे खड़ा हो गया था. वो टैंकें, जो एक दिन पहले उसी के हज़ारों हमवतनों को कुचलकर वापस लौट रही थीं.

5 जून, 1989 की ये तस्वीर दुनिया की सबसे परिचित, सबसे ज़्यादा आइकॉनिक तस्वीरों में से एक मानी जाती है (फोटो: AP)
5 जून, 1989 की ये तस्वीर दुनिया की सबसे परिचित, सबसे ज़्यादा आइकॉनिक तस्वीरों में से एक मानी जाती है (फोटो: AP)

तस्वीर, जिसे बाहर लाने के लिए फटॉग्रफर्स को ‘स्मगलिंग’ करनी पड़ी
ये तस्वीर खींची गई थी 5 जून, 1989 को. तस्वीर खींची थी पांच विदेशी फटॉग्रफर्स ने. जो उसी सड़क किनारे के एक होटेल की बालकनी में खड़े थे. ये फोटो चीन के बाहर लाने के लिए उन्हें बहुत तिकड़म भिड़ानी पड़ी. मसलन, उन पांचों में से एक फटॉग्रफर स्टुअर्ट फ्रैंकलिन ने अपने कैमरे की रील को चाय के डब्बे में छुपाकर चीन से बाहर स्मगल किया. चार्ली कोल नाम के एक दूसरे फटॉग्रफर तो सीधे प्रशासन के निशाने पर आ गए. पुलिस ने होटल के उनके कमरे पर छापा मारा. कैमरे की रील उनके हाथ न लगे, इसके लिए चार्ली ने वो रील टॉइलेट में छुपा दी. मगर प्रशासन जानता था कि चार्ली ने तस्वीरें तो खींची हैं. उन्हें हर हाल में वो तस्वीरें चाहिए थीं. ऐसे में चार्ली ने उन्हें एक दूसरी रील दे दी.

कोई नाम भी है क्या इस तस्वीर का?
फटॉग्रफर्स को पेश आईं ये मुश्किलें. ये सख़्तियां. ये ख़तरे. इन सबके बाद जाकर दुनिया को मिली एक ऐतिहासिक तस्वीर. जिसका नाम है- टैंक मैन. जैसे गांधी की अहिंसा का सिद्धांत है. वैसे ही इस तस्वीर में था निडरता का सिद्धांत. एक साधारण से कॉलेज स्टूडेंट का तोप के आगे आकर खड़े हो जाना. ये जानते हुए कि वो टैंक और उन्हें चलाने वाले लोग भीषण नरसंहार करके लौटे हैं.

ये 'टियनानमेन स्क्वैयर' आंदोलन की एक तस्वीर है. प्रदर्शन कर रहे छात्र हाथ में तख़्तियां लेकर मार्च कर रहे हैं. इस हत्याकांड के बाद से आज तक चीन में सरकार विरोधी ऐसी कोई बग़ावत नहीं हुई. अब तो सरकारी सर्विलांस इतना सख़्त है कि डिजिटल माध्यमों और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से हर नागरिक पर नज़र रखी जाती है (फोटो: AFP)
ये ‘टियनानमेन स्क्वैयर’ आंदोलन की एक तस्वीर है. प्रदर्शन कर रहे छात्र हाथ में तख़्तियां लेकर मार्च कर रहे हैं. इस हत्याकांड के बाद से आज तक चीन में सरकार विरोधी ऐसी कोई बग़ावत नहीं हुई. अब तो सरकारी सर्विलांस इतना सख़्त है कि डिजिटल माध्यमों और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से हर नागरिक पर नज़र रखी जाती है (फोटो: AFP)

क्या थे ये नरसंहार? कहां से लौटी थीं ये तोपें?
ये लौटी थीं चीन की राजधानी पेइचिंग स्थित ‘टियनानमेन स्क्वैयर’ से. 4 जून, 1989 को जहां हज़ारों छात्र इकट्ठा हुए थे. क्या चाहत थी इनकी? बस ये कि देश में सच्चा लोकतंत्र आए. सिस्टम में पारदर्शिता हो. नागरिक अधिकार हों. पिछले करीब डेढ़ महीने से चल रहा आंदोलन चीन की फजीहत करवा रहा था. कुछ ही दिनों में सोवियत प्रमुख मिखाइल गोर्बाचेव आने वाले थे चीन. अगर ये आंदोलन चलता रहता, तो चीनी व्यवस्था की पोल खुल जाती. ऐसे में 4 जून को सरकार ने ये आंदोलन कुचलने के लिए सेना भेज दी. ऑटोमैटिक राइफलों से सेना ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं. सेना की गाड़ियों ने लोगों को कुचल दिया. इतना ख़ून निकला कि पास की गटर का पानी लाल हो गया. चीन कहता है, वहां 300 लोग मारे गए. रेड क्रॉस कहता है, करीब पौने तीन हज़ार मारे गए. मगर इस नरसंहार के समय चीन में तैनात ब्रिटिश राजदूत ऐलन डॉनल्ड ने कहा, साढ़े 10 हज़ार लोग मारे गए.

आप कहेंगे, ये क़िस्सा हम आज क्यों सुना रहे हैं आपको?
इसलिए सुना रहे हैं कि 1989 के चीन और अब के चीन में कोई फ़र्क नहीं है. डंग शाओपीन और शी चिनफिंग की कम्यूनिस्ट पार्टी में कोई फ़र्क नहीं है. तब भी और अब भी, चीन एक ऑथॉरिटेरियन स्टेट है. और उसका ये तानाशाही सिस्टम अभी वुहान में लोगों का मुंह बंद करा रहा है. उन लोगों का, जिन्होंने किसी अपने को कोरोना में खोया. किसी की संक्रमित मां इलाज के लिए अस्पतालों की चौखट से लौटाई जाती रही और बिना इलाज के मर गई. किसी के पिता क्वारंटीन में ले जाए गए और वहीं मर गए. कैसे, क्यों, परिवार को कोई जवाब नहीं मिला. इस जवाब की तलाश में लोग अदालत जाना चाहते हैं. मगर प्रशासन ने वकीलों को धमकाया है. निर्देश दिया है कि वो भूले से भी ऐसा कोई केस न उठाएं.

क्या हो रहा है चीन में?
‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ की एक ख़बर के मुताबिक, वुहान के लोग जानना चाहते हैं कि उनके यहां क्या ग़लत हुआ. वो चाहते हैं कि कम्यूनिस्ट सत्ता उन्हें सारी जानकारी दे. वो कब, कहां, कैसे ये सारे जवाब चाहते हैं. वो जानना चाहते हैं कि सरकारी इंतज़ाम पर्याप्त क्यों नहीं थे. देर से क्यों शुरू हुए. वो हर लापरवाही, हर देरी का हिसाब चाहते हैं. मगर उन्हें ये जवाब मिल नहीं रहा. प्रशासन ने कोरोना से मारे गए लोगों के परिवार पर सख़्ती बढ़ा दी है. इन परिवारों के जो लोग इंटरनेट के रास्ते चीन से बाहर अपनी आवाज़ पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें इंटेरोगेट कर रही है पुलिस. कोरोना वायरस से जुड़ी ख़बरों को रिपोर्ट करने की कोशिश कर रहे वॉलेंटियर्स एकाएक लापता हो जा रहे हैं.

जान बचाकर भाग पाए, तो समझिए क़िस्मतवाले हैं
इसी सिलसिले में पढ़ते हुए हमें यैंग शानशिंग नाम के एक सामाजिक कार्यकर्ता का नाम मिला.वो गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के अधिकार की वकालत करते थे. प्रशासन द्वारा किए जाने वाले भेदभाव के खिलाफ भी अभियान चलाते थे. जून 2015 में इन्हीं गतिविधियों के लिए उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था. सात साल पहले छापे गए उनके एक पर्चे को ग़ैरक़ानूनी बताकर उन्हें करीब महीनाभर जेल में रखा गया था. क्या था उस पर्चे में? समझिए, एक तरह का बुलेटिन था. जिसमें सरकार द्वारा किए जा रहे भेदभाव का कच्चा-चिट्ठा था. यैंग जेल से छूट तो गए, मगर सरकारी डेटाबेस में उनके नाम की मार्किंग हो गई. उनका नाम आपराधिक लोगों के रेकॉर्ड में दर्ज कर लिया गया. सरकार उन्हें काम करने नहीं देती. ऊपर से किसी भी दिन गायब कर दिए जाने का भी ख़तरा था. ऐसे में जान बचाने के लिए यैंग न्यू यॉर्क भाग आए. यहां रहकर वो अब भी अपना कैंपेन चलाते हैं.

आप चैट करते हैं, पुलिस को पता लग जाता है
बीते दिनों वुहान के सात लोगों ने इंटरनेट के रास्ते यैंग से संपर्क किया. वो अपनी आपबीती सुनाना चाहते थे दुनिया को. मगर फिर अप्रैल के आख़िर में आकर एकाएक ये लोग पीछे हट गए. उनकी तरफ से जवाब आना बंद हो गया. यैंग का कहना है कि इनमें से दो लोगों ने उन्हें बताया था कि पुलिस को उनके इरादों की भनक लग गई है. पुलिस ने उन्हें धमकाया भी है. शायद बाकी पांच के साथ भी ऐसा ही हुआ हो. यैंग और इन लोगों के बीच इंटरनेट पर क्या बातचीत हुई, ये पुलिस को कैसे पता चला? यूं पता चला कि चीन ने अपने यहां इंटरनेट सप्लाई में सैकड़ों फिल्टर लगाए हुए हैं. बहुत तरह के सेंसर लगे हुए हैं यहां इंटरनेट पर. रेड सिग्नल वाले हज़ारों कीवर्ड हैं. सरकारी एजेंसियां फिल्टर के सहारे इनकी पहचान कर लेती हैं. और इस तरह उन्हें पता चल जाता है कि आपने किसको क्या मेसेज भेजा. आपके नाम का अलार्म बजा दिया जाता है और पुलिस आप तक पहुंच जाती है.

इतनी सतर्कता क्यों बरत रहा है चीन?
फ़र्ज़ कीजिए कि कोई देश है. एक दिन उसके एक शहर में ज़हरीली हवा फैले. सैकड़ों लोग मर जाएं. दुनिया को पता चले. वो जानना चाहें कि क्या हुआ, कैसे हुआ. ऐसे में वहां की सरकार एक बयान जारी करे. कहे कि एक चरमपंथी संगठन का हाथ है इसके पीछे. मगर वहां के नागरिक सोशल मीडिया पर अपनी सरकार के बयान को झूठा बताने लगें. लोग कहें कि सरकारी लापरवाही के कारण एक केमिकल फैक्ट्री से ज़हरीली गैस निकली थी. इनमें से कुछ तो सबूत के तौर पर कागज़ात, विडियो और तस्वीरें भी डाल दें इंटरनेट पर. ऐसे में दुनिया के आगे उस सरकार की किरकिरी होगी. अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव बढ़ेगा उसपर.

शायद ऐसा ही डर चीन को भी है. अगर नागरिक अपनी आपबीती सुनाएं. अगर वो प्रशासन की कोरोना पॉलिसी पर अपना नज़रिया रखें. तो शायद ऐसी बातें निकलकर आएंगी, जो चीन के आधिकारिक बयान से मेल नहीं खाएंगी.

हाय ये देशभक्ति, उफ़्फ ये देशभक्ति
स्थानीय आबादी के गुस्से को दबाने के और भी रास्ते इस्तेमाल कर रहा है चीन. मसलन, देशभक्ति. सरकार कह रही है कि कोरोना से मरे लोग शहीद हैं. ये शहीद शब्द बड़े खुले हाथों से इस्तेमाल होता है. लेकिन चीन ये बताए कि इलाज न मिलने की वजह से मारा गया इंसान शहीद कैसे हुआ? सरकारी लापरवाही के कारण विकराल हुई महामारी में मारा गया शख्स पीड़ित कहलाएगा. न कि शहीद.

आदत कहिए, चस्का कहिए, या कहिए फॉर्म्युला
ऐसा नहीं कि ये पहली आपदा हो, जहां चीन ने पीड़ितों को चुप कराने की कोशिश की है. हमें जुलाई 2008 में छपी NYT की एक रिपोर्ट मिली.उस साल 12 मई को चीन के सेशुआन प्रांत में भयंकर भूकंप आया था. करीब 87 हज़ार लोग मरे थे उसमें. इनमें एक हाई स्कूल की इमारत में दबकर मर गए 240 बच्चे भी शामिल थे. इनमें यैंग नाम की एक लड़की भी थी. उसके पिता का नाम था- यू तिंगयुन.

मारे गए बच्चों में से कइयों के अभिभावकों को लग रहा था कि शायद स्कूल की इमारत कमज़ोर होने के कारण उनके बच्चों की मौत हुई. सेशुआन दक्षिण-पश्चिमी चीन में आता है. ये भूकंप की आशंका वाला क्षेत्र है. ऐसे में इमारतों के निर्माण में भूकंपरोधी डिजाइन और सामग्रियों का ख़ास ध्यान रखा जाना चाहिए. ख़ासतौर पर सरकारी इमारतों में. यू तिंगयुन और उनके नेतृत्व में कई और अभिभावकों ने ये मुद्दा उठाना शुरू किया. फिर एक शाम यू तिंगयुन के घर पुलिस की गाड़ी पहुंची. उन्हें अपने साथ कहीं ले गई. घंटों उन्हें बिठाए रखा. उन्हें अपना अभियान ख़त्म करने को कहा गया. पुलिसवालों ने यू तिंगयुन समेत सारे अभिभावकों से एक कॉन्ट्रैक्ट साइन करवाया. इसमें लिखा था कि वो कोई प्रोटेस्ट नहीं करेंगे. अपना मुंह बंद रखेंगे. इस चुप्पी के बदले उन्हें पैसे दिए गए. एक पेंशन की रकम भी तय की गई उनके लिए. यू तिंगयुन ने पहले विरोध किया. मगर फिर दबाव में आकर उन्होंने दस्तख़त कर दिए. जैसे ‘कामयाब’ फिल्म में संजय मिश्रा कहते हैं न कि एन्जॉइंग लाइफ, और ऑप्शन ही क्या है. वैसे ही, सरकार की धमकी के आगे यू तिंगयुन और बाकी पैरेंट्स के पास ऑप्शन ही क्या था.

ये 2008 में आए उसी भूकंप की एक तस्वीर है. स्कूल की इमारत का मलबा हटाते हुए जो बच्चों के बैग, उनकी क़िताबें मिलीं, वो एक किनारे रखी हैं. राहतकार्य में लगे लोग एक बच्चे की लाश लेकर जा रहे हैं. इस भूकंप में करीब 87 हज़ार जानें गई थीं (फोटो: AFP)
ये 2008 में आए उसी भूकंप की एक तस्वीर है. स्कूल की इमारत का मलबा हटाते हुए जो बच्चों के बैग, वॉटरबोतल और उनकी क़िताबें मिलीं, वो एक किनारे रखी हैं. राहतकार्य में लगे लोग एक बच्चे की लाश लेकर जा रहे हैं. इस भूकंप में करीब 87 हज़ार जानें गई थीं (फोटो: AFP)

मारेंगे भी और रोने भी नहीं देंगे
हमने इस ख़बर की शुरुआत में आपको टियनानमेन स्क्वैयर के नरसंहार की कहानी सुनाई थी. बाहर की दुनिया इसका नाम लेती है. मगर चीन में इसका ज़िक्र नहीं होता. न ही स्कूली पाठ्यक्रम में कहीं इसका ज़िक्र मिलेगा आपको. उस घटना में मारे गए लोगों के परिवारों को भी उस बारे में बात करने की इजाज़त नहीं. अपने सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करके चीन ने जैसे लोगों की याद्दाश्त से वो दिन ही खुरच दिया है. ऐसा ही वो कोरोना के केस में भी कर रहा है. स्वतंत्र वॉलेंटियर्स की ऐसी रिपोर्ट्स, जो सरकारी स्टैंड से अलग थीं, उन्हें सेंसर कर दिया गया है. मतलब आगे कभी इतिहास लिखा जाए, तो सरकारी लाइन से इतर कोई जानकारी मौजूद ही न रहे.

ज़मीन नहीं खाती. न आसमान निगलता है. कोई और है, जो लापता करता है
मार्च में ख़बर आई कि चीन के कुछ युवा इन सेंसर्ड आर्टिकल्स के स्क्रीनशॉट्स सहेज रहे हैं.टेलिग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर इन्हें लोगों के साथ साझा कर रहे हैं. एक मीडिया रिपोर्ट में ऐसी ही एक युवा लड़की का बयान पढ़ा. वो कह रही थी कि आगे चलकर शायद इस वक़्त का इतिहास खंगाला जाए. ये सेंसर्ड रिपोर्ट्स शायद उस दिन काम आएं. इनके मार्फ़त शायद तब लोग जान सकें कि असल में क्या हुआ था. कई ग्रुप इस काम में लगे हैं वहां. इनमें से एक ग्रुप ने अपने प्रॉजेक्ट को ‘टर्मिनस 2049’ का नाम दिया. अभी मई की शुरुआत में ख़बर आई कि इस प्रॉजेक्ट में शामिल तीन युवा लापता हैं. यूं रातोरात लापता कर दिया जाना आम बात है चीन में.

वन्स अपॉन अ टाइम…
पहले राजाओं के दरबार में इतिहास लेखन का अलग विभाग हुआ करता था. बड़े-बड़े बादशाहों के जीवनकाल पर किताबें लिखी जाती थीं. इन क़िताबों को लिखने का जिम्मा अक़्सर उनके किसी भरोसेमंद को दिया जाता था. मसलन, हुमांयूनामा. जिसे लिखा था बादशाह हुमांयू की बहन गुलबदन बानो बेगम ने. अकबरनामा. जिसे बादशाह अकबर के करीबी अबुल फ़जल ने लिखा. कुछ बादशाह ख़ुद भी अपना इतिहास लिख गए. जैसे, बाबर ने लिखी बाबरनामा. जहांगीर ने लिखी तुज़ुक-ए-जहांगीरी.

लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है…
मगर इनके अलावा कुछ स्वतंत्र लेखक भी थे. वो भी अपने पीछे उस वक़्त का इतिहास छोड़ गए हैं. जैसे, अकबर के दौर में हुए बदायूनी. जिन्होंने रामायण का फ़ारसी में अनुवाद किया. इतिहास भी लिखा. उनकी लिखी क़िताब ‘मुंतख़ाब-अल-तवारीख़’ अकबर को थोड़े अलग नज़रिये से देखती है. उस दौर का इतिहास जानने के लिए सबसे ज़रूरी सोर्स में गिनी जाती है.

अब के जमाने में सरकारी मीडिया या सरकार परस्त मीडिया उन्हीं दरबारी इतिहासकारों की तरह है. उनका लिखा, सच्चा या झूठा, आने वाले दौर का सरकारी इतिहास है. लेकिन इस दौर में भी, फिर चाहे चीन जैसी तानाशाही क्यों न हो, कुछ स्वतंत्र लेखक अपना देखा-भोगा सच पीछे छोड़ जाएंगे. उनका लिखा, उनका बताया सच हमेशा सरकारी सच पर भारी पड़ेगा.


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